डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

 

धर्म, धार्मिक, धर्मांध और अंधविश्वास

इंदिरापुरम, 30 अप्रैल 2016

महाकाल की नगरी उज्जैन से कल एक खबर आई कि इस वर्ष सिंहस्थ कुम्भ में श्रद्धालुओं का आगम कम है , इस कमी का कारण कुछ अखाडों के साधुओं ने यह बताया है कि इस साल के सिंहस्थ कुम्भ को किसी की नज़र लग गई है, इसीलिए वे लोग उस नज़र को उतारने के लिए टोटके कर रहे हैं जिसे वे तंत्र साधना कह रहे हैं। जिस तरह अनपढ व अन्धविश्वासी महिलाएं व पुरूष अपने बच्चे के ज्यादा रोने या तकलिफ में होने पर उसकी नज़र उतारने के लिए बच्चे के सिर के ऊपर से लाल मिर्च और सरसों निछावर कर आग में जला देते हैं तथा उसका धुआं बच्चे को सुंघाते हैं, भले ही बच्चे का दम घुट जाए, साथ ही, बच्चे के माथे और गाल पर काला टीका भी लगा देते हैं, उसी प्रकार किसी का नया घर बन रहा होता है तो बुरी नज़र से उसे बचाने के लिए वहां बांस में एक हांडी टांग देते हैं, उस हांडी पर कालिख पोत देते हैं , उस पर चुने का टीका भी लगा देते हैं, दरवाजे पर नीम्बू और प्याज भी टांग देते हैं, अमूमन तो लोग बुरी नज़र वालों का पुतला बना कर उसका मुंह काला कर उसे भी बांस में टांग देते हैं; और ऐसा कर वे समझते हैं कि उनके बच्चे के ऊपर से बुरी नज़र उतर जाएगी तथा बुरी आत्मा का साया उनके निर्माणाधीन घर से दूर हो जाएगा , उनका घर बुरी नज़र वालों से महफूज रह कर निर्विघ्न रूप से बन सकेगा ; शायद वैसे ही उज्जैन में अखाडों के साधुओं ने लाल मिर्ची, पीले सरसों, सरसों के तेल आदि श्मशान की आग में जला कर धुआं करते हुए कुम्भ की नज़र उतार रहे हैं। इस मूल विषय पर हम चर्चा करेंगे किंतु पहले जिस धर्म के नाम पर यह सब किया जा रहा है, उस धर्म के बारे में तो जान लें।

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

ज्योतिष , राशियां , भविष्यवाणियां और
‘मीन–मेष निकालना’ हिन्दी मुहावरे का सच….

इंदिरापुरम, 22 अप्रैल 2016

हिंदी में एक प्रसिद्ध मुहवरा है – “मीन – मेष निकालना” , जिसका लगभग समानार्थी मुहावरा है – “बाल की खाल निकालना” यानी  “नुक्तचीनी करना” आदि। इन सबका अर्थ प्राय: एक – सा है – गलतियां निकालना या दोष ढूंढना अर्थात छिद्रांवेषण ; किंतु इनमें से “मीन – मेष निकालना” कुछ अलग मायने भी रखता है, उसमें अंतर्निहित अर्थ है – आसानी से किसी निर्णय पर न पहुंचना, आगा – पीछा करना, असमंजस की स्थिति में होना यानी दुविधा में होना , गहन चिंतन – मनन कर वस्तुस्थिति का पता लगाने का प्रयास करना। हम इस विषय की चर्चा अंत में करेंगे, पहले ज्योतिष , राशियों और भविष्यवाणियों की चर्चा कर ली जाए।

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

                                                                      विनोद दुआ जी से …

इंदिरापुरम, 19 अप्रैल 2016

विनोद दुआ जी , नमस्कार !

