केजरी कुमार और अरविन्द विश्वास के नाम खुला पत्र

                                                                         जीत – हार के बाद

प्रिय बन्धुवर द्वय

आप अच्छे लोग हैं, इससे भी ज्यादा अच्छे हो सकते थे। आप की टीम भी अच्छे लोगों की है, और भी अच्छे लोग उस टीम में हो सकते थे।

मैं आपको कुछ सलाह देना चाहता हूं। चूंकि हवा – पानी के बाद सलाह ही सर्वाधिक और  प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है, हालांकि हवा-पानी कम पड सकता है किंतु सलाह की कोई कमी न है, न होगी और मेरे पास फिलहाल वही उपलब्ध भी है, इसीलिए मैं वही दे रहा हूं; हां, मौका आने पर अपना वोट भी (नीतीश जी न हों तो) आप ही को दूंगा।

ऐसा न समझें कि बिन मांगे सलाह देने की इस अनजान-से व्यक्ति ने हिमाकत कैसे कर दी? आपको सलाह देने की औकात मुझमें है, मैं ऐसी सलाह 20 वर्षों पहले नीतीश कुमार जी को भी दे चुका हूं, हालांकि वर्षों बाद उन्होंने मेरी सलाह पर अमल किया। प्रसंगवश, आपको सलाह देने के पहले नीतीश जी वाला मामला क्लीयर कर दूं, वरना वे भी कहीं  यह न कहने लगें कि ये कौन आ गया मेरा बिन बुलाया सलाहकार।

तो, बात 1997 की (संभवत) जनवरी की है। मैं किसी काम से कटिहार गया था और सीताराम चमडिया के होटल में ठहरा था । मैं कुर्ता – पाजामा पहने , शॉल ओढे सुबह की सैर से लौट कर अपने कमरे के दरवाजे पर खडा था। सामने देखा तो नीतीश कुमार जी अपने मित्र और अपनी समता पार्टी के सांसद (स्वर्गीय) दिग्विजय सिंह के साथ मेरे जैसे ही कुर्ता – पाजामा पहने और शॉल ओढे चले आ रहे थे। संयोग से उन दोनों के ठहरने के लिए ठीक मेरे सामने वाला एक कमरा आरक्षित था । उस दिन लालू जी को छोड कर उनके विधायक दल के मुख्य सचेतक रहे रामप्रकाश महतो समता पार्टी में शामिल होने वाले थे, उसी कार्यक्रम में वे दोनों आए थे और होटल के मालिक चमडिया जी ने खुद उनके रहने का इंतजाम किया था।

नीतीश जी करीब आए तो मैंने उन्हें नमस्कार किया, पता नहीं क्यों? उन्होंने मुझे अपने कमरे में आमंत्रित कर लिया। बहुत देर तक जेपी आन्दोलन से ले कर बिहार व केन्द्र की राजनीति पर बातें होती रहीं। अब मुझे अपने काम पर निकलना था, उन्हें तो कोई जल्दी नहीं थी , क्योंकि उनकी सभा में अभी बहुत समय बाकी था। चलते-चलते मैंने नीतीश जी से कहा कि उन्हें लालू जी को नहीं छोडना चाहिए था। दोनों साथ रहते तो लालू जी के जनाधार का फायदा उन्हें मिलता और उससे भी बडा फायदा देश और प्रदेश की जनता को यह मिलता कि वे लालूजी की अतिवादी महत्वाकांक्षाओं पर अंकुश लगा सकते थे और अब जिन मामलों में लालू जी फंसने जा रहे थे, वे मामले होते ही नहीं , क्योंकि लालू जी को रोकने और टोकने की औकात केवल नीतीश जी में ही थी। दोनों के साथ रहने से प्रदेश को ठोस और अच्छा शासन मिल सकता था। अंत में मैंने कहा –“ एनी वे, आप से अगली मुलाकात बिहार के मुख्यमंत्री आवास पर होगी, तब मैं अपने प्रदेश के मुख्यमंत्री से बात कर रहा होऊंगा ”  और अपने कमरे में चला गया। तब से नीतीश जी केन्द्र में कई बार मंत्री बने और चार बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, लेकिन मैं उनसे मिलने का मुहुर्त्त नहीं निकाल सका, आगे भी उसकी आवश्यकता और संभावना कम ही लगती है।

तो, भाई केजरी कुमार और अरविन्द विश्वास जी, मोदी जी ने लोकसभा चुनाव जीतने के बाद जो गलती की थी, वह गलती आपने गोवा और पंजाब हारने के बाद की। बिहार में भाजपा ने शत्रुघ्न सिन्हा जैसे स्टार नेताओं को अनुपयोगी मानने की गलती की और दिग्विजयी होने के गरूर में हाथ आए एक बडे राज्य को गंवा दिया। यदि वह गलती नहीं थी तो बिहार के जुडवा जैसे सहोदर भाई देश के सबसे बडे प्रदेश उत्तर प्रदेश के विधान-सभा चुनाव तथा राष्ट्रीय राधानी राज्य दिल्ली के नगर निगम चुनावों में पूर्वांचलिए लोगों के बीच उसी मिट्टी के स्टार नेताओं – मनोज तिवारी और रविकिशन जी – का सहारा क्यों लेती। बिहार के कुछ भाजपा नेताओं के मन में बैठे शत्रुघ्न सिन्हा के व्यक्तित्व के खौफ ने भाजपा के हाथ से बिहार को फिसल जाने का अवसर पैदा किया।

पंजाब में वह खौफ ‘आप’ के आला कमान के मन में नवजोत सिंह सिद्धू  और भगवंत मान को ले कर था, साथ ही, विश्वास के वगैर भी पंजाब व गोवा जीत लेने का दम्भ था। ठीक है, विश्वास हुक्म के इक्का नहीं हैं, लेकिन तुके के तीर तो हैं ही। वैसे भी, राजनीति में कोई भी हुक्म का इक्का नहीं होता, सभी तुके के तीर ही होते हैं, चाहे मोदी जी हों या शाह जी, क्योंकि हुक्म का इक्का होते तो बिहार में भी चलते।

सो, ‘आप’ ने जो गलतियां  कीं उनमें योगेन्द्र जी जैसे परिपक्व चिंतक और प्रशांत जी जैसे उपयोगी नेताओं का निष्कासन भी शामिल है। विरोधियों और आलोचकों को साथ ले कर चलने का गुर इन्दिरा गांधी से न सीख कर जवाहर लाल नेहरू से सीखना चाहिए था।

महाभारत जीतने के बाद पाण्डवों में गरूर आया था, जिसे यक्षप्रश्न ने तोडा, आप ने तो केवल हस्तीनापुर को ही आर्यावर्त समझ लिया और एक-एक कर सबको उनकी औकात बताने लगे। दरअसल, आपके सामने युद्धिष्ठिर का प्रतिनिधि कोई यक्ष रहा ही नहीं, कोई यक्ष तो होना ही चाहिए जो प्रश्न कर सके।

आगे क्या व कैसे ?

