डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

बैंकों का राष्ट्रीयकरण एवं एकीकरण, क्या एक – दूसरे के विपरीत हैं और क्या विलय व एकीकरण निजीकरण की पहल है?

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बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस पर विशेष ( SPECIAL POST ON BANK NATIONALIZATION DAY : 19 JULY)

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बैंक राष्ट्रीयकरण दिवस प्रत्येक वर्ष 19 जुलाई को मनाया जाता है, इस उपलक्ष्य में देशवासियों को अग्रिम हार्दिक शुभकामनाएं और बधाइयां । 19 जुलाई 1969 को 14 बडे कॉमर्शियल बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ था; उसकी 47वीं वर्षगांठ से ठीक 7 दिनों पहले यानी 12 जुलाई 2016 से बैंकों में दो दिवसीय हडताल करने की घोषणा बैंक अधिकारियों एवं कर्मचारियों के कुछ संगठनों ने की थी। भारतीय स्टेट बैंक और उसमें विलय के लिए प्रस्तावित उसके सहायक बैंकों की याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय दिल्ली हाई कोर्ट ने बैंकों में प्रस्तावित उस हडताल पर रोक लगा दी, फलस्वरूप बैंककर्मियों के संगठनों ने भी हडताल वापसी की घोषणा कर दी और तदनुसार वह हडताल नहीं हो सकी। उस हडताल का प्रमुख उद्देश्य था – भारतीय स्टेट बैंक में उसके सहायक बैंकों सहित भारतीय महिला बैंक के प्रस्तावित विलय (इसके लिए केन्द्रीय मंत्रीमंडल ने 15 जून 2016  की बैठक में निर्णय ले लिया था) एवं राष्ट्रीयकृत बैंकों के संभावित एकीकरण का विरोध करना।

अपने 24 जून के पोस्ट में मैंने भारतीय स्टेट बैंक में उसके सहायक बैंकों और भारतीय महिला बैंक के विलय की चर्चा करते हुए आज़ादी के बाद कॉमर्शियल बैंकों को सार्वजनिक क्षेत्र में लाने के उद्देश्यों तथा उसकी प्रक्रिया का स्थूल विवेचन किया था। अब बैंकों में घोषित उस हडताल की वापसी के सन्दर्भ में उन उद्देश्यों और प्रक्रियाओं की सूक्ष्म विवेचना आवश्यक प्रतीत हो रही है ताकि आम जनता तक उसके हानि – लाभ की सच्चाई पहुंचाई जा सके। इसीलिए उस गूढ विषय की चर्चा में गूढ और पारिभाषिक शब्दावलियों तथा तकनीकी पक्षों की उलझनभरी बाजीगरी का सहारा न ले कर यहां सरल व सहज तरीके से सीधे – सादे शब्दों में बात रखने की कोशिश की जाएगी। तो आइए, कुछ खास बिन्दुओं के माध्यम से इस मामले को समझा जाए : जैसे – राष्ट्रीयकरण के पहले बैंकिंग यानी शुद्ध लाभकारी बैंकिंग,  राष्ट्रीयकरण के बाद बैंकिंग यानी शुद्ध कल्याणकारी बैंकिंग, राष्ट्रीयकरण का परिणाम यानी जमाकर्ताओं की जमापूंजी की सुरक्षा के साथ – साथ बैंककर्मियों में सेवा सुरक्षा का प्रबल भाव , राष्ट्रीयकरण के उद्देश्यों की पूर्ति यानी बैंक शाखाओं का विस्तार और बैंक ऋण तक गरीब – गुरबों की भी पहुंच , भविष्य में बैंकिंग तथा बैंकिंग का भविष्य यानी एक ही साथ कल्याणकारी एवं लाभकारी बैंकिंग।  

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डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

     { मेरे 24 जून 2016 के पोस्ट का आश्चर्यजनक सकारात्मक परिणाम ! }

इंदिरापुरम, 12 जुलाई 2016

मैं ने 24 जून 2016 को बैंकों का विलय व एकीकरण  : किसको नफा , किसका नुकसान ?   विषय पर एक आलेख अपने ब्लॉग www.shreelal.in और फेसबुक shreela Prasad   तथा फेसबुक कम्युनिटी पेज   ‘Aman’ shreelal Prasad पर पोस्ट करते हुए बैंकों के विलय एवं एकीकरण के नफा – नुकसान का आकलन करने तथा उसके विरुद्ध 12 – 13 जुलाई 2016 को प्रस्तावित हडताल पर उपयुक्त निर्णय लेने के लिए प्रबुद्ध बैंककर्मियों का आह्वान किया था। मुझे बेहद खुशी है कि देश – विदेश में हजारों सुधी पाठकों ने उसे पढा और सराहा, उनमें दर्जनों अमेरिकी, युरोपियन तथा एशियाई देशों के हजारों प्रबुद्ध पाठक शामिल हैं। मैं उन सबके प्रति आभार व्यक्त करता हूं।