दिल को सुकून मिल रहा है कुछ दिनों से एक टीवी चैनल पर आप को देख – सुन कर। आप एक प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय मीडिया शख्सियत व टीवी ऐंकर पर्सन  रहे हैं , आज भी कोई मुकाबला नहीं है। मैं फिल्मों के किसी भी सुपर स्टार का कभी भी फैन नहीं रहा , लेकिन जब दूरदर्शन के अलावा कोई और टीवी चैनल नहीं होता था और आप प्रणय राय के साथ चुनावी विश्लेषण की युगलबंदी करते थे, तब से मैं आप की ऐंकरिंग और विश्लेषण – कौशल का फैन रहा हूं। चूंकि विगत कुछ दशकों में आकाशवाणी और दूरदर्शन तथा अन्य बडे संस्थानों के सैकडों महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की ऐंकरिंग करने, देश के अनेक गृहमंत्रियों, वित्तमंत्रियों, अन्य केन्द्रीय मंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राज्यपालों, रिज़र्व बैंक के गवर्नरों, बैंकों के अध्यक्ष व प्रबंध निदेशकों, फिल्म स्टार एवं साहित्यकारों आदि से संबंधित कार्यक्रमों के संयोजन व संचालन का अवसर मुझे मिला है, इसलिए किसी की ऐंकरिंग, संयोजन – समन्वय की क्षमता, परिचर्चा व वादविवाद को सुव्यवस्थित रूप में संचालित करने के कौशल का आकलन व मूल्यांकन करने का शऊर मुझमें है, मैं आश्वस्त हूं कि उसके लिए मुझे किसी के प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं है।

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

पंजाब नैशनल बैंक में चुनौतियों का सिलसिला जारी रहा ….

The woods are lovely dark and deep : But I have my promises to keep

And   miles  to go   before  I     sleep   : And miles to go before I sleep

 

इंदिरापुरम,  16 अप्रैल 2016

पंजाब नैशनल बैंक में चुनौतियों का सिलसिला जारी रहा , प्रधान कार्यालय में राजभाषा अधिकारियों के स्थानांतरण – पदस्थापन संबंधी जिस कार्य को वर्षों से बहुत ही टेंढा और पेंचिदा माना जा रहा था ; उसका अहम दौर बैंक के शीर्ष कार्यपालकों के समर्थन, सह्योग व प्रोत्साहन से पूरा हो चुक था और पैरवी को ही प्रधान पूंजी मानने वाला तबका पस्त हो चुका था, किंतु बैंक के शीर्ष कार्यपालकों के उस समर्थन एवं स्नेह का बैंक के आंतरिक कार्यों में राजभाषा हिंदी का प्रयोग बढाने, राजभाषा अधिकारियों और राजभाषा विभाग को समुचित स्थान व सम्मान दिलाने तथा बैंक को भारत सरकार का राजभाषा संबंधी सर्वोच्च पुरस्कार दिलाने के लिए कैसा और कैसे उपयोग किया जाए , मेरे सामने अब सबसे बडी चुनौती यही थी। अमेरीकन कवि रॉबर्ट फ्रॉस्ट की उपर्युक्त पंक्तियां मुझे उसी सिलसिले में याद आईं, जिसका हिन्दी अनुवाद कुछ इस तरह का है-

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

अम्बेदकारवाद और गांधीवाद का समन्वित स्वरूप ही

प्रचीनता की दीवारों से घिरे अर्वाचीन भारत के उत्थान और सर्वांगीन विकास का मार्ग है

क्योंकि अम्बेदकर और गांधी एक – दूसरे के पूरक हैं

इंदिरापुरम, 14 अप्रैल 2016

आधुनिक भारत के राष्ट्रनिर्माता और भारतीय संविधान की आत्मा को लोकतंत्र के ब्रह्मसरोवर में खिलाने वाले बाबा साहब भीमराव अम्बेदकर की 125वीं जयंती के अवसर पर मैं उन्हें सादर श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं और अछूतों के उद्धार एवं दलितों के उत्थान के परिप्रेक्ष्य में गांधी जी तथा बाबा साहब के वैचारिक अंतर्द्वन्द्व पर ऐतिहासिक तथ्यों के आलोक में अपनी समझ अपने सुधी पाठकों के साथ साझा करना चाहता हूं , यह आवश्यकता मुझे इसलिए महसूस हो रही है कि कई बार कुछ मित्रों से चर्चा के दौरान ऐसा लगा कि किन्हीं कारणों से कई लोग गांधी और अम्बेदकर को एक – दूसरे का घोर विरोधी मान लेते हैं तथा अपनी उसी सोच के आधार पर कोई गांधी को तो कोई अम्बेदकर को ग़लत करार देता है।

