कर्म – फल और प्रार्थना – फल

 

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (आठ)

 

  • ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ क्यों ?
  • क्या दिन भर खेत में काम करने वाला आदमी रात को भूखे सो जाए?
  • क्या दिन भर दफ्तर में या कहीं भी ईमानदारी से पसीना बहा-बहा कर

परिश्रम करने वाला व्यक्ति पेट पालने के लिए भीख मांगे ?

  • क्या ईश्वर कभी अपने बन्दों को नाउम्मीदी में जीने का अभिशाप दे कर धरती पर भेजता है?
  • क्या निष्ठा और ईमानदारी से काम करने वाला व्यक्ति अपना परिश्रम-फल मांगने के लिए प्रार्थना करता रहे, गिडगिडाता रहे , मिन्नतें करता रहे, क्या उसकी कमाई पर उसका हक देना भगवान मुनासिब नहीं समझता?
  • क्या वह कर्म से नहीं प्रार्थना और पूजा से ही प्रसन्न होगा ? कोई भगवान अपने बन्दे को इतना निरुत्साह कैसे बना सकता है?
  • क्या प्रार्थना , भक्ति व भजन से ही ईश्वर प्रसन्न हो कर कृपा – वृष्टि करेगा?
  • क्या यह चमचागिरी, चापलूसी और चरन-वन्दना को ही धर्म-कर्म मानने की संस्कृति को बढावा देना नहीं हुआ ?
  • क्या यह सीख कम्पनियों में, दफ्तरों में हर प्रकार के कर्म क्षेत्र में काम करने वाले कार्मिकों को काम-धाम छोड कर बॉस की चापलूसी करते रहने की प्रवृत्ति को बढावा नहीं देती ?
  • क्या आपकी प्रार्थनाओं में “हे भगवान, मुझे अम्बानी जी का हवाई जहाजवा दिलवा

     दो या कम से कम जिस कम्पनी में क्लर्क हूं, उसका एमडी ही बनवा दो ”

     स्टाइल की डिमाण्ड नहीं होती? 

  • क्लर्क में नियुक्ति, क्लर्क की योग्यता , काम क्लर्की और बॉस के सामने रिपोर्ट भी क्लर्की की; ऐसे में जब आप अपने उसी ओहदे पर काम करते हुए अपने उसी बॉस से अपने सी ई ओ के बराबर तनख्वाह मांगेंगे तो आपका वह बॉस आपके बारे में क्या समझेगा ? आपका मानसिक इलाज कराने की सलाह देगा। तो, क्या आपने सबसे बुडबक भगवान को ही समझ लिया है कि काम करें जो ही सो ही और प्रार्थना में मांगे सीएमडी या सी ई ओ की तनख्वाह , ऐसे में या तो आप यह मान कर चलते हैं कि मांगने में क्या जाता है, यह पत्थर का भगवान वैसे भी दे क्या सकता है? अथवा यदि आप यह मानते हैं कि ईश्वर प्रार्थना सुनता है और पूरी भी करता है तो क्या उसे नासमझ समझ कर ठगने का संकल्प ले लिया है आपने? यदि ऐसा नहीं है तो फिर कामधाम छोड कर प्रार्थना-स्थलों की दौड क्यों लगाते हैं।
  1. तुमने अपनी गाडी की सफाई के लिए जो आदमी तीन सौ रूपये महीने पर रखा है, वह

       उसी गडी को वैसे ही साफ करने के लिए तुमसे दस हजार रूपये महीना की

        मांग कर दे, तो तुम क्या करोगे? उसे भगा दोगे और दूसरों से कहते फिरोगे

        कि लगता है , वह आदमी अपना मानसिक संतुलन खो चुका है, तो क्या

        उलजलूल डिमाण्ड लगाने पर भगवान भी तुम्हारी प्रार्थना सुन कर अपने

        दोस्तों के बीच तुम्हारे बारे में भी वैसी ही गुफ्तगू नहीं करता होगा और अब

        तक तुम्हें अपने भक्तों की सूची से हता – भगा नहीं दिया होगा  ?  

  1. मुझे आश्चर्य होता है कि तुम्हें प्रार्थना के दौरान ईश्वर से अपनी अनड्यू डिमाण्ड की

         फेहरिश्त रखते हुए शर्म क्यों नहीं आती? यदि आती है तो वैसी प्रार्थनाओं के

         पीछे भागते क्यों हो?  यदि न भय है और न ही शर्म है तो फिर …?   

  1. और यदि नहीं मानते हो तो खुद को बेकार मानना बन्द करो, ईमानदारी से काम करो ,

         किसी कमजोर, भूखे, बीमार , दुखी इंसान की मदद कर सकते हो तो करो,

         किसी को सम्मान नहीं दे सकते तो उसका अपमान भी मत करो , तुम्हारे

         मुंह का निवाला कोई भगवान नहीं छीन सकता।

  1. इसीलिए हे मनुष्य ! यदि तुम ईश्वर को मानते हो तो खुद को ईश्वर से चालाक मानना

        बन्द करो, उठो, जागो,  काम करो, और उसका शुक्रिया अदा करो, व्यर्थ का

        गर्व करना छोडो,प्रार्थना-स्थलों के लिए दौडना बन्द करो, क्योंकि वैसा कर तुम

        उसके होने के प्रति अविश्वास जताते हो और उसका अपमान करते हो, जिसने

        खुद की प्रार्थना के लिए कोई एक स्थान निरधारित न कर सारी कायनात को

        मुक्त रखा है।

 

 

और भी बहुत कुछ …. किंतु शेष कल ….. !            

