चुनावी भाषणों के आईने में हार – जीत का अक्स

डायनैमिक और डाइनामाइट (अकथ कथा : आत्मकथा)

चुनावी भाषणों के आईने में

हार – जीत का अक्स

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इंदिरापुरम,09 मार्च 2017

इस आलेख को पढने के पहले या बाद में उपर्युक्त शीर्षक के परिप्रेक्ष्य में मेरे ब्लॉग shreelal.in  पर 10 फरवरी 2017 का आलेख पढ लिया जाए , क्योंकि यह उसी की निरंतरता में है यानी उसकी पूरक है।          

ऐसा पहली बार हो रहा है कि महज कुछ राज्यों के विधानसभाओं के चुनावों से देश के प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा तो जुड ही गई है, उनका राजनीतिक भविष्य भी दांव पर लग गया है। ऐसा किसी राजनीतिक कारण या जरूरत के चलते नहीं , बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री की खुद को चमत्कारी साबित करने की महत्त्वाकांक्षा के चलते हो रहा है, वरना 70 वर्षों के आज़ाद भारत में किसी भी प्रधानमंत्री और उसके विशालकाय मंत्रीमंडल के एक चौथाई मंत्रियों द्वारा किसी विधानसभा के चुनाव में किसी एक शहर में तीन दिनों तक डेरा डाले रहने की यह पहली घटना नहीं होती । इसीलिए इन चुनावों में यह प्रश्न बेमानी हो गया है कि जीत किसकी होगी, केवल एक ही प्रश्न शेष रह गया है कि हार किसकी होगी?

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों का अंतिम चरण कल समाप्त हो गया, आज शाम से टीवी चैनलों और समाचार-पत्रों तथा अन्य सर्वेक्षण एजेंसियों द्वारा एग्जिटपोल के नाम पर तरह – तरह के चुनावी विश्लेषण शुरू हो जाएंगे। उनके पास संवाददाताओं और चुनावी विश्लेषण विशेषज्ञों की लम्बी फेहरिश्त होती रही है, फिर भी, अंतिम परिणाम आने के बाद सबकी भविष्यवाणियां चारों खाने चित्त नज़र आती रही हैं।

मैं भी चुनावी विश्लेषण करता रहा हूं और उसे अपने ब्लॉग shreelal.in  पर भी पोस्ट करता रहा हूं जो अंतिम परिणाम आने पर तमाम टीवी चैनलों और समाचार-पत्रों आदि के पूर्वानुमानों से दसगुना सही साबित होता रहा है। तो, आखिर , मेरे विश्लेषण का आधार क्या रहा होता है ? यह जानने की इच्छा प्रत्येक पाठक में हो सकती है।

मैं यह स्पष्ट कर दूं कि 10 फरवरी यानी केवल गोवा और पंजाब चुनाव के बाद किंतु उत्तराखण्ड चुनाव के पांच दिन एवं उत्तर प्रदेश  चुनाव शुरू होने के एक दिन पहले ही अपने ब्लॉग shreelal.in  पर मैंने अपना पूर्वानुमान पोस्ट कर दिया था और अपने पूर्वानुमान का आधार भी बता दिया था। मैं अभी भी , सभी चुनाव सम्पन्न हो जाने के बाद और किसी भी टीवी चैनल या एजेंसी से किसी भी तरह का चुनावी विश्लेषण – एग्जिट पोल आदि आने के पहले, अपने 10 फरवरी के पूर्वानुमानों पर कायम हूं और उसमें किसी भी तरह का परिवर्तन करने की आवश्यकता महसूस नहीं कर रहा हूं।

मैं स्कूल – कॉलेज के विद्यार्थियों की उत्तर-पुस्तिकाओं से ले कर भारत सरकार के कार्यालयों एवं उपक्रमों के कर्मचारियों तथा क्लास वन अधिकारियों तक के लिए आयोजित प्रतियोगी परिक्षाओं की उत्तर – पुस्तिकाओं का भी परीक्षण करता रहा हूं और उस दौरान प्रश्नोत्तरों के सही मूल्यांकन के लिए सही व सटीक तरीके अपनाने की तरकीब अपनाता रहा हूं। गणित और वस्तुपरक प्रश्नों एवं उनके उत्तरों को छोड दें तो एक ही प्रश्न के एक जैसे  अनेक सही उत्तर होने के बावजूद मूल्यांकन करते समय भिन्न अंक दिया जाना संभव हो जाता है और कभी – कभी तो अवश्यंभावी भी हो जाता है क्योंकि उत्तर की जानकारी की मात्रात्मकता, उत्तरदेने की गुणवत्ता, भाषा एवं शैली परीक्षक को वैसा करने के लिए विवश कर देती है। और, चूंकि विधान सभाओं या लोकसभा के चुनाव भी गणित अथवा वस्तुपरक प्रश्नोत्तरी शैली में नहीं होते, इसीलिए धरातल पर उपलब्धियां और जनता की सेवाओं के प्रति प्रतियोगी पार्टियों का स्तर जो भी रहा हो, चुनाव प्रचार की मात्रा, गुणवत्ता, भाषा और शैली का स्तर ही चुनाव परिणामों में उनके भाग्य का नियंता होता है। मैं उसी स्तर की परख की शैली अपनाता रहा हूं।

