बोल , हरदी घोंघा  बोल

 

बोल , हरदी घोंघा  बोल

मैं बचपन में अपने गांव के अखाडे में कुश्ती सीखने भी जाता था। घुडसवारी, तीरंदाजी , निशानेबाजी, तलवारबाजी और लट्ठबाजी यानी गांव में होने वाले हर खेल में शामिल रहता था। घुडसवारी भैंस की पीठ पर बैठ कर होती थी, कभी – कभी धोबी के गधे की पीठ पर भी हम सवारी गांठ लेते थे । तीरंदाजी के लिए एक पुरानी बाल्टी को कटवा कर नुकीले तीर लोहार से बनवाए थे, निशानेबाजी गुलेल, शीशे की गोली, लट्टू तथा ढेला फेंक कर आम, जामुन आदि तोडने में होती, तलवारबाजी लकडी की तलवार और बांस के पैने से गद्दका पर सीखी जाती, पतंगबाजी का नशा तो कुछ और था ही। किंतु सबसे मजेदार था कुश्ती लडना। कुश्ती अखाडे के अलावा कहीं भी, कभी भी, आमीर खान की दंगल वाली चुनौती की स्टाइल में, हो जाती थी। जरूरी नहीं कि वह घोषणा कर के ही हो, किसी भी बात पर मनमुटाव होने पर झगडा हो जाता और वह झगडा प्राय: कुश्ती में बदल जाता।

गांव में झग़डे वाली कुश्ती आज की फ्री स्टाइल से भी ज्यादा घातक होती। एक पक्ष दूसरे को पछाड देता , तब भी जीत हार की घोषणा नहीं होती; यदि कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी को पछाड कर, चित कर उसकी छाती पर बैठ जाए , तब भी जीत की घोषणा नहीं होती; उसके लिए जरूरी होता था कि नीचे वाला व्यक्ति बोल कर स्वीकार कर ले कि वह हार गया, उसे ‘हरदी घोंघा मानना’ कहते थे यानी पटखनी खाया हुआ व्यक्ति बोल दे ‘हरदी घोंघा’ तभी उसे हारा हुआ और ऊपर वाले को जीता हुआ माना जाता था। जीतने वाला यदि ज्यादा जिद्दी बदमाश टाइप का हुआ तो हारने वाले से तीन बार ‘हरदी घोंघा’ बोलवाता था। खेल – खेल में थोडी – बहुत सीखी गईं उन सभी चालों की कुछ – कुछ चालें मुझे समझ में आती हैं।

अब मेरे फेसबुक के इसी टाइम लाइन पर 28 जुलाई का       “सियासी हरम में बेगमों की सौगात” शीर्षक वाला मेरा पोस्ट देखें, जिसमें बिहार सरकार से इस्तीफा दे कर नीतीशा कुमार द्वारा भाजपा के समर्थन से नई सरकार बनाए जाने की बात मैंने की थी, उसे पढे वगैर इस पोस्ट को नहीं समझा जा सकेगा। मैंने उस पोस्ट में लिखा था कि बादशाह विवाह कर, जीत कर, खरीद कर अथवा छीन कर बेगमें लाते थे और अपने शाही हरम में बेगमों की संख्या बढाते थे, वैसा करने से उनकी शान-वो-शौकत में इजाफा होता था। बादशाह के लिए यह जरूरी नहीं होता था कि उस बेगम को वह विवाहिता होने का हर सुख दे ही दे , हां, आभूषण, धन – दौलत और जागीरें तक भी दे दी जाती थीं, किंतु उन बेगमों के पास नहीं होता था तो बादशाह का प्यार। वैसे ही शाही हरम में जनता दल (यू) शामिल हुई थी। केन्द्रीय मंत्रीमंडल में ताज़ा फेरबदल के जश्न में उस नई नवेली बेगम को न्योता तक न दे कर बादशाह ने उसकी असली औकात बता दी कि गहने ले, सोलहो सिंगार भी कर ले, परंतु शौहर के सामने बेगम होने का हक जताने की जुर्रत करना क्या, मुगालता भी मत पाल।

पत्रकार पूछते तो प्रवक्ता बोलते रहे- “अभी समय है, निमंत्रण आ जाएगा”, शपथग्रहण समारोह के एक दिन पहले पत्रकार ने पूछा – “ उनका संदेशा आया”? जवाब मिला  – “ संदेशे आते हैं, संदेशे जाते हैं, लेकिन वो नहीं आते, फिर भी उम्मीद तो है ”, अंतिम दिन शाम को पत्रकार ने पूछा – “ चिट्ठी आई”? जवाब मिला – “ आएगी जरूर चिट्ठी मेरे नाम की, तब देखना ” !

