मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” से


जानकीवल्लभ शास्त्री और

महान  फिल्मकार पृथ्वीराज कपूर

 

बात 1975 में इमर्जेंसी लगने के ठीक एक माह पहले की है। गुरूदेव प्रो. रामाश्रय प्रसाद सिंह की बेटी और मेरे भ्रातृवत मित्र राकेश कुमार सिंह की बहन रम्भा कुमारी की शादी मोतीहारी एसएनएस कॉलेज के प्रोफेसर राजेश्वर प्रसाद सिंह से हो रही थी। बारात 24 मई 1975 को आई थी।

गुरूदेव ने हिन्दी और संस्कृत के प्रकाण्ड पंडित महाकवि जानकीवल्लभ शास्त्री को भी आमंत्रित किया था। शास्त्री जी के विश्राम आदि का प्रबंध मोतीहारी रेलवे स्टेशन के विश्रामालय के एक विशिष्ट कक्ष में किया गया था। गुरूदेव ने मुझसे कहा था – “ तुम स्वयं कवि हो, कवियों की संवेदनशीलता को अच्छी तरह समझते हो, शास्त्री जी महाकवि हैं, अति संवेदनशील व्यक्ति व रचनाकार हैं और तुम उनसे परिचित भी हो , इसीलिए उनके आतिथ्य का उत्तरदायित्व तुम्हीं सम्भाल सकते हो”,  सो, शास्त्री जी के आने से ले कर दूसरे दिन उनके विदा होने तक मैं हमेशा उनके साथ रहा।

आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री मुज़फ्फरपुर आरडीएस कॉलेज में प्रोफेसर तो थे ही, हिन्दी और संस्कृत के विश्वप्रसिद्ध महाकवि भी थे , कुछ साल पहले प्रसिद्ध फिल्मकार एवं कलाकार पृथ्वीराज कपूर शास्त्री जी से मिलने मुज़फ्फरपुर आए थे। पिछले साल मैं भी शात्री जी से मिलने मुज़फ्फरपुर चतुर्भुज स्थान स्थित उनके ‘निराला निकेतन’ नामक आवास पर गया था। उनके परिवार में 15 से 20 सदस्य थे, एक तो वे खुद, एक उनकी पत्नी और शेष सदस्यों में कुछ कुत्ते, कुछ बिल्लियां और कुछ नेवले थे, बस, प्रकृति और जीव – जगत का यही अनोखा दृश्य उनके परिवार में था। उस विलक्षण व्यक्तित्व के धनी शास्त्री जी का सान्निध्य पाने का और उनसे चर्चा करने, कविता की बारीकियों को समझने एवं एक महाकवि की दिनचर्या के माध्यम से उनके व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचित होने का मेरे लिए वह एक दुर्लभ अवसर था।

मैंने शास्त्री जी से बातचीत के दौरान उनकी कई कविताओं की चर्चा की, साथ ही, 1972 में मोतीहारी टाउनहॉल के मैदान में आयोजित एक अखिल भारतीय कवि सम्मेलन में मंच संचालक प्रसिद्ध कवि दिनेश भ्रमर द्वारा उन्हें काव्यपाठ के लिए आमंत्रित करते समय ‘ स्वर्गीय जानकीवल्लभ शास्त्री’ कह कर आमंत्रित किए जाने की अंतर्कथा की भी चर्चा की। शास्त्री जी ने हंसते हुए बताया था –“ लोगों को लगा होगा कि दिनेश ने मेरे ऊपर व्यंग्य किया था, लेकिन वास्तव में मेरे प्रति अतिशय सम्मान प्रदर्शित करने के व्यामोह में भूलवश वह वैसा बोल गया था। दिनेश ने मुझसे तुरंत क्षमा भी मांग ली थी”।

शात्री जी ने बडे बेलौस अन्दाज में अपने बचपन और यौवन के कुछ संस्मरण भी सुनाये। उन्होंने कहा – “ जब मैं जवान था और पैसों की सख्त जरूरत थी, तब मेरे पास पैसे नहीं थे। आज, जब मैं बूढा हो रहा हूं और पैसों की कोई खास जरूरत नहीं रह गई है , तो मेरे पास पैसे हैं, इसीलिए इन पैसों की मैं खूब इज्जत करता हूं, इनकी खूब  खातिरदारी करता हूं और इनका सदुपयोग कर इन्हें खूब सम्मान देता हूं, इन पैसों से अपने परिवार का पालन –पोषण करता हूं, मेरे घर तो तुम गए हो ‘अमन’, देखा होगा तुमने ? इन पैसों से मैं अपने कुत्तों, बिल्लियों और नेवलों को खिलाता हूं ” ।

अंतिम वाक्य कहते – कहते शास्त्री जी के होठ व्यंग्य में भिंच गए थे। मैंने तुरंत बात का रूख बदलते हुए कहा कि कुछ साल पहले पृथ्वीराज कपूर साहब आप से मिलने आए थे , कुछ उनके साथ का संस्मरण सुनाएं । शास्त्री जी ने कहा – “पृथ्वीराज कपूर मेरे व्यक्तिगत मित्र रहे थे, वे एक चिंतक कलाकार थे और जितने अच्छे कलाकार थे, उससे बेहतर इंसान थे। वे मेरी एक रचना पर फिल्म बनाना चाहते थे। मैं जब भी बम्बई जाता था, उन्हीं के पास ठहरता था। उनके तीनों बेटों में से शशि ( मशहूर अभिनेता शशि कपूर) से मेरी ज्यादा बनती है, राज ( राज कपूर साहब) की दिनचर्या अलग तरह की है, शम्मी (शम्मी कपूर साहब) भी अपने में व्यस्त रहता है, शशि मुझे ज्यादा समय देता है”।

मैंने कहा कि जिस तरह द्रोणाचार्य एकलव्य के गुरू थे, वैसे ही आप मेरे काव्य गुरू हैं, मेरा निवेदन है कि आप अपने हाथों से मेरी डायरी पर कोई जीवन – मंत्र अंकित कर दें। शास्त्री जी ने लिखा दिया –

                     जीना भी एक कला है।

कितनी साधें हों पूरी ? तुम रोज बढाते जाते ,

कौन तुम्हारी बात बने ? तुम बातें बहुत बनाते !