दूसरा , प्राप्तांक यानी परिणाम हमेशा तुलनात्मक होते हैं अर्थात एक ने दूसरे की तुलना में कितना अच्छा या बुरा लिखा, बोला और काम किया तथा उसे बताया , उसी के अनुसार अंक मिलते हैं।

जैसे – मान लीजिए कि 100 प्रतियोगियों की उत्तर – पुस्तिकाएं जांचने को मिली हों, तो पहली उत्तर-पुस्तिका को जांचने के क्रम में प्रश्न और उसके सही, सटीक व सुन्दर उत्तर के परिप्रेक्ष्य में आपने जितने अंक दिए होंगे, आगे जांची जाने वाली उत्तर-पुस्तिकाओं के परीक्षण के लिए वे ही रोल मॉडल होंगे यानी उत्तरों की गुणवत्ता आदि को देखते हुए अंक उतने ही या उससे कम या अधिक दिए जाएंगे, वैसा करना ही ईमानदार एवं निष्पक्ष परीक्षण कहलाएगा, वरना किसी के पक्ष अथवा विपक्ष में बैठे नज़र आएंगे आप।

तीसरा, यह विदित है कि देश की अति विश्वसनीय गुप्तचर एजेंसियां – रॉ, आईबी, सीबीआई आदि सीधे प्रधानमंत्री और गृहमंत्री को रिपोर्ट करती हैं। उनका कितान सदुपयोग या दुरूपयोग सत्तापक्ष अपने निजी या दलगत फायदों के लिए करता है, यहां मेरा विषय वह नहीं है , बल्कि मैं यह बताना चाहता हूं कि उन एजेंसियों की रिपोर्टिंग की गुणवत्ता पर मुझे यकीन है। इसलिए यह मान कर चलना चाहिए कि चुनावों में सुरक्षा पहलुओं पर नज़र रखने के अलावा आम जनता का उनके प्रति रूझान क्या है, झुकाव किस ओर व कैसा है, परिस्थितिजन्य तथ्य व तथ्यात्मक यथार्थ और धरातल पर वास्तविकता क्या है, आदि की सूचनाएं उन एजेंसियों द्वारा सत्ता तक जरूर समय पर पहुंचाई जाती हैं। और, चूंकि मनुष्य हाड-मांस का बना होता है तथा हर मनुष्य सिद्ध पुरूष, योगी, ध्यानी व वीतरागी नहीं होता, चाहे वह प्रधानमंत्री ही क्यों न हो, इसलिए रहीम कवि के दोहे की माफिक –

“ खैर खून खांसी खुशी बैर प्रीत मधुपान

रहीमन दाबे ना दबे जाने सकल जहान”

वाली सच्चाई के तहत वह दुख –सुख से जुडी उन सूचनाओं के असर को अपने तन – मन – आचरण , भाषण व सम्भाषण में आने से रोक नहीं पाता है। यही कारण है कि मैं चुनावों के दौरान भौतिक साक्ष्य जुटाने के पीछे न दौड कर मानसिक साक्ष्य पर नज़र रखता हूं।

2015 के बिहार विधान चुनावों में मैंने यही एक तरीका अपनाया और 100% सही पूर्वानुमान दे पाया, इस बार भी मैं वही तरीका अपना रहा हूं क्योंकि दूसरा तरीका अपनाने का न तो मेरे पास साधन है , न समर्थन ।

यहां प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा 18 जनवरी 1977 (इमरजेंसी के दौरान) को की गई आम चुनाव कराने वाली व विस्मित कर देने वाली वह घोषणा (क्योंकि उतनी जल्दी किसी को उसकी उम्मीद नहीं थी) तथा 21 मार्च 1977 को रिजल्ट आने पर चुनाव में उनकी करारी हार की घटना याद आ रही है जिसको ले कर लोगों में आम चर्चा थी कि गुप्तचर एजेंसियां भी नहीं भांप पाईं कि पब्लिक इंदिरा जी व संजय जी के खिलाफ थी, वरना उन्होंने प्रधानमंत्री को चुनाव कराने की सलाह नहीं दी होती , जबकि कुछ लोगों का मानना था कि गुप्तचर एजेंसियां भी प्रधानमंत्री और संजय गांधी से त्रस्त थीं , इसीलिए उन्होंने जान – बूझ कर उन्हें गलत सूचना दी ताकि वे चुनाव कराएं और हार जाएं। हालांकि यहां वैसी बात नहीं , फिर भी यह बात तो है ही कि गुप्तचर एजेंसियां चुनावी सूचनाएं भी देती हैं।