रात में खबरिये ने पूछा – “ आई ”? जवाब मिला – “ लो आ गई उनकी याद , वो नहीं आए”।

और आज, नई बेगम साहिब ने यह कह कर ‘हरदी घोंघा; बोल दिया है कि हरम में शामिल होने के समय बेगम – ए – खास का ओहदा देने यानी मंत्रीमंडल में शामिल होने की बात हुई ही नहीं थी तो उसे ले कर लोग हायतोबा क्यों मचा रहे हैं?

किसी को क्या गरज पडी है जी , कोई खुद बादशाहत छोड कर गुमनाम बेगमात की जमात में  शामिल होता रहे। अवाम को तो यह समझ है कि यह बादशाह, शाम, दाम, दण्ड, भेद, चाहे जैसे भी हो, तीसमार खां बनने वालों से हरदी घोंघा बोलवाए वगैर मानता नहीं।

हालांकि अब खुद बादशाह की बादशाहत की बाढ भी ढलान पर है, बादशाह तो जमीनी हकीकत समझने लगा है, किंतु दास जन ढलान को उठान बताने में ही लगे हुए हैं, यानी मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त !

ओणम, अनंत चतुर्दशी और शिक्षक दिवस की

हार्दिक शुभकामनाएं !

 

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

04 सितम्बर 2017

कथनी – करनी के चक्रव्यूह में सरकार

कथनी – करनी के चक्रव्यूह में सरकार

आज के अखबारों में दो खबरों ने मेरा ध्यान ज्यादा खींचा । पहली खबर- बलात्कारी राम – रहीम के गुर्गे जेल भरो अभियान चलाने वाले हैं और ऐसी अपील सोसल मीडिया के जरीए की जा रही है, इसलिए सरकारी बन्दे सोसल मीडिया को खंगाल कर वैसी अपील पोस्ट करने वालों का पता लगाने वाले हैं।

दूसरी खबर – लोकपाल की नियुक्ति न करने वाली मोदी सरकार की वादाफरोशी के खिलाफ अन्ना हजारे फिर से आन्दोलन करेंगे।

पहली समस्या का हल तो केन्द्र सरकार बलात्कारी राम रहीम के प्रति असीम श्रद्धा रखने वाले अपने हरियाणा वाले मंत्री से बात कर आसानी से निकाल सकती है, क्योंकि उसी मंत्री जी के ‘धारा 144 श्रद्धा पर लागू नहीं’ वाले बयान के कारण गैरकानूनी भीड जमा हुई और भीड जमा हुई , तभी तो दर्जनों लोगों की मौत की परिस्थितियां पैदा हुईं। उस कार्य में सहयोग के लिए सरकार बलात्कारी रामरहीम के अभूतपूर्व प्रशंसक धर्मध्वज – वाहक अपने यूपी वाले माननीय सांसद से भी आग्रह कर सकती है; आखिर यह सारा झमेला तो कथनी का ही फेर है !

दूसरी समस्या थोडी टेढी है। अन्ना हजारे का बयान आया है कि कॉग्रेस के शासन – काल में लोकपाल की नियुक्ति के लिए उनके आन्दोलन में   भाजपा बडे जोरशोर से अभियान चला रही थी और शब्दवाण से तत्कालीन सरकार पर निशाना भी साध रही थी किंतु केन्द्र में सरकार चलाते हुए उसे तीन साल से भी ज्यादा हो गए और प्रधानमंत्री को कई बार पत्र लिख कर लोकपाल नियुक्ति के लिए याद भी दिलाई गई, फिर भी कोई जवाब नहीं आया; सरकार के नुमाइन्दे यही कहते रहे कि लोकपाल की नियुक्ति वाली कमेटी में लोकसभा में विपक्ष का नेता भी एक सदस्य होता है , जबकि वर्तमान लोकसभा में ऐसा कोई नेता है ही नहीं, क्योंकि उसके लिए अपेक्षित न्यूनतम संख्या में सांसद ही किसी पार्टी के पास नहीं है। कमाल का तर्क है ! इसका मतलब कि सरकार के इस कार्यकाल में लोकपाल की उम्मीद बेमानी है।  करनी को कथनी से दूर रखने का नायाब तरीका है यह !