माना, प्रथम तुम्हीं आए थे, पर इसके क्या मानी ?

उतने तो घट सिर्फ तुम्हारे, जितना नद में पानी !

 और कई प्यासे, उनका भी सूखा हुआ गला है !

                                            जीना भी एक कला है!  

शास्त्री जी द्वारा मेरी डायरी में 24 मई 1975 को अंकित उनकी वह कविता आज भी मेरे पास वैसे ही सुरक्षित है। सचमुच, वह कविता मेरा जीवन – मंत्र बन गई है। इस कविता में जीवन जीने को एक कला बताते हुए समन्व व सामंजस्य साधने का मंत्र है, जिसे मैंने अपना जीवन – दर्शन बना लिया है।

***

संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

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संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

ज्ञानी पुरूष पूरे जीवन को आत्मा का संक्रमण काल कहेंगे और उनसे ऊंचे दर्जे के आध्यात्मिक महा ज्ञानी पूरी सृष्टि को सृजन की संक्रांति कहेंगे।

मेरे जैसे सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को छोटी – छोटी बातों की ही समझ नहीं है, तो फिर उस महा ज्ञान की बात कैसे करूं?

मां की कोख से जब मैं धरती पर आ रहा था, अभी आ नहीं पाया था, किंतु यात्रा शुरू हो गई थी, उस वक्त मैं कैसा अनुभव कर रहा था, आज तक नहीं समझ पाया। शायद उसी तरह मैं उस अनुभव को भी नहीं बांट पाऊंगा , जब मेरा जीवन जा रहा होगा और मेरी मौत आ रही होगी, उस संक्रमण काल में मैं क्या व कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, वह अकथ ही रह जाएगा। शायद इन्हीं दो संक्रांतियों का नाम जीवन और मरण है!

मां की अनुभूति की तो समझ आ गई मुझमें , मेरे दुख से दुखी और मेरे सुख से सुखी होने वाली मां की मुख-मुद्रा देख कर मैं समझ गया हूं कि मेरे आने के समय उसके तन का कष्ट और मन का हर्ष मिल कर कैसा अश्रुपूरित आनन्दमय भाव का सृजन कर रहे होंगे मेरी मां के मुखमंडल पर !  प्रसूती गृह के बाहर दरवाजे पर चहलकदमी करते हुए मेरे बाबू जी के मन में कैसी उल्लासमयी हलचल मची होगी, उसका अनुभव भी मैं कर चुका हूं , परंतु मैं स्वयं कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, उसकी अनुभूति मुझे अभी तक नहीं हो पाई है।

मैं कई बार मरा हूं लेकिन ऐसी मौत कभी नहीं आई, जिसके बाद जीवन न मिला हो, यानी जीवन शास्वत है! केवल कायर ही बार – बार नहीं मरते, कायरों को कायर बताने का साहस करने वाले भी बार – बार मरते हैं, फर्क बस, इतना है कि कायर बार – बार केवल मरते ही हैं,  जीते कभी नहीं, जबकि साहसी लोग जितनी बार मरते हैं, उससे ज्याद बारा जीते हैं अर्थात उन्हें जीने और मरने का अनुभव होता है, किन्तु कायरों को न जीने का ज्ञान होता है और न मरने का भान, उनके लिए तो वे दोनों क्रियाएं व्यसन मात्र होती हैं।

दिन जा रहा होता है और रात आ रही होती है, परंतु न तो दिन ढल गया होता है और न रात आ गई होती है, उसे गोधूली वेला कहते हैं, उसके उलट जब रात जा रही होती है और दिन आ रहा होता है, परंतु न तो रात ढल पाई होती है और न ही दिन आ पाया होता है, उसे ब्राह्मवेला कहते हैं। मुझे दोनों ही वेलाओं में सूरज के मुखमंडल पर लाली ही दिखती है, बिल्कुल एक जैसी !

तो फिर, मंदिरों में प्रर्थनाएं किसलिए, मस्जिदों में अजान किसलिए, गुरूद्वारों में अरदास किसलिए. गिरिजा में कंफेशंस किसलिए? क्या ये गैर जरूरी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। सभ्यता की दौड में ये सभी हमारी जरूरत बन गए; संयम और अनुशासन के लिए, जीवन की स्वाभाविक गति व लय बनाए रखने के लिए , दूसरों का दर्द समझने के लिए , अपन हर्ष बांटने के लिए, खुद को सुधारने के लिए। मगर जब उन सबके नाम पर ही संयम के बदले अहंकार और क्रूरता आने लगे, अनुशासन के बदके उच्छृंखलता व उदंडता आने लगे, दूसरों का दर्द समझने के बदले दूसरों को दर्द दिया जाने लगे, अपना हर्ष बांटने के बदले ईर्ष्या, नफरत व स्वार्थ का बाज़ार सजाया जाने लगे, खुद को सुधारने के बदले दूसरों को सुधारने का ठेका लिया – दिया जाने लगे , तो ? संभव है कि वैसे महान लोगों को मां की कोख और धरती की छाती के बीच का वह संक्रमण उनकी समझ में आ गया हो! क्या सचमुच !!

तो क्या उन सब की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी? हां, कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, सिवाय एक जरूरत के, मां की कोख से निकलने पर जिस धरती ने हमें धारण किया, केवल वही हमारी जरूरत रह जाएगी ताकि हम जमीन पर अपने पांव टिका कर आकश की ओर देख सकें। इसे धर्म कह लें, भक्ति कह लें, मातृभूमि के प्रति प्रेम कह लें , देशभक्ति कह लें, कुछ भीकह्लें,  कुछ भी न कहें, कोई फर्क नहीं पडता।

तो क्या सबसे ऊपर यही है?  जी हां, कम से कम मेरे लिए तो किसी भी धर्म, भक्ति, आध्यात्म, देव , ईश्वर आदि से बढ कर मेरी यह धरती है , मेरा यह देश है, देवालयों में लहराने वाले ध्वजों से बढ कर फहराता हुआ यह तिरंगा है, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरिजा या किसे भी देवालय के लिए मैं एक ईंट भी न लगाऊं, परंतु अपनी धरती, अपने देश के लिए अपने खून का एक – एक कतरा और अपनी हड्डियों का एक-एक कण तक को विसर्जित करने को तैयार बैठा हूं। शायद मेरी यह सोच मां की कोख और धरती की गोद के बीच की संक्रांति समझने की क्रिया हो !

