ना अति वर्षा , ना अति धूप ; ना अति बोलता, ना अति चुप !

डायनैमिक और डाइनामाइट (अकथ कथा : आत्मकथा)

ना अति वर्षा , ना अति धूप

ना अति बोलता, ना अति चुप

इंदिरापुरम, 10 फरवरी 2017

गांव – देहात में इस तरह की ढेर सारी कहावतें देखने – सुनने को मिलती हैं। सवाल है कि कथा, कहानी या कहावतें तो कही और सुनी जाती हैं, फिर मैंने देखने की बात क्यों की ? वह इसलिए कि कहावतें जहां प्रतिफलित होती हैं, वहां सिर्फ श्रव्य ही नहीं, दृश्य जगत भी उपस्थित हो जाता है और वह दृश्य जगत जिन लोगों के कारण उपस्थित होता है, उन्हीं लोगों के शिक्षण – प्रशिक्षण व उद्बोधन – प्रबोधन के लिए ऐसी कहावतें जन्म लेती हैं। जाहिर है, यह कहावत पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बनाम वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी की ओर से आ रही है या टहलते हुए उनकी ही तरफ जा रही है।

देश की पांच विधान सभाओं के लिए 2017 के चुनाव 04 फरवरी से शुरू हो कर 08 मार्च को समाप्त होंगे, परिणाम 11 मार्च को आएंगे।  गोवा और पंजाब विधान सभाओं के लिए चुनाव 04 फरवरी को सम्पन्न हो गए, 15 फरवरी को उत्तराखण्ड विधान सभा तथा  04 और 08 मार्च को मणिपुर विधान सभा के लिए चुनाव होंगे, देश में सबसे अधिक सदस्यों वाली उत्तर प्रदेश विधान सभा के लिए चुनाव सात चरणों में होंगे, पहले चरण का चुनाव 11 फरवरी को यानी कल और अंतिम चरण का चुनाव 08 मार्च को होगा।

उपर्युक्त पांच राज्यों की विधान सभाओं में से अकेले उत्तर प्रदेश विधान सभा में ही 403 सदस्य हैं, जबकि शेष चार विधान सभाओं में कुल मिला कर 287 सदस्य  हैं यानी आधे से भी कम ,  जिसके चलते उत्तर प्रदेश के चुनाव – परिणामों के देशव्यापी प्रभाव का अन्दाजा आसानी से लगाया जा सकता है। और चूंकि 2019 में भी प्रधानमंत्री बनने का मार्ग उत्तर प्रदेश से हो कर ही निकलेगा, इसलिए, राजनीतिक दलों और उनके प्रधानों , विशेष कर केन्द्र में शासन करने वाले दल व उसके प्रधान के साथ – साथ देश के प्रधान की भी चिंता उनके चुनावी बोल एवं मुखमुद्रा से समझी जा सकती है। साथ ही, यदि ‘फेस इज दि इण्डेक्स ऑफ माइण्ड’ यानी ‘मन के कोलाहल को चेहरे के भावों से पढ लेने ’ वाली कहावत सही हो तो इन चुनावों के परिणामों का अक्श अभी ही पहचान लेना कोई बरमूडा त्रिकोण का रहस्य सुलझाना है क्या?

प्रधानमंत्री मोदी जी ने सदन में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के बारे में कहा कि उनके कार्यकाल में लाखों करोड रूपयों के घोटाले हुए, फिर भी उन पर आंच तक नहीं आई, बाथरूम में भी रेनकोट पहन कर नहाने की कला तो कोई डॉक्टर साहब से सीखे। राहुल गांधी ने कुछ दिनों पहले कहा था कि वे जब प्रधानमंत्री के बारे में सदन में बोलेंगे तो भूचाल आ जाएगा। 06 फरवरी की रात में उत्तराखण्ड सहित अन्य जगहों पर भूकम्प आया तो प्रधानमंत्री मोदी जी ने राहुल गांधी वाले वक्तव्य पर तंज कसते हुए कहा कि ‘आखिर आ ही गया भूकम्प’ ! मोदी जी ने यह भी कहा है कि डॉ. मनमोहन सिंह बोलते थे तो उनकी आवाज केवल उनकी (राहुल जी की) मां सोनिया गांधी तक ही पहुंचती थी किंतु जब वे (मोदी जी) बोलते हैं तो पूरे देश और पूरी दुनिया तक उनकी आवाज पहुंचती है।