यदि कथनी करनी एक करनी हो तो क्या लोकसभा में सबसे बडी विपक्षी पार्टी के नेता को उस कमेटी में नहीं लिया जा सकता या उससे भी ज्यादा सटीक तरीका अपनाना हो तो क्या पूरे विपक्ष को नहीं कहा जा सकता कि वे उस कार्य के लिए अपना एक सर्वमान्य नेता दे दें ? मगर नहीं, ऐसा भला क्यों किया जाए ? वैसा करने से तो कथनी – करनी के चक्रव्यूह में देश का चकराना ही रूक जाएगा। क्या होगा ‘ न खाऊंगा , न खाने दूंगा’ वाले जुमले को कार्यरूप में परिणत करने के जुमले का ?  क्या हुआ तेरा वादा ! क्या हुआ वो इरादा !!

अन्ना हजारे ने सरकार के उसी चक्रव्यूह को भेदने के लिए एक बार फिर सघन आन्दोलन छेडने की घोषणा की है। पिछले आन्दोलन में ही मैं नौकरी से त्यागपत्र दे कर शामिल होना चाहता था किंतु मेरे सहकर्मी बलदेव कुमार मल्होत्रा ने कहा था कि नौकरी में रह कर भी तो मैं वही काम कर रहा था, इसीलिए नौकरी से त्यागपत्र देने की जरूरत क्या थी ? मैंने अपनी वह ड्युटी निभाई , उसकी हकीक़त शीघ्र प्रकाश्य मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” में पढने – सुनने को मिल जाएगी।

इस दफे मैं अन्ना के साथ रहूंगा। तो मिलेंगे जंतर मंतर पर !

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

31 अगस्त 2017

अल्लाह – ईश्वर तेरो नाम !! फिर से बहुमत दे भगवान !

आखिर हो ही गया तीन तलाक का खात्मा !

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने आज तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करते हुए मुस्लिम महिलाओं को सर्वाधिक अपमानजनक और खतरनाक सामाजिक त्रासदी से निजात दिलाने की दिशा में ऐतिहासिक फैसला दिया है। तमाम मुस्लिम महिलाओं को दिली मुबारकबाद!

सन 1986 में तत्कालीन कॉंग्रेसी प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को उलटवाने के ख्याल से संविधान – संशोधन कर अपनी राजनीति का आटा गिला करा लिया था, आज के भाजपाई प्रधानमंत्री ने उसी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से बिना हर्रे – फिटकिरी के ही रंग चोखा कर लिया है। इस उपलब्धि में न तो प्रधान सेवक जी का कोई योगदान है और न ही उनकी पार्टी का; सारा श्रेय तीन तलाक के खिलाफ याचिका दायर करने वाली बहादुर मुस्लिम महिलाओं को जाता है,  फिर भी इसकी भरपूर फसल पिछले यूपी चुनाव में प्रधान जी ने काट ली है और आगे आने वाले दिनों में भी दोहरी फसल काटने का जुगाड हो गया लगता है । इसे कहते हैं समझदारी और दूर दृष्टि !

राजीव गांधी ने 1989 में रामलल्ला का ताला खुलवाने तथा उनके बाद के कॉंग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव ने 1992 में अयोध्या का विवादित ढांचा गिरवाने में मौन धारण कर 1986 में शाहबानो मामले से हुई क्षति की भरपाई  करने की कोशिश की थी , किंतु तब तक चिडिया खेत चुग गई थी, ध्रुवीकरण  का धोबियापाट दांव चला जा चुका था। यही कारण था कि आज़ादी के तुरंत बाद से ही जो भारतीय राजनीति कॉंग्रेस बनाम अन्य के रूप में हो रही थी, वह भाजपा बनाम अन्य (कॉंग्रेस सहित) के रूप में परिणत हो गई। कॉंग्रेस सबसे बडी पार्टी तो होती रही, लेकिन उसे हर बार अपने पूर्व विरोधियों की बैशाखी की जरूरत पडती रही , वह राजीव गांधी के बाद केन्द्र में तीन बार सत्ता में तो आई, परंतु हर बार दूसरों के सहारे ही चलने को विवश रही।

ध्रुवीकरण में जो कमी रह गई थी , वह कब्रिस्तान बनाम श्मशान के लिए जमीन और ईद बनाम दिवाली के लिए बिजली से पूरी हो गई और अब रही – सही कसर सडक पर नमाज बनाम थाने में जन्माष्टमी तथा शरीयत बनाम तीन तलाक से पूरी हो जाएगी।

जय हो ! अल्लाह – ईश्वर तेरो नाम !! फिर से बहुमत दे भगवान !!!

22 अगस्त 2017

पत्थर की मूरतों में समझा है तू खुदा है ! खाक-ए-वतन का मुझको हर जर्रा देवता है !!

