सभी धर्मों में ईश्वर पुरूष ही क्यों है? क्या हिन्दू समाज निष्क्रिय और नपुंसक है?

सभी धर्मों में ईश्वर पुरूष ही क्यों है?

क्या हिन्दू समाज निष्क्रिय और नपुंसक है?

 

आज दुर्गा नवमी है। हिन्दू नवरात्रि में नारी शक्ति के नौ रूपों की आराधना करते हैं, उसके अलावा भी नारी शक्ति के कई अन्य रूपों की पूजा – अर्चना भी हिन्दू करते हैं और बेटियों को पूजने का विधि-विधान भी करते हैं । मुझे नहीं मालूम , दुनिया में अन्य किस धर्म या समाज में नारी के इतने रूपों की पूजा इस तरह से की जाती है या नहीं? इसे धार्मिक परम्परा से अलग सांस्कृतिक सरोकार के रूप में देखा जाए तो भी यह एक अच्छी सोच और परम्परा है; हालांकि वे सभी रूप देवियों के हैं, सर्वशक्तिमान सर्वज्ञ सर्वविद्यमान ईश्वर के नहीं।

फिर भी, क्या नारी मिट्टी की मूरतों में ही पूजा के योग्य है ? हाड – मांस की औरत नारी शक्ति नहीं है? इस सवाल का जवाब मिट्टी या पत्थर की देवी के सामने माथा टेकने वाले , माता की चौकी करने वाले, जगराता करने वाले और माता की आराधना में भावविभोर हो कर नाचने – गाने वाले भक्तों के पास तो होना ही चाहिए, क्योंकि समाज में देखने से ऐसा तो नहीं लगता कि इन नौ दिनों में नारी के जितने रूपों की जैसी पूजा की जाती है, उसका शतांश भी वास्तविक रूप में जीवित नारी को श्रद्धा स्वरूप प्राप्त होता हो !

आज के अखबारों में एक हेड लाइन है कि देश के चार महानगरों में शाम होते ही बेटी घर नहीं लौटती तो मां-बाप चिंतित होने लगते हैं। यह कोई समाचार नहीं, हजारों परिवारों पर किए गए सर्वेक्षण का नतीजा है।

मेरे मित्र और चिंतक प्रदीप शर्मा ने आज अपने फेसबुक टाइम लाइन पर लिखा है कि नारी कई रूपों में हमारे – आपके घर में ही होती है, उसकी पूजा नहीं कर सकते तो उसका सम्मान तो कीजिए, वही नारी शक्ति की सच्ची पूजा होगी ।

सचमुच, देवी के अनगिनत रूपों की मूर्तियों की पूजा से कहीं ज्यादा महत्वपूर्व वास्तविक नारी को उसका वाजिब हक देना है । मैं प्रदीप जी के विचारों का सम्मान करता हूं और वादा करता हूं कि मां दुर्गा के चरणों में चढाए फूलों को उठा कर उस व्यक्तियों के चरणों में चढा दूंगा जो प्रदीप जी द्वारा नारी शक्ति  के संबंध में व्यक्त विचारों को कार्यरूप में परिणत करते हों।

मुझे तो इतना-सा रहस्य भी समझ में नहीं आता कि दुनिया में जो भी प्रमुख धर्म प्रचलित हैं, उनमें भगवान, ईश्वर , अल्लाह, गॉड ; सर्वशक्तिमान को चाहे जिस नाम से भी पुकारते हों, वह पुल्लिंग ही क्यों है अर्थात हर एक ईश्वर पुरूष ही क्यों है। इस सवाल का जवाब भी धर्म और ईश्वर के नाम पर मरने – मारने वालों के पास अवश्य होना चाहिए।

आज एक दूसरे व्यक्ति की फेसबुक टाइम लाइन पर एक विस्फोटक विचार पढने को मिला। उस व्यक्ति ने देवी दुर्गा से मांगे अपने वरदानों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि हिन्दू समाज निष्क्रिय और नपुंसक है। हालांकि उस सज्जन ने निष्क्रियता और नपुंसकता अथवा सक्रियता और पुंसकता की कोई परिभाषा नहीं दी है, परंतु फिर भी, उनकी फेसबुक टाइम लाइन पर बीते कुछ दिनों के पोस्ट देखने – पढने से उनके विचारों की भयावहता का पता अवश्य चल जाता है। हिन्दुत्व में विज्ञान की जडी-बूटी बांटने वाले वे सज्जन खुद को हिन्दुत्व का प्रचारक सिद्ध करने पर तुले हुए हैं। मेरा मानना है कि सदियों से हिन्दुत्व विश्व का प्रमुख धर्म व जीवन – दर्शन रहा । हजारों – लाखों ने उसे मिटाने की कोशिश की होगी, लेकिन सभी विरोधी असफल रहे । हां, इस श्रीमान की तरह हिन्दुत्व समर्थक और प्रचारक जब भी मिले हैं, हिन्दुत्व को क्षति उठानी पडी है। किसी भी विचारधारा को ऐसे समर्थक और प्रचारक मिल जाएं तो उसे नुकसान पहुंचाने के लिए किसी विरोधी या शत्रु की जरूरत नहीं होगी – ‘नादां की दोस्ती, जी का जंजाल” इसी को तो कहते हैं।

