महाभारत ! तेरे रूप अनेक !!

महाभारत ! तेरे रूप अनेक !!

बंगलोर, 20 अक्टूबर 2016

उत्तम प्रदेश !  जी हां, हां, सही समझे आप, वही उत्तम प्रदेश ! वहां चुनावी महासमर के पहले पारिवारिक महाभारत ! बिलकुल सही , महाभारत ! तेरे रूप अनेक ।

इस महाभारत में भीष्मपितामह और धृतराष्ट्र, दोनों की ही आत्माएं एक ही शरीर में हैं, हालांकि इस दफे वे दोनों ही ओरिजनल महाभारत के भीष्म और धृतराष्ट्र की तरह सिंहासन से बंधे हुए नहीं हैं, फिर भी,यह नहीं कहा जा सकता कि धृतराष्ट्र वाली आत्मा को पुत्रमोह नहीं है, क्योंकि उसके एक ही पुत्र तो था नहीं , कहीं दूसरे वाले को सिंहासन वाले की ओर से उपेक्षित समझ कर धृतराष्ट्र सिंहासन वाले से छिटक कर दूसरे वाले के मोह में फंसे गए हों, इसीलिए मोह तो है ही। लेकिन इस बार शकुनी मामा नहीं, चाचा हैं और शायद यह शकुनी ओरिजनल शकुनी से ज्यादा चतुर है , क्योंकि उसने तो भीष्म + धृतराष्ट्र = कौरव को ही सिंहासन वाले युवराज से अलग कर दिया। बिदुर चाचा तो चाचा ही हैं, क्योंकि थोडी दूर के जो हैं।

मूल महाभारत में एक और रूप परिवर्तन हुआ है – इस बार सिंहासन महाराज धृतराष्ट्र के पास नहीं है, बल्कि युवराज के पास है जो अब महज युवराज या कठपुतली राजा न रह कर पूरी तरह महाराज बन चुका है तथा उससे भी दस कदम आगे बढते हुए कौरव का चोला उतार कर दुर्योधन के बदले पाण्डव खेमे का अर्जुन बनने की ओर है, भला उसकी इतनी हिमाकत धृतराष्ट्र को नागवार कैसे नहीं गुजरेगी? सो महाभारत चालू आहे ।

शायद धृतराष्ट्र को अभी भी अपने पहले वाले रूतबे का ही गुमान है और समझता है कि वह जिसके सर पर हाथ रख देगा , वही राजा हो जाएगा। वह इस सच्चाई को समझ नहीं पा रहा है कि उसके दिन लद गए हैं या सच्चाई समझ कर भी नासमझ बनने का दिखावा कर रहा है और या तो अपनी भद्द कराने पर तुला हुआ है अथवा समानांतर क्षत्रप बनने का ख्वाब देखने वाले शकुनी को उसके ही पेट में घुस कर पटखनी देना चाह रहा है, क्योंकि वह अपनी जीवनभर की पूरी कमाई को किसी और के हाथों में जाने देगा, इसमें वेदव्यास को संदेह है, इसलिए महाभारत का रूप परिवर्तन कर उसे फिर से लिख रहे हैं।

भीष्म – धृतराष्ट्र के निर्देशों और शकुनी की सलाहों को दरकिनार कर सिंहासन ने अपनी प्रजा के जीवन को सुखद बनाने और युवा पीढी को नई तकनीक से लैस कर उन्नतिशील बनाने, अपने राज को विश्व के नक्शे में महत्व दिलाने के भरपूर प्रयास किए, उसके सकारात्मक परिणाम भी देश – दुनिया को देखने को मिले, किंतु सलाहकार शकुनी को लगा कि ऐसे में तो सिंहासन जनता में खुद का वजूद बना लेगा , बस क्या था ? शकुनी ने उसके काम में अडंगा डालने के लिए कई तरह की चालें चलीं , फिर भी, सिंहासन अपनी योजना को कार्यरूप देने में मशगुल रहा और जब उसके प्रयासों की सराहना जनता करने लगी तो शकुनी ने सिंहासन को “ बच्चा, नासमझ, जमीनी हाकीकत से अनजान, हवाहवाई , विदेशी दृष्टिकोण वाला , अनुभवहीन, प्रशासनिक कार्यों में कच्चा “ आदि कह कर उसकी उपलब्धियों को कमतर बताने , और यदि कहीं कुछ अच्छा हुआ तो उसका श्रेय खुद लेने की जुगत में भिड गया । उन सब षडयंत्रों के बावजूद जब सिंहासन की छवि धृतराष्ट्र के शासन और शकुनी की सलाहों के विपरीत्त अधिक जनप्रिय होने लगी तो शकुनी ने धृतराष्ट्र के कान भरने शुरू कर दिए, धृतराष्ट्र ने भी खुल कर कहना शुरू कर दिया कि वर्तमान महाराज को महाराज क्या , युवराज भी कोई नहीं मानता , अगर वह धृतराष्ट्र का बेटा नहीं होता; बस, परिवार में असली महाभारत की शुरूआत यहीं से हो गई।