स्वतंत्रता दिवस पर विशेष
शीघ्र प्रकाश्य मेरी आत्मकथा से ….
 
                                                  पत्थर की मूरतों में समझा है तू खुदा है!
                                          खाक-ए-वतन का मुझको हर जर्रा देवता है !!
 
भारत की स्वाधीनता के 70 वर्ष, ‘अगस्त क्रांति’ , ‘भारत वासियो करो या मरो’ व ‘अंग्रेजो भारत छोडो ‘ आन्दोलन के 75 वर्ष तथा चम्पारण सत्याग्रह के 100 की हार्दिक बधाइयां और मंगलकामनाएं !
                                                                                ****
 
                                                        शाकाहार की शुरुआत
 
मेरा परिवार सनातन हिन्दू धर्मावलम्बी था। बाबूजी स्नान ध्यान के बाद सूर्य देवता को अर्घ्य और कुल देवता को हवन-धूपदान किये वगैर भोजन नहीं करते थे और वैसा करते उन्हें रोज दिन के बारह बज जाते थे, मेरी मां उनके बाद खाती थी, वह भी सभी तीज – त्योहार करती थी और उपवास रखना तो उसका नियमित व्रत जैसा हो गया था । परिवार के वे पूरे परिवेश और रीति – रिवाज मैं भी स्वत: ग्रहण करता चला गया , सच कहूं तो कुछ मामलों में मैं बाबूजी से ज्यादा ही पुजारी हो गया, वे सुबह – शाम पूजा – पाठ तो करते थे, किंतु चन्दन – टीका नहीं लगाते थे और मांस – मछली भी खाते थे , मैं ने सन 1962 में पांचवीं क्लास में जाते ही मांस – मछली खाना छोड दिया था ( आपात्काल में जेल-यात्रा के दौरान मैं ने मांस – मछली खाना फिर से शुरू कर दिया) और बाजाप्ता चन्दन – टीका भी लगाने लगा था , स्कूल भी चन्दन – टीके लगाये हुए ही जाता।
 
सन 1962 में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं हुईं, जिनका मेरे जीवन पर व्यापक प्रभाव पडा, पहली यह कि साल की शुरुआत में बहुत दिनों तक सूर्य के दर्शन नहीं हुए और रह – रह कर भूकम्प के हल्के झटके आते रहे, जिसके चलते लोगों में दहशत फैली हुई थी। प्राकृतिक आपदा से रक्षा के लिए जगह – जगह अष्टयाम व लखरांव जैसे सार्वजनिक धार्मिक अनुष्ठानहोने लगे थे, उसी माहौल में मैं ने मांस – मछली खाना छोडा।
 
दूसरी यह कि उसी साल के उत्तरार्ध में चीन ने भारत पर हमला कर दिया। स्कूल के सभी बच्चे आस-पास के गांवों, हाट – बाजारों में हेड मास्टर साहब की अगुआई में रैली निकालते व अपने गांवों में भी प्रभातफेरी करते और ‘चाचा नेहरु जिन्दाबाद, चाउ एन लाई मुर्दाबाद, माउत्सेतुंग मुर्दाबाद ’ के नारे लगाते, जिस नारे पर ज्यादा जोर था, वह था – ‘ घास की रोटी खाएंगे, देश को बचाएंगे’ । सभी बच्चों को निर्देश दिया गया था कि सप्ताह में दो रात खाना नहीं खाएं तथा अपने हिस्से के बचे हुए भोजन के बराबर यानी एक सेर चावल हर सोमवार को स्कूल में जमा कराएं, हम सभी बच्चे वैसा ही करते थे, हेड मास्टर साहब बताते थे कि उस तरह जमा चावल को बेच कर जो राशि आएगी, वह सरकार को भेजी जाएगी जो सैनिकों के लिए गरम वर्दी खरीदने के काम आएगी। इस तरह राष्ट्रीय चरित्र और देशभक्ति का पहला पथ ‘हिंदी – चीनी भाई – भाई’ के नारों के बीच चीन द्वारा धोखे से भारत पर किए गए अचानक हमले से प्रशस्त हुआ।

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कैसी संस्कृति और कैसा संस्कार

कैसी संस्कृति और कैसा संस्कार

मीडिया के विभिन्न माध्यमों से मुम्बई की आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया की खबर देख-सुन कर मैं स्तब्ध हूं। अगर वह खबर सही है तो मैं किंकर्तव्यविमूढ-सा हो गया हूं, सोच नहीं पा रहा हूं कि मैं क्या सोचूं, समझ नहीं पा रहा हूं कि क्या समझूं, लिख नहीं पा रहा हूं कि क्या लिखूं, क्यों?