मन की ग्रंथि को निकाल बाहर फेंकिए, कैसे टीम (कुनबे को नहीं) को एक रखना है, उस पर सोचिए, जो जिस लायक है, उसका उपयोग उस काम के लिए कीजिए, क्रेडिट के बंटवारे पर जीत के बाद विचार कीजिए, बडा हिस्सा तो आला कमान को मिलेगा ही, दूसरों की अहमियत को भी सम्मान दीजिए, जैसे भाजपा ने साढे सात साल तक नीतीश जी को दे रखा था और उसके बाद लालू जी नीतीश जी को दे रहे हैं , हर हालत में खबरदार नीतीश जी को ही रहना था और है, ठीक वैसे ही अरविन्द जी, खुद को खबरदार बनाइए व जवाबदेह ।

सिसोदिया जी आपके विश्वस्त ही नहीं, परिपक्व साथी हैं, उनका महत्व बनाए रखिए, विश्वास का विश्वास भी बनाए रखिए, संजय सिंह को थोडा समावेशी बनने में मदद कीजिए , नये लडके ज्यादा ऊर्जावान हैं, उनकी ऊर्जा का दिशा-बोध सही बनाए रखिए, नीतीश जी से शब्द-संयम सीखिए, शब्द को शस्त्र कैसे बनाया जा सकता है, यह जेपी आन्दोलन वाले ज्यादा जानते हैं, तभी तो नीतीश जी डीएनए के समन्दर में बडे-बडों को डुबो देने में सफल हो सके। आप वैसे श्ब्द-शस्त्र किसी के हाथ न थमाइए।

आपने बहुत कुछ खो दिया है, फिर भी, बहुत कुछ बाकी है, यह कोई कम बात है कि लोग आपसे उम्मीद करें! उम्मीद पे दुनिया कायम है, हतोत्साह मत होइए, उठिए, जागिए और अपने चुनावी वायदों को पूरा करने में जुट जाइए।

एक बहुत ही अहम बात और, पंजाब मोदी जी हारे नहीं थे, वे उसे जीतना ही नहीं चाहते होंगे , क्योंकि उसे जीत कर भी उन्हें क्या हासिल होता, मोहतरमा मुफ्ती सईद जैसा एक और साथी मिल जाता जो उनका सिरदर्द हमेशा बढाता ही रहता। सीधी-सी बात लगती है कि  पंजाब सहित गोवा और मणिपुर को आम मतदाताओं पर ही छोड दिया गया होगा और सारा ध्यान , ईवीएम की रणनीति सहित, उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड पर, और फिलहाल दिल्ली नगर निगम चुनावों पर केन्द्रित किया गया होगा , क्योंकि 2019 के लिए भी तो वही सबसे बडा पत्ता है। इसलिए ईवीएम मुद्दे को शीत गृह में मत जाने दीजिए । मैं यह नहीं कहता कि ईवीएम में कोई गडबडी हुई, लेकिन मैं इतना जरूर कहता हूं कि भाजपा के इंजीनियरों और प्रवक्ताओं ने जो दलीलें दीं, वो नाकाबिल-ए-इकरार थी, उनके तर्कों में स्वीकार्य तार्किकता का दूर-दूर तक समावेश नहीं था, उन्हें वाह-वाही केवल इसलिए मिल गई कि वे सत्ता पक्ष के थे, मीडिया के कानफाडू ऐंकर भी उनसे बेहतर नहीं थे।

समय मिले तो मेरा ब्लॉग – shreelal.in   जरूर पढिए, 2016 के जून और उसके बाद आप के ऊपर मेरे बडे आलेख हैं । मेरी हिम्मत को सराहिए, जिसे सब डूबती हुई नाव समझ रहे हैं, मैं उसी के लिए पतवार थमा रहा हूं!

शुभकामनाओं के साथ

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

कर्म – फल और प्रार्थना – फल

 

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (आठ)

 

  • ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ क्यों ?
  • क्या दिन भर खेत में काम करने वाला आदमी रात को भूखे सो जाए?
  • क्या दिन भर दफ्तर में या कहीं भी ईमानदारी से पसीना बहा-बहा कर

परिश्रम करने वाला व्यक्ति पेट पालने के लिए भीख मांगे ?

  • क्या ईश्वर कभी अपने बन्दों को नाउम्मीदी में जीने का अभिशाप दे कर धरती पर भेजता है?
  • क्या निष्ठा और ईमानदारी से काम करने वाला व्यक्ति अपना परिश्रम-फल मांगने के लिए प्रार्थना करता रहे, गिडगिडाता रहे , मिन्नतें करता रहे, क्या उसकी कमाई पर उसका हक देना भगवान मुनासिब नहीं समझता?
  • क्या वह कर्म से नहीं प्रार्थना और पूजा से ही प्रसन्न होगा ? कोई भगवान अपने बन्दे को इतना निरुत्साह कैसे बना सकता है?
  • क्या प्रार्थना , भक्ति व भजन से ही ईश्वर प्रसन्न हो कर कृपा – वृष्टि करेगा?
  • क्या यह चमचागिरी, चापलूसी और चरन-वन्दना को ही धर्म-कर्म मानने की संस्कृति को बढावा देना नहीं हुआ ?
  • क्या यह सीख कम्पनियों में, दफ्तरों में हर प्रकार के कर्म क्षेत्र में काम करने वाले कार्मिकों को काम-धाम छोड कर बॉस की चापलूसी करते रहने की प्रवृत्ति को बढावा नहीं देती ?
  • क्या आपकी प्रार्थनाओं में “हे भगवान, मुझे अम्बानी जी का हवाई जहाजवा दिलवा

     दो या कम से कम जिस कम्पनी में क्लर्क हूं, उसका एमडी ही बनवा दो ”

     स्टाइल की डिमाण्ड नहीं होती? 