अब सवाल है कि धृतराष्ट्र चाहता क्या है ? सीधी बात है , सम्राट का शासन अभी दो – ढाई वर्ष और रहेगा, इसीलिए हर क्षत्रप सम्राट के सामने अपना महत्व सिद्ध करना चाहता है ताकि उस पर लगे आरोपों में उसे सहुलियत हासिल होती रहे। धृतराष्ट्र ने इस तरह के कई करतब दिखाए हैं, किंतु हर बार अपना मुंह वैसे ही जला बैठे, जैसे मेरे गांव के विश्वनाथ भाई और महेन्द्र जी जला बैठे थे ।

बात यों है कि मेरे गांव में विश्वनाथ भाई और महेन्द्र जी का परिवार संयुक्त था, परिवार बडा था, दूध – दही की भरपूर व्यवस्था थी किंतु घर के सदस्यों की संख्या की तुलना में कम पड जाती थी। घर की औरतें दूध खौला कर और उसे ठंढा कर सुसुम (हल्का गर्म) रह जाने पर छींके पर टांग देतीं और शाम को मटका उतार कर दूध में जोरन डालतीं ताकि कल सुबह तक दही अच्छी तरह जम जाए।  कुछ दिनों से काकी, विश्वनाथ भाई की मां, यह देख कर दंग रह जा रही थीं कि दूध की सतह के ऊपर जमी हुई छाली (मलाई की परत) टूटी भी नहीं है जिससे बिल्ली द्वारा दूध पी जाने की आशंका होती , फिर भी मटके में दूध कम हो गया लगता था।

दरअसल, छींका डेंहरी और मचान के बीच में था। विश्वनाथ भाई और महेन्द्र जी , दोनों ने पपीते की दो लम्बी – लम्बी डालियां तोडीं, यह सब जानते हैं कि पपीते की डालियां अन्दर से पूरी तरह खोखली होती है जिसे फोफी कहते हैं, एक तरफ से विश्वनाथ भाई मचान पर और महेन्द्र जी दूसरी तरफ से डेंहरी पर एक – एक फोफी ले कर बैठ जाते थे और दूध की छाली की परत में उन्हें वैसे से ही डुबो कर दूध पी जाते थे जैसे गले का व्यवसायी अनाज की बोरी में सींकनी डाल कर एक – आध किलो अनाज हर बोरी से निकाल लेता है और निशान भी नहीं छोडता है। हर दिन की भांति उस दिन भी दोनों ने पपीते की लम्बी फोफी डाल कर दूध का जोर का सुरूका मारा, बस क्या था, कंठ तक जला बैठे , दोनों बाप – बाप करते धडाम से नीचे गिर पडे । वस्तुत: उस दिन काकी ने खौलता हुआ दूध ही छींके पर टांग दिया था और ये दोनों कृष्ण – बलराम उससे अनभिज्ञ थे, फलस्वरूप अपना मुंह जला बैठे । इस तरह दूध के चालाक चोर पकडे गए। धृतराष्ट्र भी कई बार ऐसे ही अपना मुंह जला बैठे हैं, क्योंकि अब काकियां समझदार हो गई हैं और चोरी पकडने का हुनर सीख गई हैं। फिर भी, नहीं मानते धृतराष्ट्र।

दूसरा सवाल यह है कि क्या दूसरों से लडने से पहले पारिवारिक महाभारत सुलझ जाएगा ? लगता तो नहीं, क्योंकि बुजूर्ग धृतराष्ट्र यदि सुलझाना भी चाहे तो शकुनी सुलझने नहीं देगा। तीसरा सवाल, यदि पारिवारिक महाभारत सुलझ भी जाए तो क्या यह कुनबा महासमर फतह कर पाएगा? बडा मुश्किल है इस सवाल का उत्तर देना, क्योंकि एक तरफ हमारे राज्य की जनता बेहद सरल हृदय और भावुक है, जो सहानुभूति और अपनेपन की थोडी – सी आंच लगते ही सारी कठोरता भुला कर मक्खन–सी पिघल जाती है, तो दूसरी तरफ वादाफरोशों को नाक रगडने पर भी माफ नहीं करती। इसीलिए उसके रूझान को समझना बरमूडा त्रिकोण के रहस्यों को सुलझाने से कम मुश्किल नहीं है।

चौथा  सवाल, और यदि राज्य का बंटवारा हो जाए तथा दोनों धडे अपने – अपने झंडे के तले लडें तो ? यह है तो अतिवादी सोच किंतु लग रहा है कि होने वाला ऐसा ही है। तो फिर सिंहासन वाला युवराज आगे होगा और धृतराष्ट्र + भीष्म = कौरव पिछड जाएगा और शकुनी कहीं का नहीं रहेगा।

अब देखना है कि कल का युवराज और आज का महाराज कल का अर्जुन बनता है या कुछ और ?

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

बंगलोर , 20 अक्टूबर 2016

मो. 9310249821

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