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मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” से


जानकीवल्लभ शास्त्री और

महान  फिल्मकार पृथ्वीराज कपूर

 

बात 1975 में इमर्जेंसी लगने के ठीक एक माह पहले की है। गुरूदेव प्रो. रामाश्रय प्रसाद सिंह की बेटी और मेरे भ्रातृवत मित्र राकेश कुमार सिंह की बहन रम्भा कुमारी की शादी मोतीहारी एसएनएस कॉलेज के प्रोफेसर राजेश्वर प्रसाद सिंह से हो रही थी। बारात 24 मई 1975 को आई थी।

गुरूदेव ने हिन्दी और संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित महाकवि जानकीवल्लभ शास्त्री को भी आमंत्रित किया था। शास्त्री जी के विश्राम आदि का प्रबंध मोतीहारी रेलवे स्टेशन के विश्रामालय के एक विशिष्ट कक्ष में किया गया था। गुरूदेव ने मुझसे कहा था – “ तुम स्वयं कवि हो, कवियों की संवेदनशीलता को अच्छी तरह समझते हो, शास्त्री जी महाकवि हैं, अति संवेदनशील व्यक्ति व रचनाकार हैं और तुम उनसे परिचित भी हो , इसीलिए उनके आतिथ्य का उत्तरदायित्व तुम्हीं सम्भाल सकते हो”,  सो, शास्त्री जी के आने से ले कर दूसरे दिन उनके विदा होने तक मैं हमेशा उनके साथ रहा।

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री मुज़फ्फरपुर आरडीएस कॉलेज में प्रोफेसर तो थे ही, हिन्दी और संस्कृत के विश्वप्रसिद्ध महाकवि भी थे , कुछ साल पहले प्रसिद्ध फिल्मकार एवं कलाकार पृथ्वीराज कपूर शास्त्री जी से मिलने मुज़फ्फरपुर आए थे। पिछले साल मैं भी शात्री जी से मिलने मुज़फ्फरपुर चतुर्भुज स्थान स्थित उनके ‘निराला निकेतन’ नामक आवास पर गया था। उनके परिवार में 15 से 20 सदस्य थे, एक तो वे खुद, एक उनकी पत्नी और शेष सदस्यों में कुछ कुत्ते, कुछ बिल्लियां और कुछ नेवले थे, बस, प्रकृति और जीव – जगत का यही अनोखा दृश्य उनके परिवार में था। उस विलक्षण व्यक्तित्व के धनी शास्त्री जी का सान्निध्य पाने का और उनसे चर्चा करने, कविता की बारीकियों को समझने एवं एक महाकवि की दिनचर्या के माध्यम से उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित होने का मेरे लिए वह एक दुर्लभ अवसर था।

मैंने शास्त्री जी से बातचीत के दौरान उनकी कई कविताओं की चर्चा की, साथ ही, 1972 में मोतीहारी टाउनहॉल के मैदान में आयोजित एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में मंच संचालक प्रसिद्ध कवि दिनेश भ्रमर द्वारा उन्हें काव्यपाठ के लिए आमंत्रित करते समय ‘ स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री’ कह कर आमंत्रित किए जाने की अंतर्कथा की भी चर्चा की। शास्त्री जी ने हंसते हुए बताया था –“ लोगों को लगा होगा कि दिनेश ने मेरे ऊपर व्यंग्य किया था, लेकिन वास्तव में मेरे प्रति अतिशय सम्मान प्रदर्शित करने के व्यामोह में भूलवश वह वैसा बोल गया था। दिनेश ने मुझसे तुरंत क्षमा भी मांग ली थी”।

शात्री जी ने बडे बेलौस अन्दाज में अपने बचपन और यौवन के कुछ संस्मरण भी सुनाये। उन्होंने कहा – “ जब मैं जवान था और पैसों की सख्त जरूरत थी, तब मेरे पास पैसे नहीं थे। आज, जब मैं बूढा हो रहा हूं और पैसों की कोई खास जरूरत नहीं रह गई है , तो मेरे पास पैसे हैं, इसीलिए इन पैसों की मैं खूब इज्जत करता हूं, इनकी खूब  खातिरदारी करता हूं और इनका सदुपयोग कर इन्हें खूब सम्मान देता हूं, इन पैसों से अपने परिवार का पालन –पोषण करता हूं, मेरे घर तो तुम गए हो ‘अमन’, देखा होगा तुमने ? इन पैसों से मैं अपने कुत्तों, बिल्लियों और नेवलों को खिलाता हूं ” ।