अब मोदी जी के उन्हीं वक्तव्यों , विशेष कर डॉक्टर मनमोहन सिंह के प्रति दिए गए वक्तव्य को ले कर हंगामा बरपा है। विपक्ष कह रहा है कि इतिहास में आज तक देश के किसी भी प्रधानमंत्री ने सदन में किसी भी पूर्व प्रधानमंत्री के प्रति इतना अपमानजनक और निम्नस्तरीय वक्तव्य नहीं दिया तथा भूकम्प जैसी प्राकृतिक आपदा का भी उल्लेख इतनी संवेदनहीनता के साथ नहीं किया तो सत्ता पक्ष प्रधानमंत्री का बचाव करते हुए विपक्षी नेताओं द्वारा पूर्व में प्रधानमंत्री के प्रति दिए गए वक्तव्यों की याद दिला रहा है। इस पूरे प्रकरण की शल्य क्रिया करने के पहले 2014 में लोकसभा के आमचुनाव और 2015 में बिहार विधान सभा चुनाव को याद कर लेना जरूरी है।

2014 के लोकसभा चुनाव के साल भर से भी अधिक समय पहले से ही मोदी जी ने जोरशोर से तैयारी शुरू कर दी थी और लालकिला से भाषण देने का रिहर्सल भी शुरू कर दिया था। पाठकों को याद होगा कि गुजरात में लालकिला की एक प्रतिकृति बनवाई गई थी, 15 अगस्त 2013 को डॉ. मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री के रूप में लालकिला की प्राचीर से देश को संबोधित किया था तो मोदी जी ने स्वनिर्मित्त लालकिले से भाषण दिया था। उन दिनों मोदी जी का मुखमंडल आत्मविश्वास से दपदप कर रहा था और चेहरे की चमक बता रही थी कि जीत सुनिश्चित थी, हुआ भी वैसा ही।

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के शुरुआती प्रचार अभियान में भी मोदी जी वैसे ही आत्मविश्वास से लबरेज दिख रहे थे। जैसे – जैसे चुनाव प्रचार जोर पकडता गया, उनके  आत्मविश्वास में कमी आती हुई – सी महसूस होती गई, फिर तो वे प्रत्यक्ष रूप से बिहार और परोक्ष रूप से अपने पूर्व राजनीतिक सहयात्री और वर्तमान प्रतिद्वन्द्वी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के डीएनए तक पहुंच गए। पांच चरणों में हुए बिहार विधान सभा चुनाव का अंतिम चरण 05 नवम्बर को पूरा हुआ था और परिणाम 08 नवम्बर को आया था किंतु उसके बहुत पहले बिहार की रैलियों में मोदी जी के भाषण सुन कर 01 सितम्बर 2015 को ही मैंने मोदी जी को संबोधित करते हुए कुछ ट्वीट किए थे, जिसे 04 नवम्बर 2015 को अपने ब्लॉग shreelal.in    और फेसबुक  shreelalprasad  तथा फेसबुक कम्युनिटी पेज  shreelal Prasad aman पर ‘किसकी जीत और किसकी हार’ शीर्षक से एक पोस्ट डालते हुए मैंने उद्धृत किया था, यह ध्यान देने योग्य बात है कि अंतिम चरण का चुनाव 05 नवम्बर को होना था और परिणाम 08 नवम्बर को आने थे , जबकि ट्वीट मैंने 01 सितम्बर को ही और परिणामों का पूर्वाभास अंतिम चरण के चुनाव के एक दिन पहले यानी 04 नवम्बर को ही प्रकाशित कर दिया था। आज मैं फिर उस पोस्ट और ट्वीट के कुछ अंश अपने सुधी पाठकों की स्मृति को ताज़ा करने के लिए यहां उद्धृत कर रहा हूं : –