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

संक्रमण और संक्रांति

संक्रमण और संक्रांति

जहां हैं, वहां से चल कर, जहां पहुंचना है, वहां पहुंचने की क्रिया को ही संक्रमण या संक्रांति कहते हैं, और उसके बीच की अवधि को संक्रमण काल।

ग्रह नक्षत्रों की चाल समझने वाले मकर संक्रांति, सूर्य की उत्तरायण व दक्षिणायण स्थिति , चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि बताते हैं, मगर क्या उन्हें अपने संक्रमण काल के अनुभव का स्मरण है?

ज्ञानी पुरूष पूरे जीवन को आत्मा का संक्रमण काल कहेंगे और उनसे ऊंचे दर्जे के आध्यात्मिक महा ज्ञानी पूरी सृष्टि को सृजन की संक्रांति कहेंगे।

मेरे जैसे सामान्य बुद्धि के व्यक्ति को छोटी – छोटी बातों की ही समझ नहीं है, तो फिर उस महा ज्ञान की बात कैसे करूं?

मां की कोख से जब मैं धरती पर आ रहा था, अभी आ नहीं पाया था, किंतु यात्रा शुरू हो गई थी, उस वक्त मैं कैसा अनुभव कर रहा था, आज तक नहीं समझ पाया। शायद उसी तरह मैं उस अनुभव को भी नहीं बांट पाऊंगा , जब मेरा जीवन जा रहा होगा और मेरी मौत आ रही होगी, उस संक्रमण काल में मैं क्या व कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, वह अकथ ही रह जाएगा। शायद इन्हीं दो संक्रांतियों का नाम जीवन और मरण है!

मां की अनुभूति की तो समझ आ गई मुझमें , मेरे दुख से दुखी और मेरे सुख से सुखी होने वाली मां की मुख-मुद्रा देख कर मैं समझ गया हूं कि मेरे आने के समय उसके तन का कष्ट और मन का हर्ष मिल कर कैसा अश्रुपूरित आनन्दमय भाव का सृजन कर रहे होंगे मेरी मां के मुखमंडल पर !  प्रसूती गृह के बाहर दरवाजे पर चहलकदमी करते हुए मेरे बाबू जी के मन में कैसी उल्लासमयी हलचल मची होगी, उसका अनुभव भी मैं कर चुका हूं , परंतु मैं स्वयं कैसा अनुभव कर रहा होऊंगा, उसकी अनुभूति मुझे अभी तक नहीं हो पाई है।

मैं कई बार मरा हूं लेकिन ऐसी मौत कभी नहीं आई, जिसके बाद जीवन न मिला हो, यानी जीवन शास्वत है! केवल कायर ही बार – बार नहीं मरते, कायरों को कायर बताने का साहस करने वाले भी बार – बार मरते हैं, फर्क बस, इतना है कि कायर बार – बार केवल मरते ही हैं,  जीते कभी नहीं, जबकि साहसी लोग जितनी बार मरते हैं, उससे ज्याद बारा जीते हैं अर्थात उन्हें जीने और मरने का अनुभव होता है, किन्तु कायरों को न जीने का ज्ञान होता है और न मरने का भान, उनके लिए तो वे दोनों क्रियाएं व्यसन मात्र होती हैं।

दिन जा रहा होता है और रात आ रही होती है, परंतु न तो दिन ढल गया होता है और न रात आ गई होती है, उसे गोधूली वेला कहते हैं, उसके उलट जब रात जा रही होती है और दिन आ रहा होता है, परंतु न तो रात ढल पाई होती है और न ही दिन आ पाया होता है, उसे ब्राह्मवेला कहते हैं। मुझे दोनों ही वेलाओं में सूरज के मुखमंडल पर लाली ही दिखती है, बिल्कुल एक जैसी !

तो फिर, मंदिरों में प्रर्थनाएं किसलिए, मस्जिदों में अजान किसलिए, गुरूद्वारों में अरदास किसलिए. गिरिजा में कंफेशंस किसलिए? क्या ये गैर जरूरी हैं? नहीं, बिलकुल नहीं। सभ्यता की दौड में ये सभी हमारी जरूरत बन गए; संयम और अनुशासन के लिए, जीवन की स्वाभाविक गति व लय बनाए रखने के लिए , दूसरों का दर्द समझने के लिए , अपन हर्ष बांटने के लिए, खुद को सुधारने के लिए। मगर जब उन सबके नाम पर ही संयम के बदले अहंकार और क्रूरता आने लगे, अनुशासन के बदके उच्छृंखलता व उदंडता आने लगे, दूसरों का दर्द समझने के बदले दूसरों को दर्द दिया जाने लगे, अपना हर्ष बांटने के बदले ईर्ष्या, नफरत व स्वार्थ का बाज़ार सजाया जाने लगे, खुद को सुधारने के बदले दूसरों को सुधारने का ठेका लिया – दिया जाने लगे , तो ? संभव है कि वैसे महान लोगों को मां की कोख और धरती की छाती के बीच का वह संक्रमण उनकी समझ में आ गया हो! क्या सचमुच !!

तो क्या उन सब की कोई जरूरत नहीं रह जाएगी? हां, कोई जरूरत नहीं रह जाएगी, सिवाय एक जरूरत के, मां की कोख से निकलने पर जिस धरती ने हमें धारण किया, केवल वही हमारी जरूरत रह जाएगी ताकि हम जमीन पर अपने पांव टिका कर आकश की ओर देख सकें। इसे धर्म कह लें, भक्ति कह लें, मातृभूमि के प्रति प्रेम कह लें , देशभक्ति कह लें, कुछ भीकह्लें,  कुछ भी न कहें, कोई फर्क नहीं पडता।

तो क्या सबसे ऊपर यही है?  जी हां, कम से कम मेरे लिए तो किसी भी धर्म, भक्ति, आध्यात्म, देव , ईश्वर आदि से बढ कर मेरी यह धरती है , मेरा यह देश है, देवालयों में लहराने वाले ध्वजों से बढ कर फहराता हुआ यह तिरंगा है, मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा, गिरिजा या किसे भी देवालय के लिए मैं एक ईंट भी न लगाऊं, परंतु अपनी धरती, अपने देश के लिए अपने खून का एक – एक कतरा और अपनी हड्डियों का एक-एक कण तक को विसर्जित करने को तैयार बैठा हूं। शायद मेरी यह सोच मां की कोख और धरती की गोद के बीच की संक्रांति समझने की क्रिया हो !

