कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

                                 कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक में आज छपी खबर के अनुसार गाज़ियाबाद स्थित प्राचीन देवी मंदिर के महंत व हिन्दू स्वाभिमान के राष्ट्रीय अध्यक्ष यति नरसिंहानन्द ने कहा है कि देश और प्रदेश में ‘हिन्दुओं की सरकार’ है, फिर भी हिन्दू समाज पर हो रहे जुल्मों में कोई कमी नहीं आई है, इसलिए वे इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे , उनका यह बयान हनुमान यात्रा निकालने के दौरान की गई पुलिस कार्रवाई के विरोध में आया है।  
धर्म-परिवर्तन उनका व्यक्तिगत मामला है, जहां चाहें, जब चाहें, जैसे चाहें , जाएं। तथाकथित पुलिसिए जुल्म का बखान उन्होंने नहीं किया । अमनचैन और कानून – व्यवस्था  बनाए रखना पुलिस की ड्यूटी है, अगर शांति बनाए रखने के लिए पुलिस ने कोई कार्रवाई की होगी तो वह हिन्दुओं पर जुल्म कैसे है ? महंत जी ने खुलासा नहीं किया है। क्या वे चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश की पुलिस उनके मठ में जा कर उन्हीं से आदेश ग्रहण करे , तब कानून का राज कहलाएग , वरना नहीं?
मेरा सरोकार उन सब बातों से नहीं है।
मैं तो केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार से केवल इतना पूछना चाहता हूं कि क्या केन्द्र और प्रदेश में ‘हिन्दुओं की सरकार’ है ? यदि हां, तो वह भारत के संविधान के विरुद्ध है। यदि  नहीं, तो भारत के संविधान का अपमान करने के लिए उक्त महंत जी को तत्काल गिरफ्तार किया जाए और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया जाए।
शेष कल … !
“अमन” श्रीलाल प्रसाद

चम्पारण सत्याग्रह के सौ वर्ष

चम्पारण सत्याग्रह के सौ वर्ष

मोहन से महात्मा और बापू से राष्ट्रपिता होने की कथा

 

चम्पारण की धरती ने मिथिला की बेटी और अयोध्या की बहू को माता का मान दिया, यहीं जनक नन्दिनी जानकी जगत जननी बनीं , यहीं है वाल्मीकि आश्रम, उसके पूरब में जनकपुर और पश्चिम में अवधपुर।

चम्पारण की धरती ने मोहन को महात्मा का सम्मान दिया, यहीं बापू से राष्ट्रपिता का मार्ग प्रशस्त हुआ, यहीं है बापूधाम मोतीहारी , यहीं है कस्तूरबा ग्राम भीतिहरवा।     

 नील के तीन कठिया किसान राज कुमार शुक्ल की कातर पुकार पर गांधी जी कलकत्ता से पटना होते हुए 15 अप्रैल 1917 को तिरहुत कमिशनरी के मुख्यालय मुज़फ्फरपुर पहुंचे थे और उसके कुछ दिनों बाद चम्पारण जिला के मुख्यालय मोतीहारी; वहीं जुल्म के खिलाफ एक आवाज़ बन कर गांधी ने आवाज़ दी, वहीं सत्य अहिंसा और सत्याग्रह की उपजाऊ जमीन तैयार मिली । 

 गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में मुज़फ्फरपुर या चम्पारण पहुंचने की कोई तारीख नहीं लिखी है, किंतु ‘गांधी की कहानी’ लिखने वाले लुइ फ़िशर ने 15 अप्रैल 1917 को रात 12 बजे मुज़फ्फरपुर स्टेशन पहुंचने की तारीख लिखी है; हालांकि केन्द्र और बिहार सरकार के कार्यक्रमों की रपट से मालूम होता है कि निलहे अंग्रेज जमीन्दारों के एसोसिएशन के सेक्रेटरी विल्सन से गांधी जी ने 11 अप्रैल को बात की थी और उनकी वह बातचीत मुज़फ्फरपुर में हुई थी। इसलिए तारीखों की प्रमाणिकता पर मेरी कोई टिप्पणी नहीं है।

 जब मुज़फ्फरपुर में एक सरकारी कॉलेज के प्रिंसिपल प्रो. कृपलानी ने गांधी जी का स्वागत करने के लिए नौकरी छोड दी थी और खुद का कोई एक कमरा भी न होने के कारण प्रो. मल्कानी के घर गांधी जी को ठहराया था और जब उस खबर को पा कर चम्पारण के किसान अपना दुखडा सुनाने के लिए वहां जमा होने लगे थे और जब उनकी दर्दभरी  दास्तान सुन कर गांधी जी उनका दुख देखने – समझने के लिए मोतीहारी पहुंचे थे और जब सभी लोग अपना दुखडा उस आदमी को सुनाने लगे थे , जिसके पास न तख्त था, न ताज था, न शासन की सत्ता थी , न प्रशासन का बल, तो क्या वह दृश्य वैसा ही नहीं रहा होगा , जैसे परदेस गया कोई आदमी बहुत दिनों के बाद अपने गांव – घर लौटता है तो उसके बच्चे दौड कर उसे चारों तरफ से घेरे लेते हैं और रो – रो कर बतलाने लगते हैं कि मोहल्ले के किस बदमाश बच्चे ने उन्हें कितना मारा, कैसे मारा, क्यों मारा ? कहां से वह यकीन आया लोगों के मन में, कैसे वह विश्वास पैदा हुआ , बदमाशों को ललकारने की हिम्मत कहां से आई, कि अब मेरे पिता जी आ गए हैं, बहुत मार लिए, अब तो मार कर दिखाओ ; तो, क्या मोहन से महात्मा और बापू से राष्ट्रपिता बनने का मार्ग उसी विश्वास, उसी यकीन और उसी हिम्मत से वहीं प्रशस्त नहीं हुआ? तो क्या जुल्म के खिलाफ जोरदार जानदार धारदार शानदार कामयाब आवाज उठाने का प्रस्थान बिन्दु वही नहीं है? तो क्या जुल्म का बदला जुल्म से न ले कर केवल अपना वाजिब हक लेने का अहिंसक सत्याग्रह वहीं साकार नहीं हुआ? क्या यह अकारण है कि गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिख दिया – “ सच पूछिए तो मुझे वहीं उन लोगों में ही ईश्वर सत्य और अहिंसा के दर्शन हुए ” ? तो, क्या देश की धरती की धूल में ही भक्ति नज़र नहीं आई, तो क्या मिट्टी में सने किसानों में ही भगवान के दर्शन नहीं हुए, तो क्या देश का समग्र स्वरूप वहीं उपस्थित नहीं हो गया ? तो क्या उन देशवासियों की सेवा में ही देशभक्ति गंगा अवतरित नहीं हुई?           