{ बिहार विधानसभा चुनाव -2015 के पांचवें यानी अंतिम चरण का प्रचार भी थम गया । पांचों चरण का चुनाव प्रचार कई मायनों में अद्भुत, विलक्षण और अभूतपूर्व रहा, न जाने कितने मानदण्ड धराशायी हुए ? कितने रिकॉर्ड बने और बिगडे ? चुनाव में मुद्दे कितने थे, कौन – कौन – से थे, क्या – क्या थे, ये सब न तो पार्टियों को याद होंगे, न उम्मीदवारों को, न ही मतदाताओं को और न मीडिया को? चुनाव आयोग को भी इस विषय में पक्के तौर पर शायद ही कुछ पता हो !

अंतिम चरण के मतदान की तिथि 05 नवम्बर से लेकर 08 नवम्बर को परिणाम घोषित होने तक विभिन्न माध्यमों के लाल बुझक्कडों द्वारा अनुमान, पूर्वानुमान एवं रूझान बताए जाते रहेंगे, परिणाम के बाद विश्लेषण, पिष्टपेषण , आत्म निरीक्षण, परीक्षण, मंथन, महिमामंडन, निंदन व अभिनन्दन का सिलसिला भी शुरू हो जाएगा और फिर असल मुद्दा धरा का धरा रह जाएगा क्योंकि “क्या – क्या हुआ जो नहीं होना चाहिए था और क्या – क्या नहीं हुआ जो होना चाहिए था”, जैसे विषयों पर चर्चा के लिए किसी के पास समय न होगा, तो क्यों न हम इसी खाली समय का सदुपयोग कर लें? लेकिन उसके भी पहले कुछ रैलियों में प्रधानमंत्री के भाषण सुनने के बाद मैं ने 01 सितम्बर को अपने ट्वीटर @shreelalprasad    पर जो ट्वीट किए थे, उनमें से कुछ को देख लें  –

  1. आप (मोदी जी) एनडीए के एकमात्र वक्ता हैं, संबोधन में कुछ नयापन क्यों नहीं लाते , देश-विदेश के लोग आप को प्रधानमंत्री के रूप में याद रखना चाहते होंगे?
  2. क्या आपको लगता है कि आप दुनिया के सबसे बडे लोकतांत्रिक गणतंत्र के प्रधानमंत्री के रूप में बोलते हैं? यदि लगता है तो पांच साल बाद अभी वाला भाषण सुन कर अपना मूल्यांकन कीजिएगा।
  3. और यदि कहीं कोई कमी लगती है तो अभी भी वक्त है , अकेले में आत्मावलोकन कीजिएगा क्योंकि चुनाव जीतना अलग बात है, बहुमत पाना भी अलग बात है किंतु जनमत के दिलोदिमाग में बसे रहना बिलकुल ही अलग बात है ।
  4. यदि आप तात्कालिक बहुमत पाकर ही खुश हैं तो मुझे इसका दु:ख रहेगा, जेपी कब चुनाव लडे–जीते ! (पूरे आलेख के लिए मेरे ब्लॉग पर 04.11.2015 का पोस्ट देखें)

चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के पहले किए गए मेरे ये ट्वीट आज दीवार पर लिखी इबारत बन गए हैं।  }