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय !   

अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय !   

(क्योंकि आयोजन सरकारी था, किंतु अन्दाज़ पेशेवराना था, क्योंकि कार्यक्रम भाषा व अनुवाद पर था, परंतु स्वरूप साहित्यिक व सांस्कृतिक था और क्योंकि प्रस्तुति तकनीकी थी, लेकिन अभिव्यक्ति कलात्मक व लयात्मक थी; बस, भाषा, साहित्य और तकनीक की त्रिवेणी में अनुवाद की नाव चल पडी , क्योंकि उसकी पतवार तो वैश्विक बाजार की जरूरतें हैं!)     

 केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो ने 07 जुलाई को नई दिल्ली संसद मार्ग स्थित एनडीएमसी कंवेंशन सेंटर के सभागार में “अनुवाद प्रशिक्षण का ई- लर्निंग प्लेटफॉर्म” का लोकार्पण किया। भारत सरकार की “सुशासन: चुनौतियां और अवसर” कार्य-योजना के अंतर्गत दो सत्रों में आयोजित लोकार्पण समारोह के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता राजभाषा सचिव श्री प्रभाष कुमार झा आईएएस ने की , महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के प्रो. गिरीश मिश्र मुख्य अतिथि थे, मुख्य वक्तव्य प्रसिद्ध भाषाविद और टेक्नोक्रेट डॉ. ओम विकास का था, जबकि अनुवाद विज्ञान के विशेषज्ञ डॉ. विमलेश कांति वर्मा विशिष्ट वक्ता थे। संगोष्ठी सत्र की अध्यक्षता प्रो. गिरीश मिश्र ने की और मुख्य वक्तव्य प्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. नरेन्द्र कोहली ने दिया । अनुवाद ब्यूरो के निदेशक डॉ. श्रीनारायण सिंह ने ‘ऑनलाइन अनुवाद प्रशिक्षण’ की संकल्पना, कार्य-योजना और उपयोगिता पर प्रकाश डाला , जबकि राजभाषा विभाग के संयुक्त सचिव डॉ. विपिन बिहारी सिन्हा ने उद्घाटन सत्र में और अनुवाद ब्यूरो के संयुक्त निदेशक डॉ. विनोद कुमार संदलेश ने संगोष्ठी सत्र में धन्यवाद ज्ञापन किया। कार्यक्रम की शुरूआत अनुवाद पर ऑडियो विजुअल प्रस्तुति से हुई, 15 मिनट की वही प्रस्तुति अगले 4 घंटों तक श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किए रही।

केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो (सीटीबी) भारत सरकार राजभाषा विभाग का ही एक अभिन्न अंग है,जिसके निदेशक डॉ. श्रीनारायण सिंह है। श्री सिंह के नेतृत्व में सरकारी कार्यालयों, संस्थानों और बैंकों आदि में कुशल व व्यावहारिक अनुवादकों की एक बडी और बहुआयामी फौज़ तैयार होती रही है। दरअसल, वही फौज़ राजभाषा कार्यान्वयन का कारगर उपकरण है। राजभाषा विभाग के वैसे ही अभिन्न अंग नीति, कार्यान्वयन, तकनीकी और केन्द्रीय हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान भी हैं। इन सभी अंगों के अलग-अलग निदेशक हैं जो संयुक्त सचिव के मार्गदर्शन और सचिव के संरक्षण में कार्य करते हैं। वरिष्ठ तकनीकी निदेशक डॉ. केवल कृष्ण एक अनुभवी व सर्वसुलभ अधिकारी हैं, सरकारी कार्यालयों , बैंकों आदि में कम्प्यूटरीकरण और उससे जुडी समस्याओं के समाधान में उनका अमूल्य योगदान रहा है। डॉ. जयप्रकाश कर्दम  हिन्दी प्रशिक्षण संस्थान के हेड हैं, उनके नेतृत्व में हिन्दीतर भाषा-भाषी सरकारी कर्मियों को हिन्दी का प्रशिक्षण दिला कर हिन्दी कार्यान्वयन के लिए एक सक्षम व कुशल मशीनरी तैयार  की जाती रही है।

राजभाषा विभाग के सचिव श्री प्रभाष कुमार झा आईएएस , संयुक्त सचिव डॉ. विपिन बिहारी सिन्हा और निदेशक (कार्यान्वयन) डॉ. संदीप कुमार आर्य से पहली बार मैं इसी समारोह में मिला। झा जी अपने पद और कद के अनुरूप विषय में गहरी रुचि और पैठ रखने वाले वरिष्ठ आईएएस अफसर हैं; सरल इतने कि उद्घाटन सत्र के बाद मंच से उतर कर संगोष्ठी सत्र में श्रोता-दर्शक – दीर्घा की पहली पंक्ति में मेरे पास ही आ कर बैठ गए और अगले दो घंटों के दौरान बीच – बीच में आयोजन के बारे में चर्चा भी करते रहे। संयुक्त सचिव का व्यक्तित्व भी सहज है , डॉ. संदीप आर्य सुव्यवस्थित व्यक्तित्व – सम्पन्न हैं। कुल मिला कर राजभाषा विभाग को कुशल व प्रभावी नेतृत्व मिला है तो उस नेतृत्व को भी योग्य व समर्पित टीम मिली है। इस आयोजन ने ढेर सारे नये – पुराने मित्रों – शुभचिंतकों से मिलने का अवसर भी उपलब्ध करा दिया। उदय कुमार सिंह मुम्बई में  ‘गेल’ में वरिष्ठ अफसर हैं, 1993 के बाद उनसे कल उस आयोजन में ही भेंट हुई, उन्होंने मुझे पहचान लिया , किंतु मैं पहली नज़र में नहीं पहचान पाया। अब मैं इसके लिए उनकी नज़रों की तारीफ करूं या  खुद को 25 साल पहले जैसा ही बनाए रखने के लिए अपनी पीठ थपथपाऊं ! राजभाष के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों में निदेशक रमेश बाबू अनियरी और संयुक्त निदेशक राकेश कुमार से मिलना सुखकर रहा। और भी कई प्रिय और आदरणीय मित्र मिले , उन सबको मेरी शुभकामनाएं।

