डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

 

( बेहद बेरहम होता है वक्त , और , बेहतर मरहम भी होता है वक्त)

इंदिरापुरम , 27 फरवरी 2016

बेहद बेरहम होता है वक्त , और , बेहतर मरहम भी होता है वक्त ! लोग कहते हैं कि वक्त किसी का इंतजार नहीं करता, मैं कहता हूं कि जो वक्त का इंतजार करता है वह रेगिस्तान को भी गुलिस्तान बना देने का हुनर व हौसला हासिल कर लेता है । वक्त को इन दोनों ही रूपों में देखा – पढा , सुना – समझा और भोगा है मैं ने। संभवत: हरएक व्यक्ति के जीवन में वक्त अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, दर्ज ही नहीं कराता, बल्कि महसूस भी कराता है, यह अलग बात है कि उसका एहसास हमें उस तरह से हो न हो।

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(मेरी ज़िन्दगी मुश्तक़िल इक सफर है)

अहमदाबाद , 16 फरवरी 2016

बेटी को अस्पताल से घर लाने के एक सप्ताह बाद डॉक्टर से राय ली तो कुछ और दिन ऑव्जर्वेशन में रहने की सलाह डॉक्टर ने दी, तदनुसार सबका बंगलोर जाने का कार्यक्रम रद कर देना पडा । उधर बंगलोर में बहू अस्पताल से घर आ गई थी। बेटा , छोटी बेटी और  दामाद तथा मेरी साली के दो बेटे बंगलोर में ही थे और देखरेख के लिए फिलहाल बेटे के फ्लैट में ही सभी आ गए थे, उन सबके अलावा बहू के मायके वालों में से भी एक परिवार बंगलोर में ही था। बेटे ने कहा था कि हम दोनों , मैं और मेरी पत्नी, अहमदाबाद में बेटी और नाती की देखरेख करें , बंगलोर वे लोग सम्भाल लेंगे, फिर भी, न मुझे चैन आ रहा था न पत्नी को इत्मीनान हो रहा था, क्योंकि अहमदाबाद में दामाद बैंक में हैं तो बंगलोर में रहने वाले परिवार के सभी लोग एमएनसी में हैं, केवल हम दोनों ही हैं जिनके चौबीसों घंटे अपने हैं। बेटे ने और बेटियों ने भी , मेरी सेवा निवृत्ति के बाद मुझे सलाह दी थी कि अब कहीं भी जाना हो तो हम दोनों यानी उनके माता – पिता, साथ ही जाएं, पिछले एक साल से हम ऐसा ही कर रहे थे, लेकिन अब परिस्थिति ऐसी आ गई थी कि कुछ दिनों के लिए हम में से एक बेटी – दामाद और नाती के पास रहे तो दूसरा, बेटा – बहू और पोता के पास रहे, इसीलिए हमने आपस में विचार कर निर्णय ले लिया कि चूंकि बेटी का ऑपरेशन हुआ है और उसे ज्यादा सावधानी तथा आराम की जरूरत है और साथ ही, यहां और कोई अपना नहीं है तो पत्नी अहमदाबाद में बेटी के पास रहें और नाती को भी सम्भालें तथा मैं बेटा – बहू – पोता के पास चला जाऊं, हमने अपनी यह योजना किसी को भी नहीं बताई, पहले से बेटी और नाती के साथ हम दोनों के बंगलोर जाने के लिए 02 फरवरी की टिकट थी ही, सो शेष दो टिकट रद करा कर मैं बंगलोर के लिए चल पडा।

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जय हिन्द

जिन लोगों ने “भारत की बर्बादी तक जंग जारी रखने” के नारे जे एन यु कैम्पस में लगाए या जो लोग वैसे नारे कहीं भी लगाने की जुर्रत करते हैं, चाहे वे भरतीय हों या कोई और , वे हमारी मातृभूमि के दुश्मन हैं, इसीलिए भारत सरकार को कोई तुष्टीकरण की नीति अपनाए वगैर भारतीय कानून के तहत उन्हें कडी से कडी सजा तुरंत दिलाने के लिए हर संभव कार्रवाई तत्काल सुनिश्चित करनी चाहिए, ताकि उस तरह की घटना भारत की सरजमीं पर दुहराने का स्वप्न भी कोई न देख सके । जय हिन्द !

 शब्द और स्वर का ऐसा बेमिसाल दोस्ताना !

बंगलोर, 09 फरवरी 2016

“ सूरज को चोंच में लिये मुर्गा खडा रहा

खिडकी के परदे खींच दिये, रात हो गई ”

और सचमुच परदा खिंच गया, रात हो गई क्योंकि हिंदी और उर्दू की मिलीजुली जुबान हिन्दुस्तानी का अज़ीम शायर परदे के पीछे चला गया , गंगा – जमुनी तहज़ीब का आफताब चला गया , निदा फाजली नहीं रहे, अदबी उजाले में  रात का – सा स्यापा लगे है मुझे, मगर फिर भी, उनकी क़लम की नोक से बूंद – बूंद आखर – आखर झरझरा कर झरी हुई रोशनी ग़जलों, नज़्मों और दोहों की शक्ल में इस क़दर इफरात में छितराई हुई है कि अंधेरा मुंह छुपा कर भागता हुआ लागे है।  शहरी रहन – सहन  को अभिव्यक्त करने के ख्याल से लिखा निदा साहब का यह शेर उन पर ही कितना मौजूं  बैठता है!

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

(सियासत से बहुत ऊपर होती है विरासत)

बंगलोर, 07 फरवरी 2016

मैं, भारत के एक जिम्मेदार नागरिक की हैसियत से बडी विनम्रता और सद्भावना के साथ, देश के जनमानस और भारत सरकार के  समक्ष, उच्चस्तर पर विचार – विमर्श के लिए, राष्ट्र एवं जनहित में,  कुछ सलाह प्रस्तुत करना चाहता हूं, यह जानते – समझते हुए भी कि लोग कहेंगे ही कि संसार में सबसे सस्ती चीज सलाह है, तो भी मैं वही सबसे सस्ती चीज ही देना चाहता हूं। यह भारत के माननीय प्रधानमंत्री और उनके मंत्रीमंडल के मानव संसाधन विकास मंत्री / शिक्षा मंत्री / सूचना एवं प्रसारण मंत्री / युवा, खेल व संस्कृति मंत्री की विशेष सूचना के लिए है।परंतु, इससे पहले कि मैं अपनी सलाह प्रस्तुत करूं, जनमत में व्याप्त कुछ सच्चाइयां, कुछ सूचनाएं और अपनी समझ भी रख देना आवश्यक समझता हूं।

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