ज्योतिष और जादूगर   

 

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (सात)

 

  1. फलित ज्योतिष (स्ट्रोलॉजी) पर प्रतिबंध हो, क्योंकि खगोल विद्या (स्ट्रोनॉमी) तो वैज्ञानिक है, किंतु फलित ज्योतिष अन्धविश्वास है, जो लोग उसे भी विज्ञान मानते हैं, उन्हें मेरी खुली चुनौती है तथा उनकी भी हर चुनौती को मैं स्वीकार करूंगा।
  2. फलित ज्योतिष का सरकारी शिक्षण संस्थानों में पठन-पाठन बन्द हो,
  • क्योंकि वैसा करना अन्धविश्वास को संस्थागत स्वरूप दे कर उसे बढावा देना है।
  1. तंत्र – मंत्र पर प्रतिबंध हो,  क्योंकि वह अन्धविश्वास है।
  2. ग्रह-नक्षत्रों के कुप्रभाव से निवारण के उपाय के रूप में पूजा-पाठ, हवन आदि पर

प्रतिबंध हो,  क्योंकि वह अन्धविश्वास है।

क्योंकि गुरूत्वाकर्षण के अनुसार ग्रह-नक्षत्रों की गति व स्थिति का प्रभाव तो पड

सकता है, जैसे चन्द्रमा से समुद्र में ज्वार उठना, सूर्यग्रहण से किरणों में विकार आना आदि, परंतु पूजा-पाठ-हवन और तंत्र-मंत्र-गण्डे-ताबीज से उसके प्रभाव को दूर नहीं किया जा सकता, विज्ञान की सहायता से हम अपना बचाव कर सकते हैं।

  1.  तंत्र-मंत्र-सिद्धि , भविष्यवाणी, ज्योतिष  आदि का दावा करने वालों का सार्वजनिक

  स्थल पर खुले में परदाफाश हो और फिर उनका बहिष्कार हो,

  क्योंकि उस अन्धविश्वास को सिद्धि साबित करने की चुनौती कोई भी तथाकथित

  सिद्ध स्वीकार नहीं कर सकता।        

  1.  जादूगरों के लिए यह अनिवार्य हो कि खेल शुरू होने के पहले वे घोषणा करें कि

  जादू कला और विज्ञान के संयुक्त प्रदर्शन के सिवा कुछ बहीं, जादू से कुछ भी नहीं

  किया – कराया जा सकता , वह मात्र एक खेल है,

  क्योंकि दुनिया में ऐसा कोई भी नहीं है जो जादू के प्रभाव को साबित कर सके।

  1.  भूत-प्रेत का अड्डा माने जाने वाले खण्डहरों , इमारतों आदि में मीडिया वालों द्वारा

  हाथ में कैमरा और एक रिमोटनूमा यंत्र ले कर तथाकथित नेगेटिव इनर्जी की

  तलाश  का नाटक बन्द हो ;

  क्योंकि वैसा करना अन्धविश्वास को लोकप्रिय माध्यमों से प्रचारित-प्रसारित करना

  है।  

              और भी बहुत कुछा… किंतु शेष कल…..

शराब और खानपान  

 

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (छह)

 

  1. पूरे देश में एक साथ एक बारगी ही शराबबन्दी लागू कर दी जाए। उसे राजनीतिक और

           धार्मिक मुद्दा नहीं बनने दिया जाए।

  1. ताडी को भी शराब ही माना जाए , कुछ लोगों के तुष्टीकरण के लिए ताडी को फल का

           रस कहने का छलावा न किया जाए।

  1. गैर-कानूनी रूप से शराब बनाने वाले और शराब सप्लाई करने वाले पर हत्या के प्रयास का और शराब सेवन करने वाले पर आत्महत्या के प्रयास का मुकदमा चलाया जाए।
  2. ड्रग्स सेवन परने वाले पर आत्महत्या का प्रयास करने और ड्रग्स सप्लाई करने वाले पर हत्या करने का मुकदमा चलाया जाए।
  3. उन सब के लिए यदि वर्तमान कानून में समुचित प्रावधान न हो तो आवश्यक संशोधन कर कठोर धाराएं जोडी जाएं।
  4. हर शहर की नगरपालिका दस हजार की जनसंख्या पर एक सब्जी मार्केट और

    मीट – मछली मार्केट बना कर दे, जैसा कि पटना के बोरिंग रोड चौराहा पर है।

 

 

अभी और भी बहुत कुछ … किंतु शेष कल ….!

राष्ट्र-द्रोह, राज-द्रोह और सरकार-द्रोह

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (छह)

  

  1. फांसी की सजा समाप्त हो –

    क्योंकि किसी कारणवश सजा के बाद यदि आरोप ग़लत साबित हो जाता है तो मरे हुए  

    व्यक्ति को जिन्दा करने की ताक़त किसी के पास नहीं, फिर मारने की हिमाकत क्यों?

  1. राष्ट्र-द्रोह को हत्या से भी ज्यादा संगीन अपराध घोषित किया जाए।
  1. राष्ट्र-द्रोह, राज-द्रोह और सरकार-द्रोह की परिभाषा, सजा के प्रावधानों की जानकारी सहित, सरल भाषा में मीडिया के विभिन्न लोकप्रिय माध्यमों से आम जनता को समझाई जाए।

 

आगे और भी बहुत कुछ.. .. किंतु शेष कल….. !