मैंने उक्त आयोजन को ‘अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय’ कहा है। मैं अपने इस कथन के मूल में निहित भावभूमि एवं दर्शन-दृष्टि को आप से साझा करूंगा और कार्यक्रम का विवेचन, विश्लेषण व गुण-दोष-निरूपण भी करूंगा, परंतु उसके पहले पूरी विनम्रता के साथ मैं सूचित करना चाहूंगा कि ऐसे कार्यक्रमों का मूल्यांकन करने की सामर्थ्य मुझमें है तथा उसका औचित्य भी मुझसे जुडा हुआ है , क्योंकि भारतवर्ष  में राजभाषा संबंधी अब तक का विशालतम भव्यतम और सर्वाधिक प्रभावी समारोह – सम्मेलन कराने का श्रेय मुझे और मेरी टीम को ही है । हमारा ही राजभाषा सम्मेलन था जिसमें भारत के माननीय गृहमंत्री और वित्तमंत्री सहित अनेक केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, सांसद, सचिव , भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर तथा सभी बैंकों व वित्तीय संस्थाओं के सीएमडी आदि अपने राजभाषा प्रभारियों के साथ उपस्थित हुए।

भाषिक वर्गीकरण के अनुसार ‘ग’ क्षेत्र में स्थित कोलकाता में पहला सम्मेलन 1988 में, दूसरा सम्मेलन ‘ख’ क्षेत्र में स्थित मुम्बई में 1990 में तथा तीसरा सम्मेलन 1991 में ‘क’ क्षेत्र स्थित जयपुर में हुआ। तीनों ही सम्मेलनों का आयोजन पांच सितारा होटलों में किया  गया और वैसा इस दृढ भावना के साथ किया गया कि चूंकि सरकारी संस्थानों के मुख्य धारा संबंधी बडे कार्यक्रम बडे होटलों में होते थे तो फिर हिन्दी का सम्मेलन क्यों नहीं । उस सोच के पीछे दर्शन यह था कि उन संस्थानों के प्रमुख हिन्दी को भी राष्ट्र और संस्थान की अस्मिता जुडा विषय मानें तथा उससे जुडे अधिकारियों को भी समान रूप से (इन तमाम विषयों पर विस्तार से चर्चा मेरी आत्मकथा में की गई है जिसका लोकार्पण महात्मा गांधी के चम्पारण सत्याग्रह के 100 वर्ष और भारत की स्वतंत्रता के 70 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में अगले महीने होगा ) महत्वपूर्ण समझें।

अब मैं सीधे आयोजन के व्यक्ति, व्यक्तित्व और वक्तव्य की चर्चा करना चाहूंगा। चारों अतिथि वक्ता अपने – अपने क्षेत्र के मूर्धन्य विद्वान हैं और देश में ही नहीं, विदेशों में भी समादृत हैं, वे विश्व के अनेक विश्वविद्यालयों में अध्यापन कर चुके हैं, व्याख्यान दे चुके हैं तथा भाषिक, साहित्यिक , सांस्कृतिक यात्राओं का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं।  पांचवे वक्ता , राजभाषा विभाग के सचिव उस शीर्ष संस्था के प्रमुख हैं, जिसे भारत सरकार ने अपने कार्यालयों, उपक्रमों तथा बैंकों आदि में संविधान की भावनाओं के अनुरूप राजभाषा हिन्दी को लागू कराने का दायित्व सौंपा है; इसलिए उन सबके द्वारा कुछ कहे जाने का गंभीर मायने है।

सचिव ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारतीय लोकमानस में निर्मल जल-धारा की तरह सहज स्वाभाविक रूप में बहने वाली हिन्दी ही हिन्दी है और वही हिन्दी, राजभाषा हिन्दी है, उस हिन्दी के लिए संस्कृत का ज्ञान अनिवार्य नहीं है क्योंकि हिन्दी की प्रकृति स्वाधीन है। उन्होंने कहा कि हमारे शरीर का हर अंग तन्दुरूस्त है , किंतु शायद सोचने वाला, चिंतन करने वाला हमारा जो मन – मस्तिष्क है, वही कमजोर है, तभी तो हिन्दी बोलने अथवा हिन्दी वाला कहे जाने में हमें हीन भावना घेर लेती है। उन्होंने अपनी व्यक्तिगत भावना व्यक्त करते हुए कहा कि जब कोई उन्हें हिन्दी वाला कहता है तो उनका छह फुट का कद दस फुट का हो जाता है। सचिव ने केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो के निदेशक डॉ. एसएन सिंह की प्रशंसा करते हुए कहा कि वे अपनी टीम के साथ प्रशासनिक हिन्दी के सरलीकरण पर कार्य कर रहे हैं, एक ऐसी शब्दावली बनने जा रही है , जिसमें केवल प्रशासनिक ही नहीं, बल्कि हिन्दी के ढाई – तीन लाख शब्द होंगे जो हिन्दी के समावेशी स्वरूप को प्रतिध्वनित करेंगे।

मुख्य अतिथि प्रो. गिरीश मिश्र ने उस कार्यक्रम को हिन्दी को सशक्त, समर्थ व सार्थक बनाने के लिए भाषा के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी पहल बताया और अनुवाद को ब्रह्म की ‘एकोअहम बहुस्यामि’ की अभिव्यक्ति की भांति सर्वव्यापि होना बताया । डॉ. ओम विकास ने अनुवाद के तकनीकी और भाषा के विकास में तकनीक के उपयोग की चर्चा की तो डॉ. विमलेश कांति वर्मा ने अनुवाद को वैश्विक बाजार, साहित्य, संस्कृति और इतिहास से परिचित होने का एकमात्र जरिया बताया। डॉ. नरेन्द्र कोहली ने भाषा को मूल जातीय संस्कृति व उसके स्वरूप से दूर ले जाने के उपक्रम को भाषा को विकृत करने का कार्य कहा , स्पष्ट शब्दों में कहूं तो उन्होंने संस्कृत – निष्ठ हिन्दी की आवश्यकता बताते हुए घर, बाजार, दफ्तर और विश्वविद्यालय के लिए एक ही भाषा – स्वरूप की वकालत की यानी कि हिन्दी का तत्सम रूप ही उनकी नज़र में असल हिन्दी है, वे कुछ हद तक तद्भव और देशज रूप भी स्वीकार करने को सहमत हैं , परंतु विदेशज शब्दों से एक तरह की चिढ-सी महसूस हुई उनकी सोच में।

