डायनैमिक और डाइनामाइट

(आवाज़ दो)

बंगलोर, 15 अगस्त 2015

स्वतंत्रता दिवस पर देश – विदेश में  रहने वाले तमाम हिन्दुस्तानियों का क्रांतिकारी अभिनन्दन
व स्वतंत्र चेतना और मानवीय संवेदना का सम्मान करने वालों को नमन !

“ न इज़्ज़त दे, न अज़मत दे, न सूरत दे, न सीरत दे  ;
  वतन  के  वास्ते  या  रब, मुझे मरने की हिम्मत दे ”

नज़ीर बनारसी के इन अल्फाजों का एक – एक हर्फ जीने वाले जोशीले, जज़्बाती व जुनूनी इंक़लाबी वतनपरस्त हिंदुस्तानियों के दम पर आज़ाद हैं हम आज । सवाल उठता है कि उस आज़ादी को बरकरार रखने के लिए, उसे मजबूत बनाने के लिए, उसे देश के जन – जन  और कण – कण  तक पहुंचाने के लिए हम और आप क्या कर रहे हैं, अल्लमा इकबाल ने भी कभी कहा था –

“ पत्थर की मूरतों में समझा है तू खुदा है
   हमको तो  वतन का  हर  जर्रा  देवता है ”

मैं पूरे यकीन के साथ यह नहीं कह सकता कि ईश्वर है या नहीं, क्योंकि मैं आस्थावानों की आस्था को आहत करना नहीं चाहता और उसे नहीं मानने वालों से कोई अपील भी नहीं करना चाहता, लेकिन यदि वह है और सब कुछ वही करता है तो मैं कृतज्ञ हूं उसका , जिसने मुझे इस लायक बनाया कि मैं अपनी भावनाओं को शब्द दे सकूं , इसीलिए पूरे यकीन के साथ यह कह सकता हूं कि जिस तरह ईश्वर को  काबा, कैलाश , मंदिर, मस्जिद, गिरिजा या गुरूद्वारा जैसे तीर्थ स्थानों में  ही नहीं, जन-जन और कण-कण में कभी भी, कहीं भी व किसी भी रूप में ढूंढा जा सकता है,  बशर्त उसे पाने की ललक में उसके बहाने कुछ और पाने की सनक शामिल न हो, ठीक उसी तरह देशभक्ति व वतनपरस्ती को साबित करने के लिए क्रांतिकारी बलिदानियों की तरह जेल जाने या फांसी पर झुलने के अवसर का इंतजार करना जरूरी नहीं है, क्योंकि वो दौर कुछ और था ये दौर कुछ और है

अब तो उन शहीदों के सपनों को पूरा करने के लिए हमें केवल अपने कर्त्तव्यों को ईमानदारी और निष्ठा से पूरा करना है , निजी हितों के लिए समाज के हितों की अनदेखी नहीं करनी है और राष्ट्रीय सम्पत्ति को वैयक्तिक स्वार्थ–सिद्धि का साधन नहीं बनने देना है, इस तरह अब तो देशभक्ति सिद्ध करने के लिए मौका हर कदम पर मौजूद है।  क्योंकि क्रांति की सरजमीं हमेशा दुश्मनों के खून से लाल ही नहीं होती, बल्कि अपनों के पसीने से तर –ब- तर हो कर लहलहाती फसलों से हरीभरी भी होती है , क्योंकि  क्रांति की हवाओं में हमेशा गोले बारूद का जहरीला धुआं ही नहीं फैलता, बल्कि कल-कारखानों से निकलता हुआ धुआं खुशहाली का बादल  बन  बरसता भी है, क्योंकि इंकलाब के आसमां में हमेशा जांबाज वाज़ ही परवाज़ नहीं भरते, बल्कि आज़ादी और भाईचारे का पैगाम ले अमन के परिंदे भी पर तोलते हैं, इसीलिए तो कभी राज्य क्रांति होती है तो कभी सिपाही क्रांति, कभी अहिंसा और असहयोग क्रांति  होती है तो कभी सम्पूर्ण क्रांति, कभी हरित व श्वेत क्रांति होती है तो तो कभी नीली व पीली क्रांति, और अब , आज जरूरत है शब्द क्रांति की, देश के दामन पर दाग़ लगाने वाले राष्ट्रीय स्वाभिमान में वाधक घातक हर आदमी के खिलाफ शब्द उछालने की ।