शादी , तलाक और संतान

 

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार (पांच)

  

  1. तीन तलाक समाप्त हो,

           – क्योंकि वह प्रथा महिला विरोधी है;

           – क्योंकि वैसे तलाक से प्रभावित बच्चों को उनके बचपना का स्वाभाविक हक

              नहीं मिल पाता; इसलिए वह प्रथा सन्तान विरोधी भी है।

           – क्योंकि वैसी तलाकसुदा औरत को उसका स्वाभाविक सम्मान समाज में नहीं

              मिल पाता , इसलिए वह प्रथा समाज विरोधी भी है;

  •   किसी भी धर्म का कोई भी प्रामाणिक ग्रंथ उसे मान्यता प्रदान नहीं करता,  

            इसलिए वह धर्मविरोधी भी है;

  •  क्योंकि वह प्रथा महिला को आदमी के बराबर होने का हक नहीं देती ,

           इसलिए वह अमानवीय भी है।

  1.    एक पत्नी या पति के जीवित रहते दूसरी शादी को अपराध घोषित किया जाए;   क्योंकि निसंत्तान को संतानोत्पत्ति के लिए,      केवल बेटी वाले को बेटा भी पैदा

             करने के लिए अथवा दैहिक सुख मात्र के लिए बहु विवाह,  दूसरी शादी

            अनैतिक और अमानवीय है;

  •  क्योंकि वैसे मामलों में जीवित पहली पत्नी की सहमति भी विवशता में दी

           गई सहमति होती है, इसलिए वैसा करना जबरदस्ती भी है;  

       3.  जिस तरह तलाक अदालत से हो,उसी तरह दूसरी शादी भी अदालत की मंजूरी से

      हो।  

        4. निर्धारित संख्या से अधिक संतानोत्पत्ति को अपराध घोषित किया जाए;

             क्योंकि सही परवरिश के अभाव में बच्चे कुपोषण व अशिक्षा के शिकार हो   

            जाते हैं; इसके लिए अतीत का उदाहरण देखने से अधिक धरती का भविष्य

            देखना जरूरी है;

        5. सरकारी सेवाओं, शासन – प्रशासन और जन प्रतिनिधित्व के लिए अधिकतम संतान

              संख्या निर्धारित हो और उसका उल्लंघन करने वालों को उसके लिए आवेदन

              का भी हक न दिया जाए और चयन के बाद भी उसका उल्लंघन करने

              वालों को तत्काल उनके पद , सेवा , प्रतिनिधित्व से हटा दिया जाए और

              आगे के लिए भी अपात्र घोषित कर दिया जाए।  और यदि किसी की

              संतानों की संख्या कानून बनने के पहले ही निर्धारित अधिकतम संख्या –

             सीमा को पार कर गई हो, उनके लिए सरकारी सेवाओं या जन-प्रतिनिधित्व

             में जाने के लिए अधिकतम उम्र सीमा निर्धारित हो।                      

       6.  जन्म, शादी, तलाक, मरण आदि सब कुछ पंजीकृत हो और उसके लिए ग्राम

              पंचायत स्तर तक मेकैनिज्म तैयार और अधिकृत हो; यानी बहु विवाह, बाल विवाह, जबरन विवाह दहेज प्रथा आदि                          अपराध घोषित किए  जाएं, तलाक कानून सम्मत हो और संतानोत्पत्ति निर्धारित संख्या में हो।    

  1.     शादी या श्राद्ध अथवा सामाजिक – धार्मिक आयोजनों में अधिकतम व्यय की

           राशि चुनाव – व्यय की भांति निर्धारित हो और वह राशि आयोजक के

           खाते में मानी जाए , उसका हिसाब उसी से लिया जाए। 

  1.      अर्थात आय के साथ – साथ व्यय पर भी कर निर्धारण हो।
  2.      भारत भूमि में रहने वाले और भारत के नागरिकों पर वे सारी बातें सभी धर्मों

           पर समान रूप से लागू हों।

  1.  ये सभी विचार कोई नये विचार नहीं हैं, हजारों सालों से इस तरह के विचार आते रहे हैं,  लेकिन अब हम अपेक्षाकृत अधिक विकसित और सभ्य सुसंस्कृत समाज में रहते हैं तथा हमने एक सुविचारित संविधान के अंतर्गत सेकुलर लोकतंत्रीय गणतंत्र अपनाया है , इसीलिए इन बिन्दुओं पर निर्णय लेने का समय आ गया है।

 

अभी और भी बहुत कुछ, किंतु शेष कल…..!

आस्था और अन्धविश्वास की सीमा-रेखा

 कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

 – ‘आस्था को ठेस पहुंचने वाला’ क्लौज कानून से समाप्त हो   –

        क्योंकि आस्था और अन्धविश्वास के बीच सीमा – रेखा खींचना असंभव है।

– सरकारी भवनों, कार्यालयों,कार्यक्रमों में पूजा-पाठ और किसी भी तरह के धार्निक अनुष्ठान की प्रथा समाप्त हो –

        क्योंकि संविधान हर व्यक्ति को स्वेच्छा से कोई भी धर्म या मतवाद मानने और उसका का अनुसरण करने की स्वतंत्रता तो देता

        है, किंतु वैसा वह अपने व्यक्तिगत स्तर पर घर – परिवार में करे , सरकारी स्तर पर सरकार में नहीं, सरकार सेकुलर है।

– धर्म-स्थलों में ही नहीं, सामाजिक कार्यक्रमों और सरकारी भवनों में भी ऊंचे बुर्ज पर लाउडस्पीकर लगा कर तेज आवाज में बजाना

       समाप्त हो –

       क्योंकि वैसा करने की आज़ादी तो है, किंतु अपनी चारदीवारी के भीतर, किसी और को असुविधा पहुंचाए वगैर, उसके लिए