6 – 7 अगस्त 2016 को, गुजरात के उना में तथाकथित गो-रक्षकों दवारा कुछ दलित युवकों की बेरहमी से पिटाई किए जाने के बाद, प्रधानमंत्री द्वार दिए गए भाषण से ले कर, नोटबंदी और उससे उपजी परिस्थितियों का जवाब देने, गोवा में (उसके बाद भी अन्य कई जगहों पर) चुनावी भाषण के दौरान भावुक हो जाने, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह से संबंधित रेनकोट वाले बयान देने, उत्तराखण्ड में आए भूकम्प जैसे प्राकृतिक आपदा को राहुल गांधी के बायन से जोड कर तंज कसने, कब्रिस्तान – श्मशान के लिए जमीन तथा ईद – दिवाली के लिए बिजली देने की बातों के माध्यम से ध्रुवीकरण करने , चण्डीगढ एवं महाराष्ट्र के म्युनिसिपल चुनावों में जीत को ही नोटबंदी के एवज में अपनी उपलब्धि बताने, विरोधियों की असफलताओं और अपने योगदान की बात न कर विपक्षी पार्टियों के नामों का हास्यापद फुल फॉर्म बताने तथा उनके नेताओं पर व्यक्तिगत टिप्पणियां करने और यूपी में पूरी ताक़त झोंकने के बावजूद अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी की महज पांच विधानसभा सीटों को पाने के लिए खुद तीन दिनों तक एक ही शहर में डेरा डालने व अनेक रोड शो कर ताक़त दिखाने तक की घटनाएं, भावभंगिमाएं , भाषण – संभाषण की भाषा-शैली तथा शब्दावली आदि  से प्रतीत होता है कि गुप्त रूप से मिली सूचनाएं अनुकूल नहीं हैं । मेरे पूर्वानुमान के आधार यही प्रतीति है।

और, मेरा पूर्वानुमान , 10 फरवरी के अनुमानों में बिना किसी परिवर्तन के, यह भी है कि जीत चाहे जिस किसी भी दल या गठबन्धन की हो, हार निश्चित रूप से प्रधानमंत्री की ही होगी, क्योंकि मेरी नज़र में इस बार सरकार बना लेना ही जीत का पैमाना नहीं होगा, युद्ध में लगे पराक्रम और हाथ आए नतीजे भी उसके पैमाने होंगे। कारण साफ है , प्रतिद्वन्द्वी तो वे ही थे न , जिन्हें आप पप्पू कहते हैं या नौसीखिया बबुआ कहते हैं अथवा सम्पति पार्टी वाली बहना कहते हैं। पप्पू और बबुआ हार भी गए ( हालांकि उसकी संभावना भी रेयरेस्ट ऑफ रेयर है) तो भी वे अर्जुन की अनुपस्थिति में भीष्म एवं द्रोणाचार्य व कृपाचार्य जैसे महारथियों की समवेत सेना द्वारा बालक अभिमन्यु को चक्रव्युह में फंसा कर मारने जैसा होगा और यदि अभिमन्यु चक्रव्युह तोड कर जीत हासिल कर लेता है तो उसके निहितार्थ की कल्पना भी नहीं की जा सकती , क्योंकि 2019 आने में बहुत विलम्ब नहीं है और , जिस तरह लोहिया ने कहा था कि जिन्दा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं, उसी तरह भाजपा वाले भी खुद 2019 का इंतजार नहीं करेंगे, प्रधानमंत्री की चिंता वही है। हां, सरकार बन जाने पर 2019 तक पहुंचने में कोई खास दिक्कत आने की संभावना शायद ही हो; बाकी राज्यों में सरकार बनने या न बनने का निहितार्थ उतना भयावह नहीं है।

तो, कुछ घंटों बाद से टीवी चैनलों के सामने बिना हिलेडुले बैठे रहिए और करोंडों के खर्च व सैकडों – हजारों मैनपॉवर के इस्तेमाल से उनके द्वारा परोसे जाने वाले एग्जिट पोल, पूर्वानुमान व विश्लेषण आदि का रसास्वादन अपने घर का आटा गीला करते हुए चाय – बिस्किट के साथ करते रहिए, बीच – बीच में , और, 11 मार्च को आंखें फाड – फाड कर मेरा ब्लॉग भी देखिए , उसके बाद दूध का दूध नहीं, बल्कि सेहत के लिए कौन हानिकारक है – मट्ठा या मक्खन? खुद जान जाइए।

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

09 मार्च 2017

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492 thoughts on “चुनावी भाषणों के आईने में हार – जीत का अक्स

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