हिन्दू समाज को ऐसे नासमझ समर्थकों की जरूरत नहीं है जो  धार्मिक उन्माद और वैमनस्य फैला कर हिन्दुत्व के “सर्व धर्म समभाव और वसुधैव कुटुम्बकम” जैसे मूल सिद्धांतों के विपरीत समाज में टकराव पैदा करने की कोशिश में लगे हों, हिन्दुत्व तो वैसे विरोधियों को भी गले लगाने को तैयार होगा जो परस्पर स्नेह, सौहार्द , अहिंसा और सद्भाव रखते हों।

इसीलिए हिन्दू समाज को निष्क्रिय और नपुंसक कहने वाले वैसे तत्वों की मैं भर्त्सना करता हूं और आदि शंकराचार्य के “चरैवेति चरैवेति” ,  स्वामी दयानन्द सरस्वती के ‘सनातन वैदिक एकेश्वरवाद’ , स्वामी विवेकानंद के ‘सर्वात्म सनातन हिन्दुत्व’ एवं ‘वेदांत दर्शन’ तथा योगी अरविंदो घोष के ‘अति मानस’ दर्शन के समन्वित स्वरूप को प्रणाम करता हूं।

दुर्गा नवमी की बधाइयां और विजयादशमी की शुभकामनाएं।

कविता, राजनीति और मौत !

शीघ्र प्रकाश्य मेरी आत्मकथा में अकथ रह गया कथांश

  • कविता, राजनीति और मौत !

दक्षिणी कलकत्ता में बिडला जी के जुट मील में विराट कविसम्मेलन का आयोजन था। उसके संयोजन और संचालन का दायित्व मुझे सौंपा गया था। उन दिनों मैं कलकत्ता में ही पोस्टेड था, यह 1980 के दशक की बात है । बडे – बडे कवियों के अलावा एक साधारण – सा दिखने वाले कवि को भी मैंने आमंत्रित कर लिया था, नाम था रघुनाथ प्रसाद ‘ग़ुस्ताख़’। उस अभिजात कवि – मंडली में एक सर्वहारा कवि को देख कर एक बडे कवि ने नाक -भौं सिकुडाते हुए मुझे उलाहना दी – “किस कव्वाल को तुमने बुला लिया ‘अमन’ ?”

दरअसल, वह कवि जी बहुत बडे कवि और मंच संचालक थे ! रेलवे द्वारा अखिल भारतीय स्तर का जो भी कवि सम्मेलन होता, उसका संयोजन और संचालन प्राय: वही करते थे। वे भारतीय रेलवे के राजभाषा निदेशक शिवसागर मिश्र के व्यक्तिगत मित्र थे और मिश्र जी राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के दामाद थे। शिवसागर जी एक धीर – गंभीर और हिन्दी के प्रति समर्पित उच्चाधिकारी थे , रेलवे में हिन्दी को लोकप्रिय बनाने में शिवसागर जी का ऐतिहासिक योगदान रहा है । शिवसागर जी के  बडे भाई रामसागर मिश्र भी पूर्व रेलवे के मुख्यालय फेयरली प्लेस कलकत्ता में वरिष्ठ हिन्दी अधिकारी थे, उनसे भी मेरी अच्छी आपकता थी, कई मंचों को हमने साझा भी किया था।

हावडा के यशराज प्रकाशन ने आशुतोष प्रसाद और मेरे संयुक्त सम्पादन में एक कहानी संकलन का प्रकाशन किया था। उस प्रकाशक के आग्रह पर एक कार्यक्रम में मिश्र जी को मैंने आमंत्रित किया था , वे मेरे आमंत्रण पर उस कार्यक्रम में हावडा आए थे। मुझे मिश्र जी का स्नेहिल आशीर्वाद प्राप्त था, किंतु वह कवि जी तो मिश्र जी के व्यक्तिगत मित्र थे, इसलिए वे खुद को भी सबसे अलहदा समझते थे। बिडला जी वाले कवि सम्मेलन से शिवसागर जी का कोई वास्ता नहीं था, किंतु उनके मित्र उस कवि जी का रूतबा समझाने के लिए उस पृष्ठभूमि का उल्लेख करना आवश्यक लगा।