समूचे कार्यक्रम को विविध अयामी बनाने के लिए डॉ. नरेन्द्र कोहली के वक्तव्य का संदर्भ तो बनता है किंतु भारत के जनमानस में हिन्दी का जो रूख व रूतबा है, वह दूर भागता हुआ-सा लगता है जो, मेरी समझ में, भारत की ऐतिहासिक विरासत के भी प्रतिकूल है। इस कार्यक्रम के बाद मेरे मन में कोहली जी को ले कर जो बात उठी, वह बहुत निराशाजनक थी। मैं सोचने लगा कि अच्छा होता कि मैं सिर्फ लेखक कोहली को ही जनता होता, काश ! वक्ता कोहली का व्याख्यान नहीं सुना होता । पढ कर जिस लेखक कोहली की छवि मन में थी,सुन कर वह दरक गई। दरअसल, अधिकांश विश्वविद्यालयीन अध्यापकों के साथ यह परेशानी है, वे सामने वाले हर श्रोता को अपना छात्र ही मान लेते हैं और बौद्धिक व्याख्यानों में इतने रच-बस गए होते हैं तथा इस हद तक थक गए होते हैं कि वे देख ही नहीं पाते की गांव की गलियों में, बाज़ार की दौरी-दूकानों पर, दफ्तरों के टेबुलों पर क्या कुछ जीवंत घट रहा है और वे कैसे रो – गा रहे हैं (हिन्दी के इन्हीं आयामों पर मेरा 21 पृष्ठों का शोध आलेख सरकार की आधिकारिक वेबसाइट rajbhasha.nic.in पर है, उसे देखा जा सकता है) । इस आयोजन का सबसे कमजोर और अनुपयोगी भाषण रहा था उनका वह वक्तव्य।

आयोजन की अन्य कमियों में माननीया महिला उद्घोषक की उद्घोषणाएं भी रही, केन्द्रीय अनुवाद ब्यूरो को उन्हें फिर किसी मंच का संचालन देने के पहले वॉयस मॉडुलेशन का प्रशिक्षण दिला देना चाहिए।

सत्येन्द्र दहिया का संचालन मधुर व मनोहारी लगा , जैसे बहुत ऊंचाई से गिरता हुआ कोई झरना जब घाटी में उतरता जाता है तो तो उसकी ध्वनि धीमी होती जाती है और हवाओं में घुलमिल गई वह ध्वनि राहगीर के कानों में फुसफुसाहट – सी लगती है, , कमाल का वॉयस मॉडुलेशन है उनकी प्रस्तुति में ! उन्हें अपनी सह – उद्घोषिका को भी कुछ टिप्स दे देनी चाहिए थी।

आयोजन का सबलतम पक्ष दृश्य – श्रव्य प्रस्तुति की पटकथा और उसका सम्पादन रहा। विनोद कुमार संदलेश द्वारा लिखित आलेख बहुत ही मौलिक चिंतन व शोध का परिणाम था, हर कथन को साकार कर देने वाले विजुअल प्रोपर्टिज और औडियो प्रस्तुति ने विषय-वस्तु को सदेह उतार देने जैसा बना दिया। भाषा , साहित्य, संगीत, कला, संस्कृति आदि से संबंधित वे विजुअल प्रोपर्टिज भी अद्भुत थीं।  डॉ. श्रीनारयण सिंह का सम्पादन पूरी पटकथा को चुस्त – दुरूस्त तथा श्रोता-दर्शक के मनमिज़ाज़ को बांधे रखने के लायक बनाने में सफल रहा , वॉयस ओवर देने वाले कलाकार की भी सराहना करनी होगी कि स्वरों के आरोह – अवरोह को संयमित करते हुए उन्होंने प्रस्तुति को समग्र रूप से यादगार बना देने में अपना मूल्यवान योगदान दिया। इसीलिए सचिव झा जी ने उस प्रस्तुति को अकल्पनीय कहा तो मुख्य अतिथि प्रो. मिश्र ने भाष के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी पहल बताया और मैं कहता हूं –

‘ अद्भुत अद्वितीय अविस्मरणीय  !!

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

 

चाय – विमर्श

चाय – विमर्श

 

मेरी शीघ्र प्रकाश्य आत्मकथा से …. !

 

(आजकल मीडिया में एक राष्ट्रीय चाय दूकान की चर्चा चाय से भी ज्यादा गर्म है।  हो भी क्यों नहीं, आखिर उसी दूकान के मालिक आज के राष्ट्रीय प्रधान सेवक पूरी दुनिया में विमर्श का विषय जो बने हुए हैं। सुना है कि भक्तजन उस दूकान को राष्ट्रीय स्मारक अथवा अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल घोषित – विकसित कराने का अभियान छेडने वाले हैं। यह खबर सुनते ही मेरी बांछें खिल गईं ! मैंने भी अपनी यादों के तहखानों का उत्खनन करना शुरू कर दिया , उस खुदाई में मेरे चाय – विमर्श के भी कुछ ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्त्व के अवशेष प्राप्त हुए हैं, यहां मैं उन अवशेषों की प्रदर्शनी लगा रहा हूं।)