       मैं पूरे यकीन के साथ यह नहीं कह सकता कि ईश्वर है या नहीं, क्योंकि मैं आस्थावानों की आस्था को आहत करना नहीं चाहता और उसे नहीं मानने वालों से कोई अपील भी नहीं करना चाहता, लेकिन यदि वह है और सब कुछ वही करता है तो मैं कृतज्ञ हूं उसका , जिसने मुझे इस लायक बनाया कि मैं अपनी भावनाओं को शब्द दे सकूं,  इसीलिए मैं पूरे यकीन के साथ यह कह सकता हूं कि जिस तरह ईश्वर को काबा, कैलाश , मंदिर, मस्जिद, गिरिजा या गुरूद्वारा जैसे तीर्थ स्थानों में ही नहीं , जन-जन और कण-कण में कभी भी, कहीं भी व किसी भी रूप में ढूंढा जा सकता है,  बशर्त उसे पाने की ललक में उसके बहाने कुछ और पाने की सनक शामिल न हो, ठीक उसी तरह देशभक्ति व वतनपरस्ती को साबित करने के लिए क्रांतिकारी बलिदानियों की तरह फांसी पर झूलने या स्वतंत्रता सेनानियों की तरह जेल जाने के अवसर का इंतजार करना जरूरी नहीं है, क्योंकि वो दौर कुछ और था, ये दौर कुछ और है । अब तो उन शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों को साकार करने के लिए हमें केवल अपने कर्त्तव्यों को ईमानदारी और निष्ठा से पूरा करना है , निजी हितों से समाज-हितों को ऊपर रखना है और राष्ट्रीय सम्पत्ति को वैयक्तिक स्वार्थसिद्धि का साधन नहीं बनने देना है।

  तो, क्या अब देशभक्ति सिद्ध करने के लिए मौका हर कदम पर मौजूद नहीं है ? क्या क्रांति की सरजमीं हमेशा दुश्मनों के खून से लाल ही होती है? क्या वह अपनों के पसीने से तर ब- तर हो कर लहलहाती फसलों से मालामाल नहीं होती ? क्या क्रांति की हवाओं में हमेशा गोले बारूद का जहरीला धुआं ही फैलता है? क्या कल-कारखानों से निकलता हुआ धुआं खुशहाली का बादल बन नहीं बरसता?  क्या इंकलाब के आसमां में हमेशा जांबाज वाज़ ही परवाज़ भरते हैं ? क्या आज़ादी वो अपनापन का पैगाम ले अमन के परिंदे भी पर नहीं तोलते ? क्या सवालों के सैलाब में जवाबों के ज़ज़ीरे खुद ब खुद निकल नहीं आते , कभी राज्य क्रांति बन कर तो कभी सिपाही क्रांति बन कर ,  कभी अहिंसा और सत्याग्रह क्रांति के रूप में तो कभी अवज्ञा और असहयोग क्रांति के वेश में, कभी सम्पूर्ण क्रांति का झण्डा उठा कर तो कभी सर्वोदय व भूदान का झोला फैला कर , कभी हरित क्रांति की चादर बिछा कर और श्वेत क्रांति की नदियां बहा कर तो कभी नीली व पीली क्रांति की फलियां उगा कर,  और अब , अब जरूरत है शब्द क्रांति की, केवल शब्द बोने की और शब्द की फसल काटने की ,  देश के दामन पर दाग़ लगाने वाले राष्ट्रीय स्वाभिमान में वाधक घातक हर आदमी के खिलाफ शब्द उछालने की ।

           अक्षर ब्रह्म है, शब्द ब्रह्म है, नाद ब्रह्म है आदि आदि; मैं ऐसे भारी भरकम मीमांसा-वाक्यों में आप को उलझाना नहीं चाहता, मैं तो सीधी – सादी बात बोलना चाहता हूं कि शब्दों का उपयोग आप शस्त्र  के रूप में करें , शर्त केवल इतनी है कि आप के शब्द स्वार्थ सिद्धि के साधन मात्र न हों, आप के शब्द आप की आत्मा की आवाज़ हों, आप अपने शब्दों में समा कर बाहर निकलें , शब्द आप में आत्मसात हो कर निकले, आप के शब्दों में आपका आचरण हो, आपका आचरण भी शब्दवान हो  अर्थात अपने शब्दों के प्रति आप ईमानदार हों निष्ठावान हों , समर्पित हों यानी आप शब्द परायण हों, आप अपने शब्दों को जीएं , फिर देखिए, वे शब्द किस तरह ब्रह्मास्त्र का काम करते हैं । आखिर गांधी ने वही तो किया था , शब्दों को आचरण में ढाला था और आचरण को शब्दों में पिरोया था, शब्दाग्रह किया था अर्थात शब्द-शस्त्र का प्रक्षेपण व प्रहार किया था, वही तो सत्याग्रह था ।

        बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि आज देश – दुनिया में टकराव और असहिष्णुता का माहौल है, एकतरफा संवाद चल रहा है, ऐसे में गांधीवादी देश को दिशा दें, बताएं कि देश को किस दिशा में जाना चाहिए, आज के संदर्भ में क्या एजेंडा होना चाहिए।  दरअसल, यह सवाल हरेक देशवासी के जहन में आना चाहिए, प्रत्येक देशभक्त भारतीय के मन – मस्तिष्क में कौंधना चाहिए, हर वतनपरस्त हिन्दुस्तानी के दिल में उठना चाहिए; अगर नहीं उठा है वह सवाल अब तक, तो उठाइए, पूछिए, खुद से पूछिए, दूसरों से पूछिए, अपने सामने वालों से पूछिए, पीछे वालों से पूछिए, दाएं और बाएं के बगलगीरों से पूछिए, सभी देशभक्तों से पूछिए , देशवासियों से पूछिए , क्योंकि देशभक्त कोई भी कहीं भी और कभी भी हो सकाता है ।   

