वर्चस्व का महासमर 1: रिज़र्व बैंक बनाम वित्त मंत्रालय एवं गृहमंत्रालय

  वर्चस्व का महासमर 1: रिज़र्व बैंक बनाम वित्त मंत्रालय एवं गृहमंत्रालय

 डायनैमिक और डाइनामाइट (अकथ कथा : आत्मकथा)

अहमदाबाद , 22 दिसम्बर 2016

गीता का ज्ञान देना आसान है किंतु मोह – पाश से मुक्त हो कर अपनों से युद्ध करना मुश्किल, इसलिए कृष्ण बनने से कठिन कार्य अर्जुन बनना है; तभी तो मैं कृष्ण की तरह वर्षों से अर्जुन की तलाश करता रहा।

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वैसे ही, चाणक्य बनने से अधिक दुष्कर कार्य चन्द्रगुप्त बनना है; तभी तो मैं चाणक्य की तरह दशकों तक चन्द्रगुप्त को ढूंढता रहा। हम इस तलाश से

रू-ब-रू होंगे, अगली तीन कडियों में । प्रस्तुत है पहली कडी।

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भारत सरकार ने देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया था। दिल्ली स्थित सरकारी क्षेत्र के बैंकों और वित्तीय संस्थाओं के प्रशासनिक प्रधान उस समिति के सदस्य थे और मैं सचिव था। समिति का मुख्य काम सदस्य कार्यालयों में राजभाषा नीति का कार्यान्वयन कराना और  उसकी समीक्षा करना था। उसकी बैठकें वर्ष में दो बार होती थीं, वित्तीय वर्ष 2010 – 11 की दूसरी बैठक दिसम्बर 2010 में होनी थी। बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में राजभाषा विभाग के सचिव को आमंत्रित करना था। वरिष्ठ आईएएस अफसर श्रीमती वीणा उपाध्याय उन दिनों राजभाषा विभाग में सचिव थीं।

मैंने सचिव के सचिवालय को फोन कर मिलने का समय मांगा तो मुझे बताया गया कि मिलने के उद्देश्य और अपने पदनाम का उल्लेख करते हुए एक अनुरोध पत्र फैक्स कर दीजिए। मैंने फोन पर ही उन्हें पूरी बात बता दी, फिर भी उनहोंने पत्र भेजने को कहा। मुझे बडा आश्चर्य हुआ और सच कहूं तो मुझे बहुत ही नागवार गुजरा। मैंने थोडी – सी रुखाई, किंतु शांत व सौम्य स्वर में कहा कि अंगरेजों के जमाने वाली नौकरशाही अभी भी नहीं गई? उन्होंने बडी विनम्रता के साथ कहा – “ सर, हम तो उनके हुक्म के अनुसार ही चलेंगे, आप दो लाइन का एक पत्र अभी ही फैक्स कर दीजिए, अभी वह चेम्बर में बैठी हुई हैं, मैं आपका पत्र तुरंत उनके सामने प्रस्तुत कर दूंगा ; आगे उनकी मर्जी ”। मैंने वैसा ही किया।

पत्र फैक्स करने के बाद मैं मन ही मन स्वयं को क्षुब्ध महसूस कर रहा था क्योंकि मैं अपने छात्र जीवन से ले कर अब तक अनेक आईएएस एवं आईपीएस अफसरों से मिला था, जिनमें केन्द्र और राज्य सरकारों के सचिव, फील्ड में कार्यरत डिविजनल कमीशनर, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, एसपी, आईजी, डिजीपी तथा अन्य वरिष्ठ अधिकारी रहे थे, उनमें से कई सीनियर अफसर तो मुझसे मित्रवत मिलते थे और कभी – कभी खुद ही फोन भी कर लेते थे। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि डिविजनल कमीशनर से मिलने मैं पहुंचता, उस वक्त वे अपने डिविजन के जिलाधिकारियों की बैठक कर रहे होते, फिर भी मेरे आने की सूचना मिलते ही मुझे बैठक में ही बुला लेते और जिलाधिकारियों से मेरा परिचय भी कराते; हालांकि उनमें से कई जिलाधिकारी भी मुझे पहले से ही जान रहे होते। परंतु, मिलने के लिए पत्र लिख कर समय मांगने की नौबत पहली बार आई थी। मैं उसी उधेडबुन में था कि थोडी ही देर में मुझे फोन पर बताया गया कि मैं नौ बजे सचिव से मिल सकता था, थोडी राहत–सी महसूस हुई।