        कानून में कुछ प्रावधान भी है, उन प्रावधानों का सख्ती से अनुपालन हो ।

–  सरकारी या सरकार से अनुदानप्राप्त शिक्षण संस्थानों में धार्मिक शिक्षा समाप्त हो-  

        क्योंकि सेकुलर सरकार का काम धर्म का प्रचार – प्रसार नहीं है।

–  शासन, प्रशासन के लोग और किसी भी प्रकार के संवैधानिक जनप्रतिनिधि सार्वजनिक रूप से आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में

         शामिल न हों और न ही शुभकामना संदेश भेजें,  यदि वे वैसा करते हुए पाए जाते हों तो उनका पद, सदस्यता आदि निरस्त

         कर दिया जाए –

        क्योंकि जन-प्रतिनिधि चुन लिए जाने के बाद सबके लिए समान हैं और सभी उनके लिए भी समान हैं, इसलिए समाज के

        विभाजन का कारण बनने वाले धार्मिक आयोजनों में सार्वजनिक रूप से उनकी सहभागिता विभाजन की दरार को बढा सकती

         है।

–  हज-यात्रा और मानसरोवर-यात्रा जैसे अभियानों के लिए यदि सरकारी सबसिडी दी जाती हो तो तत्काल प्रभाव से उसे समाप्त

    किया जाए,

         क्योंकि जो उनमें से किसी को भी नहीं मानते, उनके हिस्से के टैक्स के पैसों को उन अभियानों में क्यों लगाया जाए?

–  सरकार द्वारा और सरकारी अनुदान से हज भवन, मानसरोवर भवन या उस तरह का कोई भी धार्मिक भवन बनाया जाना समाप्त

     हो-

          क्योंकि अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक का तुष्टीकरण सरकारी निधि से किया जाना उन लोगों के प्रति अन्याय होगा, जो उनमें से

          किसी को भी नहीं मानते।

–  पर्यटन को बढावा देने के नाम पर धर्मिक स्थलों के निर्माण, विकास, विस्तार या रख-रखाव पर सरकारी खर्च न हो ।

–  धार्मिक स्थलों पर यदि सरकार कोई भी खर्च करती है तो सबसे पहले उन धर्मों और उनके धर्मस्थलों में जमा धन सरकारी खजाने

          में जमा हो और पूरा प्रबंध सरकार अपने हाथ में ले।

          क्योंकि विकास पर खर्च सरकार करे और उससे हुई आमदनी को धर्म के ठेकेदार रखें, ऐसा नहीं चलेगा।

–  धर्म और ईश्वर आदि व्यक्तिगत विषय हैं, उसे सार्वजनिक प्रदर्शन का तमाशा बनाने पर पाबन्दी हो-

            क्योंकि वही प्रदर्शन वर्चस्व दिखाने का हथकण्डा बन जाता है और प्रेम – मोहब्बत से रहने वाला समाज भी बंटने लगता है। –  किसी भी सार्वजनिक मंच पर किसी भी व्यक्ति को धर्मगुरू, आध्यात्मिक गुरू,  योगीराज, बाबा जी आदि जैसे संबोधन न दिए

            जाएं। यदि वह किसी संस्था का पदधारी या सदस्य हो, तो उसे उसके पदनाम से बुलाया जा सकता है-

            क्योंकि आध्यात्मिक गुरू या धर्म गुरू जैसे पद मिठाई की दूकान की रेवडी नहीं है कि जिसे चाहो, जब चाहो, जहां चाहो ,

            बांट दो।

  • भाषा और शब्दावली पर न जा कर, इसे सभी धर्मों के लिए समान समझा जाए।

 

और भी बहुत कुछ… लेकिन धीरे – धीरे …!

ईश्वर और धर्म

 

                                          कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

 

  • – ईश्वर के प्रति आस्था का कारण भय था और धर्म के प्रति विश्वास का कारण  भूख, भ्रष्टाचार व व्यभिचार।
  • फिर, भय, भूख, भ्रष्टाचार व व्यभिचार ने साथ मिल कर भेद पैदा किया।
  • भेद ने ईश्वर और धर्म को बांट कर भय, भूख, भ्रष्टाचर व व्यभिचार की चारदीवारी में बन्द कर दिया और खुद उनका पहरेदार बन बैठा।
  • फिर भय, भूख, भ्रष्टाचर और व्यभिचार ने भेद की अगुवाई में धर्म एवं ईश्वर का धन्धा शुरू कर दिया।
  • वैसे धंधेबाजों का न कोई ईश्वर है, न कोई धर्म , न आस्था, न विश्वास;
  • आस्था व विश्वास उनके धंधे के हथकण्डे हैं।
  • इसीलिए हे मनु – शतरूपा के वंशजो, आदम – हौवा की औलादो, एडम – ईव की संतानो !

 उठो, जागो,  कर्म करो और भय, भूख, भ्रष्टाचार व व्यभिचार की दीवारों को ढहा दो, भेद को समन्दर में डुबा दो या रेगिस्तान में जला दो अथवा अंतरिक्ष में विलीन करा दो , उन सबकी कैद से ईश्वर और धर्म को मुक्त कराओ, आस्था व विश्वास को संवेदनशील बनाओ ।  

 शेष कल…!