वस्तुत: देशभक्ति केवल वे ही नहीं करते जो बर्फीली पहाडियों या उबलते रेगिस्तानों में सरहदों की रक्षा करते हुए संगीनों के साये में जिन्दगी गुजारने वाले सेना के जवान हैं , देशभक्ति वे भी करते हैं जो उन जवानों को रसद पहुंचाने के लिए मुसलाधार बारीशों या चिलचिलाती धूप अथवा हड्डियों को गला देने वाली कंपकपाती ठंढ में थरथराते हाथों से खेतों में हल चलाने वाले किसान हैं और देशभक्ति तो वो बहू – बेटियां  व माताएं-बहनें भी करती हैं जो उन किसानों के लिए रोटियां सेंकने में अपनी जिन्दगी के हसीन लम्हों को जला डालती हैं या जो उन जवानों को निश्चिंत होकर अपना फर्ज़ अदा करने देने के लिए अपनी चुडियों की खनक को अनसुना कर देती हैं, अपने हाथों की मेहंदी व  पांवों के महावर को बेडियां नहीं बनने देतीं अथवा अपनी कलाइयों या कोख के सूना होने का गम उन तक पहुंचने नहीं देतीं; देशभक्ति हम भी करते हैं जो सुबह से शाम तक घरों या दफ्तरों में पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपनी ड्युटी करते हैं। वैसे ही, जन गण मंगल के लिए मंगल तक को नाप लेने वाले अनुसंधानों में , खेत–खलिहानों में, कल-कारखानों में, हाट-बाजारों में या नदी- नालों में पूरी संजीदगी और ईमानदारी से अपने काम को अंजाम देने वाले लोग भी उतने ही देशभक्त हैं जितने कि ये जवान, ये किसान या हम हम। ये सभी लोग प्राणों की आहुति दे कर आज़ादी हासिल कराने वाले क्रांतिकारी बलिदानियों और तन-मन-धन व सारा जीवन होम कर देने वाले स्वतंत्रता संग्रामियों के सपनों को साकार करने में साझीदार हैं , उनके तप – त्याग से प्राप्त स्वाधीनता को बरकरार रखने और मजबूत बनाने में मददगार हैं, सवाल उठता है कि आप इन में से कौन हैं ,क्या हैं और कहां हैं?

आईए, आज़ादी की 68वीं वर्षगांठ पर हम अपने गिरेवान में झांकें, अपने ज़मीर को टटोलें, यदि सबके सामने नहीं तो घर में अकेले में ही आदमकद आईने के सामने खडे हो कर अपनी ही आंखों में आंखें डाल कर खुद से यह सवाल पूछें कि क्या एक भी दाना हमने ऐसा खाया जो हमने कमाया नहीं था ?   ऐसा कोई एक भी पैसा अपने लिए खर्च किया जो हमारी मेहनत से अर्जित नहीं था ? क्या ऐसा कुछ भी अपने लिए उपयोग किया जिस पर नैतिक या कानूनी हक नहीं था ? क्या स्वार्थ के लिए अपने अधिकारों का दुरूपयोग किया ? क्या किसी के जायज हक को दरकिनार करा कर अपने नाजायज हित को ऊपर करने के लिए अपने पॉवर , पैसा या पैरवी का दुरूपयोग किया ? उत्तर यदि ना है तो आप भी देशभक्त हैं, उत्तर यदि हां है तो आप भी देशद्रोही हैं, देशभक्ति या देशद्रोह को मात्रा में आंकने की प्रवृत्ति खुद को छलावा देने के साथ-साथ राष्ट्र को धोखा देना और मानवता को शर्मसार करना है।