अंतिम वाक्य कहते – कहते शास्त्री जी के होठ व्यंग्य में भिंच गए थे। मैंने तुरंत बात का रूख बदलते हुए कहा कि कुछ साल पहले पृथ्वीराज कपूर साहब आप से मिलने आए थे , कुछ उनके साथ का संस्मरण सुनाएं । शास्त्री जी ने कहा – “पृथ्वीराज कपूर मेरे व्यक्तिगत मित्र रहे थे, वे एक चिंतक कलाकार थे और जितने अच्छे कलाकार थे, उससे बेहतर इंसान थे। वे मेरी एक रचना पर फिल्म बनाना चाहते थे। मैं जब भी बम्बई जाता था, उन्हीं के पास ठहरता था। उनके तीनों बेटों में से शशि ( मशहूर अभिनेता शशि कपूर) से मेरी ज्यादा बनती है, राज ( राज कपूर साहब) की दिनचर्या अलग तरह की है, शम्मी (शम्मी कपूर साहब) भी अपने में व्यस्त रहता है, शशि मुझे ज्यादा समय देता है”।

मैंने कहा कि जिस तरह द्रोणाचार्य एकलव्य के गुरू थे, वैसे ही आप मेरे काव्य गुरू हैं, मेरा निवेदन है कि आप अपने हाथों से मेरी डायरी पर कोई जीवन – मंत्र अंकित कर दें। शास्त्री जी ने लिखा दिया –

                     जीना भी एक कला है।

कितनी साधें हों पूरी ? तुम रोज बढाते जाते ,

कौन तुम्हारी बात बने ? तुम बातें बहुत बनाते !

माना, प्रथम तुम्हीं आए थे, पर इसके क्या मानी ?

उतने तो घट सिर्फ तुम्हारे, जितना नद में पानी !

 और कई प्यासे, उनका भी सूखा हुआ गला है !

                                            जीना भी एक कला है!  

शास्त्री जी द्वारा मेरी डायरी में 24 मई 1975 को अंकित उनकी वह कविता आज भी मेरे पास वैसे ही सुरक्षित है। सचमुच, वह कविता मेरा जीवन – मंत्र बन गई है। इस कविता में जीवन जीने को एक कला बताते हुए समन्व व सामंजस्य साधने का मंत्र है, जिसे मैंने अपना जीवन – दर्शन बना लिया है।

***

संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

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संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

ज्ञानी पुरूष पूरे जीवन को आत्मा का संक्रमण काल कहेंगे और उनसे ऊंचे दर्जे के आध्यात्मिक महा ज्ञानी पूरी सृष्टि को सृजन की संक्रांति कहेंगे।

मेरे जैसे सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को छोटी – छोटी बातों की ही समझ नहीं है, तो फिर उस महा ज्ञान की बात कैसे करूं?

मां की कोख से जब मैं धरती पर आ रहा था, अभी आ नहीं पाया था, किंतु यात्रा शुरू हो गई थी, उस वक्त मैं कैसा अनुभव कर रहा था, आज तक नहीं समझ पाया। शायद उसी तरह मैं उस अनुभव को भी नहीं बांट पाऊंगा , जब मेरा जीवन जा रहा होगा और मेरी मौत आ रही होगी, उस संक्रमण काल में मैं क्या व कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, वह अकथ ही रह जाएगा। शायद इन्हीं दो संक्रांतियों का नाम जीवन और मरण है!

मां की अनुभूति की तो समझ आ गई मुझमें , मेरे दुख से दुखी और मेरे सुख से सुखी होने वाली मां की मुख-मुद्रा देख कर मैं समझ गया हूं कि मेरे आने के समय उसके तन का कष्ट और मन का हर्ष मिल कर कैसा अश्रुपूरित आनन्दमय भाव का सृजन कर रहे होंगे मेरी मां के मुखमंडल पर !  प्रसूती गृह के बाहर दरवाजे पर चहलकदमी करते हुए मेरे बाबू जी के मन में कैसी उल्लासमयी हलचल मची होगी, उसका अनुभव भी मैं कर चुका हूं , परंतु मैं स्वयं कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, उसकी अनुभूति मुझे अभी तक नहीं हो पाई है।

मैं कई बार मरा हूं लेकिन ऐसी मौत कभी नहीं आई, जिसके बाद जीवन न मिला हो, यानी जीवन शास्वत है! केवल कायर ही बार – बार नहीं मरते, कायरों को कायर बताने का साहस करने वाले भी बार – बार मरते हैं, फर्क बस, इतना है कि कायर बार – बार केवल मरते ही हैं,  जीते कभी नहीं, जबकि साहसी लोग जितनी बार मरते हैं, उससे ज्याद बारा जीते हैं अर्थात उन्हें जीने और मरने का अनुभव होता है, किन्तु कायरों को न जीने का ज्ञान होता है और न मरने का भान, उनके लिए तो वे दोनों क्रियाएं व्यसन मात्र होती हैं।

