डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(पिंजडे की किस्म और तोते का डीएनए – 2)

बंगलोर, 28 दिसम्बर 2015
फ़िराक़ गोरखपुरी की ग़ज़ल का एक शेर –
“ कुछ क़फ़श की तीलियों से छन रहा है नूर – सा
  कुछ फ़ज़ा कुछ हसरत –ए– परवाज़ की बातें करो
                  *****
पिंजडे में कैद परिंदे की बेचारगी का रोना मत रो, उसकी बेखौफ़ उडान की बात करो, खुले  आसमान की बात करो, पिंजडे का कद और अपनी हद उसे मालूम है, सलाखों से छन कर आ रहा उजास उसका हमसफर है, उसका हौसला बरकरार है। इस सच का सामना हमने पिछली कडी – 21 दिसम्बर 2015 की पोस्ट – में मेरे प्रोमोशन और पोस्टिंग के संदर्भ में विभिन्न घटनाक्रमों से गुजरते हुए किया, पिंजडे का एक तोता बोल सकता है आज़ाद बोल तो बाकी तोते क्यों नहीं? दरअसल, पिंजडे की किस्म और तोते का डीएनए ही असल गुनहग़ार  हैं !

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(पिंजडे का तोता भी बोल सकता है आज़ाद बोल)

बंगलोर, 21 दिसम्बर 2015

                                मेरी आत्मकथा की –आगे की कई कडियां
                             उपर्युक्त  उपशीर्षक से आएंगी, पहली कडी में पढते हैं-
                               “पिंजडे की किस्म और तोते का डीएनए”

पी पी पी पी पी पी यानी पॉवर, पैसा, प्रताडना, प्रवंचना, पैरवी और पांव – प्रछालना पॉलिसी अर्थात साम – दाम – दण्ड – भेद की कूटनीति; विचित्र माया है काम करने – कराने की ! एक से बढ कर एक मारक मंत्र हैं ये, फिर भी, इन सभी मंत्रों से या इनमें से कुछ मंत्रों से या किसी एक मंत्र से ही विंध जाना, एकमात्र नियति नहीं है, इन तमाम मंत्रों को निष्प्रभावी बना देने के किए एक ही मंत्र काफी है और वह है – ईमानदारी ! इनमें से प्रथम पांच यानी शक्ति अर्थात अधिकार का दुरूपयोग, पैसे का प्रलोभन, अनुचित रूप से दण्डित करने की धमकी , बदनाम करने- कराने की शाज़िश और प्रभावशाली व्यक्तियों से दबाव डलवाने की कोशिश आदि तो बिलकुल खुल्लमखुला शैली की नीति है, जिनके अर्थ या प्रभाव को किसी विश्लेषण की जरूरत नहीं है, किंतु छठी नीति यानी पांव – प्रछालना अर्थात (झूठी) प्रशंसा करने और ‘एकमात्र माई–बाप आप ही हैं’ कह कर दीन – हीन बन कर काम निकलवाने –  की नीति अत्यंत खतरनाक और मीठे – धीमे ज़हर वाली प्यारी – मनोहारी विषकन्या – सी है, निस्सन्देह आज के ज़माने में सारे दुनियाबी सुखों के लालच से निर्लिप्त ‘ईमानदार’ रूपी विश्वामित्र की भी तपस्या भंग कराने के लिए किसी मेनका से भी अधिक प्रभावाशालिनी अप्सरा प्रशंसा ही है, इसीलिए इसके दंश से बच निकलना ही सबसे बडी ईमानदारी और बहादुरी है।

