” हिंदी एक मत से नहीं, एकमत से बनी थी राजभाषा”

शोध आलेख    ” हिंदी एक मत से नहीं,एकमत से बनी थी राजभाषा”
भारत सरकार राजभाष विभाग की ऑफिशियल वेबसाईट  rajbhasha.nic.in पर जून 2014 से प्रदर्शित

सूचना ” डायनैमिक और  डाइनामाईट “

                                                    सूचना

” डायनैमिक ऎण्ड डाइनामाईट ” शीर्षक से मैं अपनी आत्मकथा की शुरुआत अपने टाईमलाईन  पर और साथ ही इस नोट पर भी स्वाधीनता दिवस 15 अगस्त 2015 से करूंगा, घटनाक्रम पंजाब नैशनल बैंक , प्रधान कार्यालय में राजभाषा विभाग के प्रभारी मुख्य प्रबंधक के पद से सम्मानजनक सेवा पूरी कर रिटायर्मेंट के दिन से अतीत की ओर लौटते हुए होगा ।
मेरा पूरा सेवाकाल राजभाषा हिंदी के लिए रहा है और मेरा व्यक्तित्व एवं कृतित्व जो भी है , वह उसी की देन है, फिर भी अपनी आत्मकथा का शीर्षक मैं अंग्रेजी में रख रहा हूं। इस विषय का खुलासा भी सही समय पर करूंगा,लेकिन फिलहाल उससे ज्यादा जरूरी खुलासों के लिए तैयार रहिए।
रिटायर्मेंट की तिथि यानी 31.10.2014 और भारत के माननीय राष्ट्रपति द्वारा मुझे पुरस्कार प्रदान किए जाने की तिथि यानी 15.11.2014 के बीच मैं ने अपने फेसबुक नोट पर दो पोस्ट किए । 02 नवम्बर को ” शुक्रिया उन सबका” शीर्षक से अपनी आत्मकथा का शुभारंभ किया और 15 नवम्बर को “शत – शत बधाइयां ” शीर्षकसे उसकी दूसरी कडी दी । उसके बाद ” अतीत के झरोखे से भविष्य की झांकी” , ” मेरी बेटी में मेरी मां क्यों नजर आती है मुझे” , ममता और संवेदना ही ईश्वर है ” , ” जब पंख लगे परिंदे को ” , ” असहमति का अधिकार” भाग – एक एवं ” असहमति का अधिकार ” भाग – दो ।  कुल मिला कर वे आठ एपीसोड मेरे व्यक्तिगत एवं पारिवारिक जीवन के कुछ वैसे अंश थे जिन्हें दिया जाना  तत्कालीन परिस्थितियों के अनुसार अपेक्षित था । अभी उस कडी में कुछ और भी अंश अपेक्षित हैं, इसीलिए मेरे बारे में और मुझसे जुडी घटनाओं के बारे में जानने के इच्छुक शुभ या अशुभ चिंतकों को थोडा इंतजार करना होगा।
चूंकि डायनैमो ऊर्जा और गतिशीलता का प्रतीक है तथा डाइनामाईट ऊर्जा के विध्वंसक प्रयोग का, इसीलिए आत्मकथा के इन अंशों में विस्फोटक सूचनाओं के होने से इंकार नहीं किया जा सकता और यह तो सभी जानते हैं कि विध्वंस ही नवनिर्माण की पहली प्रक्रिया होती है, अत: उसे हमेशा नकारात्मक दृष्टिकोण से ही नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि जो घटनाएं घट गईं, वे तो हकीकत और इतिहास बन चुकी हैं। । अभी तो यही गुजारिश है कि पिछली आठ कडियों को पढने का समय निकालिए ।
शुक्रिया,
अमन श्रीलाल प्रसाद
 25 जून, 2015
मो. 9310249821

असहमति का अधिकार : भाग – 2 RIGHT TO DISAGREE : PART – 2

इंदिरापुरम, 23 जून 2015

मैं ने 11 जून 2015 को अपने फेसबुक नोट में अपनी आत्मकथा का एक अंश पोस्ट किया था जो अपनेआप में असहमति –प्रबंधन यानी  DISAGREEMEN – MANAGEMET  पर एक आर्टिकल बन गया  था । उस पर बहुत विचारोत्तेजक और प्रेरणादायी टिप्पणियां प्राप्त हुईं। उस पोस्ट में मैं ने ढाई दशक पहले की सच्ची घटनाओं का जिक्र किया था। इस कडी में पिछले वर्ष की घटनाओं के माध्यम से मैं असह्मति प्रबंधनकी चर्चा को आगे बढाना चाहूंगा।