  क्योंकि, देशभक्ति केवल वे ही नहीं करते जो बर्फीली पहाडियों या उबलते रेगिस्तानों में सरहदों की रक्षा करते हुए संगीनों के साये में जिन्दगी गुजारने वाले सेना के जवान हैं , देशभक्ति वे भी करते हैं जो उन जवानों को रसद पहुंचाने के लिए मूसलाधार बारिशों या चिलचिलाती धूप अथवा हड्डियों को गला देने वाली कंपकपाती ठंढ में थरथराते हाथों से खेतों में हल चलाने वाले किसान हैं और देशभक्ति तो वो बहू बेटियां  व माताएं-बहनें भी करती हैं जो उन किसानों के लिए रोटियां सेंकने में अपनी जिन्दगी के हसीन लम्हों को जला डालती हैं या जो उन जवानों को निश्चिंत होकर अपना फर्ज़ अदा करने देने के लिए अपनी चूडियों की खनक को अनसुना कर देती हैं, अपने हाथों की मेहंदी व पांवों के महावर को बेडियां नहीं बनने देतीं अथवा अपनी मांग, अपनी कोख और अपनी कलाइयां सूनी होने का गम उन तक पहुंचने नहीं देतीं;  देशभक्ति हम भी करते हैं जो सुबह से शाम तक घरों या दफ्तरों में पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपनी ड्युटी करते हैं। वैसे ही, जन गण मंगल के लिए मंगल तक को नाप लेने वाले अनुसंधानों में , खेतखलिहानों में, कल-कारखानों में, हाट-बाजारों में या नदी- नालों में वतन की खातिर पूरी संजीदगी से अपने काम को अंजाम देने वाले लोग भी उतने ही देशभक्त हैं, जितने कि ये जवान, ये किसान या हम। ये सभी लोग प्राणों की आहुति दे कर आज़ादी हासिल कराने वाले क्रांतिकारी बलिदानियों और तन-मन-धन व सारा जीवन होम कर देने वाले स्वतंत्रता संग्रामियों के सपनों को साकार करने में साझीदार हैं , उनके तप त्याग से प्राप्त स्वाधीनता को बरकरार रखने और मजबूत बनाने में मददगार हैं, सवाल उठता है कि आप इन में से कौन हैं, क्या हैं, क्यों हैं, कहां और कैसे हैं?

   आइए, चम्पारण सत्याग्रह की 100वीं वर्षगांठ पर हम अपने गिरेवान में झांकें, अपने ज़मीर को टटोलें,  अपने ईमान से पूछें , यदि सबके सामने नहीं तो घर में अकेले में ही आदमकद आईना के सामने खडे हो कर अपनी ही आंखों में आंखें डाल कर खुद से यह सवाल पूछें कि क्या एक भी दाना हमने ऐसा खाया जो हमने कमाया नहीं था ? ऐसा कोई एक भी पैसा अपने लिए खर्च किया जो हमारी मेहनत से अर्जित नहीं था?  क्या ऐसा कुछ भी अपने लिए उपयोग किया, जिस पर नैतिक या कानूनी हक नहीं था ? क्या स्वार्थ के लिए अपने अधिकारों का उपयोग किया ? क्या किसी के जायज हक को दरकिनार करा कर अपने नाजायज हित को ऊपर करने के लिए अपने पॉवर , पैसा या पैरवी का दुरूपयोग किया ? उत्तर यदि ना है तो आप भी देशभक्त हैं, उत्तर यदि हां है तो आप भी देशद्रोही हैं, देशभक्ति या देशद्रोह को मात्रा में आंकने की प्रवृत्ति खुद को छलावा देने के साथ-साथ राष्ट्र को धोखा देना और मानवता को शर्मसार करना है।     

   अच्छा बनने, अच्छाई को समर्थन देने और बुराई का विरोध करने की सीख दुनिया का हर धर्म देता है, हो सकता है कि आप समाज और राजनीति, साहित्य और संस्कृति, सरकारी अर्धसरकारी गैरसरकारी निजी सेवाओं या कारबार से जुडे व्यक्ति हों अथवा इन सबसे अछूता धर्म ही कर्म हो आपका, तब भी यह सवाल उठेगा कि क्या सच कहने का साहस आप रखते हैं, सच सुनने का धैर्य आप के पास है, बुराई का विरोध करने की हिम्मत आप जुटा पाते हैं ?  कहीं कोउ नृप होई हमार का हानि वाली सोच से त्रस्त तो नहीं हैं आप, कहीं क्या करें, बडों का दबाव थाजैसी हीन भावना और ब्यर्थ के बहानों से ग्रस्त तो नहीं हैं आप ? “अकेला चना भांड नहीं फोड सकताजैसे पराजित भाव-बोध के शिकार तो नहीं हैं आप ? 

याद रखिए, आज की समस्याओं के समाधान की शक्ति गोले –  बारूद या बन्दूकों में नहीं, शब्द की शमशीर में है। आज वक्त है शब्दक्रांति का, आवाज़ उठाने का, ये मत सोच कि आवाज़ उठाने से क्या हासिल होगा ? तुम ठीक समय पर , ठीक तरह से, ठीक ठीक आवाज़ दो, ठोस ठोस परिणाम ठोक ठोक के मिलेंगे। इसीलिए दूसरी, तीसरी या चौथी आज़ादी की चाहत के पहले अपने ज़मीर को जगा, क्योंकि जगा हुआ ज़मीर न बुज़दिल होता है, न गुलाम। नेता जी ने कहा था – “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” , मैं कहता हूं- तुम ग़लत की खिलाफत और सही की हिफाज़त में आवाज़ दो, तुम्हारा जमीर खुद ब- खुद आज़ाद हो जाएगा।  

