और एक कदम यह भी

          एक प्रशंसनीय पहल

                     

भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग, केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान की पाठ्यक्रम संशोधन समिति की एक उच्चस्तरीय बैठक 14 मार्च 2017 को सीजीओ कम्प्लेक्स, अंत्योदय भवन, नई दिल्ली में हुई। बैठक की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक और प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. जयप्रकाश कर्दम ने की। डॉ. श्रीनारायण सिंह समीर निदेशक केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, डॉ. रवि कुमार टेकचन्दानी निदेशक केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, डॉ. भरत सिंह प्रोफेसर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान , डॉ.पूरन चन्द टंडन प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं भारतीय अनुवाद परिषद – भारतीय विद्या भवन; एनएचपीसी के वरिष्ठ अधिकारी श्री राजबीर सिंह, केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान के उपनिदेशक डॉ. भूपेन्द्र सिंह, सहायक निदेशक श्रीमती दलजीत कौर एवं स्नेहलता सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में उपस्थित थे।

समिति के विशिष्ट सदस्य के रूप में मुझे भी आमंत्रित किया गया था। मैं मंत्रालय की ऐसी समितियों का सदस्य पहले भी रहा हूं, सेवानिवृत्ति के बाद भी उस सिलसिले से मुझे जोडे रखने के लिए मैं भारत सरकार और उसके अधिकरियों के प्रति आभार प्रकट करता हूं।

डॉ. जयप्रकाश कर्दम ने भारत सरकार के राजभाषा सचिव श्री प्रभाष कुमार झा आईएएस के संदेशों का उल्लेख करते हुए बैठक का शुभारम्भ किया । उन्होंने कहा कि चूंकि माननीय प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने जनहित संबंधी योजनाओं और कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने के लिए सरल एवं सुगम हिन्दी का प्रयोग करने पर जोर दिया है, इसीलिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की पुस्तकों में भी यथा संभव सहज व बोलचाल की हिन्दी का प्रयोग किया जाए ताकि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ – साथ आम जनता के लिए भी वह उपयोगी सिद्ध हो सके। डॉ. कर्दम ने यह भी कहा कि यद्यपि इन पाठ्यक्रमों का सीधा संबंध हिन्दीतर भाषी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों से है तथा संस्थान को प्रदत्त क्षेत्राधिकार में रह कर ही कार्य करना है , तथापि , चूंकि सरकार के कामकाज आम जनता के लिए होते हैं, इसलिए इन पाठ्यक्रमों का भी अंतिम लक्ष्य आम जनता ही है।

डॉ. कर्दम ने बताया कि 1955 में ये पाठ्यक्रम शुरू हुए थे , जिनमें समय – समय पर संशोधन होते रहे हैं , कम्प्युटर और इंटरनेट का युग आने पर उन पाठ्यक्रमों को उसके अनुसार संशोधित कर वेबसाइट पर भी उपलब्ध करा दिया गया है, जिसका लाभ उठा कर हजारों इच्छुक हिन्दीतरभाषी हिन्दी सीख रहे हैं।  और अब, टेक्नोलॉजी के अद्यतन विकास व विस्तार को ध्यान में रखते हुए संस्थान ने उन पाठ्यक्रमों को मोबाइल ऐप में भी उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है, फलस्वरूप प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में एक बार फिर से संशोधन की आवश्यकता महसूस हो रही है , ताकि इन्हें अत्याधुनिक तकनिक से जोडा जा सके। ऐसा हो जाने पर देश – विदेश के असंख्य हिन्दीतरभाषी, जब और जहां चाहें, अपनी सुविधा के अनुसार हिन्दी सीख सकेंगे।

डॉ. श्रीनारायण सिंह समीर ने कहा कि सीखने की क्रिया निरंतर चलने वाली प्रक्रिया होती है। हम जब भी नये लोगों से मिलते हैं या नई जगहों पर जाते हैं अथवा नया काम करते हैं या नई चीजों का इस्तेमाल करते हैं तो उस प्रक्रिया में स्वत: कुछ न कुछ नये शब्दों व शब्दावलियों को सीखते और सिखाते हैं। कभी – कभी वैसे शब्दों व शब्दावलियों को समझने में कठिनाई – सी महसूस होती है; हालांकि वे शब्द कठिन नहीं होते, केवल अपरिचित होते हैं और उस अपरिचय के कारण ही वे कठिन लगते हैं। इसीलिए यदि वैसे शब्द मिलते हैं तो उन्हें भी सीखना चाहिए, तकनीकी मामलों में तो वैसा होना आम बात है।

मैंने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत सरकार और उसके राजभाषा सचिव ने हिन्दी प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को संशोधित कर नई तकनीक के अनुरूप ढालने तथा उसे मोबाइल ऐप में उपलब्ध कराये जाने के लायक बनाने का जो निर्देश दिया है , वह समय की मांग है , इसीलिए डॉ. जयप्रकाश कर्दम के निदेशन में केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान की यह पहल प्रशंसनीय है। अब इस समिति के विद्वानों को यह देखना है कि ये पाठ्यक्रम किस प्रकार सहज, सुगम और लोकप्रिय बनेंगे। मैंने यह भी कहा कि पाठ्यपुस्तकें यदि सरल और रोचक हों, तो पाठ्यक्रम भी लोकप्रिय होंगे। मेरा मत था कि ऐसी पाठ्यपुस्तकों के पाठों में विषय संबंधी ज्ञान मूल लक्ष्य नहीं होता, बल्कि लक्ष्य उस ज्ञान को पाठकों तक पहुंचाने का माध्यम यानी उसकी भाषा का ज्ञान कराना होता है,  इसीलिए पाठों में शब्दों और शब्दावलियों का प्रयोग करते समय इस मूल लक्ष्य को ध्यान में रखा जाए। मैंने कहा कि हमें याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रत भारत में भाषा संबंधी संविधानिक प्रावधानों को लागू कराने के लिए गठित शब्दावली आयोगों और समितियों से हिन्दी शब्दों व शब्दावलियों के निर्माण में जो कुछ असावधानियां हो गईं, उन्हीं के चलते कुछ बिलकुल अपरिचित – से लगने वाले शब्द हिन्दी शब्दावलियों में आ गए, फलस्वरूप हिन्दी को दुरूह होने का आरोप भी झेलना पडा । इसीलिए हिन्दी के विद्वान अपनी विद्वता का उपयोग विश्वविद्यालय में करें और ऐसे पाठ्यक्रमों में हिन्दीतरभाषी सरकारी कर्मियों के कार्यकलापों के लिए उपयोगी तथा जनसाधारण के लिए लोकप्रिय भाषा को अपनाएं यानी देश – काल और पात्र के अनुरूप भाषा ही विविधताओं में एकता की मिसाल माने जाने वाले हमारे देश की एकता की कडी हो सकती है और हिन्दी अपने स्वाभाविक रूप में ऐसी ही है भी।

समिति की दिन भर चली बैठक में सदस्यों ने परस्पर समन्वय, सामंजस्य व व्यावहारिक दृष्टिकोण का परिचय देते हुए पाठ्यक्रमों का उपयोगी स्वरूप तैयार किया। संस्थान के निदेशक द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ बैठक सम्पन्न हुई।

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम , 14 मार्च 2017

9310249821  ई-मेल : shreelal_prasad@rediffmail.com

BLOG:  shreelal.in

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