कल से आगे का शेष

 कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

  

  •     ईश-निंदा कानून समाप्त हो –
  • – क्योंकि देवी – देवता – पैगम्बर – प्रभु या ईश्वर मानने की स्वतंत्रता किसी के
       पास है तो नहीं मानने की स्वतंत्रता भी किसी के पास है;

         –  क्योंकि जब आसमान में कींचड उछाल कर कोई उसे कलुषित नहीं कर सकता  तो वैसे असंख्य आसमानों और असीमित
सृष्टियों का सृजन करने वाला सर्जक 
  किसी के कृत्य से कैसे निंदित या कलुषित हो सकता है?  

  • क्योंकि जो अजन्मा है, अजर-अमर है, अगोचर, असीम है, अपरम्पार है, सर्वज्ञाता, सर्वशक्तिमान , सर्वविद्यमान है, अनिंद्य है; उसकी निंदा करने की क्षमता माटी का पुतला कहे जाने वाले किसी इंसान में कैसे हो सकती है?
  • क्योंकि ‘ईश-निंदा’ जैसे शब्द की खोज करने वाला या वैसे शब्द का प्रयोग करने वाला खुद ईश के प्रति सही नज़रिया व्यक्ति प्रतीत नहीं होता ।
  • क्योंकि वैसे शब्द का प्रयोग कर किसी को दण्डित कराने की मंसा रखने वाला व्यक्ति स्वयं असीम को सीमित समझने व समझाने की धृष्टता करता प्रतीत होता है।
  • क्योंकि निंदित या कलुषित तो हम जैसे तुच्छ प्राणियों की फितरत है, ईश उस दायरे में कैसे आ सकता है?  

 

          आगे और भी बहुत कुछ .. लेकिन … शेष कल ..!

कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

                                 कोई पूर्वग्रह नहीं, केवल विचार

एक राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक में आज छपी खबर के अनुसार गाज़ियाबाद स्थित प्राचीन देवी मंदिर के महंत व हिन्दू स्वाभिमान के राष्ट्रीय अध्यक्ष यति नरसिंहानन्द ने कहा है कि देश और प्रदेश में ‘हिन्दुओं की सरकार’ है, फिर भी हिन्दू समाज पर हो रहे जुल्मों में कोई कमी नहीं आई है, इसलिए वे इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे , उनका यह बयान हनुमान यात्रा निकालने के दौरान की गई पुलिस कार्रवाई के विरोध में आया है।  
धर्म-परिवर्तन उनका व्यक्तिगत मामला है, जहां चाहें, जब चाहें, जैसे चाहें , जाएं। तथाकथित पुलिसिए जुल्म का बखान उन्होंने नहीं किया । अमनचैन और कानून – व्यवस्था  बनाए रखना पुलिस की ड्यूटी है, अगर शांति बनाए रखने के लिए पुलिस ने कोई कार्रवाई की होगी तो वह हिन्दुओं पर जुल्म कैसे है ? महंत जी ने खुलासा नहीं किया है। क्या वे चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश की पुलिस उनके मठ में जा कर उन्हीं से आदेश ग्रहण करे , तब कानून का राज कहलाएग , वरना नहीं?
मेरा सरोकार उन सब बातों से नहीं है।
मैं तो केन्द्र और उत्तर प्रदेश सरकार से केवल इतना पूछना चाहता हूं कि क्या केन्द्र और प्रदेश में ‘हिन्दुओं की सरकार’ है ? यदि हां, तो वह भारत के संविधान के विरुद्ध है। यदि  नहीं, तो भारत के संविधान का अपमान करने के लिए उक्त महंत जी को तत्काल गिरफ्तार किया जाए और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया जाए।
शेष कल … !
“अमन” श्रीलाल प्रसाद

चम्पारण सत्याग्रह के सौ वर्ष

चम्पारण सत्याग्रह के सौ वर्ष

मोहन से महात्मा और बापू से राष्ट्रपिता होने की कथा

 

चम्पारण की धरती ने मिथिला की बेटी और अयोध्या की बहू को माता का मान दिया, यहीं जनक नन्दिनी जानकी जगत जननी बनीं , यहीं है वाल्मीकि आश्रम, उसके पूरब में जनकपुर और पश्चिम में अवधपुर।

चम्पारण की धरती ने मोहन को महात्मा का सम्मान दिया, यहीं बापू से राष्ट्रपिता का मार्ग प्रशस्त हुआ, यहीं है बापूधाम मोतीहारी , यहीं है कस्तूरबा ग्राम भीतिहरवा।     

 नील के तीन कठिया किसान राज कुमार शुक्ल की कातर पुकार पर गांधी जी कलकत्ता से पटना होते हुए 15 अप्रैल 1917 को तिरहुत कमिशनरी के मुख्यालय मुज़फ्फरपुर पहुंचे थे और उसके कुछ दिनों बाद चम्पारण जिला के मुख्यालय मोतीहारी; वहीं जुल्म के खिलाफ एक आवाज़ बन कर गांधी ने आवाज़ दी, वहीं सत्य अहिंसा और सत्याग्रह की उपजाऊ जमीन तैयार मिली । 

 गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में मुज़फ्फरपुर या चम्पारण पहुंचने की कोई तारीख नहीं लिखी है, किंतु ‘गांधी की कहानी’ लिखने वाले लुइ फ़िशर ने 15 अप्रैल 1917 को रात 12 बजे मुज़फ्फरपुर स्टेशन पहुंचने की तारीख लिखी है; हालांकि केन्द्र और बिहार सरकार के कार्यक्रमों की रपट से मालूम होता है कि निलहे अंग्रेज जमीन्दारों के एसोसिएशन के सेक्रेटरी विल्सन से गांधी जी ने 11 अप्रैल को बात की थी और उनकी वह बातचीत मुज़फ्फरपुर में हुई थी। इसलिए तारीखों की प्रमाणिकता पर मेरी कोई टिप्पणी नहीं है।