कॉलेज में आए कुछ महीने हो गए थे,  किंतु तब तक किसी छात्र की कोई बडी पहचान नहीं बनी थी। एमआईएल हिन्दी की क्लास थी। प्रोफेसर रमाशंकर पाण्डेय हाजिरी ले रहे थे। उनका स्वभाव बहुत ही विनम्र और मिलनसार था, देर से आने वाले छात्रों की भी हाजिरी बना देते थे, अंत में वे पूछ भी लेते थे कि हाजिरी में कोई छूटा तो नहीं ? उस दिन भी उन्होंने वैसा पूछा । रमेश कुमार नाम का मेरा एक सहपाठी  था, उसकी नई – नई शादी हुई थी, कोट, पैंट और टाई में मोटरसायकिल पर कॉलेज आता था। बाकी लडकों में खुद को ज्यादा ही स्मार्ट जताने की कोशिश में रहता था। उसी ठसक में उसने प्रो. रमाशंकर पाण्डेय को टोक दिया – “सर, बहुत हो गई हाजिरी, अब पढाई शुरू की जाए”। उसकी वह बात और बॉडी लैंग्वेज पाण्डेय जी को खल गई, फिर भी, उन्होंने सीधे उसे कुछ नहीं कहा और पढाना शुरू कर दिया।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त के प्रसिद्ध महाकाव्य ‘साकेत’ का एक अंश ‘पंचवटी में लक्ष्मण’ नाम से कोर्स में था, उसमें सीताहरण के संदर्भ में शूर्पणखा का प्रसंग भी था। पाण्डेय जी ने रमेश से पूछ दिया कि पिछले दिन जिस प्रसंग की पढाई हुई थी, उसका सारांश बताए। रमेश फिसड्डी साबित हुआ, पाण्डेय जी ने दूसरे छात्रों से भी पूछा, किसी ने भी कुछ नहीं बताया। पाण्डेय जी ने कहा –  “ छुटे हुए विद्यार्थी की हाजिरी लेने में दो मिनट लग गए तो वह समय बहुत खल रहा था आप लोगों को , तो फिर पढते क्यों नहीं, इस तरह अपने मां – बाप के पैसे और कॉलेज का समय क्यों जाया कर रहे हैं ? पूरी क्लास चुप क्यों है ”? मैं तो धोती – कुर्ता पहनने वाला घोषित गंवार था, इसलिए मेरा नोटिस कोई नहीं लेता था। मैंने स्वयं कहा –“ श्रीमान ! मैं बताना चाहता हूं ”। सबने मुझे चकित हो कर देखा, प्रोफेसर साहब ने अनुमति दे दी।

मोतीहारी एमएस कॉलेज में मैं प्राक कला यानी प्री यूनिवर्सिटी आर्ट्स का छात्र था।  मेरी क्लास में 10 –11  लडकियां थीं, किंतु एमआईएल वाली क्लास में तो 25 से भी अधिक लडकियां थीं, कई लडके अधिकांश समय उन लडकियों को ही घूरते रहते थे , शायद अपनी क्लास की एक लडकी को मैं भी कभी – कभी  देख लेता था, लेकिन मैं पढाई से मन कभी नहीं हटाता था । ‘पंचवटी’ में पिछले दिन जो पढाया गया था, वह राम एवं लक्ष्मण के बीच शूर्पणखा का प्रसंग था।  शूर्पणखा अप्सरा – सी सुन्दर स्त्री के वेश में आती है, अपने हाव – भाव और कामुक अदाओं से कभी राम को तो कभी लक्ष्मण को लुभानाती है, परंतु दोनों में से कोई भी भाई उसे महत्व नहीं देता, फलस्वरूप शूर्पणखा राम और लक्ष्मण के बीच पेंडुलम की तरह हिंडोले खाती रहती है।

मैंने वह प्रसंग मैथिलीशरण गुप्त की कुछ पंक्तियों को उद्धृत करते हुए सुनाया और उसे आज की परिस्थितियों से जोड कर एक व्यंग्य कर दिया –  “ राम और लक्ष्मण की चारित्रिक दृढता ने शूर्पणखा जैसी कामाक्षी और रूपवंती युवती को कभी इधर तो कभी उधर भटकने को विवश कर दिया, वह ललचाई नज़रों से कभी राम को तो कभी लक्ष्मण को देखती हुई प्रेम की भीख मांगती रही , गिडगिडाती रही, मिन्नतें करती रही, किंतु दोनों में से किसी ने भी उसकी ओर आंख उठा कर देखा तक नहीं। आजकल के मेरे मित्रों की तरह नहीं कि पढाई छोड कर अपनी सहपाठी कन्याओं को देखने में ही पूरा समय लगाते रहें और कोई इनकी तरफ एक नज़र देखे तक नहीं ”।

वह मेरा कोई भाषण नहीं था, बल्कि हमारे पाठ्यक्रम का एक अंश था, जिसका भावार्थ मैं बता रहा था, फिर भी, सबने जोरदार तरीके से तालियां बजाईं और उनमें सबसे आगे लडकियां रहीं। रमेश सहित मेरे कई सहपाठियों का बुरा हाल हो गया और मैं हीरो बन गया। मेरी जोरदार पहचान बनी और मैं चर्चा का विषय बन गया। उसके बाद मेरे कई दोस्त बन गए। प्रो. रमाशंकर पाण्डेय मुझे ‘जिज्ञासु जी’ कहने लगे और सबके सामने मुझे ज्यादा महत्व देने लगे।

वह चूंकि एमआईएल (हिन्दी) की क्लास थी, इसलिए क्लास में लगभग 200 छात्र –  छात्राएं थीं। हॉल से निकलने के बाद मैंने महसूस किया कि अधिकांश निगाहें मुझे ही घूर रही थीं। इसीलिए मैं भी पूरी गंभीरता का लबादा ओढ कर राम – लक्ष्मण की चारित्रिक दृढता का उदाहरण प्रस्तुत करने की कोशिश में लग गया। उसके बाद एक पिरियड लिजर थी, और फिर, इतिहास की क्लास थी। मैं लायब्रेरी की तरफ जा रहा था कि मेरा एक सहपाठी मेरे पास आ कर बोला – “ भाई जी, चलिए स्टेशन से चाय पी कर आते हैं ”। तब तक मैंने चाय पीना सीखा नहीं था, किंतु उस सहपाठी के आमंत्रण में एक कशिश थी जो अपनापन से लबरेज थी, इसीलिए मैंने कहा – “ भाई जी, मैं चाय तो नहीं पीता, फिर भी चलिए, चलते हैं ”। उसने गांधी होटल में दो स्पेशल चाय मंगाई , मैंने प्लेट में ढाल कर फूंक – फूंक कर चाय पी, चाय पीना मेरी आदतों में न तब शुमार था , न आज। उस दिन हमलोगों के बीच ज्यादा कुछ बातचीत नहीं हुई, केवल पढाई की ही बातें होती रहीं, तब तक उसने घडी देख कर कहा – “ चलिए, अगली क्लास का टाइम हो गया”। मेरी तरह उसके मूल विषय भी हिन्दी, इतिहास और राजनीति शास्त्र थे, अतिरिक्त विषय भी तर्कशास्त्र था, अंग्रेजी और    एमआईएल हिन्दी अनिवार्य विषय तो समान थे ही, इस प्रकार हम हर क्लास में साथ ही थे।