   तो, आ ! देशभक्तो आ! ! वतनपरस्तो आ ! देशभक्तों की हिफाज़त में बोल, देशद्रोहियों की खिलाफत में बोल, दमदार मददगार ईमानदार आवाज़ उठा, अपने देशभक्त होने का सबूत दे , देश की आवाज़ बोल, देश की आवाज़ सुन, देश की आवाज़ लिख ; वक्ता है तो बोल कर लिख, गूंगा है तो लिख कर बोल, बहरा है तो देख कर सुन ! अंधा है तो सुन कर देख ! क्योंकि  शब्द-शस्त्र के अद्भुत अद्वितीय अभूतपूर्व अविस्मरणीय आत्माभिमानी आविष्कारक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चम्पारण सत्याग्रह का यह शताब्दी वर्ष है और आज सर्वशक्तिमान शस्त्र – अस्त्र शब्द ही है। लेकिन हां, शब्दों का चयन सावधानी से हो, वरना हमने एक शब्द से जनतंत्र का युद्ध हारते हुए और दो शब्दों से जीतते भी देखा है । इसलिए जब प्रधानमंत्री जी ने गांधी जी के सत्याग्रह के बाद ‘स्वच्छाग्रह’ कहा है तो मैं ‘शब्दाग्रह’ कह रहा हूं, क्योंकि ‘स्वच्छाग्रह’ भी तो एक शब्द ही है, जिसे गांधी और कस्तूरबा ने चम्पारण में साकार किया था, तो अब जरूरत है ‘शब्दाग्रह’ की यानी कहे गए हर शब्द को साकार करने की, यह पहल जरूरी है।      

 

         तभी तो, मैं, जब कभी भी दुविधा या कठिनाइयों में होता हूं, गांधी की आत्मकथा पढता हूं, मोहन से महात्मा तक का सफ़र समझ में आ जाता, बापू से राष्ट्रपिता तक की यात्रा का हर मार्ग शीशे – सा पारदर्शी हो जाता है और फिर न कोई दुविधा रह जाती है , न कठिनाई।  

 

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

… चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में प्रकाश्य मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” से ..

 

मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड गयो रे।

मोहे पनघट पे नन्दलाल छेड गयो रे।

मोरी नाजुक कलैया मरोड गयो रे  ॥

कंकरी मोहे मारी , गगरिया फोड डारी

मोरी सारी अनारी भिगो गयो रे ।

मोरा घूंघटा नजरियों से तोड गयो रे॥

 

अहा ..!अ…हा !! अ…हा.हा..!!! क्या ही पावन दृश्य है, अक़बर यानी पृथ्वीराज कपूर साहब और सलीम यानी दिलीप कुमार साहब तख्त पर विराजमान हैं और अनारकली यानी मधुबाला सहिबा नाच – गा रही हैं, मानों अध्यात्म-रस की अनंत वर्षा हो रही हो और सभी भक्तजन उसमें भींग रहे हों!

अगले दृश्य में मधु जी के अधरों का बांकपन यानी विद्युत-रेखा-सी दम-दम दमकतीं दंत-पंक्तियों के बीच धंसने को आतुर होठ मानों भक्ति रस का सूनामी प्रलय मचा रहे हों और उसमें भक्तजनों के पापों की गठरी, पगडण्डी, खेत – खलिहान, झोंपडी और महल तक आमूलचूल धुल रहे हों, ऐसी पुण्य की वर्षा हर हमेशा क्यों नहीं होती ? होरी भी अपनी धनिया के संग गोबर को कांख में दबाए नहा आता और पंडित दातादीन या मातादीन गोदान के लिए वहीं उससे खेतों का सौदा करा रहे होते।

मन पवित्र हो गया ये आध्यात्मिक दृश्य देख कर और भजन सुन कर, ढूंढा तो कोई अगरबती ही नहीं मिली घर में वहां जलाने को, सोचता हूं दीप-दान ही कर दूं।

केशव – केशव , धन्य हो गए हम :–

बनत नहिं जमुना कौ ऐबौ।

सुन्दर स्याम घाट पर ठाढे, कहौ कौन बिधि जैबौ।

कैसे बसन उतारि धरै हम, कैसे जलहिं समैबौ ।

नन्द-नन्दन हमकौं देखैंगे, कैसे करि जु अन्हैबौ॥

चोली, चीर , हार लै भाजत सो कैसे करि पैबौ।

अंकन भरि – भरि लेत सूर प्रभु, काल्हि न इहिं पथ ऐबौ॥

दूसरा अमृत-रस- वर्षा-सिक्त पद :-

काम-आतुर भजीं मोकौ, नव तरुनि ब्रज – नारी ॥

सूर – प्रभु अनुमान कीन्हौ, हरौं इनके चीर ।

अहा… ! धन्य हो प्रभु, पट शिष्य हमको भी बना लेते !!

तीसरा अद्यात्म-कलश :

हमारे अम्बर देहु मुरारि।

लै सब चीर कदम्ब चढि बैठे , हम जल-मांझ उघारी॥

तट पर बिना बसन क्यों आवैं, लाज लगति है भारी ।

चोली हार तुम्हीं कैं दीन्हौं, चीर हमहिं द्यौ डारी ॥

तुम यह बात अचंभौ भाषत , नांगी आवहु नारी ।

सूर स्याम कछु छोह करौ जू, सीत गई तनु मारी ॥

अर्थात गोपियां थक – हार कर कहती हैं कि हे कान्हा, तुम अचम्भा वाली बात क्यों कहते हो कि हम नारियां नंगी ही बाहर आ जाएं, हमें बहुत लाज लग रही है, कुछ तो दया करो हम पर , चोली और हार तुम्हीं ले जाओ, परंतु वस्त्र तो हमें दे दो ताकि हम जल से बाहर आ जाएं, हमें ठंढ लग रही है।

“थोडा लिखना, ज्यादा समझना” , गांव में जब हम किसी भौजाई की ओर से  कलकतवा गए भैयारू के लिए पत्र लिखते थे तो अंत में भौजाई यह लाइन जरूर लिखवाती थीं। सो, मेरी ओर से भी पाठकों से वही अरदास है।

हां, माननीय धार्मिक प्रवंचकों, धर्म के ठेकेदारों, कृपा बांटने और घृणा बेचने तथा प्रेम की भीख देने – लेने वालों को सीधा संदेश, मुझे चुनौती देने की ऐतिहासिक भूल मत कीजिएगा, वरना धर्म का धंधा चौपट कर दूंगा। ऐसे सैकडों सबूत हैं मेरे पास।

सीधा सवाल, आज तक उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई, जिन्होंने हमारे प्रभु को उस रूप में प्रस्तुत किया और एमए, पीएचडी, डी-लिट, एमफिल करने के लिए विषयों का पंजीकरण भी कराया, ऐसे ही पदों व पदावलियों को  आधार बना कर स्वयं को उस चिरंतन नायक के रूप में प्रस्तुत करते हुए आज की बहू – बेटियों को आधुनिक गोपिकाओं – सी समझ प्रेम निवेदन करने वाले धर्म – प्रवंचकों में से कुछ को तो अनंत काल से अनंत काल के लिए कृष्ण की जन्मस्थली का दर्शन करने के लिए पर्यटन पर भेज दिया है, बाकियों को वैसे ही खेल खेलने के लिए खुले सांढ की तरह क्यों छोड दिया ?