आजकल फिर, मोदी जी की मुखमुद्रा और भाषा में बिहार चुनाव के अंतिम दिनों वाली स्थिति यानी आत्मविश्वास की कमी नज़र आ रही है, मनमोहन सिंह और राहुल गांधी के प्रति दिए गए उनके बयानों के अक्श उसी तरह उभर रहे हैं। आज भले ही उनके भाषणों में “छप्पन इंच का सीना” या “गुजरात का शेर” अथवा “डीएनए” नहीं है, उन शब्दावलियों का रूप परिवर्तन हो गया है , किंतु फिर भी, उनके अर्थ नहीं बदले हैं। कहीं इसका मतलब यह तो नहीं कि इस बार भी बिहार चुनाव की पुनरावृत्ति होने जा रही है तथा इसका पूर्वास किसी और को हो या न हो, मोदी जी को अवश्य हो गया है; क्योंकि पंजाब हाथ से फिसलता हुआ और गोवा खिसकता हुआ नज़र आ रहा है, मणिपुर बहुत दूर की कौडी है, और सबसे बडी बात, 2019 का प्रवेश द्वार उत्तरप्रदेश दूर, बहुत दूर जाता दिख रहा है। आशा की किरण कहीं झिलमिलाती हुई – सी प्रतीत हो रही हो तो वह केवल उत्तराखण्ड की पहाडियों, घाटियों, गुफाओं और कन्द्राओं में ही , गोवा के समुद्री तट पर फैले रेत – कण भी सूर्य की किरणों की चमक में चमकदार पदार्थ – से दिखने का भ्रम उत्पन्न कर रहे हैं ।

2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में शब्द शास्त्र के बदले शस्त्र बन गए थे , जो अंततोगत्वा दुधारी तलवार साबित हुए। शब्दों का संस्कार और शिष्टाचार का छूटना कई चीजों के छुट जाने का कारण बन जाता है। जहां तक मुझे याद है, इंदिरा जी की पूर्व पीढी के नेताओं ने उनके प्रति जो सबसे भद्दे शब्द कहे थे , वे थे – ‘ गूंगी गुडिया’ तथा उनके समकालीनों ने जो सबसे भद्दे शब्द उनके लिए कहे , वे थे – ‘तानाशाह’ , ‘घमण्डी’ , ‘हठी’ , ‘जिद्दी’ और इंदिरा जी द्वारा जयप्रकाश नारायण के लिए जो सबसे भद्दा शब्द कहा गया , वह था – ‘ फासिस्ट’ । कॉंग्रेस में तब के युवा तुर्क कहे जाने वाले चन्द्रशेखर जी ने इंदिरा जी को सलाह दी थी कि वे एक बार जेपी से मिल लें, लेकिन शायद इन्दिरा जी ने जेपी से खुद पहल कर मिलने में अपनी हेठी समझी थी, इसीलिए उन्हें हठी, जिद्दी और घमण्डी कहा गया था। उन्हीं दिनों हिन्दी और मैथिली के प्रसिद्ध कवि , बेलौस, प्रखर और फक्कड व्यक्तित्व के धनी बाबा नागार्जुन ने एक लोकप्रिय कविता लिखी थी –

“ इंदु जी , इंदु जी , क्या हुआ आप को

    बेटे को तार दिया , बोर दिया बाप को ”

ये तमाम शब्द और शब्दावलियां आपात्काल के दौरान और उसके बाद की उपज हैं (बेशक ‘गूंगी गिडिया’ उसके बहुत पहले की शब्दावली है) , वह आपात्काल, जो स्वंत्रता प्राप्ति के बाद देश की राजनीति का सबसे कठिन और बेलौस हो कर कहें तो, सबसे निंदनीय दौर माना जाता रहा है, फिर भी, इन शब्दों और शब्दावलियों में अवांछनीय तत्व नहीं ढूंढे जा सकते। आखिर अब क्या हो गया कि विपक्ष तो विपक्ष, खुद सत्ता पक्ष और स्वयं प्रधानमंत्री भी ऐसी शब्दावलियों का ऐसे अन्दाज़ में प्रयोग कर रहे हैं, जिसके औचित्य से ज्यादा वांछनीयता और स्तरीयता पर सवाल खडे किए जा रहे हैं, आखिर धैर्य में इतना क्षरण क्यों? यहां वैसे वक्तव्यों का औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रधानमंत्री के बचाव में इतना कह भर देना कि “विपक्ष भी कैसे – कैसे शब्दों का प्रयोग करता रहा है” काफी नहीं होगा, क्योंकि मोदी जी के “डीएनए” वाले बयान से आहत होने के बाद भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने प्रतिकार स्वरूप वैसे किसी भी शब्द का प्रयोग कहां किया था? क्या राजनीतिक चरित्र की स्वच्छता और दृढता तथा विरोधियों के प्रति बयानों में संस्कार व शिष्टाचार की उदारता वहां से नहीं सीखी जा सकती ?