चूंकि हमारा वह वार्तालाप दिन के करीब तीन बजे हो रहा था, इसीलिए मैंने स्वाभाविक रूप में समझा कि मिलने का समय कल सुबह 09 बजे का दिया गया होगा। मैंने पूछा कि क्या वे कल उतनी सुबह कार्यालय आ जाएंगी? मुझे बताया गया कि कल सुबह 09 बजे का नहीं, आज ही रात के 09 बजे का समय मुझे दिया गया था, मुझे यह भी बताया गया कि वे कुछ ही दिनों पहले राजभाषा विभाग में आई थीं, वे रोज 9 – 10 बजे रात तक कार्यालय में कार्य करती थीं और पेंडिंग फाईलों को निपटाने के लिए घर भी ले जाती थीं। मेरे लिए यह आश्चर्य का एक नया विषय था। बैंकों में तो सीनियर अफसर रात के 09, 10 या कभी – कभी 11 – 12 बजे तक बैठकें करते थे, मैं स्वयं उसका भुक्तभोगी था, किंतु मंत्रालयों के सचिव सीनियर आईएएस अफसर भी उतनी देर रात तक कार्यालय में बैठते थे , कार्य करते थे, आगंतुकों से मिलते थे और पेंडिंग फाईलें निपटाने के लिए घर भी ले जाते थे ! पता नहीं क्यों, यह जान कर मुझे थोडा संतोष और सुखद आश्चर्य हुआ था।

राजभाषा विभाग का सचिव राजभाषा नीति के कार्यान्वयन के लिहाज से देश का सर्वोच्च अधिकारी होता है जिसका आदेश केन्द्र सरकार के सभी मंत्रालयों, विभागों, कार्यालयों, उपक्रमों, बैंकों व वित्तीय संस्थाओं आदि में समान रूप से लागू होता है। इसीलिए मैंने अपने बैंक एवं समिति (जिसका मैं सचिव था) की तब तक की उपलब्धियों, गतिविधियों और भावी कार्ययोजनाओं का सारसंक्षेप तैयार करा कर उसकी प्रिंटआउट के साथ – साथ पॉवर प्वाइंट प्रेजेंटेशन की सीडी भी अपने पास रख ली थी, ताकि सचिव कुछ पूछें तो या नहीं भी पूछें तो भी अनुमति ले कर अपने बैंक एवं समिति के कार्यों के बारे में उन्हें ऑडिओ विजुअल तरीके से ठोस जानकारी दे सकूं।

मैं रात के ठीक 9 बजे खान मार्केट लोकनायक भवन की तीसरी मंजिल पर स्थित राजभाषा विभाग, भारत सरकार के सचिव श्रीमती वीणा उपाध्याय के कार्यालय में उपस्थित हुआ, उनके निजी सचिव ने बताया कि सचिव महोदया मेरी ही प्रतीक्षा कर रही थीं। मैं ने जैसे ही उनके चेम्बर में प्रवेश किया, बडी तत्परता से अपनापन भरे लहजे में उन्होंने कहा – “ आईए , आईए प्रसाद जी, बैठिए ”। ऐसा लगा कि वे मुझे पहले से ही जानती हों, हालांकि हम पहली बार मिल रहे थे। मैं ने , महसूस किया कि जिस तरह मैं उनसे मिलने के लिए पूरी तैयारी के साथ गया था, वैसे ही शायद उन्होंने भी मेरे जाने के पहले ही मेरे बारे में बहुत कुछ पता कर लिया था, अच्छा लगा।

बैठक बहुत ही सौहार्दपूर्ण रही। मैंने अपने बैंक और समिति के राजभाषा संबंधी कार्यकलापों के बारे में उन्हें बताया, उन्होंने भी राजभाषा विभाग में जो कुछ नया करने की योजना बनाई थी, उसके बारे में मुझे बताया, साथ ही, हमारी समिति की बैठक में आने की सहमति भी दे दी। उनसे मिल कर मेरा क्षोभ जाता रहा, फिर भी, उन्हें मैंने इतना जरूर बता दिया कि पत्र लिख कर मिलने का समय मांगने के लिए कहना एक उबाऊ प्रक्रिया अपनाना था, जिससे अंग्रेजों के जमाने की सख्त नौकरशाही की बू आती थी और व्यक्तित्व के जटिल व अलोकप्रिय होने का संदेश भी जाता था।