अच्छा बनने, अच्छाई को समर्थन देने और बुराई का विरोध करने की सीख दुनिया का हर धर्म देता है, हो सकता है कि आप समाज और राजनीति, साहित्य और संस्कृति, सरकारी – अर्धसरकारी – गैरसरकारी सेवाओं या कारबार से जुडे व्यक्ति हों अथवा इन सबसे अछूता धर्म ही कर्म हो आपका, तब भी यह सवाल उठेगा कि क्या सच कहने का साहस आप रखते हैं, सच सुनने का धैर्य आप के पास है, बुराई का विरोध करने की हिम्मत आप जुटा पाते हैं ?  कहीं “कोउ नृप होई हमार का हानि” वाली सोच से त्रस्त तो नहीं हैं आप, कहीं “क्या करें, बडों का दबाव था” जैसी हीन भावना और ब्यर्थ के बहानों से ग्रस्त तो नहीं हैं आप ? “अकेला चना भांड नहीं फोड सकता” जैसे पराजित भाव-बोध के शिकार तो नहीं हैं आप ?  याद रखिए, आज की समस्याओं के समाधान की शक्ति गोले –  बारूद या बन्दूक में नहीं, बल्कि शब्द की शमशीर में है। आज वक्त है शब्दक्रांति का, आवाज़ उठाने का, ये मत सोच कि आवाज़ उठाने से क्या हासिल होगा ? तुम ठीक समय पर , ठीक तरह से, ठीक – ठीक आवाज़ दो, ठोस – ठोस परिणाम ठोक – ठोक के मिलेंगे। इसीलिए दूसरी, तीसरी या चौथी आज़ादी की चाहत के पहले अपने ज़मीर को जगा क्योंकि जगा हुआ ज़मीर न गुलाम हो सकता है न बुज़दिल। नेता जी ने कहा था – “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” , मैं कहता हूं- “तुम ग़लत की खिलाफत और सही की हिफाज़त में आवाज़ दो, तुम्हारा जमीर खुद –ब- खुद आज़ाद हो जाएगा”।

तो आ ! देशभक्तो आ ! वतनपरस्तो आ ! देशभक्तों की हिफाज़त में बोल, देशद्रोहियों की खिलाफत में बोल,   दमदार – मददगार – ईमानदार आवाज़ उठा, अपने देशभक्त होने का सबूत दे , देश की आवाज़ बोल, देश की आवाज़ सुन, देश की आवाज़ लिख ; वक्ता है तो बोल कर लिख, गूंगा है तो लिख कर बोल, बहरा है तो देख कर सुन ! अंधा है तो सुन कर बोल ! वरना मरने के बाद भी यह सवाल तुम्हारा पीछा करता ही रहेगा कि —

“ जिस पर गिर कर उदर दरि से तुमने जन्म लिया   है
   जिसका खा कर अन्न, सुधा सम नीर समीर  पीया है
  वह  स्नेह  की  मूर्ति  दयामयी  माता तुल्य मही  है
  उसके प्रति  कर्त्तव्य  तुम्हारा  क्या  कुछ शेष नहीं है”?

तो , अपनी  आपबीती के माध्यम से मैं आप से बात करता – कराता हूं ऐसे ही शेष कर्त्तव्यों से , मैं अपनी जांबाजी सुनाने – दिखाने के लिए नहीं, किसी का अपमान या सम्मान करने के उद्देश्य से नहीं, किसी को नीचा दिखाने या ऊंचा उठाने की मंसा से नहीं,  बल्कि यह दिखाने – समझाने के लिए अपनी आपबीती आप को सुनाने जा  रहा हूं कि ऐसा भी हो सकता है, ऐसा भी और ऐसे भी कुछ किया जा सकता है। वीरता – कायरता या आत्ममुग्धता – आत्मश्लाघा आदि – आदि पर आप विचार करते रहें और मूल्यांकन दर मूल्यांकन भी करते रहें, आरोप दर आरोप भी लगाते रहें , लेकिन तनिक भी और जहां कहीं भी आप को लगे कि मैं सच से परे जा रहा हूं तो बेधडक हो कर इसी पेज पर अपनी टिप्पणियों के बाउंसर फेंकने या यदि सही लगे तो समर्थन देने से मत चुकिए क्योंकि —

“समर शेष  है, नहीं पाप का  भागी  केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका  भी अपराध ”

एक बार फिर स्वाधीनता दिवस की बधाईयां और सच कहने – सुनने की इच्छा एवं क्षमता के लिए शुभकामनाएं।   जय हिन्द !

( इसे पोस्ट करने के पहले मैं  लाल किले की प्राचीर से  माननीय प्रधानमंत्री जी का देशवासियों के नाम संदेश सुन लेना चाहता था, इसीलिए इसे पूर्वाह्न  में नहीं, अपराह्न  में पोस्ट कर रहा हूं।  मेरा ब्लॉग    shreelal.in  शुरू हो रहा है ,  मेरे फेसबुक  shreelal prasad  नोट के साथ – साथ ब्लॉग पर भी मेरे पोस्ट को देखा जा सकता है ।  मेरे   फेसबुक नोट पर 03 नवम्बर 2014 से आजतक किए गए सभी पोस्ट  इस ब्लॉग पर भी  फिर से  प्रदर्शित कर दिए जा रहे हैं  ।

अमन श्रीलाल प्रसाद
बंगलोर, 15 अगस्त 2015
मो. 9310249821

18,828 thoughts on “डायनैमिक और डाइनामाइट

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