विपक्ष द्वारा सत्ता को “दुर्गा” की उपाधि देने तथा सत्ता द्वारा विपक्ष को “ सौम्य व्यक्तित्व से सम्पन्न श्रेष्ठ नेता एवं सर्वाधिक प्रभावशाली वक्ता” का मान देने का दौर कब व कैसे वापस आएगा, कौन बताएगा यह? कोई ऐसी संजीवनी तो हाथ लगी नहीं है , जिससे इंदिरा जी को जिन्दा किया जा सके ताकि वे गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की अध्यक्षता भी करें और रूस से अटूट दोस्ती कर पाकिस्तान को धूल चटाते हुए बांगला देश भी बनवा दें ; कोई ऐसी अचूक स्वास्थ्यबर्द्धक बूटी भी बाबा ने नहीं बनाई , जिससे अटल बिहारी बाजपेयी जी को इतना स्वस्थ बनाया जा सके कि वे सद्भावना की बस व ट्रेन भी पाकिस्तान भेजें व  करगिल भी जीत लें;  और फिर से संसद में आने लगें तथा सत्ता की राजनीति में रहें या विरोध की राजनीति में, हर हाल में संसदीय गरिमा एवं “राजधर्म” का पाठ पढाने लगें।

आज की सत्ता के शीर्ष पुरूष ही नहीं, सत्ताधारी दल के अधिकांश नेताओं का राजनीतिक संस्कार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रांगण में हुआ माना जाता है। वह आरएसएस , जिससे हमारा वैचारिक मतभेद चाहे जितना भी हो, भाषा और शब्दों के संस्कार व शिष्टाचार की वनस्थली तो माना ही जाता है । आखिर उसके स्नातकों की भाषा में ऐसी गिरावट क्यों, क्या हार की आशंका इतनी भयावह अथवा जीत की लालसा इतनी मनभावन होती है कि जन्मजात संस्कार को भी तिलांजलि दे दी जाए? क्या आवाज की बुलन्दी का मायने इतना ही है? क्या एक की स्थाई चुप्पी का जवाब ऐसे ही डवांडोल बोल हैं? इतनी याद तो सम्भाल कर रखी ही जाए कि जिस तरह रात के स्यापा के बाद दिन का उजाला और सुहावने दिन के बाद डरावनी रात का आना तय है, उसी तरह हार के बाद जीत और जीत के बाद हार देखना भी मुकर्रर है , फिर वैसे विपरीत काल में आने वाली पीढियां बडा बेरहम मूल्यांकन करेंगी, तब कौन होगा बचाव में , क्या होंगे बयान ?

बचपन की एक कहानी यों ही याद आ रही है , यह कहानी मेरे दादा जी ने एक पंचायत का फैसला करते हुए सुनाई थी , आएं , एक बार फिर हम सब सुनें उसे  :-