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

भाजपा को 282 + क्यों, कैसे और कब तक

भारतीय जनता पार्टी के पास लोक सभा में 282 + का आंकडा है जो 543 सदस्यों वाली लोकसभा में सहजता के साथ बहुमत सिद्ध करने के लिए काफी है। 1980 में लोक सभा में दो सदस्यों के साथ सफर शुरू करने वाले दल को 10वीं चुनावी दौड यानी 34 साल बाद यह उपलब्धि हासिल होना कोई आसान – सी मंजिल नहीं , तो कोई बहुत बडा चमत्कार भी नहीं है। इसीलिए इस आंकडे की मीमांसा करना और उस पार्टी के भूत एवं वर्तमान की चर्चा करते हुए भविष्य का आकलन करना जरूरी लग रहा है क्योंकि इस आंकडे से एक तबके में लोकतंत्र की मजबूती के प्रति आश्वस्ति बलवती हुई है तो दूसरे तबके में ग़लतफहमियां और तीसरे तबके में खुशफहमियां पलने का अवसर मिल गया है।

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

 धरा बेच देंगे, गगन बेच देंगे ; सुमन बेच देंगे, चमन बेच देंगे

क़लम के सिपाही अगर सो गये तुम, वतन के मसीहा (?) वतन बेच देंगे

इंदिरापुरम, 06 अप्रैल 2016

मैं बहुत दिनों से चैन की नींद सोना चाहता हूं और फिर तरोताज़ा हो कर अपनी आत्मकथा के मूल विषय पर लौटना चाहता हूं, मगर देश – दुनिया में रोज कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है कि चैन से सोने का खयाल ही अपराधबोध से भर जाता है ,

क्योंकि कलमकार अगर चैन से सो गये तो …… ?

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

 ईश्वर मरणशील प्राणी है ! 

 

इंदिरापुरम, 04 अप्रैल 2016

‘ईश्वर मरणशील प्राणी है !’ मैं यह सवाल पूछ रहा हूं या संशयात्मक रूप से यह विचार रख रहा हूं अथवा निश्चयात्मक रूप में अपनी सोच बता रहा हूं ? पता नहीं।  जो भी हो,  इस विषय पर आगे बढने से पहले मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूं कि लोगों की ईश्वर के बारे में जो भी धारणा या आस्था हो, उसे ठेस पहुंचाना या उस सोच के प्रति अविश्वास अथवा अनादर का भाव प्रदर्शित करना मेरा ध्येय नहीं है, सभी अपनी – अपनी आस्था और विश्वास को मानने के लिए स्वतंत्र हैं, मैं भी। यदि मेरी इस सोच पर कोई अपनी आस्था को ठेस पहुंचाने का प्रयास करने का आरोप लगाता है तो मेरा भी सीधा – सा जवाब है कि वह अपनी सोच से मेरी सोच और आस्था को ठेस पहुंचा रहा है। इसलिए बेहतर है कि सभी अपनी – अपनी आस्था और विश्वास के साथ खुश रहें और दूसरों के लिए भी कुछ मौलिक रूप में सोचने का अवसर और स्वतंत्र क्षण छोडें । यदि ईश निंदा और धार्मिक आस्था संबंधी कानून का कोई प्रावधान उस दृष्टिकोण को अपनाने से निषेध करता हो तो उसमें आवश्यक संशोधन होना चाहिए । मैं यह भी स्पष्ट कर दूं कि मैंने चार्वाक दर्शन, नीत्शे या मार्क्स जैसे नास्तिकों , निराशावादियों या धर्म को अफीम कहने वालों का कोई अध्ययन नहीं किया है, मैंने अध्ययन तो किया है सनातन हिन्दू धर्म के ग्रंथों – गीता, रामायण, महाभारत, वेद – वेदांगों – उपनिषदों, पुराणों ,स्मृतियों, जैन व बौद्ध धर्म के सिद्धांतों से संबंधित ग्रंथों का तथा कुछ अन्य पुस्तकों का, आर्यसमाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती के सत्यार्थ प्रकाश का, कुरान और हदीश का, बाईबल का, ज़ेंदावेस्ता के कुछ अंशों का, लेकिन हां , यह भी सच है कि मैंने शुरू तो किया था एक धार्मिक व्यक्ति की तरह उनका अध्ययन,  किंतु रास्ते में ही बन गया मात्र एक पाठक, जी हां, वैसा ही एक जिज्ञासु पाठक जो ज्ञान – विज्ञान की जानकारी के लिए अपनी पसन्द की पुस्तकें पढता है।

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