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तब मैं पंजाब नैशनल बैंक की पंजाबीबाग शाखा में ऑन जॉब ट्रेनिंग ले रहा था। नवम्बर 2009 के शुरू में हेड ऑफिस राजभाषा विभाग के मुख्य प्रबंधक ईश्वर चन्द्र बंसल ने फोन कर बताया था कि उन्हें हटा कर उस जगह पर मुझे पोस्ट करने की कवायद चल रही है और ऐसा , उनके कहे अनुसार, मेरे द्वारा कराई गई पैरवी के चलते हो रहा है। मैं ने उन्हें बताया था कि मैं कभी भी ‘पैरवी पुत्र’ नहीं रहा हूं और यदि उच्चस्तर पर वैसी कोई कवायद चल भी रही हो तो उसकी कोई जानकारी मुझे नहीं है। मुझे याद आया कि जब मैं पटना मंडल कार्यालय में वरिष्ठ प्रबंधक – राजभाषा था और स्केल 3 से स्केल 4 में प्रोन्नति के लिए परीक्षा दी थी तो एक रोज रात के करीब 8 बजे फोन कर श्री बंसल ने ही सूचना दी थी कि रिटेन टेस्ट का रिजल्ट आ गया है और मुझे 100 में से 74 अंक यानी बहुत ही अच्छे अंक प्राप्त हुए हैं, उन्होंने मुझे बधाई देते हुए पूछा था कि क्या प्रोमोशन के बाद हेड ऑफिस राजभाषा विभाग में आना चाहेंगे ? उन्होंने यह भी बताया था कि वे खुद राजभाषा विभाग में ही रहना चाहते हैं और विभाग में एक से अधिक मुख्य प्रबंधक रखे नहीं जा सकते। वे मुझे असुरक्षा की भावना से ग्रस्त लगे थे , मैं ने उनसे कहा था कि तीन दशक की सेवावधि में कभी भी स्थानांतरण के लिए अनुरोध नहीं किया तो प्रोमोशन के पहले पदस्थापना के बारे में सोचने का सवाल ही नहीं उठता। मैं उस समय ट्रेन में था और फरीदाबाद आईटी सेंटर में चार दिनों की ट्रेनिंग के लिए जा रहा था। थोडी देर बाद मेरे सर्कल हेड आर डी कैले ने भी फोन कर बधाई दी और अगले स्टेशन पर उतर कर वापस आ जाने की सलाह दी, किन्तु मैं ने ट्रेनिंग पूरी करना ही बेहतर समझा, उसके अलावा बीच रास्ते से वापसी ट्रेन की सुविधा मिलती भी नज़र नहीं आई, इसीलिए मैंने यात्रा जारी रखी, हालांकि फरीदाबाद पहुंचने के बाद अगले दिन वापस आने का आदेश मिल गया क्योंकि इंटरव्यु के लिए एग्जीक्युटीव प्रोफाईल भरना था।स्त 2009 को प्रोमोशन का फाईनल रिजल्ट निकला था किंतु पोस्टिंग अक्टूबर के मध्य में हुई थी, उस बीच ईश्वर चन्द्र बंसल हमेशा फोन पर बातें करते रहते थे । उसी दौरान मुझे किसी दूसरे व्यक्ति ने फोन कर सूचित किया कि कार्यपालक निदेशक एम वी टांकसाले श्री बंसल को हटा कर मुझे राजभाषा विभाग का मुख्य प्रबंधक बनाना चाहते हैं क्योंकि उसके लिए, उनके कहे अनुसार, मैं ने अपने पक्ष में वित्त मंत्रालय में पदस्थापित किसी प्रभावशाली आईएएस अफसर से पैरवी कराई थी। मैं ने उनसे भी स्पष्ट कर दिया कि पैरवी कराना मेरी फितरत में नहीं है। बात करने वाले की आवाज़ दमदार और औडियोफोनिक थी, किंतु मैं उन्हें पहचान नहीं पा रहा था। चूंकि फोन मेरे मोबाईल पर लैण्डलाईन से आया था, इसलिए इतना पता तो चल ही गया कि फोन प्रधान कार्यालय राजभाषा विभाग से किया जा रहा था। बीच – बीच में उसी व्यक्ति का उसी लैण्डलाईन से मुझे फोन आता रहा और लेटेस्ट जानकारी दी जाती रही, फिर भी, मैंने पहचान नहीं पूछी। एक दिन फोन पर बात हो ही रही थी कि लाईन कट गई, मैं ने समझा कि शायद केबल में कोई समस्या आ गई हो, इसीलिए अपनी ओर से उसी लैण्डलाईन पर फोन लगाया तो उधर से रिसीव करने वाले की आवाज़ पहले वाले व्यक्ति से भिन्न थी, मैंने बताया कि ‘पटना से श्रीलाल बोल रहा हूं’ तो उधर से कहा गया कि वे एसपी कोहली बोल रहे थे और मेरी बात शायद बलदेव मल्होत्रा से हो रही होगी , उन्होंने फोन उठा लेने के लिए बलदेव जी को पुकारा। इससे स्पस्ट हो गया कि एक ही लैण्डलाईन फोन की दो समानांतर लाईनें थीं और शायद वार्तालाप किसी और द्वारा सुने जाने की आशंका में पहले वाले सज्जन ने फोन रख दिया होगा, इससे यह भी महसूस हुआ कि उस कार्यालय में गुटबाजी थी जिसमें से एक गुट ऐसा है जिसे ईश्वर चन्द्र बंसल को हटाए जाने की खुशी थी तो दूसरा गुट दुखी था।

