डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

                                      बैंकों का विलय व एकीकरण  : किसको नफा , किसका नुकसान ?

(प्रधानमंत्री जी, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय और एकीकरण शीघ्र सम्पन्न कराइए क्योंकि अगला विश्वयुद्ध बम, बन्दूकों व मिसाइलों से नहीं, बल्कि आर्थिक संसाधनों से लडा जाएगा और उसके लिए सुदृढ वित्तीय ढांचा का होना जरूरी है। 19वीं सदी के उत्तरार्ध में जर्मन राज्यों के एकीकरण के लिए बिस्मार्क तथा आधुनिक इटली के निर्माण एवं सुदृढीकरण के लिए मैज़िनी, गैरीबाल्डी व कैवूर इतिहास पुरूष हो गए; भारत में भी , देसी रियासतों के विलय के लिए सरदार पटेल, बैंकों के राष्ट्रीयकरण के लिए इंदिरा गांधी तथा आर्थिक उदारीकरण व वैश्वीकरण के लिए डॉ. मनमोहन सिंह इतिहास में अमर हो गए हैं; हालांकि 1991-92 में बैंकों के एकीकरण की नीति बना लेने के बावजूद वित्तमंत्री के रूप में 5 साल और प्रधानमंत्री के रूप में 10 साल के कीमती समय में भी वे अपनी उस नीति को अमली जामा नहीं पहना सके, शायद उसके पीछे न्यु बैंक ऑफ इंडिया का 1993 में पंजाब नैशनल बैंक में बिलकुल हडबडी में विलय करा देने से जो पेंचीदगियां पैदा हुईं,  वही मुख्य वजह रहीं हो; फिर भी, देश में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का एकीकरण उन्हीं के कार्यकाल में 2006 से 2008 के बीच हुआ जिनकी संख्या 196 से घट कर 56 रह गई है, उन्हें एक बार फिर एकीकृत किया जाना चाहिए और प्रत्येक राज्य में एक ही ग्रामीण बैंक रखा जाना चाहिए। इतिहास अब आपके द्वार आ गया है, वही इतिहास जिसने मैजिनी को इटली का ‘दिल’, कैवूर को ‘दिमाग’ और गैरीबाल्डी को ‘ताक़त’ कहा था, आप तो ‘मनकी बात’ करते हैं, आप देश का दिल , वित्तमंत्री अरुणजेटली दिमाग और गृहमंत्री राजनाथ सिंह ताक़त बनें। सभी पूर्ववर्तियों से आगे निकल जाने के लिए आपका मार्ग प्रशस्त है, आप ढेर सारे बडे – बडे काम करा रहे हैं, राष्ट्रीयकृत बैंकों सहित ग्रामीण बैंकों का भी एकीकरण इसी वित्तीय वर्ष में करा लीजिए, और हां, विलय एवं एकीकरण से उत्पन्न होने वाली संभावित समस्याओं के समाधान के उपाय पहले ही ढूंढ लीजिए, इतिहास अपने पन्नों में नहीं, सिर–माथे रखेगा आप को। यह भी ध्यान रहे कि सिर पर कामयाबी का सेहरा बंधने या नाकामी का ठीकरा फुटने की पृष्ठभूमि आदमी खुद तैयार करता है।)

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

                          केजरीवाल बनाम अन्ना बजरिये अन्ना बनाम पेरियार
(अरविन्द केजरीवाल – अन्ना हजारे और सीएन अन्नादुरई – ई वी रामास्वामी पेरियार)
 विशेष सन्दर्भ: तमिलनाडु में हिन्दी की राजनीति अर्थात राजनीति में हिन्दी
 
इंदिरापुरम, 16 जून 2016
 
कहते हैं, न गुजरा हुआ वक्त लौट कर आता है और न ही मरा हुआ आदमी, फिर भी, इतिहास खुद को दुहराता है। ऐसा कैसे हो सकता है? यह तो इतिहास ही बताएगा। तो आएं, इतिहास की कुछ झलकियां देखें।
 इस सिंहावलोकन अथवा पुनरावलोकन की प्रक्रिया को अरविन्द केजरीवाल को अन्ना यानी सीएन अन्नादुरई के बरख्श और अन्ना हजारे को पेरियार यानी ईवी रामास्वामी पेरियार के बरख्श देखने का आग्रह नहीं समझा जाए , फिर भी, यदि इस तरह का आग्रह मेरे इस आलेख में किसी को प्रतीत होता भी है तो क्या गुनाह है? क्योंकि ये तथ्य तो इतिहास में दर्ज हैं और शेष हिस्सा हमारे आपके सामने है।

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ग़ज़ल : कुछ कही – अनकही

मित्रो

बहुत दिनों से आत्मकथा लेखन में व्यस्त रह रहा हूं और बीच – बीच में समसामयिक विषयों एवं घटनाओं पर विश्लेषणात्मक टिप्पणिया भी कर लिया करता हूं। ऐसे में ऊंगलियां कलम पकडना भूलती जा रहीं हैं और लैपटॉप के की – बोर्ड पर दौड लगाने की अभ्यस्त होती जा रही हैं। जाहिर है, कविता – कहानी लिखना भी अब वैसे ही सपना – सा होता जा रहा है, जैसे बेग़म का मायके जाना।

ये तो भाई राशिद राही और माननीया नीतु राठौड जी की ग़ज़लें हैं जिन्हें देख – पढ कर कुछ लिखना – सा आ रहा है , तो मुलाहिजा फरमाइएगा –

(एक)

वक्त अग़र रेत–सा फिसला  नहीं होता

समन्दर में  सहरा  निकला नहीं होता

सूरज  तमंचों  से   आग  बरसाता है

वरना  ये  हिमालय  पिघला नहीं होता

हमने   ही  तो  दरवाज़ा खोल रखा था

हर कदम पे  ये  सिला मिला नहीं होता

जाडे की  धूप–सी मीठी  ईद  का लहजा

इस तरह गर्मी   का  कर्बला नहीं होता

पडोसन   से  मसाइल सुलझा ली होतीं

जुल्फ–सा उलझा हर मसला नहीं  होता

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

देवी-देवताओं का आर्थिक उदारीकरण और बाबाओं का वैश्वीकरण

इंदिरापुरम, 02 जून 2016

देवी देवताओं का आर्थिक उदारीकरण और बाबाओं का वैश्वीकरण 20वीं सदी के उत्तरार्द्ध में ही शुरू हो गया था, हालांकि बाबा पीवी नरसिंहराव की सरकार ने तत्कालीन वित्तमंत्री डॉ. मनमोहनसिंह के नेतृत्व में भारतीय अर्थव्यवस्था में उदारीकरण व वैश्वीकरण की शुरूआत बहुत बाद में 1991 में की और , वह भी, रूस के मिखाइल गोर्वाचोव द्वारा शीत युद्ध की समाप्ति की ओर कदम बढाते हुए ग्लास्नोत एवं  प्रेस्त्रोइका का नारा दिए जाने के बाद; गोर्वाचोव को उसके लिए नोबेल पुरस्कार मिला तो मनमोहन सिंह को मौनमोहन सिंह का खिताब; परंतु बाबाओं का वैश्वीकरण रजनीश , धीरेन्द्र ब्रह्मचारी , चन्द्रस्वामी से होते हुए जीवन – कला बाबा और अनुलोम विलोम बाबा तक आ गया । उनके अलावा भी बहुत – से बापू और बाबा हुए और हैं। खैर, यहां मेरा विषय यह नहीं है।

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