 जब मुज़फ्फरपुर में एक सरकारी कॉलेज के प्रिंसिपल प्रो. कृपलानी ने गांधी जी का स्वागत करने के लिए नौकरी छोड दी थी और खुद का कोई एक कमरा भी न होने के कारण प्रो. मल्कानी के घर गांधी जी को ठहराया था और जब उस खबर को पा कर चम्पारण के किसान अपना दुखडा सुनाने के लिए वहां जमा होने लगे थे और जब उनकी दर्दभरी  दास्तान सुन कर गांधी जी उनका दुख देखने – समझने के लिए मोतीहारी पहुंचे थे और जब सभी लोग अपना दुखडा उस आदमी को सुनाने लगे थे , जिसके पास न तख्त था, न ताज था, न शासन की सत्ता थी , न प्रशासन का बल, तो क्या वह दृश्य वैसा ही नहीं रहा होगा , जैसे परदेस गया कोई आदमी बहुत दिनों के बाद अपने गांव – घर लौटता है तो उसके बच्चे दौड कर उसे चारों तरफ से घेरे लेते हैं और रो – रो कर बतलाने लगते हैं कि मोहल्ले के किस बदमाश बच्चे ने उन्हें कितना मारा, कैसे मारा, क्यों मारा ? कहां से वह यकीन आया लोगों के मन में, कैसे वह विश्वास पैदा हुआ , बदमाशों को ललकारने की हिम्मत कहां से आई, कि अब मेरे पिता जी आ गए हैं, बहुत मार लिए, अब तो मार कर दिखाओ ; तो, क्या मोहन से महात्मा और बापू से राष्ट्रपिता बनने का मार्ग उसी विश्वास, उसी यकीन और उसी हिम्मत से वहीं प्रशस्त नहीं हुआ? तो क्या जुल्म के खिलाफ जोरदार जानदार धारदार शानदार कामयाब आवाज उठाने का प्रस्थान बिन्दु वही नहीं है? तो क्या जुल्म का बदला जुल्म से न ले कर केवल अपना वाजिब हक लेने का अहिंसक सत्याग्रह वहीं साकार नहीं हुआ? क्या यह अकारण है कि गांधी जी ने अपनी आत्मकथा में लिख दिया – “ सच पूछिए तो मुझे वहीं उन लोगों में ही ईश्वर सत्य और अहिंसा के दर्शन हुए ” ? तो, क्या देश की धरती की धूल में ही भक्ति नज़र नहीं आई, तो क्या मिट्टी में सने किसानों में ही भगवान के दर्शन नहीं हुए, तो क्या देश का समग्र स्वरूप वहीं उपस्थित नहीं हो गया ? तो क्या उन देशवासियों की सेवा में ही देशभक्ति गंगा अवतरित नहीं हुई?           

       मैं पूरे यकीन के साथ यह नहीं कह सकता कि ईश्वर है या नहीं, क्योंकि मैं आस्थावानों की आस्था को आहत करना नहीं चाहता और उसे नहीं मानने वालों से कोई अपील भी नहीं करना चाहता, लेकिन यदि वह है और सब कुछ वही करता है तो मैं कृतज्ञ हूं उसका , जिसने मुझे इस लायक बनाया कि मैं अपनी भावनाओं को शब्द दे सकूं,  इसीलिए मैं पूरे यकीन के साथ यह कह सकता हूं कि जिस तरह ईश्वर को काबा, कैलाश , मंदिर, मस्जिद, गिरिजा या गुरूद्वारा जैसे तीर्थ स्थानों में ही नहीं , जन-जन और कण-कण में कभी भी, कहीं भी व किसी भी रूप में ढूंढा जा सकता है,  बशर्त उसे पाने की ललक में उसके बहाने कुछ और पाने की सनक शामिल न हो, ठीक उसी तरह देशभक्ति व वतनपरस्ती को साबित करने के लिए क्रांतिकारी बलिदानियों की तरह फांसी पर झूलने या स्वतंत्रता सेनानियों की तरह जेल जाने के अवसर का इंतजार करना जरूरी नहीं है, क्योंकि वो दौर कुछ और था, ये दौर कुछ और है । अब तो उन शहीदों व स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों को साकार करने के लिए हमें केवल अपने कर्त्तव्यों को ईमानदारी और निष्ठा से पूरा करना है , निजी हितों से समाज-हितों को ऊपर रखना है और राष्ट्रीय सम्पत्ति को वैयक्तिक स्वार्थसिद्धि का साधन नहीं बनने देना है।

  तो, क्या अब देशभक्ति सिद्ध करने के लिए मौका हर कदम पर मौजूद नहीं है ? क्या क्रांति की सरजमीं हमेशा दुश्मनों के खून से लाल ही होती है? क्या वह अपनों के पसीने से तर ब- तर हो कर लहलहाती फसलों से मालामाल नहीं होती ? क्या क्रांति की हवाओं में हमेशा गोले बारूद का जहरीला धुआं ही फैलता है? क्या कल-कारखानों से निकलता हुआ धुआं खुशहाली का बादल बन नहीं बरसता?  क्या इंकलाब के आसमां में हमेशा जांबाज वाज़ ही परवाज़ भरते हैं ? क्या आज़ादी वो अपनापन का पैगाम ले अमन के परिंदे भी पर नहीं तोलते ? क्या सवालों के सैलाब में जवाबों के ज़ज़ीरे खुद ब खुद निकल नहीं आते , कभी राज्य क्रांति बन कर तो कभी सिपाही क्रांति बन कर ,  कभी अहिंसा और सत्याग्रह क्रांति के रूप में तो कभी अवज्ञा और असहयोग क्रांति के वेश में, कभी सम्पूर्ण क्रांति का झण्डा उठा कर तो कभी सर्वोदय व भूदान का झोला फैला कर , कभी हरित क्रांति की चादर बिछा कर और श्वेत क्रांति की नदियां बहा कर तो कभी नीली व पीली क्रांति की फलियां उगा कर,  और अब , अब जरूरत है शब्द क्रांति की, केवल शब्द बोने की और शब्द की फसल काटने की ,  देश के दामन पर दाग़ लगाने वाले राष्ट्रीय स्वाभिमान में वाधक घातक हर आदमी के खिलाफ शब्द उछालने की ।