किसी प्रभावशाली आईएएस अफसर की पैरवी से ईडी एमवी टांकसाले के मेरे पक्ष में होने की बात सुन कर मेरा माथा ठनका था कि बिना किसी कारण वैसी बात उडी कैसे ? क्योंकि कथित पैरवी तो कभी कराई ही नहीं गई थी। लगता है कि ईडी द्वारा दृढता से मेरा पक्ष लिए जाने के कारण ही लोगों ने वैसी पैरवी की कल्पना कर ली होगी क्योंकि जो लोग पैरवी से ओतप्रोत वातावरण में ही हमेशा रहते हों, वे ईडी द्वारा किसी का उस तरह दृढतापूर्वक पक्ष लिए जाने का तगडी पैरवी के अलावा दूसरा कोई कारण मान ही नहीं सकते और चूंकि उन दिनों वित्त मंत्रालय में एक प्रभावशाली पद पर बिहार कैडर के एक सीनियर आईएएस अफसर थे, इसीलिए उन लोगों ने स्वत: यह अनुमान लगा लिया होगा कि उसी अफसर के कहने पर ईडी मेरा पक्ष ले रहे होंगे (बाद में पता चला था कि ईडी साहब के पीए राजेश गुप्ता के चलते वैसा महौल बना था, गुप्ता जी बंसल जी के हितैषी थे) , हालांकि वैसा मानने व कहने वाले हर व्यक्ति को मैं स्पष्ट रूप से बता चुका था कि पैरवी करने – कराने को मैं अपना अपमान मानता हूं। फिर भी, इतना सब कुछ सुन कर यह बात मुझे समझ में आने लगी थी कि संभवत: ईडी टांकसाले जी स्वयं ही मेरा पक्ष दृढता से ले रहे होंगे।  तो आखिर, ईडी द्वारा स्वत: मेरा पक्ष लिए जाने का कारण क्या हो सकता था ? मैं समझता हूं कि नीचे दिए तथ्यों से यह बात बिलकुल स्पष्ट हो जानी चाहिए।

स्केल 3 से 4 में प्रोमोशन के लिए रिटेन टेस्ट मैंने अच्छे अंकों से पास कर लिया था, अगली कडी के रूप में  इंटरव्यु जुलाई 2009 में पीएनबी के कोलकाता सर्कल ऑफिस में हुआ था। इंटरव्यु बोर्ड के चेयरमैन थे बैंक के एग्जीक्युटिव डायरेक्टर यानी ईडी  एमवी टांकसाले और दो मेम्बरों में एक थीं महाप्रबंधक अर्चना भार्गव और दूसरे थे डीजीएम वेद प्रकाश , उन तीनों में से किसी से भी कभी भी मेरी मुलाकात नहीं थी। सवाल पूछने शुरू किए थे श्रीमती भार्गव ने, उस दौरान श्री टांकसाले मेरा एग्जीक्युटिव प्रोफाईल पढते रहे थे, लगभग 10 मिनट बाद श्री टांकसाले ने श्रीमती भार्गव को रोकते हुए सवाल करना शुरू कर दिया – “रिटेन टेस्ट में आप को 100 में से 74 नम्बर है और परफॉर्मेंस अप्रेजल भी एक्सीलेंट और आउटस्टैण्डिंग रेटेड है, इसीलिए यह तो साफ है कि आप का प्रोमोशन हो रहा है, लेकिन आप हमेशा हिंदी अफसर रहे हैं, ब्रांच में कभी काम किया नहीं, आप को ऑडीटर भी नहीं बना सकते क्योंकि ऑडीटर होने के लिए भी मेन बैंकिंग की जानकारी जरूरी है , तो फिर चार सौ करोड – पांच सौ करोड रूपये के  बिजनेस वाली ब्रांच का चीफ मैनेजर आप को कैसे बनाया जा सकता है ?” अगले 20 मिनट तक इसी सवाल को विभिन्न कोनों से पूछा गया। मैंने बडे इत्मीनान से वाद–विवाद शैली में अपना पक्ष पूरी स्पष्टता से रखना शुरू किया –