“ एक राजा शिकार करने जंगल गया। सेनापति और कई सैनिक भी उसके साथ थे। अचानक शेर ने राजा पर आक्रमण कर दिया । सेनापति ने अपनी जान पर खेल कर बहादुरी दिखाते हुए शेर को मार गिराया, परंतु उसने राजा और साथी सैनिकों से अनुरोध किया कि राजधानी लौट कर प्रजा को यह न बताएं कि शेर को सेनापति ने अकेले मार गिराया , क्योंकि लोग विश्वास नहीं करेंगे और उसकी हंसी उडाएंगे। राजधानी वापस आने पर प्रजा राजा की जयजयकार करती रही , उसकी बहादुरी का गुणगान करती रही और राजा से पूछती रही कि उन्होंने शेर को कैसे मारा ? किंतु राजा और सैनिक चुप, और सेनापति ! वह तो चुप्पी को अपना स्थाई आवरण बना कर एक टक सबको देखता रहा , देखता ही रहा । राजा क्रोधित हो गया। उसने सोचा कि उसका सेनापति बहुत ही कमजोर आत्मविश्वास और हीन भावना से ग्रस्त आदमी था, जो अपनी उपलब्धि नहीं बता सकता, उसके भरोसे कोई युद्ध कैसे जीता जा सकता था? इसीलिए राजा ने सेनापति को बर्खास्त कर दिया।

राजा अपने नए सेनापति के साथ फिर शिकार पर निकला। जंगल में जाते समय एक सियार नज़र आया, सेनापति ने सैनिकों को ललकारा , सभी सियार को खदेडते हुए राजा से दूर निकल गए। आखिर सब ने मिल कर सियार को मार गिराया । सैनिक सियार को बांस पर टांग कर पीछे – पीछे चल रहे थे, आगे – आगे सेनापति सीना ताने, मूंछ पर ताव देता ,  जश्न मनाता चल रहा था। राजा के पास पहुंच कर सेनापति अपनी बहादुरी का बखान करते हुए ईनाम मांगने लगा। अब राजा को अपने पहले वाले चुप्पा और अब वाले बडबोला सेनापति के बीच का अंतर समझ में आ गया था । आजकल वह राजा अपने पुराने सेनापति की तलाश कर रहा है।

यह कहानी मैंने केवल मन – बहलाव  के लिए सुनाई है, इसका वर्तमान राजनीतिक परिप्रेक्ष्य से कुछ भी लेना देना नहीं है, यकीन मानिए।

समता सौहार्द और औदार्य के अप्रतिम संत कवि रविदास जयंती की हार्दिका बधाइयां और शुभकामनाएं !

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

इंदिरापुरम, 10 फरवरी 2017

2,016 thoughts on “ना अति वर्षा , ना अति धूप ; ना अति बोलता, ना अति चुप !

  • 20/10/2017 at 5:51 am
    Permalink

    I am genuinely delighted to glance at this blog posts which consists of tons of valuable information, thanks for providing such statistics.|

    Reply
  • 20/10/2017 at 3:56 am
    Permalink

    Greetings, I believe your site could be having web browser compatibility problems. Whenever I look at your site in Safari, it looks fine but when opening in Internet Explorer, it’s got some overlapping issues. I just wanted to provide you with a quick heads up! Other than that, excellent blog!|

    Reply
  • 20/10/2017 at 2:02 am
    Permalink

    I know this if off topic but I’m looking into starting my own blog and was curious what all is needed to get setup? I’m assuming having a blog like yours would cost a pretty penny? I’m not very web savvy so I’m not 100% certain. Any tips or advice would be greatly appreciated. Many thanks|

    Reply
  • 19/10/2017 at 7:44 pm
    Permalink

    My programmer is trying to persuade me to move to .net from PHP. I have always disliked the idea because of the expenses. But he’s tryiong none the less. I’ve been using Movable-type on several websites for about a year and am worried about switching to another platform. I have heard excellent things about blogengine.net. Is there a way I can import all my wordpress content into it? Any help would be really appreciated!|

    Reply
  • 19/10/2017 at 9:45 am
    Permalink

    viagra online contrareembolso
    buy viagra
    viagra cialis 100mg
    [url=http://bgaviagrahms.com/#]viagra online[/url]
    notice viagra 100 mg

    Reply
  • 19/10/2017 at 4:35 am
    Permalink

    Write more, thats all I have to say. Literally,
    it seems as though you relied on the video to make your point.

    You obviously know what youre talking about, why throw away your intelligence
    on just posting videos to your site when you could be giving us something informative to
    read?

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

55 visitors online now
35 guests, 20 bots, 0 members