मुझे यह भी सूचना मिली थी कि संभवत: भारतीय स्टेट बैंक तथा उसमें विलय के लिए प्रस्तावित उसके सहायक बैंकों में भी उच्चस्तर पर मेरे आलेख को पढा गया और संभवत: उसी से प्रेरित हो कर माननीय दिल्ली हाईकोर्ट में 12 – 13 जुलाई की प्रस्तावित हडताल के खिलाफ याचिका दायर की गई , परिणाम स्वरूप माननीय हाईकोर्ट ने उस हडताल पर रोक लगा दी है और आज संबंधित संगठनों ने माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के मद्देनज़र हडताल वापसी की घोषणा भी कर दी। मैं देश हित में आए इस निर्णय का स्वागत करता हूं।

मैं एक सप्ताह के अंतर्गत अपने 26 जून के आलेख की दूसरी कडी भी प्रकाशित करूंगा, उससे संबंधित शोध कार्य चल रहा है। तब तक वर्षों पहले लिखी मेरी इस कविता का भी आनन्द लीजिए :-

आकाश कुसुम वह नहीं

धरती के सीने को चीरो

स्वर्ग के सोपान उभरेंगे वहीं पर ।

पादपों को पत्तियां दो

और हरापन जंगलों को

नील रहने दो गगन को;

छुप रहा कुहेलिका में

है,अनिर्णीत भग्य तेरा

सिन्धु की लहरें समेटो

पोंछ माथे का पसीना

और धरा पर अंगुलियों से

भाग्य की रेखा उकेरो

दो भुजाएं हैं दिशाओं को सम्भालो

धर हथेली पर अकम्पित

एक

मिट्टी का दीया

समय का सूर्य पा लिया

फिर सितारे नभ से उतरेंगे जमीं पर

स्वर्ग के सोपान उभरेंगे यहीं पर।

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

इंदिरापुरम,12 जुलाई 2016

9310249821

डायनैमिक और डाइनामाइट : एक आत्मकथा

                                                            एक ग़ज़ल  : कही अनकही

कहना बेमानी ही नहीं, बेईमानी भी है कि व्यस्तता के कारण अपने रचनात्मक लेखन को मैं आगे नहीं बढा पा रहा हूं क्योंकि रिटायर्मेंट के बाद एक सरकारी संस्थान में सम्मानजनक पद और मानदेय पर नौकरी मिल रही थी लेकिन नौकरी वही 10 से 5 यानी पूरे समय की थी, तो बच्चों ने उसे करने नहीं दिया। उनका कहना था कि बहुत हो गई नौकरी, अब मैं वह करूं जो नौकरी के दिनों में समय अथवा अन्य कारणों से न कर सका होऊं। बात मेरे मन की थी , सो मैं लग गया आत्मकथा लिखने और फेसबुक तथा अपने ब्लॉग पर उसे पोस्ट करने। मेरा ब्लॉग www.shreelal.in बनाया मेरे बेटे कुमार पुष्पक ने और उसे डिजायन किया आशीष प्रकाश तथा उसके एक दोस्त मनीष कुमार ने।

मैं ने 15 अगस्त 2015 को अपना ब्लॉग www.shreelal.in शुरू किया था। इस छोटी-सी अवधि में ही उस पर 58000 से अधिक हिट हुईं हैं और उत्तरी अमेरीका, यूरोप एवं एशिया के 40 से अधिक देशों के हजारों सुधी पाठक उससे जुड गए हैं, उनमें से 650 से अधिक  पाठकों ने प्रशंसात्मक प्रतिक्रियाएं भी दी हैं; कुछ पाठकों ने ब्लॉग में ‘डोनेट बटन’ का प्रावधान करने की भी सलाह दी है ताकि वे मुझे धन भेज सकें, यूएसए, यूके, रशियन फेडरेशन के कुछ देशों सहित चीन और जापान के कुछ पाठकों ने मेरे ब्लॉग का व्यावसायिक उपयोग करने की अनुमति मांगी है तो कुछ ब्लॉगर अपने ब्लॉग और वेबसाईट पर लिखने के लिए मुझे आमंत्रित कर रहे हैं। अभी मैंने इस पर कोई निर्णय नहीं लिया है लेकिन अपने उन सभी पाठकों के प्रति मैं हृदय से आभार व्यक्त करता हूं और यह आश्वासन भी देता हूं कि निकट भविष्य में अपने निर्णय से उन्हें अवश्य अवगत करा दूंगा। उनकी सलाह, उनका अनुरोध और आमंत्रण मेरे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण हैं , मैं उन सबका सम्मान करता हूं। कोई भी व्यक्ति उन सलाहों, अनुरोधों और आमंत्रणों को मेरे ब्लॉग www.shreelal.in पर कभी भी देख सकता है और अपनी प्रतिक्रिया भी दे सकता है। विदित है कि मैं लिखता तो हूं हिन्दी में, किंतु स्वत: अनुवाद की सुविधा उपलब्ध होने के कारण कई विदेशी भाषाओं में भी उसे पढा जा सकता है।

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