  • क्लर्क में नियुक्ति, क्लर्क की योग्यता , काम क्लर्की और बॉस के सामने रिपोर्ट भी क्लर्की की; ऐसे में जब आप अपने उसी ओहदे पर काम करते हुए अपने उसी बॉस से अपने सी ई ओ के बराबर तनख्वाह मांगेंगे तो आपका वह बॉस आपके बारे में क्या समझेगा ? आपका मानसिक इलाज कराने की सलाह देगा। तो, क्या आपने सबसे बुडबक भगवान को ही समझ लिया है कि काम करें जो ही सो ही और प्रार्थना में मांगे सीएमडी या सी ई ओ की तनख्वाह , ऐसे में या तो आप यह मान कर चलते हैं कि मांगने में क्या जाता है, यह पत्थर का भगवान वैसे भी दे क्या सकता है? अथवा यदि आप यह मानते हैं कि ईश्वर प्रार्थना सुनता है और पूरी भी करता है तो क्या उसे नासमझ समझ कर ठगने का संकल्प ले लिया है आपने? यदि ऐसा नहीं है तो फिर कामधाम छोड कर प्रार्थना-स्थलों की दौड क्यों लगाते हैं।
  1. तुमने अपनी गाडी की सफाई के लिए जो आदमी तीन सौ रूपये महीने पर रखा है, वह

       उसी गडी को वैसे ही साफ करने के लिए तुमसे दस हजार रूपये महीना की

        मांग कर दे, तो तुम क्या करोगे? उसे भगा दोगे और दूसरों से कहते फिरोगे

        कि लगता है , वह आदमी अपना मानसिक संतुलन खो चुका है, तो क्या

        उलजलूल डिमाण्ड लगाने पर भगवान भी तुम्हारी प्रार्थना सुन कर अपने

        दोस्तों के बीच तुम्हारे बारे में भी वैसी ही गुफ्तगू नहीं करता होगा और अब

        तक तुम्हें अपने भक्तों की सूची से हता – भगा नहीं दिया होगा  ?  

  1. मुझे आश्चर्य होता है कि तुम्हें प्रार्थना के दौरान ईश्वर से अपनी अनड्यू डिमाण्ड की

         फेहरिश्त रखते हुए शर्म क्यों नहीं आती? यदि आती है तो वैसी प्रार्थनाओं के

         पीछे भागते क्यों हो?  यदि न भय है और न ही शर्म है तो फिर …?   

  1. और यदि नहीं मानते हो तो खुद को बेकार मानना बन्द करो, ईमानदारी से काम करो ,

         किसी कमजोर, भूखे, बीमार , दुखी इंसान की मदद कर सकते हो तो करो,

         किसी को सम्मान नहीं दे सकते तो उसका अपमान भी मत करो , तुम्हारे

         मुंह का निवाला कोई भगवान नहीं छीन सकता।

  1. इसीलिए हे मनुष्य ! यदि तुम ईश्वर को मानते हो तो खुद को ईश्वर से चालाक मानना

        बन्द करो, उठो, जागो,  काम करो, और उसका शुक्रिया अदा करो, व्यर्थ का

        गर्व करना छोडो,प्रार्थना-स्थलों के लिए दौडना बन्द करो, क्योंकि वैसा कर तुम

        उसके होने के प्रति अविश्वास जताते हो और उसका अपमान करते हो, जिसने

        खुद की प्रार्थना के लिए कोई एक स्थान निरधारित न कर सारी कायनात को

        मुक्त रखा है।

 

 

और भी बहुत कुछ …. किंतु शेष कल ….. !            

डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा (पीएनबी और एबीसीडी )

   डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

     (पीएनबी और एबीसीडी )

बंगलोर, 31 अक्टूबर 2015

 

( “ पंजाब नैशनल बैंक में सीएमडी के रूप में मैं ने कुछ ही दिनों पहले ज्वाईन किया है। देश के  बडे,  प्रतिष्ठित और अग्रणी राष्ट्रीयकृत बैंक – परिवार का मुखिया बनाए जाने पर मुझे बहुत खुशी हो रही है। आप के संगठन द्वारा मेरे स्वागत और अभिनन्दन के लिए इस बडी सभा का आयोजन किया गया है। यह सभागार पीएनबी दिल्ली – एनसीआर में कार्यरत साथियों से खचाखच भरा है, आप मुझे इतना प्यार और आदर दे रहे हैं ! मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि अगले पांच साल तक मुझे आप जैसे साथियों के साथ काम करने का अवसर मिलेगा । परंतु , मैं माफी मांगते हुए यह भी कहना चाहता हूं कि इस स्वागत और सम्मान  से मुझे बिलकुल खुशी नहीं मिल रही है, बल्कि उसके विपरीत मैं खुद को शर्मिंदा महसूस कर रहा हूं। आप सोचेंगे कि ऐसे मौके पर मैं कैसी बातें कर रहा हूं? आप को मेरी बातों से आश्चर्य हो रहा होगा ! आप इसका कारण जानना चाह रहे होंगे?  साथियो, मेरे हाथ में एक पत्र है , बैंक के एक सम्मानित ग्राहक ने मुझे यह पत्र लिखा है, मैं इसे पढ कर आप को सुनाता हूं, मेरे दु:खी और शर्मिंदा होने का कारण आप खुद ब खुद समझ जाएंगे ”……..? )

आत्मकथा के इसी अंश से …….

*   *   *   *   *

 

पी एन बी – पंजाब नैशनल बैंक — प्यारा न्यारा बैंक — भरोसे का प्रतीक ! इसी नाम और प्रतीक से  प्रसिद्ध हमारा बैंक , अपने स्थापना वर्ष 1895 से ले कर अब तक देश – दुनिया में आए अनेक आर्थिक झंझावातों को झेल कर भी भारतीय अर्थव्यवस्था में पूरी मजबूती के साथ खडा, सुदृढ आर्थिक मेरूदण्ड, देश की सेवा में निरंतर अग्रसर , स्थापना का शताब्दी वर्ष सबसे पहले मनाने वाला राष्ट्रीयकृत बैंक, मुझे इस महान संस्था से जुडे होने पर गर्व है । मेरा मानना है कि यदि कोई कर्मचारी या अधिकारी व्यक्तिगत हित – साधन के लिए अपनी संस्था के हित या छवि को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है तो उसके उस कृत्य को देशद्रोह की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।