क्लास में वह मुझसे अलग बैठता था, किंतु उस दिन इतिहास की क्लास से ही वह मेरे पास बैठने लगा। मैंने देखा कि कई लडके उससे दोस्ती गांठने की फिराक में रहते थे। अगले दिन से ही मेरा वह सहपाठी मित्र “भाई जी” कहने के बदले मुझे मेरे फर्स्ट नेम “श्रीलाल” कह कर पुकारने लगा और “तुम ताम” पर उतर आया । इतनी जल्दी उसका उस तरह घनिष्ठता दिखलाना मेरे गंवार मन को थोडा विचित्र – सा लगा, किंतु उसके संबोधन में इतना गहरा अपनापन-बोध था कि मन उसकी ओर अनायास खिंचता चला गया , मैं भी उसे “तुम” कहने लगा और उसका फर्स्ट नेम “राकेश”  कह कर पुकारने लगा। ( इस धरती पर मेरा सबसे प्रिय मित्र था वह , अब इस दुनिया में नहीं रहा, उससे 12 साल छोटा भाई सुबोध कुमार सिंह आजकल दिल्ली में नाबार्ड में एक वरिष्ठ अधिकारी है, उसकी शादी हिन्दी के ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त यशस्वी कवि डॉ. केदारनाथ सिंह की बेटी से हुई है)  

अब चाय पीने वालों में हम पांच – छह छात्र हो गए, चाय के पैसे देने के लिए अब हर व्यक्ति “पहले मैं – पहले मैं” करने लगा, राकेश से दोस्ती जता कर सभी खुद को बडभागी समझने लगे ,  मेरा साथ होना भी उन सबके लिए एक तरह से शराफत का सर्टिफिकेट मिलने जैसा था,  अब पैसे राकेश भी नहीं देता था, और मुझे, मुझे तो वैसे भी पैसे देने ही नहीं थे , क्योंकि चाय पीने तो मैं उन लोगों के विशेष आग्रह पर जाता था और वैसे भी चाय पीना मेरा शगल था भी नहीं (आज भी मैं किसी का मन रखने या समय काटने के लिए ही चाय पीता हूं) , उसके कई कारण थे ।

पहला कारण तो यह था कि हमारे गांव देहात में बच्चों और युवकों में चाय पीने की आदत को बीडी, सिगरेट, खैनी, तम्बाकू, पान आदि खाने जैसी बुरी आदतों में शुमार किया जाता था , इसलिए यदि कोई चाय पीता भी था तो अपने बडों से छुपा कर ही पीता था। दूसरा कारण यह था कि गांवों में किसान सुबह से ही अपने काम में लग जाते थे, एक बार ही भरपेट भोजन कर खेतों में निकलते थे, घर वापस आ कर फिर खाना खा लेते थे, चाय पीने का कोई समय ही नहीं होता था उनके पास। तीसरा कारण यह था कि गांवों में ऐसा चुल्हा तो किसी के पास होता नहीं था कि जब चाहें, जलालें और जब चाहें, बुझा दें, क्योंकि तब गैस या स्टोव किसी के पास होता नहीं था, जलावन के रूप में लकडी और उपले आदि का उपयोग होता था, जिसे चाय बनाने जैसे महज कुछ मिनटों के काम के लिए जलाना-बुझाना सुविधाजनक नहीं होता था, और रही बात गांव में चाय की दूकान की तो गरीब से गरीब आदमी भी चाय की दूकान चलाना पसन्द नहीं करता था, इसलिए लोगों में चाय की आदत ही नहीं पनपती थी । एक अन्य कारण भी था, चूंकि चाय से न तो भूख मिटती थी और न ही प्यास जाती थी; इसलिए शहर में आसानी से उपलब्ध होने पर भी केवल ‘जीभ दागने’ के लिए मेरे जैसे युवक चाय पीने जैसे ‘असामाजिक’ व ‘अनावश्यक’ शगल पर कुछ भी खर्च करना फिजुलखर्ची मानते थे। मेरे चाय नहीं पीने के पीछे वे सभी कारण थे।

एक दिन शाम को अंतिम क्लास खत्म हुई। हम सभी दोस्त गांधी होटल चाय पीने गए, मगर इस दफे तो मामला कुछ और ही था। कागज में लपेट कर शक्ति रस की तीन बोतलें वेटर ले आया , पता चला कि कॉलेज के लडकों में हल्के नशा के लिए शक्ति रस (आयुर्वेदिक या कोई अन्य प्रोडक्ट सिरप)  का सेवन आम था। रस ग्लास में ढाला गया, राकेश ने मेरे लिए ग्लास लगाने से मना कर दिया और एक कप चाय का ऑर्डर कर दिया। उसी बीच सुधीन्द्र पीने के लिए मुझ पर जोर डालने लगा और मेरे ‘ना’ करने पर अपना ग्लास मेरे मुंह में लगाने लगा। “चटाक” , सुधीन्द्र के गाल पर एक जोरदार झन्नाटेदार तमाचा लगा। देखा तो राकेश आग बबूला हुआ जा रहा था – “ श्रीलाल मेरा दोस्त है, तुम लोगों के साथ तो यह उठे – बैठे भी नहीं,  मेरे चलते आता है, जब मैं इस पर जोर नहीं दे रहा तो फिर तुमने जबरदस्ती क्यों की? आइन्दा, जिसने भी ऐसा किया, वह खुद को मेरी दोस्ती से खारिज समझे ”। उस घटना के बाद कॉलेज में मेरी छवि में बेहिसाब निखार आ गया। पढाकू और वक्ता तो माना ही जाने लगा था, अब संयम व संस्कार की भी चर्चा होने लगी, एक – दो ईर्ष्यालू किस्म के लडकों ने मुझे देख कर फबती भी कसी – “वो देखो , स्साला .. विवेकानन्द की औलाद जा रहा है” ।

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

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