व्याख्या करने का कोई बखेडा भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि व्याख्याएं मैं भी जानता हूं। वैसा लिखने वाले ने कोई व्याख्या नहीं की, न गीत लिखने वाले ने, न गाने वाले ने, न नाचनी वाली ने , न देखने – सुनने वालों ने , तो फिर व्याख्या का ठेका किसने किसको दे दिया?

हां, कोई बडे वकील हैं ,  उनके चटर – पटर (ट्वीटर) से इस आर्टिकल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कोई सम्बन्ध नहीं है।

 

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

शहीदों की चिताओं पर लागेंगे हर बरस मेले

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले

इंदिरापुरम, 23 मार्च 2017

कोटिश: नमन भारत माता के उन वीर सपूतों को जिन्होंने आज ही के दिन फांसी के फंदों को चूमा था, शहीद – ए – आज़म भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव। साथ ही , उन स्वनाम धन्य और अनाम शहीदों को भी जो देश की आज़ादी और देशवासियों की खुशहाली के लिए सर्वस्व निछावर कर गए।

भगत सिंह अनजान नहीं थे अपने हस्र से, उन्हें पता था कि असेम्बली में बम फेंकने से वे गिरफ्तार होंगे और फांसी भी होगी, तभी तो वे न भागे , न फांसी के नाम पर छटपटाए; सबसे ऊपर उन्हें अपना मकसद भी याद था कि किसी की जान लेने के लिए नहीं, किसी को नुकसान पहुंचाने के लिए नहीं, बल्कि बहरे हुक्मरानों को सुनाने और सोए हुए देशवासियों को जगाने के लिए उन्होंने बम के धमाके किए थे।

बस, उन्हें यह नहीं मालूम था कि आज़ाद भारत में कोई ऐसा भी छद्मवेशी स्वदेशी होगा जो उनके नाम, काम और आदर्शों को व्यापार का जरिया बना लेगा। छद्मवेशी धर्मनिरपेक्षता एक छलावा है , छद्मवेशी स्वदेशी व्यापार क्या है ?

महात्मा गांधी ने विदेशी कपडों की होली जलाई थी, लेकिन उसके बदले किसी ब्राण्ड के कपडे नहीं बेचे थे, उस आन्दोलन की भावभूमि पर खुद को रखनेवाले व्यापारियों को कुछ तो…हो !

शहीदों के नाम और चित्र व्यवसाय बढाने के माध्यम बन जाएंगे, उन शहीदों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा , मैंने तो जगते हुए भी नहीं सोचा कि करोडों भारतवासियों के लिए शान व स्वाभिमान के प्रतीक वे शहीद विज्ञापन में इस्तेमाल होंगे।

एक सभ्य व अनुशासित नागरिक होने के नाते मैं कानून का राज्य मानने वाला हूं, हालांकि हर विषय को ले कर इतने कानून और उन कानूनों की इतनी धाराएं हैं कि उन सबके बारे में पूरी जानकारी, मेरे जैसे साधारण नागरिक को क्या, बडे – बडे धुरन्धर प्रबुद्ध नागरिकों को भी नहीं होगी, फिर भी, कानूनी प्रावधानों का ज्ञान न होना बचाव के लिए कोई मान्य तर्क नहीं है। उसके बावजूद मैं पहले ही कानून से माफी मांग लेता हूं कि यदि अज्ञानतावश कुछ वैसी बात हो जाती है तो उसे निर्दोष मन की बात मानी जाए, जानबूझ कर किया गया उल्लंघन नहीं।

क्या स्वदेशी के नाम पर किसी खास ब्राण्ड की सामग्रियों के प्रचार के लिए शहीदों के नाम, चित्र और आदर्शों को भुनाया जा सकता है? यदि कानूनन वह सही भी हो तो क्या राष्ट्र-प्रेम और देश-भक्ति के बडे – बडे आदर्शों का पिटारा ले कर चलने वाले व्यक्ति अथवा संस्था को इस बात की छूट दी जा सकती है कि वह जन भावनाओं का दोहन करे ?

यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं कि एक संस्था ने भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की कुर्बानियों की आग पर अपने उत्पादों की बिक्री बढाने की रोटी सेंकी है। आज एक बडे राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक के पृष्ठ तीन पर उस आशय का एक बडा विज्ञापन है । क्या शहीदों की चिताओं की आग व्यावसायिक रोटियां सेंकने के लिए है?  उस संस्था का बिना किसी आर्थिक लाभ का ब्राण्ड एमबेसडर स्वयं को बतलाने वाला व्यक्ति जब भी स्वतंत्रता दिवस आता है, हाथों में तिरंगा लहरा कर अपनी कम्पनी का उत्पाद बेचता पाया जाता है। यदि शहीदों को याद करना है तो उसका विज्ञापन स्वतंत्र रूप से दें, उसी में अपने उत्पाद न घुसेडें।

यदि वह कानूनन जायज भी हो तो देश के शहीदों के नाम पर उत्पाद बेचने वाला व्यक्ति या संस्थान किस मुंह से किसी वैसे व्यक्ति की राजनीति को कोस सकता है जो अपने पूर्वजों के नाम भुना कर राजनीति कर रहा हो ? क्योंकि वह तो अपनी पैत्रिक सत्ता का उपयोग कर रहा है, जनता जब चाहती है, उसे सिर पर बिठाती है और जब नहीं चाहती, धूल में मिला देती है ; मगर मार्केटिंग के गुर शहीदों के नाम पर सीखने वाले तो पूरे देश की पैत्रिक सत्ता का दोहन कर रहे हैं, क्या जब तक जनता उन्हें भी धूल नहीं चटा देती, तब तक वे सार्वजनिक धरोहर का इस्तेमाल निजी लाभ के लिए वैसे ही करते रहेंगे जैसे कोई ट्रेन के डिब्बे में लिखा हुआ यह संदेश पढ कर  – “ रेलवे की सम्पत्ति आप की सम्पत्ति है, इसकी रक्षा करना आपका दायित्व है ” सारे पंखों एवं अन्य उपकरणों को खोल कर अपने घर ले जाए और यदि कोई पूछे तो बोले-“ इसकी रक्षा करना मेरा दायित्व है, यदि इसे यहीं छोड दूं तो कोई उठा ले जाएगा ”।

और, यदि वह कानूनन गलत है तो उसके लिए कानून कहां है? मेरा किसी पर आरोप नहीं, एक निर्दोष मन की जिज्ञासा है, कृपया उसे शांत करें।

यदि वर्तमान कानून वैसे ट्रेड प्रमोशन को मना नहीं करता तो उसके लिए माकूल कानून बनाया जाए, और यदि कानून में उसे रोकने का प्रावधान है तो उसे ढूंढ कर लाया जाए व उसे अमली जामा पहनाया जाए।

अथवा क्या “वतन पर मरने वालों का बाकी यही निशां होगा”?