“ मैं 21 मार्च 1977 से 06 अक्टूबर 1979 तक चम्पारण क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक में क्लर्क – कैशियर रहा था, उस बैंक की स्थापना एक – डेढ साल पहले ही हुई थी , हर माह नई – नई शाखाएं खुल रही थीं, कई शाखाएं शुरू करने और चलाने का मुझे अनुभव मिला। हां, बैंकिंग कार्य मैनुअल होते थे और कारोबार छोटे स्तर पर था, वहां वेतन भी बहुत कम था । उसी बीच पहले की अपेक्षा लगभग दोगुने वेतन पर मेरा चयन क्लर्क के रूप में ही न्यु बैंक ऑफ इंडिया में हो गया । तब वह बैंक प्राईवेट था।  मैं ने 06 अक्टूबर 1979 को ग्रामीण बैंक से  इस्तीफा दे दिया और 08 अक्टूबर 1979 को न्यु बैंक ऑफ इंडिया की धनबाद शाखा , बिहार में ज्वाईन कर लिया । वह बैंक छह महीने बाद 15 अप्रैल 1980 को नेशनलाईज्ड हो गया, उस बैंक में चार साल तक विभिन्न शाखाओं में काम किया, उससे  मुझे व्यापक पैमाने पर बैंकिंग अनुभव प्राप्त हुआ, तब तक कम्प्युटराईजेशन नहीं हुआ था, सभी काम मैनुअल ही होते थे, वहां मैं एक कुशल कर्मचारी समझा जाता था। मैं हिंदी से एमए था, बैंक राष्ट्रीयकृत हो गया था और उसमें राजभाषा नीति लागू हो गई थी , फलस्वरूप स्पेश्लिस्ट कैडर में हिंदी अफसर की वेकेंसी निकली , जिनमें से कुछ पद आंतरिक प्रोन्नति प्रक्रिया से भी भरे गए, मैंने उसके लिए आयोजित लिखित परीक्षा के साथ – साथ  इंटरव्यु में भी टॉप किया था और फाईनल सेलेक्शन लिस्ट में भी मेरा नाम एक नम्बर पर था। न्यु बैंक ऑफ इंडिया का 04 सितम्बर 1993 को पंजाब नैशनल बैंक में विलय हो गया। अपने कार्यों के चलते मैं अपने बैंक में ही नहीं, पूरे बैंकिंग उद्योग में एक कुशल और लोकप्रिय हिंदी अफसर यानी राजभाषा अधिकारी माना जाता रहा हूं, राजभाषा अधिकारी के अलावा मैं बैंक का पीआरओ भी रहा हूं , मेरे कार्यों के लिए अनेक उच्चस्तरीय पुरस्कार मुझे और मेरे कार्यालय तथा बैंक को प्राप्त हुए हैं, मेरे बैंक द्वारा अपनी ओर से तथा सभी बैंक़ों द्वारा सामूहिक रूप से आयोजित अनेक राष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण व बडे कार्यक्रमों का मैं संयोजन भी करता रहा हूं, एक तरह से वैसे आयोजनों का सफल इवेंट मैनेजर भी रहा हूं। इस संबंध में विशेष जानकारी मेरे एग्जीक्युटिव प्रोफाईल में भी है ” । इतना कह कर मैं प्रतिक्रिया जानने के उद्देश्य से थोडी देर चुप रहा तो टांकसाले जी ने कहा कि – “ बोलते रहिए, अच्छा बोल रहे हैं, लेकिन मैं तो यह जानना चाहता हूं कि आखिर इन सबसे आप चार – पांच सौ करोड रूपये के बिजनेस वाली ब्रांच को कैसे चला पाएंगे ” ? मैं ने फिर बोलना शुरू किया –