*   *   *   *   *

मंदिर या किसी बडी  इमारत अथवा अपने जीवन के ऊंचे पडावों पर पहुंचने के बाद जब आप जमीन को छूती हुई सबसे नीचे की सीढियों तक पहुंचना चाहते हैं तब आप ऊपर से नीचे की ओर एक – एक सीढी उतरते हैं किंतु चूंकि चढने और उतरने  की गति और ऊर्जा में अंतर होता है, इसीलिए उतरते समय आप कभी – कभी एक साथ दो – दो सीढियों की छलांग भी लगा देते हैं। मैं ने अपने जीवन की सीढियां नीचे से ऊपर की ओर  एक – एक कर तय की है, इसीलिए आत्मकथा के रूप में जब अपने अनुभव आप से बांटने बैठा हूं तो ऊपर से एक – एक सीढी उतर रहा हूं यानी बात बिल्कुल नीचे यानी शुरू अर्थात बचपन से न प्रारंभ कर आखिरी से कर रहा हूं और उतरते समय बीच – बीच में कुछ सीढियों की छलांग भी लगा लेता हूं; फिर भी , मेरी कोशिश है  कि बातों का सिलसिला और तारतम्य बिखरे नहीं।

बिहार के अति पिछडे इलाके के एक छोटे – से गांव में मेरा जन्म हुआ ; सडक नहीं, बिजली नहीं, खेती के अलावा कोई और रोजी – रोजगार नहीं, शिक्षा नहीं, निकटतम रेलवे लाईन 15 किलोमीटर दूर , जिला मुख्यालय 30 किलोमीटर दूर, हिंदीभाषी इलाका किंतु गांव में हिंदी में बात करने वाले को ‘बहुत अंग्रेजी झाडने वाला’ कहा जाता , 10वीं तक स्कूल में भी  बातचीत मातृभाषा  भोजपुरी में ही , छठी क्लास से एबीसीडी यानी अंग्रेजी पढाने की शुरुआत, कॉलेज में जाने पर हिंदी में बात करना शुरू । वैसे व्यक्ति को पंजाब नैशनल बैंक जैसे देश के अग्रणी राष्ट्रीयकृत बैंक ने  अपने प्रधान कार्यालय में राजभाषा विभाग का प्रभारी मुख्य प्रबंधक बनाया !

मैं जब दिल्ली पहुंचा तो मेरे पास पूंजी के नाम पर माता – पिता से मिला संस्कार और आधुनिक भारत के इतिहास का एक पन्ना था, वह पन्ना जिसमें दर्ज है कि मोहनदास करमचन्द गांधी को ‘माहात्मा’ गांधी बनने की आधारभूमि मेरे पिछडे गांव शहर –  मोतीहारी ने ही दी , वही मोतीहरी (चम्पारण) , जहां नीलहे गोरों के विरुद्ध भारत में प्रथम सत्याग्रह करने का अवसर और संबल गांधी जी को मिला ; उसके अलावा ‘पीपीपीपीपीपी’ ( 6पी का फुलफॉर्म किसी अगली कडी में)  में से कोई भी दौलत मेरी गांठ में नहीं थी। फिर भी, बैंक के शीर्ष कार्यपालकों ने जो स्नेह और समर्थन मुझे दिया , वह मुझे अल्लादीन के चिराग़ से निकले जिन्न से कम नहीं लगता, इससे मुझे लोगों में बनी वह धारणा गलत लगने लगी जिसके आधार पर लोग आरोप लगाते हैं कि बडे अधिकारी अपने से नीचे के अधिकारियों पर ग़लत दबाव बना कर मनोवांछित ग़लत कार्य करा लेते हैं। यह सही है कि ऐसे दबाव डालने वालों की कमी नहीं , साथ ही , यह भी तो सही है कि दबाव में गलत काम करने वाले लोग लालचवश भयभीत हो कर ही वैसा करते हैं।

*   *   *   *   *

श्रीमती उषा अनंतसुब्रमण्यन ने 14 अगस्त 2015 को उसी प्रतिष्ठित पंजाब नैशनल बैंक में प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्यपालक अधिकारी (एमडी ऐण्ड सीईओ) के रूप में ज्वाईन किया , पीएनबी में यह उनकी दूसरी पारी है , इसके पहले वे 19 जुलाई 2011 को कार्यपालक निदेशक (ईडी) के रूप में आईं थीं और भारत सरकार द्वारा भारतीय महिला बैंक (बीएमबी)  की स्थापना किए जाने पर उसकी प्रथम प्रमुख हो कर पीएनबी से बीएमबी में चली गईं थीं। मेरा यह सौभाग्य रहा था कि ईडी के रूप में राजभाषा विभाग उन्हीं के अभिभावकत्व में सौंपा गया था जिसके चलते उनके प्रत्यक्ष मार्गदर्शन में मुझे काम करने का अवसर मिला था,  मैं उन दिनों (11.01.2010 से 31.10.2014 तक) पीएनबी प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग का मुख्य प्रबंधक था, मैडम पीएनबी की केन्द्रीय राजभाषा समिति की अध्यक्षा थीं और मैं सचिव था, उन्होंने बैंक में राजभाषा हिंदी का प्रयोग बढाने, उसे लोकप्रिय बनाने तथा राजभाषा एवं उससे जुडे अधिकारियों – कर्मचारियों का मान – सम्मान बढाने के अनेक महत्वपूर्ण दिशानिदेश दिए थे और उन्हें कार्यान्वित करवाया था । उनकी  सदाशयता और हिंदी के प्रति प्रेरणा – प्रोत्साहन – भावना  के लिए मैं हमेशा उनका आभारी रहूंगा । वे बीएमबी में जाते समय पीएनबी कर्मियों पर अपनी अमिट छाप छोड गईं थीं, यह दूसरी पारी उनके लिए बडी चुनौतियां ले कर आई है, मेरी हार्दिक शुभकामनाएं।

*  *  *  *  *

 

 

मैं ने मंडल कार्यालय दिल्ली में ज्वाईनिंग रिपोर्ट दी, चार – पांच मुख्य प्रबंधकों के साथ मेरी भी पेशी महाप्रबंधक आरके दुबे के समक्ष हुई। चर्चा के दौरान मैं ने बताया कि 30 वर्षों पहले मैं क्लर्क के रूप में बैंक में भर्ती हुआ था, 4 साल के बाद स्पेशलिस्ट -हिंदी अफसर के रूप में मेरा प्रोमोशन हुआ, इस प्रकार मैं 26 वर्षों से स्पेशलिस्ट अफसर ही हूं। उन्होंने कहा कि लेकिन अब तो आप को ब्रांच हेड के रूप में काम करना पडेगा, कैसे करेंगे ? मैंने कहा कि जब हिंदी अफसर बना था तो उसके पहले कभी हिंदी अफसर के रूप में काम करने का अनुभव नहीं था, फिर भी मेरा कार्य निष्पादन हमेशा उत्कृष्ट रहा, वैसे ही इसे भी कर लूंगा, कुछ भी असंभव नहीं है। वे बहुत प्रभावित हुए, उन्होंने रिटेल हब पश्चिम विहार में मुझे पोस्ट करने का निर्देश अपने मुख्य प्रबंधक – एचआर को दे दिया । पिछली मुलाकात न उन्हें याद रही थी और न मैं ने याद दिलाई और न ही मैं ने उसकी आवश्यकता समझी । मुख्य प्रबंधक – एचआर श्री नेहाल अहद मेरे पूर्व परिचित थे, उनसे मैंने पूछा कि क्या यह मेरी फाईनल पोस्टिंग है? उन्हें मैं ने यह भी बतलाया कि ऐसा मैं इसलिए पूछ रहा था ताकि स्थायी आवास की व्यवस्था कर पटना से अपना परिवार भी शिफ्ट कर लूं क्योंकि स्थानांतरण के बाद बैंक में एक ही जगह पर लीज्ड आवास या मकान भाडा भत्ता देने का नियम था। नेहाल जी ने बताया कि इसे फाईनल ही समझिए ।