           अक्षर ब्रह्म है, शब्द ब्रह्म है, नाद ब्रह्म है आदि आदि; मैं ऐसे भारी भरकम मीमांसा-वाक्यों में आप को उलझाना नहीं चाहता, मैं तो सीधी – सादी बात बोलना चाहता हूं कि शब्दों का उपयोग आप शस्त्र  के रूप में करें , शर्त केवल इतनी है कि आप के शब्द स्वार्थ सिद्धि के साधन मात्र न हों, आप के शब्द आप की आत्मा की आवाज़ हों, आप अपने शब्दों में समा कर बाहर निकलें , शब्द आप में आत्मसात हो कर निकले, आप के शब्दों में आपका आचरण हो, आपका आचरण भी शब्दवान हो  अर्थात अपने शब्दों के प्रति आप ईमानदार हों निष्ठावान हों , समर्पित हों यानी आप शब्द परायण हों, आप अपने शब्दों को जीएं , फिर देखिए, वे शब्द किस तरह ब्रह्मास्त्र का काम करते हैं । आखिर गांधी ने वही तो किया था , शब्दों को आचरण में ढाला था और आचरण को शब्दों में पिरोया था, शब्दाग्रह किया था अर्थात शब्द-शस्त्र का प्रक्षेपण व प्रहार किया था, वही तो सत्याग्रह था ।

        बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि आज देश – दुनिया में टकराव और असहिष्णुता का माहौल है, एकतरफा संवाद चल रहा है, ऐसे में गांधीवादी देश को दिशा दें, बताएं कि देश को किस दिशा में जाना चाहिए, आज के संदर्भ में क्या एजेंडा होना चाहिए।  दरअसल, यह सवाल हरेक देशवासी के जहन में आना चाहिए, प्रत्येक देशभक्त भारतीय के मन – मस्तिष्क में कौंधना चाहिए, हर वतनपरस्त हिन्दुस्तानी के दिल में उठना चाहिए; अगर नहीं उठा है वह सवाल अब तक, तो उठाइए, पूछिए, खुद से पूछिए, दूसरों से पूछिए, अपने सामने वालों से पूछिए, पीछे वालों से पूछिए, दाएं और बाएं के बगलगीरों से पूछिए, सभी देशभक्तों से पूछिए , देशवासियों से पूछिए , क्योंकि देशभक्त कोई भी कहीं भी और कभी भी हो सकाता है ।   

  क्योंकि, देशभक्ति केवल वे ही नहीं करते जो बर्फीली पहाडियों या उबलते रेगिस्तानों में सरहदों की रक्षा करते हुए संगीनों के साये में जिन्दगी गुजारने वाले सेना के जवान हैं , देशभक्ति वे भी करते हैं जो उन जवानों को रसद पहुंचाने के लिए मूसलाधार बारिशों या चिलचिलाती धूप अथवा हड्डियों को गला देने वाली कंपकपाती ठंढ में थरथराते हाथों से खेतों में हल चलाने वाले किसान हैं और देशभक्ति तो वो बहू बेटियां  व माताएं-बहनें भी करती हैं जो उन किसानों के लिए रोटियां सेंकने में अपनी जिन्दगी के हसीन लम्हों को जला डालती हैं या जो उन जवानों को निश्चिंत होकर अपना फर्ज़ अदा करने देने के लिए अपनी चूडियों की खनक को अनसुना कर देती हैं, अपने हाथों की मेहंदी व पांवों के महावर को बेडियां नहीं बनने देतीं अथवा अपनी मांग, अपनी कोख और अपनी कलाइयां सूनी होने का गम उन तक पहुंचने नहीं देतीं;  देशभक्ति हम भी करते हैं जो सुबह से शाम तक घरों या दफ्तरों में पूरी ईमानदारी और निष्ठा से अपनी ड्युटी करते हैं। वैसे ही, जन गण मंगल के लिए मंगल तक को नाप लेने वाले अनुसंधानों में , खेतखलिहानों में, कल-कारखानों में, हाट-बाजारों में या नदी- नालों में वतन की खातिर पूरी संजीदगी से अपने काम को अंजाम देने वाले लोग भी उतने ही देशभक्त हैं, जितने कि ये जवान, ये किसान या हम। ये सभी लोग प्राणों की आहुति दे कर आज़ादी हासिल कराने वाले क्रांतिकारी बलिदानियों और तन-मन-धन व सारा जीवन होम कर देने वाले स्वतंत्रता संग्रामियों के सपनों को साकार करने में साझीदार हैं , उनके तप त्याग से प्राप्त स्वाधीनता को बरकरार रखने और मजबूत बनाने में मददगार हैं, सवाल उठता है कि आप इन में से कौन हैं, क्या हैं, क्यों हैं, कहां और कैसे हैं?