“ सर, मैं एक कुशल प्रबंधक  रहा हूं और मुझे बैंकिंग की जानकारी भी , थ्योरिटिकल ही सही, है; यह रिटेन टेस्ट में मुझे प्राप्त अंकों से स्पष्त हो जाता है। रही बात प्रैक्टीकल बैंकिंग की तो बैंक उसके लिए आवश्यक ट्रेनिंग भी देता है और जब मैं परीक्षा पास करने के लिए पढ कर बैंकिंग ज्ञान प्राप्त कर सकता हूं तो यह तय है कि अपने कैरियर को बचाने, बनाने और व्यापक स्तर पर ग्राहकों से जुडने के लिए प्रयास कर लेटेस्ट प्रैक्टीकल बैंकिंग का ज्ञान भी प्राप्त कर लूंगा। वैसे भी, बेसिक प्रैक्टीकल बैंकिंग की जानकारी मैं 1977 से ही प्राप्त करता रहा हूं , यह अलग बात है कि वह अनुभव मैनुअल बैंकिंग का था और अब सब कुछ टेक्नोलॉजी आधारित है, असल परेशानी मुझे यहां होने की संभावना है जिससे निज़ात पाने के लिए मैं पूरा प्रयास करूंगा ”।

श्री टांकसाले ने अगला सवाल पूछा – “ आप एक चीफ मैनेजर के रूप में किस तरह की ब्रांच प्रेफर करेंगे , क्रेडिट ओरिएण्टेड या डिपॉजिट ओरिएण्टेड ” ?

मैने जवाब देना शुरू किया –“ मेरी समझ में ब्रांच मैनेजरी बिजनेस की समग्रता में है, इसीलिए मेरे मन में प्रेफर करने जैसी बात तो कभी नहीं उठी, किंतु यदि उस तरह का ऑप्शन मुझे दिया जाता है तो मैं डिपॉजिट ओरिएण्टेड ब्रांच पसन्द करूंगा क्योंकि बैंक के राजभाषा अधिकारी और पीआरओ के रूप में विभिन्न स्तर के सरकारी – गैर सरकारी संस्थाओं और लोगों से जुडने का अवसर मुझे अक्सर मिलता रहा है जो बैंक बिजनेस बढाने में मददगार सबित हो सकता है। और सर, पंजाब नैशनल बैंक जैसे देश के अग्रणी बैंक में चीफ मैनेजर की जरूरत क्या केवल ब्रांच चलाने के लिए ही है ?  अन्य ऐसे कार्यालय या विभाग या कार्य नहीं हैं जहां मेरी योग्यता और अनुभव का सही  – सही उपयोग किया जा सके और मैं स्वाभाविक रूप से अपना 100% कार्यनिष्पादन दे सकूं ” ?

टांकसाले जी ने कहा – “ आप हमेशा बिहार, झारखण्ड और बंगाल यानी पूर्वांचल में ही पदस्थापित रहे हैं, दूरदराज के राज्यों में और दिल्ली में नहीं रहे ”  ?