नवागत सीएमडी श्री के. आर. कामत के स्वागत समारोह में सीरीफोर्ट (?)  सभागार गया था । श्री कामत ने अपने स्वागत समारोह में बोलते हुए कहा था –  “ पंजाब नैशनल बैंक में सीएमडी के रूप में मैं ने कुछ ही दिनों पहले ज्वाईन किया है। देश के  बडे,  प्रतिष्ठित और अग्रणी राष्ट्रीयकृत बैंक – परिवार का मुखिया बनाए जाने पर मुझे बहुत खुशी हो रही है। आप के संगठन द्वारा मेरे स्वागत और अभिनन्दन के लिए इस बडी सभा का आयोजन किया गया है। यह सभागार पीएनबी दिल्ली – एनसीआर में कार्यरत हजारों साथियों से खचाखच भरा है, आप मुझे इतना प्यार और आदर दे रहे हैं !  मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूं कि अगले पांच साल तक मुझे आप जैसे साथियों के साथ काम करने का अवसर मिलेगा । परंतु , मैं माफी मांगते हुए यह भी कहना चाहता हूं कि इस स्वागत और सम्मान से मुझे बिलकुल खुशी नहीं मिल रही है,  बल्कि उसके विपरीत मैं खुद को शर्मिंदा महसूस कर रहा हूं। आप सोचेंगे कि ऐसे मौके पर मैं कैसी बातें कर रहा हूं ? आप को मेरी बातों से आश्चर्य हो रहा होगा ! आप इसका कारण जानना चाह रहे होंगे?  साथियो, मेरे हाथ में एक पत्र है , बैंक के एक सम्मानित ग्राहक ने मुझे यह पत्र लिखा है, मैं इसे पढ कर आप को सुनाता हूं, मेरे दु:खी और शर्मिंदा होने का कारण आप खुद ब खुद समझ जाएंगे ………… ? ”

इतना कह कर श्री कामत ने वह पूरा पत्र पढ कर सुना दिया , उस पत्र के माध्यम से बैंक के एक बडे और सम्मानित ग्राहक ने शिकायत की थी कि नवागत सीएमडी यानी श्री कामत के स्वागत समारोह के आयोजन के लिए उस संगठन के पदाधिकारियों ने चंदा के रूप में एक बडी रकम की मांग की थी  और न चाहते हुए भी उन्हें वह रकम देनी पडी थी । श्री कामत ने पूछा  – “ आप ही बताएं, यह कैसा स्वागत , सम्मान और अभिनन्दन है जिसके लिए ग्राहकों से पैसे लिए गए ? नहीं चाहिए मुझे ऐसा अभिनन्दन ! किंतु चूंकि आपने आदर के साथ बुलाया है और सीएमडी  के रूप में एक साथ इतनी बडी संख्या में साथियों से मुखातीब होना एक बडा और महत्त्वपूर्ण  अवसर भी है, इसीलिए मैं अपनी बात आप के समक्ष रखूंगा जरूर ” । वह पत्र अंग्रेजी में था, श्री कामत बोल भी रहे थे अंग्रेजी में ही, बीच – बीच में हिंदी में भी बोलते थे । श्री कामत ने वर्ष 2009 में 28 अक्टूबर को पीएनबी में सीएमडी का पदभार संभाला था और वह 2009 का नवम्बर महीना था जब वे अपने स्वागत समारोह में उक्त बातें बोल रहे थे। श्री कामत ने उस वक्तव्य के माध्यम से अपनी भावी कार्यशैली का स्पष्ट संकेत देने के साथ – साथ ग़लत को ग़लत कहने तथा सही काम निर्भीक हो कर करने का खुला संदेश भी दे दिया था । एक साधारण आदमी भी उक्त घटना के बाद अंदाजा लगा सकता था की सीएमडी के रूप में श्री कामत का कार्यकाल कितना चुनौतीभरा होने वाला था।

* * * * * *

 

पीएनबी के शीर्ष कार्यपालकों और प्रधान कार्यालय एचआरडी व पीएडी को मैं धन्यवाद देना चाहता हूं कि दसवें द्विपक्षीय समझौता से हुए सेलरी रिविजन से संबंधित ऐरियर कलक्युलेशन के लिए हेड ऑफिस लेवेल पर ही आवश्यक सॉफ्टवेयर/ ऐप्लीकेशन तैयार कराकर कार्यरत और सेवानिवृत्त अधिकारियों – कर्मचारियों को भी समय पर ऐरियर का भुगतान करा दिया गया । इसके साथ ही,  मैं एक सुझाव भी देना चाहता हूं कि एक ऐसा सॉफ्ट्वेयर – ऐप्लीकेशन भी तैयार कराया जाए जिसके माध्यम से सभी सेवानिवृत्त कर्मियों का ई-मेल आईडी और मोबाईल नम्बर के साथ एक केन्द्रीकृत डाटाबेस तैयार किया जाए और यदि बैंक  द्वारा सेवानिवृत कर्मियों के लिए कोई योजना/ सुविधा जारी की जाती है तो एक क्लिक पर ही उन सबको एक साथ सूचित कर दिया जाए क्योंकि सेवानिवृत कर्मियों को एचआरएमएस या पासवर्ड आधारित अन्य साईट देखने की सुविधा नहीं रह जाती है और उसे उस  प्रभाग / विभाग / कार्यालय , जहां से वह अधिकारी या कर्मचारी सेवानिवृत्त हुआ होता है, से सूचना नहीं मिल पाती  है।

* *  *  *  *

भारत के लौह पुरूष और प्रथम गृहमंत्री (स्व.) सरदार वल्लभ भाई पटेल का जन्म आज ही के दिन 1875 में हुआ था, उस महान आत्मा के आविर्भाव की 140 वीं वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएं !

 

आज (स्व.) श्रीमती इंदिरा गांधी की 32वीं पुण्यतिथि भी है , आज ही के दिन 1984 में उनकी हत्या कर दी गई थी, वह हत्या 20वीं सदी की जघन्यतम हत्याओं में से एक थी, उस महान आत्मा के अवसान पर शोक… श्रद्धांजलि ! दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना .. !

 

दोनों महान आत्माएं राष्ट्रीय एकता और प्रबल दृढ इच्छाशक्ति के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।

*  *  *  *  *  *

मेरी सेवानिवृत्ति का भी आज एक वर्ष पूरा हो गया। यह विशेष पोस्ट 31 अक्टूबर को यों ही तो नहीं…..?

राष्ट्रीय चेतना और दृढ इच्छाशक्ति आप के संबल हों, हार्दिक मंगलकामनाएं  ..!

श्रीलाल प्रसाद

बंगलोर, 31अक्टूबर 2015

09310249821

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भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर डॉ. डी सुब्बाराव से प्रथम पुरस्कार (राजभाषा कार्यान्वयन: 2011–12) प्राप्त करती हुई पीएनबी की

तत्कालीन ईडी (वर्तमान एमडी व सीईओ) श्रीमती उषा अनंतसुब्रमण्यन एवं मुख्य प्रबंधक – राजभाषा श्री श्रीलाल प्रसाद

 

 

संसदीय राजभाषा समिति के समक्ष (नई दिल्ली, 2013) पीएनबी के तत्कालीन सीएमडी श्री केआर कामत ,

ईडी (वर्तमान एमडी व सीईओ) श्रीमती उषा  अनंतसुब्रमण्यन, जीएम श्री जीएस चौहान और मुख्य प्रबंधक – राजभाषा श्री श्रीलाल प्रसाद

ज्योतिष और जादूगर   

 

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (सात)

 

  1. फलित ज्योतिष (स्ट्रोलॉजी) पर प्रतिबंध हो, क्योंकि खगोल विद्या (स्ट्रोनॉमी) तो वैज्ञानिक है, किंतु फलित ज्योतिष अन्धविश्वास है, जो लोग उसे भी विज्ञान मानते हैं, उन्हें मेरी खुली चुनौती है तथा उनकी भी हर चुनौती को मैं स्वीकार करूंगा।
  2. फलित ज्योतिष का सरकारी शिक्षण संस्थानों में पठन-पाठन बन्द हो,
  • क्योंकि वैसा करना अन्धविश्वास को संस्थागत स्वरूप दे कर उसे बढावा देना है।
  1. तंत्र – मंत्र पर प्रतिबंध हो,  क्योंकि वह अन्धविश्वास है।
  2. ग्रह-नक्षत्रों के कुप्रभाव से निवारण के उपाय के रूप में पूजा-पाठ, हवन आदि पर

प्रतिबंध हो,  क्योंकि वह अन्धविश्वास है।

क्योंकि गुरूत्वाकर्षण के अनुसार ग्रह-नक्षत्रों की गति व स्थिति का प्रभाव तो पड

सकता है, जैसे चन्द्रमा से समुद्र में ज्वार उठना, सूर्यग्रहण से किरणों में विकार आना आदि, परंतु पूजा-पाठ-हवन और तंत्र-मंत्र-गण्डे-ताबीज से उसके प्रभाव को दूर नहीं किया जा सकता, विज्ञान की सहायता से हम अपना बचाव कर सकते हैं।

  1.  तंत्र-मंत्र-सिद्धि , भविष्यवाणी, ज्योतिष  आदि का दावा करने वालों का सार्वजनिक

  स्थल पर खुले में परदाफाश हो और फिर उनका बहिष्कार हो,

  क्योंकि उस अन्धविश्वास को सिद्धि साबित करने की चुनौती कोई भी तथाकथित

  सिद्ध स्वीकार नहीं कर सकता।        

  1.  जादूगरों के लिए यह अनिवार्य हो कि खेल शुरू होने के पहले वे घोषणा करें कि

  जादू कला और विज्ञान के संयुक्त प्रदर्शन के सिवा कुछ बहीं, जादू से कुछ भी नहीं

  किया – कराया जा सकता , वह मात्र एक खेल है,

  क्योंकि दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो जादू के प्रभाव को साबित कर सके।

  1.  भूत-प्रेत का अड्डा माने जाने वाले खण्डहरों , इमारतों आदि में मीडिया वालों द्वारा

  हाथ में कैमरा और एक रिमोटनूमा यंत्र ले कर तथाकथित नेगेटिव इनर्जी की

  तलाश  का नाटक बन्द हो ;

  क्योंकि वैसा करना अन्धविश्वास को लोकप्रिय माध्यमों से प्रचारित-प्रसारित करना

  है।  

              और भी बहुत कुछा… किंतु शेष कल…..

शराब और खानपान  

 

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (छह)

 

  1. पूरे देश में एक साथ एक बारगी ही शराबबन्दी लागू कर दी जाए। उसे राजनीतिक और

           धार्मिक मुद्दा नहीं बनने दिया जाए।

  1. ताडी को भी शराब ही माना जाए , कुछ लोगों के तुष्टीकरण के लिए ताडी को फल का

           रस कहने का छलावा न किया जाए।

  1. गैर-कानूनी रूप से शराब बनाने वाले और शराब सप्लाई करने वाले पर हत्या के प्रयास का और शराब सेवन करने वाले पर आत्महत्या के प्रयास का मुकदमा चलाया जाए।
  2. ड्रग्स सेवन परने वाले पर आत्महत्या का प्रयास करने और ड्रग्स सप्लाई करने वाले पर हत्या करने का मुकदमा चलाया जाए।
  3. उन सब के लिए यदि वर्तमान कानून में समुचित प्रावधान न हो तो आवश्यक संशोधन कर कठोर धाराएं जोडी जाएं।
  4. हर शहर की नगरपालिका दस हजार की जनसंख्या पर एक सब्जी मार्केट और

    मीट – मछली मार्केट बना कर दे, जैसा कि पटना के बोरिंग रोड चौराहा पर है।

 

 

अभी और भी बहुत कुछ … किंतु शेष कल ….!

राष्ट्र-द्रोह, राज-द्रोह और सरकार-द्रोह

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (छह)

  

  1. फांसी की सजा समाप्त हो –

    क्योंकि किसी कारणवश सजा के बाद यदि आरोप ग़लत साबित हो जाता है तो मरे हुए  

    व्यक्ति को जिन्दा करने की ताक़त किसी के पास नहीं, फिर मारने की हिमाकत क्यों?