मैंने यह भी कहा कि राजभाषा विभाग के सचिव के रूप में उन्हें अधिक सहज और सुलभ होना चाहिए था, वह उनका एक अतिरिक्त गुण माना जाता, वरना जब मुझसे, भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय राजधानी के लिए गठित राजभाषा समिति के सचिव से , मिलने में इतनी लम्बी प्रक्रिया होगी तो एक आम राजभाषा अधिकारी अपनी समस्याएं सचिव को सुनाना चाहेगा तो वह कैसे मिल सकेगा ?

मैंने सचिव को यह भी कहा कि गृह मंत्रालय प्रति वर्ष हिन्दी में उत्कृष्ट कार्य करने वाले सरकारी कार्यालयों और व्यक्तियों आदि को राजभाषा संबंधी देश का सर्वोच्च पुरस्कार – “इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कार” (मोदी सरकार ने उसका नाम बदल कर ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार’ कर दिया है) भारत के राष्ट्रपति के हाथों से ग्रहण करने का अवसर उपलब्ध कराता था। केन्द्र सरकार के मंत्रालयों, कार्यालयों, उपक्रमों तथा प्रतिष्ठानों आदि के लिए तो पुरस्कार निर्धारण में गृह मंत्रालय राजभाषा विभाग स्वतंत्र रीति – नीति अपनाता था किंतु बैंकों के मामले में कोई स्वतंत्र रीति – नीति न अपना कर उसी सूची को आधार मान कर निर्णय ले लेता था जो भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उनके अपने राजभाषा पुरस्कारों के लिए बनाई गई होती थी। उस सूची को तैयार करने में केवल भारतीय रिज़र्व बैंक का हाथ होता था क्योंकि उसके लिए गठित प्रत्यक्ष नमूना जांच टीम में गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालय का कोई भी प्रतिनिधि नहीं होता था, जबकि उस टीम के हाथों में पर्याप्त मात्रा में विशेष अंक होते थे जो निर्णयों को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखते थे।

मैंने शिकायती लहजे में कहा कि भारत सरकार के सर्वोच्च राजभाषा पुरस्कारों के निर्धारण के लिए गृह मंत्रालय राजभाषा विभाग द्वारा गठित निर्णायक समिति के पास रिज़र्व बैंक द्वारा पहले ही ले लिए गए निर्णयों पर सहमत होने के अलावा और कुछ भी नया करने को नहीं होता था , जबकि वे पुरस्कार भारत सरकार के होते थे। इसका सीधा मतलब था कि भारत सरकार के अधिकारों का उपयोग रिज़र्व बैंक के अधिकारी करते थे।

इसके अलावा मैं ने यह भी कहा कि केन्द्र सरकार के मंत्रालयों को दिए जाने वाले पुरस्कारों की संख्या उनमें कार्यरत कार्मिकों की संख्या के आधार पर निर्धारित होती थी और उपक्रमों को ‘क’ , ‘ख’ और ‘ग’ भाषा  क्षेत्रवार अलग – अलग पुरस्कार दिए जाते थे, जबकि बैंकों के मामले में तीनों क्षेत्रों को मिला कर पुरस्कार दिए जाते थे जो , मेरी समझ से, प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध तो था ही, उससे कई तरह की असंगतियां भी पैदा हो जाने का अंदेशा था। फलस्वरूप , राजभाषा पुरस्कारों के मूल में निहित प्रेरणा व प्रोत्साहन से हिन्दी का प्रयोग बढाने का सदोद्देश्य तिरोहित हो जाने की संभावना थी। इसलिए भारत सरकार को वह कार्य रिज़र्व बैंक से ले कर पूरी तरह अपने नियंत्रण में कर लेना चाहिए । लगातार इतना सब कुछ कहने के बाद मैं एकाएक चुप हो गया और उनकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लगा।