दिन जा रहा होता है और रात आ रही होती है, परंतु न तो दिन ढल गया होता है और न रात आ गई होती है, उसे गोधूली वेला कहते हैं, उसके उलट जब रात जा रही होती है और दिन आ रहा होता है, परंतु न तो रात ढल पाई होती है और न ही दिन आ पाया होता है, उसे ब्राह्मवेला कहते हैं। मुझे दोनों ही वेलाओं में सूरज के मुखमंडल पर लाली ही दिखती है, बिल्कुल एक जैसी !

तो फिर, मंदिरों में प्रर्थनाएं किसलिए, मस्जिदों में अजान किसलिए, गुरूद्वारों में अरदास किसलिए. गिरिजा में कंफेशंस किसलिए? क्या ये गैर जरूरी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। सभ्यता की दौड में ये सभी हमारी जरूरत बन गए; संयम और अनुशासन के लिए, जीवन की स्वाभाविक गति व लय बनाए रखने के लिए , दूसरों का दर्द समझने के लिए , अपन हर्ष बांटने के लिए, खुद को सुधारने के लिए। मगर जब उन सबके नाम पर ही संयम के बदले अहंकार और क्रूरता आने लगे, अनुशासन के बदके उच्छृंखलता व उदंडता आने लगे, दूसरों का दर्द समझने के बदले दूसरों को दर्द दिया जाने लगे, अपना हर्ष बांटने के बदले ईर्ष्या, नफरत व स्वार्थ का बाज़ार सजाया जाने लगे, खुद को सुधारने के बदले दूसरों को सुधारने का ठेका लिया – दिया जाने लगे , तो ? संभव है कि वैसे महान लोगों को मां की कोख और धरती की छाती के बीच का वह संक्रमण उनकी समझ में आ गया हो! क्या सचमुच !!

तो क्या उन सब की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी? हां, कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, सिवाय एक जरूरत के, मां की कोख से निकलने पर जिस धरती ने हमें धारण किया, केवल वही हमारी जरूरत रह जाएगी ताकि हम जमीन पर अपने पांव टिका कर आकश की ओर देख सकें। इसे धर्म कह लें, भक्ति कह लें, मातृभूमि के प्रति प्रेम कह लें , देशभक्ति कह लें, कुछ भीकह्लें,  कुछ भी न कहें, कोई फर्क नहीं पडता।

तो क्या सबसे ऊपर यही है?  जी हां, कम से कम मेरे लिए तो किसी भी धर्म, भक्ति, आध्यात्म, देव , ईश्वर आदि से बढ कर मेरी यह धरती है , मेरा यह देश है, देवालयों में लहराने वाले ध्वजों से बढ कर फहराता हुआ यह तिरंगा है, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरिजा या किसे भी देवालय के लिए मैं एक ईंट भी न लगाऊं, परंतु अपनी धरती, अपने देश के लिए अपने खून का एक – एक कतरा और अपनी हड्डियों का एक-एक कण तक को विसर्जित करने को तैयार बैठा हूं। शायद मेरी यह सोच मां की कोख और धरती की गोद के बीच की संक्रांति समझने की क्रिया हो !

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

ज्ञानी पुरूष पूरे जीवन को आत्मा का संक्रमण काल कहेंगे और उनसे ऊंचे दर्जे के आध्यात्मिक महा ज्ञानी पूरी सृष्टि को सृजन की संक्रांति कहेंगे।

मेरे जैसे सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को छोटी – छोटी बातों की ही समझ नहीं है, तो फिर उस महा ज्ञान की बात कैसे करूं?

मां की कोख से जब मैं धरती पर आ रहा था, अभी आ नहीं पाया था, किंतु यात्रा शुरू हो गई थी, उस वक्त मैं कैसा अनुभव कर रहा था, आज तक नहीं समझ पाया। शायद उसी तरह मैं उस अनुभव को भी नहीं बांट पाऊंगा , जब मेरा जीवन जा रहा होगा और मेरी मौत आ रही होगी, उस संक्रमण काल में मैं क्या व कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, वह अकथ ही रह जाएगा। शायद इन्हीं दो संक्रांतियों का नाम जीवन और मरण है!