  1. राष्ट्र-द्रोह को हत्या से भी ज्यादा संगीन अपराध घोषित किया जाए।
  1. राष्ट्र-द्रोह, राज-द्रोह और सरकार-द्रोह की परिभाषा, सजा के प्रावधानों की जानकारी सहित, सरल भाषा में मीडिया के विभिन्न लोकप्रिय माध्यमों से आम जनता को समझाई जाए।

 

आगे और भी बहुत कुछ.. .. किंतु शेष कल….. !

शादी , तलाक और संतान

 

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (पांच)

  

  1. तीन तलाक समाप्त हो,

           – क्योंकि वह प्रथा महिला विरोधी है;

           – क्योंकि वैसे तलाक से प्रभावित बच्चों को उनके बचपना का स्वाभाविक हक

              नहीं मिल पाता; इसलिए वह प्रथा सन्तान विरोधी भी है।

           – क्योंकि वैसी तलाकसुदा औरत को उसका स्वाभाविक सम्मान समाज में नहीं

              मिल पाता , इसलिए वह प्रथा समाज विरोधी भी है;

  •   किसी भी धर्म का कोई भी प्रामाणिक ग्रंथ उसे मान्यता प्रदान नहीं करता,  

            इसलिए वह धर्मविरोधी भी है;

  •  क्योंकि वह प्रथा महिला को आदमी के बराबर होने का हक नहीं देती ,

           इसलिए वह अमानवीय भी है।

  1.    एक पत्नी या पति के जीवित रहते दूसरी शादी को अपराध घोषित किया जाए;   क्योंकि निसंत्तान को संतानोत्पत्ति के लिए,      केवल बेटी वाले को बेटा भी पैदा

             करने के लिए अथवा दैहिक सुख मात्र के लिए बहु विवाह,  दूसरी शादी

            अनैतिक और अमानवीय है;

  •  क्योंकि वैसे मामलों में जीवित पहली पत्नी की सहमति भी विवशता में दी

           गई सहमति होती है, इसलिए वैसा करना जबरदस्ती भी है;  

       3.  जिस तरह तलाक अदालत से हो,उसी तरह दूसरी शादी भी अदालत की मंजूरी से

      हो।  

        4. निर्धारित संख्या से अधिक संतानोत्पत्ति को अपराध घोषित किया जाए;

             क्योंकि सही परवरिश के अभाव में बच्चे कुपोषण व अशिक्षा के शिकार हो   

            जाते हैं; इसके लिए अतीत का उदाहरण देखने से अधिक धरती का भविष्य

            देखना जरूरी है;

        5. सरकारी सेवाओं, शासन – प्रशासन और जन प्रतिनिधित्व के लिए अधिकतम संतान

              संख्या निर्धारित हो और उसका उल्लंघन करने वालों को उसके लिए आवेदन

              का भी हक न दिया जाए और चयन के बाद भी उसका उल्लंघन करने

              वालों को तत्काल उनके पद , सेवा , प्रतिनिधित्व से हटा दिया जाए और

              आगे के लिए भी अपात्र घोषित कर दिया जाए।  और यदि किसी की

              संतानों की संख्या कानून बनने के पहले ही निर्धारित अधिकतम संख्या –

             सीमा को पार कर गई हो, उनके लिए सरकारी सेवाओं या जन-प्रतिनिधित्व

             में जाने के लिए अधिकतम उम्र सीमा निर्धारित हो।                      

       6.  जन्म, शादी, तलाक, मरण आदि सब कुछ पंजीकृत हो और उसके लिए ग्राम

              पंचायत स्तर तक मेकैनिज्म तैयार और अधिकृत हो; यानी बहु विवाह, बाल विवाह, जबरन विवाह दहेज प्रथा आदि                          अपराध घोषित किए  जाएं, तलाक कानून सम्मत हो और संतानोत्पत्ति निर्धारित संख्या में हो।    

  1.     शादी या श्राद्ध अथवा सामाजिक – धार्मिक आयोजनों में अधिकतम व्यय की

           राशि चुनाव – व्यय की भांति निर्धारित हो और वह राशि आयोजक के

           खाते में मानी जाए , उसका हिसाब उसी से लिया जाए। 

  1.      अर्थात आय के साथ – साथ व्यय पर भी कर निर्धारण हो।
  2.      भारत भूमि में रहने वाले और भारत के नागरिकों पर वे सारी बातें सभी धर्मों

           पर समान रूप से लागू हों।

  1.  ये सभी विचार कोई नये विचार नहीं हैं, हजारों सालों से इस तरह के विचार आते रहे हैं,  लेकिन अब हम अपेक्षाकृत अधिक विकसित और सभ्य सुसंस्कृत समाज में रहते हैं तथा हमने एक सुविचारित संविधान के अंतर्गत सेकुलर लोकतंत्रीय गणतंत्र अपनाया है , इसीलिए इन बिन्दुओं पर निर्णय लेने का समय आ गया है।

 

अभी और भी बहुत कुछ, किंतु शेष कल…..!

आस्था और अन्धविश्वास की सीमा-रेखा

 कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

 – ‘आस्था को ठेस पहुंचने वाला’ क्लौज कानून से समाप्त हो   –

        क्योंकि आस्था और अन्धविश्वास के बीच सीमा – रेखा खींचना असंभव है।

– सरकारी भवनों, कार्यालयों,कार्यक्रमों में पूजा-पाठ और किसी भी तरह के धार्निक अनुष्ठान की प्रथा समाप्त हो –

        क्योंकि संविधान हर व्यक्ति को स्वेच्छा से कोई भी धर्म या मतवाद मानने और उसका का अनुसरण करने की स्वतंत्रता तो देता

        है, किंतु वैसा वह अपने व्यक्तिगत स्तर पर घर – परिवार में करे , सरकारी स्तर पर सरकार में नहीं, सरकार सेकुलर है।

– धर्म-स्थलों में ही नहीं, सामाजिक कार्यक्रमों और सरकारी भवनों में भी ऊंचे बुर्ज पर लाउडस्पीकर लगा कर तेज आवाज में बजाना

       समाप्त हो –

       क्योंकि वैसा करने की आज़ादी तो है, किंतु अपनी चारदीवारी के भीतर, किसी और को असुविधा पहुंचाए वगैर, उसके लिए

        कानून में कुछ प्रावधान भी है, उन प्रावधानों का सख्ती से अनुपालन हो ।

–  सरकारी या सरकार से अनुदानप्राप्त शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा समाप्त हो-  