   आइए, चम्पारण सत्याग्रह की 100वीं वर्षगांठ पर हम अपने गिरेवान में झांकें, अपने ज़मीर को टटोलें,  अपने ईमान से पूछें , यदि सबके सामने नहीं तो घर में अकेले में ही आदमकद आईना के सामने खडे हो कर अपनी ही आंखों में आंखें डाल कर खुद से यह सवाल पूछें कि क्या एक भी दाना हमने ऐसा खाया जो हमने कमाया नहीं था ? ऐसा कोई एक भी पैसा अपने लिए खर्च किया जो हमारी मेहनत से अर्जित नहीं था?  क्या ऐसा कुछ भी अपने लिए उपयोग किया, जिस पर नैतिक या कानूनी हक नहीं था ? क्या स्वार्थ के लिए अपने अधिकारों का उपयोग किया ? क्या किसी के जायज हक को दरकिनार करा कर अपने नाजायज हित को ऊपर करने के लिए अपने पॉवर , पैसा या पैरवी का दुरूपयोग किया ? उत्तर यदि ना है तो आप भी देशभक्त हैं, उत्तर यदि हां है तो आप भी देशद्रोही हैं, देशभक्ति या देशद्रोह को मात्रा में आंकने की प्रवृत्ति खुद को छलावा देने के साथ-साथ राष्ट्र को धोखा देना और मानवता को शर्मसार करना है।     

   अच्छा बनने, अच्छाई को समर्थन देने और बुराई का विरोध करने की सीख दुनिया का हर धर्म देता है, हो सकता है कि आप समाज और राजनीति, साहित्य और संस्कृति, सरकारी अर्धसरकारी गैरसरकारी निजी सेवाओं या कारबार से जुडे व्यक्ति हों अथवा इन सबसे अछूता धर्म ही कर्म हो आपका, तब भी यह सवाल उठेगा कि क्या सच कहने का साहस आप रखते हैं, सच सुनने का धैर्य आप के पास है, बुराई का विरोध करने की हिम्मत आप जुटा पाते हैं ?  कहीं कोउ नृप होई हमार का हानि वाली सोच से त्रस्त तो नहीं हैं आप, कहीं क्या करें, बडों का दबाव थाजैसी हीन भावना और ब्यर्थ के बहानों से ग्रस्त तो नहीं हैं आप ? “अकेला चना भांड नहीं फोड सकताजैसे पराजित भाव-बोध के शिकार तो नहीं हैं आप ? 

याद रखिए, आज की समस्याओं के समाधान की शक्ति गोले –  बारूद या बन्दूकों में नहीं, शब्द की शमशीर में है। आज वक्त है शब्दक्रांति का, आवाज़ उठाने का, ये मत सोच कि आवाज़ उठाने से क्या हासिल होगा ? तुम ठीक समय पर , ठीक तरह से, ठीक ठीक आवाज़ दो, ठोस ठोस परिणाम ठोक ठोक के मिलेंगे। इसीलिए दूसरी, तीसरी या चौथी आज़ादी की चाहत के पहले अपने ज़मीर को जगा, क्योंकि जगा हुआ ज़मीर न बुज़दिल होता है, न गुलाम। नेता जी ने कहा था – “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” , मैं कहता हूं- तुम ग़लत की खिलाफत और सही की हिफाज़त में आवाज़ दो, तुम्हारा जमीर खुद ब- खुद आज़ाद हो जाएगा।  

   तो, आ ! देशभक्तो आ! ! वतनपरस्तो आ ! देशभक्तों की हिफाज़त में बोल, देशद्रोहियों की खिलाफत में बोल, दमदार मददगार ईमानदार आवाज़ उठा, अपने देशभक्त होने का सबूत दे , देश की आवाज़ बोल, देश की आवाज़ सुन, देश की आवाज़ लिख ; वक्ता है तो बोल कर लिख, गूंगा है तो लिख कर बोल, बहरा है तो देख कर सुन ! अंधा है तो सुन कर देख ! क्योंकि  शब्द-शस्त्र के अद्भुत अद्वितीय अभूतपूर्व अविस्मरणीय आत्माभिमानी आविष्कारक राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के चम्पारण सत्याग्रह का यह शताब्दी वर्ष है और आज सर्वशक्तिमान शस्त्र – अस्त्र शब्द ही है। लेकिन हां, शब्दों का चयन सावधानी से हो, वरना हमने एक शब्द से जनतंत्र का युद्ध हारते हुए और दो शब्दों से जीतते भी देखा है । इसलिए जब प्रधानमंत्री जी ने गांधी जी के सत्याग्रह के बाद ‘स्वच्छाग्रह’ कहा है तो मैं ‘शब्दाग्रह’ कह रहा हूं, क्योंकि ‘स्वच्छाग्रह’ भी तो एक शब्द ही है, जिसे गांधी और कस्तूरबा ने चम्पारण में साकार किया था, तो अब जरूरत है ‘शब्दाग्रह’ की यानी कहे गए हर शब्द को साकार करने की, यह पहल जरूरी है।      

 

         तभी तो, मैं, जब कभी भी दुविधा या कठिनाइयों में होता हूं, गांधी की आत्मकथा पढता हूं, मोहन से महात्मा तक का सफ़र समझ में आ जाता, बापू से राष्ट्रपिता तक की यात्रा का हर मार्ग शीशे – सा पारदर्शी हो जाता है और फिर न कोई दुविधा रह जाती है , न कठिनाई।  

 

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

… चम्पारण सत्याग्रह शताब्दी वर्ष में प्रकाश्य मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” से ..

 

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