मई 2014 में केंद्र में माननीय नरेन्द्र मोदी जी की सरकार बनी । कुछ दिनों बाद सरकार ने संविधानिक प्रावधानों के अन्तर्गत केन्द्रीय कर्यालयों में भारत संघ की राजभाषा नीति के अनुपालन के क्रम में  हिन्दी में कार्य करने का निर्देश जारी किया जिसका एक राज्य  के दो दिग्गज नेताओं ने जोरदार विरोध किया। संविधानिक प्रावधानों को कार्यान्वित  कराने के लिए भारत की संसद ने जब 1963 में राजभाषा अधिनियम पारित किया था तब भी वहां  के कुछ बडे नेताओं ने उससे असहमति जताई थी और उसका विरोध किया था, कुछ हिंसक घटनाएं भी हुईं थीं जो एक ऐतिहासिक तथ्य है। चूंकि यह बहुत ही संवेदनशील विषय था और सरकार के समक्ष विगत घटनाएं नज़ीर के रूप में थीं, इसलिए इस बार सरकार संविधानिक प्रावधानों को लागू कराने के लिए कटिबद्ध तो दिखती थी , किंतु साथ ही , इस बात के लिए भी सतर्क दिखती थी कि भाषिक सद्भाव और समरसता भी बनी रहे । भारत जैसे बहुभाषी और सामासिक संस्कृति से संपन्न विविधता में एकता के प्रतीक देश में वह कटिबद्धता और सतर्कता परमावश्यक तत्त्व है क्योंकि लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्तिको अपना विचार रखने और दूसरों के विचार से असहमत होने का अधिकार है, शर्त्त केवल इतनी है कि विचार तथ्यपरक, वस्तुनिष्ठ एवं पूर्वग्रहरहित हो । देश – दुनिया ने देखा कि सरकार ने समावेशी दृष्टिकोण और दूरंदेशी सूझ-बूझ के साथ उस मामले का हल निकाला।

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असहमति का अधिकार (एक) RIGHT TO DISAGREE

  •  इंदिरापुरम , 11 जून 2015

02 मई, 2015 को बंगलोर स्थित ब्रिगेड गार्डेनिया के अगस्ता क्लब में मेरे साढे चार माह के पौत्र अपूर्व अमन के रिसेप्शन के बाद जब सभी मेहमान चले गए, तब फ्लैट की ओर जाते समय मेरे बेटे कुमार पुष्पक ने हंसते हुए कहा कि पापा , जीवन में आपने बहुत कुछ देखा – परखा और समझा  है, अपने अनुभव के आधार पर “How To Manage Disagreement” यानी “असहमति प्रबंधन” विषयपर कोई आर्टिकल लिखिए । यह बात देखने-सुनने में साधारण थी किंतु थी बडी गंभीर ,मैं ने बेटे के अंदाज में ही हंसते हुए कहा कि लिखूंगा । पूर्व निर्धारित कार्यक्रमानुसार 05 मई , 2015 को मैं पत्नी के साथ इंदिरापुरम आ गया । इस बीच अपनी आत्मकथा के कुछ अंश को मैं ने फेसबुक नोट पर पोस्ट किया जिसका अन्य लोगों के साथ-साथ मेरे बेटे कुमार पुष्पक, बेटी शिल्पा श्री और शिप्रा ने भी जोरदार स्वागत करते हुए पूरी जीवनी  शेयर करने का अनुरोध किया ।बेटे की आर्टिकल लिखने की मांग मैं भूला नहीं था, किंतु चूंकि बेटे ने एकेडेमिक आर्टिकल की नहीं, अनुभव जनित आर्टिकल की मांग की थी , इसीलिए डेल कार्नेगी या एरिक  बर्न जैसे मैनेजमेंट गुरुओं अथवा How to Win Friends and Influence People या  I am OK, You are OK जैसी पुस्तकों से उद्धरणों की निरर्थकता को समझते हुए  मैं अपनी आत्मकथा के किसी अंश को ही उस आर्टिकल के रूप में पोस्ट करना चाह रहा था , सो मैं ने डायरी के पन्ने उलटने शुरू किए।

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