“सर, मैं ने ट्रांस्फर के लिए कभी भी रिक्वेस्ट नहीं लगाई, बैंक ने जहां भी पदस्थापित किया, मैं गया और पूरे मनोयोग से काम किया, आगे भी मेरी यही नीति रहेगी”, मैंने जवाब दिया

“ ठीक है, थैंक यु”, टांकसाले जी ने कहा और मैं नमस्कार कर कमरे से बाहर आ गया।

उस इंटरव्यु के कुछ ही दिनों बाद टांकसाले जी से एक बडी यादगार भेंट उसी तरह की इवेंट मैनेजरी के सिलसिले में पटना में हुई, जिस तरह की चर्चा मैं ने इंटरव्यु के दरम्यान की थी और जिसका उल्लेख मैंने अपने एग्जीक्युटिव प्रोफाईल में भी किया था। तब तक फाईनल रिजल्ट निकला भी नहीं था। वाकया 04 अगस्त 2009 का है। उस दिन प्रात: 11 बजे पटना जिला के पुनपुन में वित्तीय समावेशन (फाइनांसियल इंक्लुजन) , जिसे आज की केन्द्र सरकार ने ‘जन – धन – योजना’ नाम दे दिया है, के पायलट प्रोजेक्ट का उद्घाटन होना था, उसके पहले 10 बजे अनीसाबाद शाखा का उद्घाटन होना था और उसके भी पहले तडके 8 बजे दानापुर – खगौल में कुष्ठ रोगियों की कॉलोनी में ह्वील चेयर तथा अन्य सामग्री का वितरण किया जाना था और उन सभी कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि बैंक के एग्जीक्युटिव डायरेक्टर एम वी टांकसाले ही थे।

 

तो 2009 में प्रेमचन्द्र शर्मा और मैंने, दोनों ने स्केल 3 से 4 में प्रोन्नति के लिए रिटेन टेस्ट और इंटरव्यु दिया था। मेरा और शर्मा जी का इंटरव्यु कोलकाता में  ही  हुआ था , उन्होंने मुझे बताया था कि वे अपने इंटरव्यु से संतुष्ट नहीं थे, उनका पिछला इतिहास भी उनकी उस परेशानी की पुष्टि कर रहा था । फाईनल रिजल्ट अभी निकला नहीं था और इंटरव्यु बोर्ड के चेयरमैन रहे टांकसाले जी पटना आ रहे थे। मेरे एजीएम डी के शर्मा ने मुझसे कहा कि – “ प्रेमचन्द्र शर्मा पुनपुन के कार्यक्रम का संचालन (कम्पीयरिंग) करेगा और ईडी साहब से संबंधित कार्यों को देखेगा , तुम सुबह छह बजे कोढियों की बस्ती में जा कर सभी अरेंजमेंट सुनिश्चित करोगे, 8 बजे ईडी साहब को ले कर सर्कल हेड और हम (डीके शर्मा) आएंगे, ह्वील चेयर और अन्य सामग्री वहां बंटवाएंगे, ईडी साहब के वहां पहुंचने के पहले ही तुम वहां से चले जाओगे और अनीसाबाद शाखा के उद्घाटन का प्रबंध करोगे, बाकी काम ब्रांच मैनेजर और एलडीएम देख लेंगे, ईडी साहब के वहां पहुंचने के पहले ही तुम वहां से चले जाओगे और सर्कल ऑफिस में रहोगे और हां, मीडिया में सभी कार्यक्रमों के प्रचार – प्रसार की जिम्मेदारी तुम्हारी ही होगी” । यह ब्रीफिंग निर्धारित तिथि के दो दिनों पहले हो रही थी, मैं गंभीरतापूर्वक एजीएम डी के शर्मा के निर्देशों को सुन रहा था और उनकी पूरी प्लानिंग भी समझ रहा था,  किंतु जब उन्होंने अंतिम वाक्य कहा तो मैं मंद – मंद मुस्कुराने लगा।