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

      और एक कदम यह भी

          एक प्रशंसनीय पहल

                     

भारत सरकार, गृह मंत्रालय, राजभाषा विभाग, केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान की पाठ्यक्रम संशोधन समिति की एक उच्चस्तरीय बैठक 14 मार्च 2017 को सीजीओ कम्प्लेक्स, अंत्योदय भवन, नई दिल्ली में हुई। बैठक की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक और प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. जयप्रकाश कर्दम ने की। डॉ. श्रीनारायण सिंह समीर निदेशक केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो, डॉ. रवि कुमार टेकचन्दानी निदेशक केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, डॉ. भरत सिंह प्रोफेसर केन्द्रीय हिन्दी संस्थान , डॉ.पूरन चन्द टंडन प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय एवं भारतीय अनुवाद परिषद – भारतीय विद्या भवन; एनएचपीसी के वरिष्ठ अधिकारी श्री राजबीर सिंह, केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान के उपनिदेशक डॉ. भूपेन्द्र सिंह, सहायक निदेशक श्रीमती दलजीत कौर एवं स्नेहलता सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी बैठक में उपस्थित थे।

समिति के विशिष्ट सदस्य के रूप में मुझे भी आमंत्रित किया गया था। मैं मंत्रालय की ऐसी समितियों का सदस्य पहले भी रहा हूं, सेवानिवृत्ति के बाद भी उस सिलसिले से मुझे जोडे रखने के लिए मैं भारत सरकार और उसके अधिकरियों के प्रति आभार प्रकट करता हूं।

डॉ. जयप्रकाश कर्दम ने भारत सरकार के राजभाषा सचिव श्री प्रभाष कुमार झा आईएएस के संदेशों का उल्लेख करते हुए बैठक का शुभारम्भ किया । उन्होंने कहा कि चूंकि माननीय प्रधानमंत्री और गृहमंत्री ने जनहित संबंधी योजनाओं और कार्यक्रमों को लोकप्रिय बनाने के लिए सरल एवं सुगम हिन्दी का प्रयोग करने पर जोर दिया है, इसीलिए प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की पुस्तकों में भी यथा संभव सहज व बोलचाल की हिन्दी का प्रयोग किया जाए ताकि सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ – साथ आम जनता के लिए भी वह उपयोगी सिद्ध हो सके। डॉ. कर्दम ने यह भी कहा कि यद्यपि इन पाठ्यक्रमों का सीधा संबंध हिन्दीतर भाषी सरकारी अधिकारियों और कर्मचारियों से है तथा संस्थान को प्रदत्त क्षेत्राधिकार में रह कर ही कार्य करना है , तथापि , चूंकि सरकार के कामकाज आम जनता के लिए होते हैं, इसलिए इन पाठ्यक्रमों का भी अंतिम लक्ष्य आम जनता ही है।

डॉ. कर्दम ने बताया कि 1955 में ये पाठ्यक्रम शुरू हुए थे , जिनमें समय – समय पर संशोधन होते रहे हैं , कम्प्युटर और इंटरनेट का युग आने पर उन पाठ्यक्रमों को उसके अनुसार संशोधित कर वेबसाइट पर भी उपलब्ध करा दिया गया है, जिसका लाभ उठा कर हजारों इच्छुक हिन्दीतरभाषी हिन्दी सीख रहे हैं।  और अब, टेक्नोलॉजी के अद्यतन विकास व विस्तार को ध्यान में रखते हुए संस्थान ने उन पाठ्यक्रमों को मोबाइल ऐप में भी उपलब्ध कराने का निर्णय लिया है, फलस्वरूप प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों में एक बार फिर से संशोधन की आवश्यकता महसूस हो रही है , ताकि इन्हें अत्याधुनिक तकनिक से जोडा जा सके। ऐसा हो जाने पर देश – विदेश के असंख्य हिन्दीतरभाषी, जब और जहां चाहें, अपनी सुविधा के अनुसार हिन्दी सीख सकेंगे।

डॉ. श्रीनारायण सिंह समीर ने कहा कि सीखने की क्रिया निरंतर चलने वाली प्रक्रिया होती है। हम जब भी नये लोगों से मिलते हैं या नई जगहों पर जाते हैं अथवा नया काम करते हैं या नई चीजों का इस्तेमाल करते हैं तो उस प्रक्रिया में स्वत: कुछ न कुछ नये शब्दों व शब्दावलियों को सीखते और सिखाते हैं। कभी – कभी वैसे शब्दों व शब्दावलियों को समझने में कठिनाई – सी महसूस होती है; हालांकि वे शब्द कठिन नहीं होते, केवल अपरिचित होते हैं और उस अपरिचय के कारण ही वे कठिन लगते हैं। इसीलिए यदि वैसे शब्द मिलते हैं तो उन्हें भी सीखना चाहिए, तकनीकी मामलों में तो वैसा होना आम बात है।