सचिव प्रसन्न दिख रही थीं, उन्होंने बडे संजीदा स्वर में कहा –      “ बोलते रहिए, और भी कुछ कहिए, आपको सुनना अच्छा लग रहा है, इतने काम की बातें और वह भी इतनी साफगोई से आज तक किसी ने भी नहीं कही थी ” । मैंने बडे आदर के साथ कहा – “ मिलना सहज और सुलभ हो तो हम आगे भी बातें करते रहेंगे ”। वे मेरा ईशारा समझ गईं, हंसते हुए उन्होंने कहा कि वह पत्र वाला सिस्टम आज से ही बन्द । वे हमारी समिति की बैठक में आईं, बहुत अच्छा बोलीं, मेरी प्रशंसा में भी बोलीं और मेरे सुझावों पर कार्य शुरू कर देने का स्पष्ट संकेत भी दे गईं । उनकी गरिमापूर्ण उपस्थिति से बैठक बेहद सफल रही।

उसके बाद श्रीमती वीणा उपाध्याय से कई बार मुलाकातें हुईं, कभी मेरी पहल पर , कभी उनकी पहल पर; उन्होंने बताया था –“ बैंकों को दिए जाने वाले इंदिरा गांधी राजभाषा पुरस्कारों के लिए मूल्यांकन मानदण्ड का कस्टोमाइजेशन और मानकीकरण किया जा रहा है ”। उन्होंने मेरे सुझावों को बहुत ही महत्वपूर्ण और व्यावहारिक बताते हुए कहा था – “20 वर्षों से अधिक का समय बीत गया इन पुरस्कारों को शुरू हुए , अब तक इस विषय पर इस रूप में सोचा नहीं गया, यह अपनेआप में आश्चर्य का विषय है ”।

कुछ दिनों बाद,  2011 में, संसदीय राजभाषा समिति का निरीक्षण दौरा कुल्लू मनाली में हुआ। समिति में सचिव वीणा जी भी थीं। दौरे के समन्वय का कार्य हमारे बैंक को सौंपा गया था और नियमानुसार समस्त प्रबंध हमें निरीक्षित होने वाले सभी बैंकों एवं संस्थाओं की ओर से संयुक्त रूप से करने थे। एक अधिकारी ने मुझे बताया कि सचिव यहां के प्रबंध से नाखुश हैं और नाराज हो कर राज्य सरकार के गेस्ट हाउस में जा रही हैं। चूंकि वे हमारी अतिथि के साथ – साथ नियमानुसार स्टेट गेस्ट भी थीं, इसीलिए यदि राज्य सरकार के गेस्ट हाउस में रहने के लिए जा रही होती तो कोई विशेष बात नहीं समझी जाती, परंतु यदि प्रबंध से नाखुश हो कर जा रही हों तो अवश्य सोचनीय विषय था , इसीलिए मेरे महाप्रबंधक बी सी निगम चिंतित हो गए।

मैं तुरंत सचिव वीणा जी से मिला , उन्होंने बडे सम्मान और निश्चल हृदय से कहा – “ यहां के चीफ सेक्रेटरी ने राज्य सरकार के आतिथ्य में ठरने के लिए मुझसे अनुरोध किया था। आप चिंता न करें प्रसाद जी, जिसने भी आप से मेरी नाराजगी की बात कही है, वह या तो मेरा खैरख्वाह बनने की ज्यादा कोशिश कर रहा है या मेरा नाम ले कर आप पर बेजां धौंस जमाना चाह रहा है ” । वे कहीं नहीं गईं और भूतल पर एक साधारण कमरे में रहीं। इतनाही नहीं, वहां लॉन में लगे फूलों की क्यारियों में मेरे साथ खडी हो कर उन्होंने अपने मोबाईल में तस्वीर भी खिंचवाई। मेरे जी एम निगम साहब यह देख कर बहुत खुश हुए, उन्होंने जल्दी से मेरे पास आ कर सचिव के साथ अपनी भी तस्वीर खिंचवा ली। आज वीणा जी कहां हैं, मैं नहीं जानता, फिर भी, उनके आत्मीयतापूर्ण व्यवहार और गरिमामयी कार्यशैली के लिए मैं आज भी उन्हें श्रद्धा व सम्मान के साथ याद करता हूं।

क्रमश: …

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

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