टेलीविजन चैनलों के साथियों ने एक्स्क्लुसिव बाईट के लिए तथा प्रिंट मीडिया के साथियों ने एक्स्क्लुसिव सवालों के जवाब के लिए मुझसे अनुरोध किया था , किंतु उस माहौल में वैसा करा पाना प्रैक्टीकली संभव नहीं था, इसलिए तय हुआ कि मैं ही सबके सवाल ले लूं और ईडी का इंटरव्यु मैं ही कर लूं। वैसा ही हुआ, कार्यक्रम जब समाप्ति की ओर बढा तो मंच पर ही एक तरफ ईडी की कुर्सी लगा कर मैंने अपने लिए भी एक कुर्सी लगा ली और दूरदर्शन की माईक ले कर मैं सवाल करने लगा, मीडिया के सभी साथी कवर करने लगे, कैमरामैन शूट कर रहे थे तो रिपोर्टर नोट कर रहे थे।  एजीएम डी के शर्मा अचम्भित हो कर देख रहे थे और शायद सोच रहे थे कि उनके द्वारा लिखी गई स्क्रिप्ट में तो यह सीन था ही नहीं। इसीलिए उन्होंने ब्रीफिंग करते हुए जब आखिरी वाक्य में मीडिया प्रबंध की जिम्मेदारी भी मुझे सौंपी तो मैं मुस्कुराने लगा था क्योंकि शायद शर्मा  जी को इस बात का आईडिया नहीं रहा होगा कि मीडिया प्रबंध के क्रम में तो अनचाहे ही मैं ईडी की नज़रों में आ ही जाऊंगा और जबकि एजीएम शर्मा जी ने सारा चक्रव्युह मुझे वैसे अवसरों से दूर रखने के लिए ही रचा था। इसी बीच दर्शकों में हंगामा हो गया, लगा कि कुछ लोग जानबूझ कर कार्यक्रम को तहस – नहस करना चाह रहे हैं, अचानक हल्ला सुन कर मंच पर जमे सभी कैमरामैन ने अपने कैमरे का रूख उधर ही मोड दिया , ईडी साहब चिंतित हो गए कि बैंक का इमेज इससे खराब हो सकता है, मैंने उनकी आशंका समझते ही उन्हें ईशारे से आश्वस्त किया और स्टैण्ड माईक थाम कर फिर एक शेर सुना दिया और शांत रहने की अपील करते हुए यह भी कहा कि गरीबों को बैंक से जोडने के लिए पीएनबी द्वारा आयोजित इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम को डिस्टर्व करने की नीयत से जो बेवजह हल्ला कर रहे हैं वे मीडिया के वीडियो कैमरे में कैद हो रहे हैं, लोग तुरंत शांत हो गए, इंटरव्यु फिर शुरू हो गया । इसके अलावा ईडी साहब से मेरी कोई मुलाकात या बात नहीं हुई थी। कल हो कर सभी अखबारों में कई – कई कॉलमों में तस्बीरों के साथ बैंक के बारे में बडी – बडी और अच्छी रिपोर्टें छपी थीं। सर्कल हेड ने बताया कि रात में डीनर के समय ईडी साहब मेरे ही बारे में बातें करते रहे थे ।  26 अगस्त को फाइनल रिजल्ट निकलने के बाद अक्टूबर में जब पोस्टिंग हुई तो मुझे दिल्ली और प्रेमचन्द्र शर्मा को कोलकाता मिला था। नियमानुसार हम ऑन जॉब ट्रेनिंग ले रहे थे।

यह पूरी पृष्ठभूमि और लम्बी कहानी यहां मैं ने इसलिए लिखी कि पाठक स्वयं फैसला करें कि यदि ईडी टांकसाले जी हेड ऑफिस राजभाषा विभाग में मुझे पोस्ट करना चाहते रहे हों तो क्या उसके लिए मुझे किसी पैरवी की जरूरत पडी होगी , जैसा कि ईश्वर चन्द्र बंसल और बलदेव मल्होत्रा अपनी ओर से बता रहे थे ? जब राजभाषा विभाग में ज्वाईन करने के बाद मैंने बताया कि किसी आईएएस अफसर से पैरवी कराए जाने की बात बिल्कुल बकवास  थी तो बलदेव मल्होत्रा ने मुझे सलाह दी थी कि यदि लोग ऐसा मानते हैं तो हर्ज़ क्या है ? इससे लोगों पर धाक ही जमती है, इसलिए इस सोच को बने रहने देना चाहिए। मैंने उनसे कहा था कि बिलकुल नहीं, मैं इसमें अपना अपमान मनता हूं, क्योंकि मैं व्यक्तिगत फायदे के लिए किसी भी तरह की पैरवी को अनुचित मानता हूं। किसी पैरवी – तैरवी से परे मेरा तो मानना रहा है कि-

“खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तक़दीर से पहले,   खुदा बन्दे से खुद पूछे , बता  तेरी  रज़ा क्या है ” ।

तो, ‘पिंजडे के तोते’ वाली विशिष्ट बातें अगली कडी में ..!