        क्योंकि सेकुलर सरकार का काम धर्म का प्रचार – प्रसार नहीं है।

–  शासन, प्रशासन के लोग और किसी भी प्रकार के संवैधानिक जनप्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में

         शामिल न हों और न ही शुभकामना संदेश भेजें,  यदि वे वैसा करते हुए पाए जाते हों तो उनका पद, सदस्यता आदि निरस्त

         कर दिया जाए –

        क्योंकि जन-प्रतिनिधि चुन लिए जाने के बाद सबके लिए समान हैं और सभी उनके लिए भी समान हैं, इसलिए समाज के

        विभाजन का कारण बनने वाले धार्मिक आयोजनों में सार्वजनिक रूप से उनकी सहभागिता विभाजन की दरार को बढा सकती

         है।

–  हज-यात्रा और मानसरोवर-यात्रा जैसे अभियानों के लिए यदि सरकारी सबसिडी दी जाती हो तो तत्काल प्रभाव से उसे समाप्त

    किया जाए,

         क्योंकि जो उनमें से किसी को भी नहीं मानते, उनके हिस्से के टैक्स के पैसों को उन अभियानों में क्यों लगाया जाए?

–  सरकार द्वारा और सरकारी अनुदान से हज भवन, मानसरोवर भवन या उस तरह का कोई भी धार्मिक भवन बनाया जाना समाप्त

     हो-

          क्योंकि अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक का तुष्टीकरण सरकारी निधि से किया जाना उन लोगों के प्रति अन्याय होगा, जो उनमें से

          किसी को भी नहीं मानते।

–  पर्यटन को बढावा देने के नाम पर धर्मिक स्थलों के निर्माण, विकास, विस्तार या रख-रखाव पर सरकारी खर्च न हो ।

–  धार्मिक स्थलों पर यदि सरकार कोई भी खर्च करती है तो सबसे पहले उन धर्मों और उनके धर्मस्थलों में जमा धन सरकारी खजाने

          में जमा हो और पूरा प्रबंध सरकार अपने हाथ में ले।

          क्योंकि विकास पर खर्च सरकार करे और उससे हुई आमदनी को धर्म के ठेकेदार रखें, ऐसा नहीं चलेगा।

–  धर्म और ईश्वर आदि व्यक्तिगत विषय हैं, उसे सार्वजनिक प्रदर्शन का तमाशा बनाने पर पाबन्दी हो-

            क्योंकि वही प्रदर्शन वर्चस्व दिखाने का हथकण्डा बन जाता है और प्रेम – मोहब्बत से रहने वाला समाज भी बंटने लगता है। –  किसी भी सार्वजनिक मंच पर किसी भी व्यक्ति को धर्मगुरू, आध्यात्मिक गुरू,  योगीराज, बाबा जी आदि जैसे संबोधन न दिए

            जाएं। यदि वह किसी संस्था का पदधारी या सदस्य हो, तो उसे उसके पदनाम से बुलाया जा सकता है-

            क्योंकि आध्यात्मिक गुरू या धर्म गुरू जैसे पद मिठाई की दूकान की रेवडी नहीं है कि जिसे चाहो, जब चाहो, जहां चाहो ,

            बांट दो।

  • भाषा और शब्दावली पर न जा कर, इसे सभी धर्मों के लिए समान समझा जाए।

 

और भी बहुत कुछ… लेकिन धीरे – धीरे …!

ईश्वर और धर्म

 

                                          कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

 

  • – ईश्वर के प्रति आस्था का कारण भय था और धर्म के प्रति विश्वास का कारण  भूख, भ्रष्टाचार व व्यभिचार।
  • फिर, भय, भूख, भ्रष्टाचार व व्यभिचार ने साथ मिल कर भेद पैदा किया।
  • भेद ने ईश्वर और धर्म को बांट कर भय, भूख, भ्रष्टाचर व व्यभिचार की चारदीवारी में बन्द कर दिया और खुद उनका पहरेदार बन बैठा।
  • फिर भय, भूख, भ्रष्टाचर और व्यभिचार ने भेद की अगुवाई में धर्म एवं ईश्वर का धन्धा शुरू कर दिया।
  • वैसे धंधेबाजों का न कोई ईश्वर है, न कोई धर्म , न आस्था, न विश्वास;
  • आस्था व विश्वास उनके धंधे के हथकण्डे हैं।
  • इसीलिए हे मनु – शतरूपा के वंशजो, आदम – हौवा की औलादो, एडम – ईव की संतानो !

 उठो, जागो,  कर्म करो और भय, भूख, भ्रष्टाचार व व्यभिचार की दीवारों को ढहा दो, भेद को समन्दर में डुबा दो या रेगिस्तान में जला दो अथवा अंतरिक्ष में विलीन करा दो , उन सबकी कैद से ईश्वर और धर्म को मुक्त कराओ, आस्था व विश्वास को संवेदनशील बनाओ ।  

 शेष कल…!

कल से आगे का शेष

 कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

  

  •     ईश-निंदा कानून समाप्त हो –
  • – क्योंकि देवी – देवता – पैगम्बर – प्रभु या ईश्वर मानने की स्वतंत्रता किसी के
       पास है तो नहीं मानने की स्वतंत्रता भी किसी के पास है;

         –  क्योंकि जब आसमान में कींचड उछाल कर कोई उसे कलुषित नहीं कर सकता  तो वैसे असंख्य आसमानों और असीमित
सृष्टियों का सृजन करने वाला सर्जक 
  किसी के कृत्य से कैसे निंदित या कलुषित हो सकता है?  

  • क्योंकि जो अजन्मा है, अजर-अमर है, अगोचर, असीम है, अपरम्पार है, सर्वज्ञाता, सर्वशक्तिमान , सर्वविद्यमान है, अनिंद्य है; उसकी निंदा करने की क्षमता माटी का पुतला कहे जाने वाले किसी इंसान में कैसे हो सकती है?
  • क्योंकि ‘ईश-निंदा’ जैसे शब्द की खोज करने वाला या वैसे शब्द का प्रयोग करने वाला खुद ईश के प्रति सही नज़रिया व्यक्ति प्रतीत नहीं होता ।
  • क्योंकि वैसे शब्द का प्रयोग कर किसी को दण्डित कराने की मंसा रखने वाला व्यक्ति स्वयं असीम को सीमित समझने व समझाने की धृष्टता करता प्रतीत होता है।
  • क्योंकि निंदित या कलुषित तो हम जैसे तुच्छ प्राणियों की फितरत है, ईश उस दायरे में कैसे आ सकता है?  

 

          आगे और भी बहुत कुछ .. लेकिन … शेष कल ..!

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