मैंने अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि भारत सरकार और उसके राजभाषा सचिव ने हिन्दी प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों को संशोधित कर नई तकनीक के अनुरूप ढालने तथा उसे मोबाइल ऐप में उपलब्ध कराये जाने के लायक बनाने का जो निर्देश दिया है , वह समय की मांग है , इसीलिए डॉ. जयप्रकाश कर्दम के निदेशन में केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान की यह पहल प्रशंसनीय है। अब इस समिति के विद्वानों को यह देखना है कि ये पाठ्यक्रम किस प्रकार सहज, सुगम और लोकप्रिय बनेंगे। मैंने यह भी कहा कि पाठ्यपुस्तकें यदि सरल और रोचक हों, तो पाठ्यक्रम भी लोकप्रिय होंगे। मेरा मत था कि ऐसी पाठ्यपुस्तकों के पाठों में विषय संबंधी ज्ञान मूल लक्ष्य नहीं होता, बल्कि लक्ष्य उस ज्ञान को पाठकों तक पहुंचाने का माध्यम यानी उसकी भाषा का ज्ञान कराना होता है,  इसीलिए पाठों में शब्दों और शब्दावलियों का प्रयोग करते समय इस मूल लक्ष्य को ध्यान में रखा जाए। मैंने कहा कि हमें याद रखना चाहिए कि स्वतंत्रत भारत में भाषा संबंधी संविधानिक प्रावधानों को लागू कराने के लिए गठित शब्दावली आयोगों और समितियों से हिन्दी शब्दों व शब्दावलियों के निर्माण में जो कुछ असावधानियां हो गईं, उन्हीं के चलते कुछ बिलकुल अपरिचित – से लगने वाले शब्द हिन्दी शब्दावलियों में आ गए, फलस्वरूप हिन्दी को दुरूह होने का आरोप भी झेलना पडा । इसीलिए हिन्दी के विद्वान अपनी विद्वता का उपयोग विश्वविद्यालय में करें और ऐसे पाठ्यक्रमों में हिन्दीतरभाषी सरकारी कर्मियों के कार्यकलापों के लिए उपयोगी तथा जनसाधारण के लिए लोकप्रिय भाषा को अपनाएं यानी देश – काल और पात्र के अनुरूप भाषा ही विविधताओं में एकता की मिसाल माने जाने वाले हमारे देश की एकता की कडी हो सकती है और हिन्दी अपने स्वाभाविक रूप में ऐसी ही है भी।

समिति की दिन भर चली बैठक में सदस्यों ने परस्पर समन्वय, सामंजस्य व व्यावहारिक दृष्टिकोण का परिचय देते हुए पाठ्यक्रमों का उपयोगी स्वरूप तैयार किया। संस्थान के निदेशक द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ बैठक सम्पन्न हुई।

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम , 14 मार्च 2017

9310249821  ई-मेल : shreelal_prasad@rediffmail.com

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चुनावी भाषणों के आईने में हार – जीत का अक्स

डायनैमिक और डाइनामाइट (अकथ कथा : आत्मकथा)

चुनावी भाषणों के आईने में

हार – जीत का अक्स

    *****

इंदिरापुरम,09 मार्च 2017

इस आलेख को पढने के पहले या बाद में उपर्युक्त शीर्षक के परिप्रेक्ष्य में मेरे ब्लॉग shreelal.in  पर 10 फरवरी 2017 का आलेख पढ लिया जाए , क्योंकि यह उसी की निरंतरता में है यानी उसकी पूरक है।          

ऐसा पहली बार हो रहा है कि महज कुछ राज्यों के विधानसभाओं के चुनावों से देश के प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा तो जुड ही गई है, उनका राजनीतिक भविष्य भी दांव पर लग गया है। ऐसा किसी राजनीतिक कारण या जरूरत के चलते नहीं , बल्कि स्वयं प्रधानमंत्री की खुद को चमत्कारी साबित करने की महत्त्वाकांक्षा के चलते हो रहा है, वरना 70 वर्षों के आज़ाद भारत में किसी भी प्रधानमंत्री और उसके विशालकाय मंत्रीमंडल के एक चौथाई मंत्रियों द्वारा किसी विधानसभा के चुनाव में किसी एक शहर में तीन दिनों तक डेरा डाले रहने की यह पहली घटना नहीं होती । इसीलिए इन चुनावों में यह प्रश्न बेमानी हो गया है कि जीत किसकी होगी, केवल एक ही प्रश्न शेष रह गया है कि हार किसकी होगी?

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              महाशिवरात्रि

                                                                मेरे नाती कुमार श्रेष्ठ का मुण्डन संस्कार

मेरे नाती कुमार श्रेष्ठ का मुण्डन संस्कार महाशिवरात्रि – 24 फरवरी – को अहमदाबाद में सम्पन्न हुआ । 18 अक्टूबर 2014 को दिल्ली में जन्मा कुमार श्रेष्ठ मेरी पुत्री शिल्पाश्री एवं जमाई सुमीत कुमार का प्रथम पुत्र है।

महाशिवरात्रि हिन्दू आस्था एवं विश्वास का प्रतिमान हैं, वह शिव और पार्वती का विवाह दिवस है, उसका हर पल पवित्र, शुभ एवं पुण्य प्रदान करने वाला है।

शिव – पार्वती के सनातन संगम की साक्षी महाशिवरात्रि मेरे नाती कुमार श्रेष्ठ के मुण्डन संस्कार की भी साक्षी हो गई है।

मेरा नाती कुमार श्रेष्ठ दीर्घायु हो, सदा स्वस्थ – प्रसन्न रहे, संवेदनशील और संस्कारशील व्यक्तित्व प्राप्त करे, सबके स्नेह, सम्मान व सद्भाव का पात्र बने, ऐश्वर्यशाली एवं यशस्वी हो, इसके लिए उसके नाना – नानी और समस्त पूर्वजों का आशीर्वाद है।

यह सुखद संयोग है कि इस वर्ष की महाशिवरात्रि यानी 24 फरवरी मेरे एकमात्र पुत्र कुमार पुष्पक और बहू आरती पुष्पक के विवाह की छठी वर्षगांठ भी है। पुष्पक और आरती के सुदीर्घ स्वस्थ – प्रसन्न स्नेहिल दाम्पत्य जीवन की मम्मी –  पापा और समस्त स्वजनों – परिजनों की ओर से हार्दिक बधाइयां, शुभकामनाएं एवं अशेष आशीष।

इसी महीने बसंत पंचमी , 01 फरवरी, को पुष्पक एवं आरती के प्रथम पुत्र मेरे पोता अपूर्व अमन का मुण्डन संस्कार और विद्यारम्भ तिरुपति में सम्पन्न हुआ, मेरा पोता दीर्घजीवी हो, स्वस्थ – प्रसन्न रहे, उन्नतिशील व प्रगतिशील बने, ऐश्वर्यवान एवं यशस्वी हो , इसके लिए दादा – दादी एवं समस्त पूर्वजों के   अशेष आशीष एवं शुभकामनाएं।

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

ना अति वर्षा , ना अति धूप ; ना अति बोलता, ना अति चुप !