मां की अनुभूति की तो समझ आ गई मुझमें , मेरे दुख से दुखी और मेरे सुख से सुखी होने वाली मां की मुख-मुद्रा देख कर मैं समझ गया हूं कि मेरे आने के समय उसके तन का कष्ट और मन का हर्ष मिल कर कैसा अश्रुपूरित आनन्दमय भाव का सृजन कर रहे होंगे मेरी मां के मुखमंडल पर !  प्रसूती गृह के बाहर दरवाजे पर चहलकदमी करते हुए मेरे बाबू जी के मन में कैसी उल्लासमयी हलचल मची होगी, उसका अनुभव भी मैं कर चुका हूं , परंतु मैं स्वयं कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, उसकी अनुभूति मुझे अभी तक नहीं हो पाई है।

मैं कई बार मरा हूं लेकिन ऐसी मौत कभी नहीं आई, जिसके बाद जीवन न मिला हो, यानी जीवन शास्वत है! केवल कायर ही बार – बार नहीं मरते, कायरों को कायर बताने का साहस करने वाले भी बार – बार मरते हैं, फर्क बस, इतना है कि कायर बार – बार केवल मरते ही हैं,  जीते कभी नहीं, जबकि साहसी लोग जितनी बार मरते हैं, उससे ज्याद बारा जीते हैं अर्थात उन्हें जीने और मरने का अनुभव होता है, किन्तु कायरों को न जीने का ज्ञान होता है और न मरने का भान, उनके लिए तो वे दोनों क्रियाएं व्यसन मात्र होती हैं।

दिन जा रहा होता है और रात आ रही होती है, परंतु न तो दिन ढल गया होता है और न रात आ गई होती है, उसे गोधूली वेला कहते हैं, उसके उलट जब रात जा रही होती है और दिन आ रहा होता है, परंतु न तो रात ढल पाई होती है और न ही दिन आ पाया होता है, उसे ब्राह्मवेला कहते हैं। मुझे दोनों ही वेलाओं में सूरज के मुखमंडल पर लाली ही दिखती है, बिल्कुल एक जैसी !

तो फिर, मंदिरों में प्रर्थनाएं किसलिए, मस्जिदों में अजान किसलिए, गुरूद्वारों में अरदास किसलिए. गिरिजा में कंफेशंस किसलिए? क्या ये गैर जरूरी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। सभ्यता की दौड में ये सभी हमारी जरूरत बन गए; संयम और अनुशासन के लिए, जीवन की स्वाभाविक गति व लय बनाए रखने के लिए , दूसरों का दर्द समझने के लिए , अपन हर्ष बांटने के लिए, खुद को सुधारने के लिए। मगर जब उन सबके नाम पर ही संयम के बदले अहंकार और क्रूरता आने लगे, अनुशासन के बदके उच्छृंखलता व उदंडता आने लगे, दूसरों का दर्द समझने के बदले दूसरों को दर्द दिया जाने लगे, अपना हर्ष बांटने के बदले ईर्ष्या, नफरत व स्वार्थ का बाज़ार सजाया जाने लगे, खुद को सुधारने के बदले दूसरों को सुधारने का ठेका लिया – दिया जाने लगे , तो ? संभव है कि वैसे महान लोगों को मां की कोख और धरती की छाती के बीच का वह संक्रमण उनकी समझ में आ गया हो! क्या सचमुच !!

तो क्या उन सब की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी? हां, कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, सिवाय एक जरूरत के, मां की कोख से निकलने पर जिस धरती ने हमें धारण किया, केवल वही हमारी जरूरत रह जाएगी ताकि हम जमीन पर अपने पांव टिका कर आकश की ओर देख सकें। इसे धर्म कह लें, भक्ति कह लें, मातृभूमि के प्रति प्रेम कह लें , देशभक्ति कह लें, कुछ भीकह्लें,  कुछ भी न कहें, कोई फर्क नहीं पडता।

तो क्या सबसे ऊपर यही है?  जी हां, कम से कम मेरे लिए तो किसी भी धर्म, भक्ति, आध्यात्म, देव , ईश्वर आदि से बढ कर मेरी यह धरती है , मेरा यह देश है, देवालयों में लहराने वाले ध्वजों से बढ कर फहराता हुआ यह तिरंगा है, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरिजा या किसे भी देवालय के लिए मैं एक ईंट भी न लगाऊं, परंतु अपनी धरती, अपने देश के लिए अपने खून का एक – एक कतरा और अपनी हड्डियों का एक-एक कण तक को विसर्जित करने को तैयार बैठा हूं। शायद मेरी यह सोच मां की कोख और धरती की गोद के बीच की संक्रांति समझने की क्रिया हो !

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

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