श्रीलाल

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बंगलोर, 21 दिसम्बर 2015

मेरा पोता अपूर्व अमन आज एक वर्ष का हो गया

    मेरा पौत्र अपूर्व अमन

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आज 16 दिसम्बर 2015 को पूरे एक वर्ष का हो गया।

शत – शत बधाइयां , कोटिश: आशीर्वचन ।

अपूर्व अमन का जन्म जामिया हमदर्द मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल नई दिल्ली में डॉ. अर्चना कुमारी की देखरेख में 16 दिसम्बर 2014 को प्रात: 10 बज कर 16 मिनट पर हुआ था। आज के लगभग एक वर्ष दो माह पहले 18 अक्टूबर 2014 को उसी अस्पताल में उसी डॉक्टर की देखरेख में मेरे नाती – पुत्री शिल्पा श्री और जमाता सुमीत कुमार के पुत्र – कुमार श्रेष्ठ का भी जन्म हुआ था।

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(नाचते – नाचते मोरवा , गोडवा देख मुरछाए)

इंदिरापुरम, 06 दिसम्बर 2015

दुखवा हम  का सों कहें सैयां गयो परदेश ; पता नहीं, मेरी यह पांती पूरी हो तब तक ‘वो’ देश में होंगे या विदेश में , इसीलिए इसे डाकखाने के लेटर बॉक्स में न डाल कर अपने ब्लॉग और फेसबुक पर डाल रहा हूं। फिर भी , गारंटी नहीं है कि यह ‘उन’ तक पहुंच ही जाएगी, क्योंकि जो लोग बिहार चुनाव की जमीनी हक़ीक़त भी न पहुंचा सके, वे मेरी बात पहुंचा पाएंगे , इसका क्या भरोसा ?

******

मेरे बाबू (पिता जी) एक कहावत सुनाया करते थे – “नाचते – नाचते मोरवा , गोडवा देख मुरछाए ” । एक बार उन्होंने उसका अर्थ बतलाते हुए कहा था कि सावन की काली घटा और जंगल की हरियाली देख मोर भाव – विभोर हो कर नाचता है, किंतु नाचते – नाचते जब उसकी नज़र अपने पांवों पर पडती है, तब वह हताश – निराश हो कर नाचना बंद कर देता है और अपने ही पांव देख वह मूर्छित हो जाता है। मैं ने पूछा था कि ऐसा क्यों होता है ? मोर के पांव में ऐसा क्या है जिसे देख वह मूरछित हो जाता है ? बाबू ने समझाया था कि मोर के पंख जितने खूबसूरत होते हैं, उसके पांव उतने ही बदसूरत होते हैं। वह अपने रंगविरंगे पंख देख खुश होता है, सावन की काली घटाएं और जंगल की हरियाली उसका उत्साह बढाती हैं, वह नाचने लगता है, किन्तु उसके पांवों की बदसूरती उसमें हीन भावना भर देती है। लोग तो उसका नाच देखते हैं, उसके पांवों की तरफ तो किसी की नज़र जाती ही नहीं, किंतु मोर क्या करे ? वह तो सच्चाई जानता है।

जब कभी भी मैं अपने परिवार के बहुविश्रुत उदार व शानदार अतीत और साधारण  वर्तमान  के बारे में कोई सवाल कर देता तो बाबू वह कहावत सुना देते और भावुक हो जाते।

‘वो’ जरूर जानना चाहते होंगे कि यह कहावत मैं उन्हें  क्यों सुना रहा हूं ? तो चलिए, घर – परिवार के कुछ और समाचार पहले सुना लूं, फिर वह कहावत सुनाने का कारण भी बता दूंगा।

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