डायनैमिक और डाइनामाइट (अकथ कथा : आत्मकथा)

ना अति वर्षा , ना अति धूप

ना अति बोलता, ना अति चुप

इंदिरापुरम, 10 फरवरी 2017

गांव – देहात में इस तरह की ढेर सारी कहावतें देखने – सुनने को मिलती हैं। सवाल है कि कथा, कहानी या कहावतें तो कही और सुनी जाती हैं, फिर मैंने देखने की बात क्यों की ? वह इसलिए कि कहावतें जहां प्रतिफलित होती हैं, वहां सिर्फ श्रव्य ही नहीं, दृश्य जगत भी उपस्थित हो जाता है और वह दृश्य जगत जिन लोगों के कारण उपस्थित होता है, उन्हीं लोगों के शिक्षण – प्रशिक्षण व उद्बोधन – प्रबोधन के लिए ऐसी कहावतें जन्म लेती हैं। जाहिर है, यह कहावत पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह बनाम वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी की ओर से आ रही है या टहलते हुए उनकी ही तरफ जा रही है।

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मुण्डन एवं विद्याध्ययन संस्कार

डायनैमिक और डाइनामाइट (अकथ कथा : आत्मकथा)

मुण्डन एवं विद्याध्ययन संस्कार

तिरुमाला तिरुपति

बसंत पंचमी 01 फरवरी 2017

श्वेतपद्मासना हंसवाहिनी पुस्तकधारिणी साम – सप्तस्वर – रागिनी विद्यादायिनी भव – भय – भेदिनी भगवती भारती मां सरस्वती की पूजा अर्चना का आज विशेष दिवस है ; बालक – बालिकाओं के विद्या – अध्ययन के शुभ मुहूर्त के साथ आज रंग वो गुलाल के त्योहार होली का शुभारम्भ देवी देवताओं को चन्दन रोली और अबीर अर्पित कर हो गया है। आज बसंत पंचमी है।

देश-विदेश के भारतवंशी, विशेष कर हिन्दू, आज बसंत आगमन का त्योहार बडे धूमधाम से मना रहे हैं। उमंग उत्साह उल्लास स्नेह और आनन्द आदि बसंत के स्थायी भाव में विभोर उत्सवधर्मा मानव मन मनोरम मनोहारी प्राकृतिक छटा के संग उसी के रंग में सराबोर है।

आज मेरे पौत्र (पोता) अपूर्व अमन का मुण्डन संस्कार और विद्याध्ययन शुभारम्भ व लेखनी पूजन तिरुमाला तिरुपति में भगवान बालाजी धाम में सम्पन्न हुआ तो मेरे दौहित्र (नाती) कुमार श्रेष्ठ का विद्याध्ययन शुभारम्भ एवं लेखनी पूजन अहमदाबाद साबरमती के सुन्दर सुहाने सौहार्दमय वातावरण में सम्पन्न हुआ।

मेरे पौत्र अपूर्व अमन ( मेरे एकमात्र पुत्र कुमार पुष्पक और बहू आरती पुष्पक का प्रथम पुत्र) के साथ मैं, मेरी पत्नी पुष्पा प्रसाद , पुत्र कुमार पुष्पक , बहू आरती पुष्पक, छोटी पुत्री शिप्रा और दामाद अभिषेक आर्यन कल रात में बंगलोर से चल कर आज सुबह तिरुपति पहुंचे। यहीं बालाजी के पवित्र प्रांगण में अपूर्व का मुण्डन संस्कार और लेखनी पूजन सम्पन्न हुआ।

बडी बेटी शिल्पाश्री पति सुमीत कुमार एवं पुत्र कुमार श्रेष्ठ के साथ अहमदाबाद में हैं, मेरे नाती श्रेष्ठ ने वहीं सरस्वती पूजन किया।

मेरे उपर्युक्त संस्कारित पोता और नाती , दोनों की तस्वीरें इस पोस्ट के साथ हैं । मैं अपने सभी सुहृदजनों, सुधी पाठकों, शुभचिंतकों से प्रार्थना करता हूं कि मेरे पोता और नाती को अपना स्नेह व आशीर्वाद दें तथा उनके स्वस्थ – प्रसन्न मंगलमय जीवन की कामना करने की कृपा करें ।

मेरे पोता और नाती चरित्रवान हों, विवेकवान हों, बुद्धिमान हों, मानवीय संवेदना से परिपूर्ण गुणवान हों, दयावान हों, करुणामय धनवान हों ,ऐश्वर्यवान एवं यशस्वी हों, इसके लिए मेरे, मेरी पत्नी, मेरे पुत्र व पुत्रबधू , बेटी व दामाद एवं समस्त पूर्वजों के अशेष आशीष उनके साथ हैं।

आज माघ सप्तमी है , हमारे यहां आज के दिन शक्तिस्वरूपा देवी भगवती की पूजा होती है। बसंत पंचमी विद्या की देवी सरस्वती पूजा के दिन बच्चों के शुभ संस्कार हुए, मैंने उसी दिन इस पोस्ट की शुरुआत की और आज सप्तमी शक्ति की देवी पूजा के दिन इसे पूरा कर पोस्ट कर रहा हूं।

शुभमेतिशुभम !

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

बंगलोर, माघ सप्तमी 03 फरवरी 2017

गांधी खादी नोट वोट

डायनैमिक और डाइनामाइट (अकथ कथा : आत्मकथा)

                                                                      (गांधी खादी नोट वोट )

बंगलोर, 14 जनवरी 2017

माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदरदास मोदी जी, एक निवेदन है आप से,

अविलम्ब हरियाणा के मंत्री महोदय श्री अनिल विज साहब को खट्टर मंत्रीमंडल से तथा अपनी तस्वीर को खादी ग्रामोद्योग की डायरी और कैलेण्डर से हटवा दीजिए। वरना, केवल इन्हीं दोनों घटनाओं से आगामी पांचों विधान सभा चुनाव आप हार जाएंगे। हालांकि यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि आप के विरोधी उपर्युक्त दोनों संदेशों को जनमानस तक कितनी कुशलता से पहुंचा पाते हैं।

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