‘ग़ुस्ताख़’ जी को मैं जानता नहीं था। जब कलकत्ता में केन्द्र सरकार के एक बडे उपक्रम के सरकारी आयोजन में मैंने उनकी कविताएं सुनीं तो मैं उनके हास्य – व्यंग्य का कायल हो गया। कोई रोजी – रोजगार नहीं था उनके पास, और केवल कविता से जीविकोपार्जन कितना संभव है, यह सबको पता है ! गुस्ताख़ जी कव्वालों की टोली में भी जाते और कव्वाली मुकाबलों में तत्क्षण शेर-वो-शायरी से सवालों के जवाब तैयार करते। उन्हीं कव्वालों से उनकी रोजी-रोटी चलती थी। वे सम्पन्न घराने के होते तो उन्हें आशुकवि का ख़िताब लोग दे देते, लेकिन वे तो एक बिल्कुल साधारण व्यक्ति थे, भले ही काव्य – कला में धुरन्धर रहे हों । कुछ विशुद्ध कविता-प्रेमी लोग उन्हें कविगोष्ठियों , सम्मेलनों और मुशायरों में भी बुला लेते तो उनमें भी उन्हें कुछ ‘पत्रम-पुष्पम’ मिल जाते, वैसी ही एक उच्चस्तरीय कविगोष्ठी में उनसे मेरा परिचय हुआ था।

एक बात तय थी कि जिस कविसम्मेलन में ‘ग़ुस्ताख़’ जी होते, उनके लिए तालियों का अम्बार लग जाता , क्योंकि उनकी हर पंक्ति जनमानस को अपनी-सी लगती , जबकि लच्छेदार कविताएं करने वाले बडे-बडे शब्दाडम्बरी कवियों के सामने तालियों के टोटे पड जाते। इसीलिए उस बडे कवि ने ‘ग़ुस्ताख़’ जी को हिकारतभरी नज़रों से देखा था। ‘गुस्ताख़’ जी की एक लम्बी कविता थी। जब वे अपनी वह कविता एक खास अन्दाज़ में सुनाते तो श्रोता एक सप्ताह तक उस कविता की पंक्तियां गुनगुनाते रहते और अकेले में भी हंसते-मुस्कुराते रहते । वह पूरी कविता तो नहीं , लेकिन उसकी एक पंक्ति इस प्रसंग में अवश्य रखूंगा।

गुस्ताख़ जी की उस कविता का प्रसंग चुनावी माहौल में एक बडे नेता जी द्वारा गांव के लोगों से वोट के साथ – साथ चन्दा में नोट मांगने का था। प्रसंग देखिए – गांव के लोग जमा हैं। नेता जी लोगों से बारी-बारी से पूछते हैं कि वोट के अलावा वे नोट कितना देंगे? एक से पूछा – “आप क्या और कैसा सहयोग करेंगे ” ? एक शर्राफा दुकानदार से नेता जी ने चहक कर पूछा – “सेठ जी, आप क्या करेंगे और कितना करेंगे” ? जाहिर था, नेता जी के जेहन में सोना -चांदी के सिक्के रहे होंगे। उसके बाद नम्बर था एक व्यापारी का । नेता जी ने पूछा – “आप क्या करेंगे ” ? व्यापारी ने कहा –

हम तो बांस के व्यापारी हैं, बांस करेंगे

दरअसल, वह बांस का व्यापार करने वाला व्यापारी था, इसीलिए उसने अपनी मंसा नेता जी को बता दी यानी कि जो उसके पास था, वही तो वह दे सकता था अर्थात जो कुछ कर सकने की उसकी क्षमता थी, वही तो वह करेगा !

बस, नेता जी के बेहोश होने की सूचना के साथ कविता तो समाप्त हो गई, लेकिन बडे कवि महोदय रेलवे के अलावा अन्य कवि-सम्मेलनों की बाट जोहते रह गए। वे इतने गुस्से में आ गए थे कि कविता पढने के लिए जब मैंने उन्हें आवाज़ दी तो वे अपनी कविता ही भूल गए। कारण यह था कि रेलवे के कविसम्मेलनों का संचालन करते-करते वे कविसम्मेलन मंचों के संचालन पर अपना एकाधिकार समझने लगे थे, परंतु बिडला जी की स्थानीय साहित्य समिति के प्रबंधकों ( जिनमें नवीन प्रजापति ‘स्वांत’ प्रमुख थे) ने वह काम मुझे सौंप दिया , कवि जी का पारा चढाने के लिए उतना काफी था । प्रसिद्ध कवि और लोकप्रिय गीतकार मेरे आदरणीय मित्र डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र ने उस कवि जी को बहुत समझाया कि अपनी कविता पढें और पत्रम – पुष्पम लें, बाकी संयोजन और संचालन किससे कराना था, वह तो आयोजकों का विषय था, इसीलिए उस विषय से परे हट कर कवि के रूप में अपनी कविता पढें। परंतु फिर भी,  उस कवि जी का गुस्सा कम न हुआ,  परिणामस्वरूप दो लाइनें सुनाने के बाद वे अपनी कविता ही भूल गए।

सवाल उठता है कि कलकत्ता छोडे मुझे तीन दशक हो गए, फिर आज ‘गुस्ताख़’ जी और उनकी कविता की याद क्यों आई? जवाब में प्रसंग देखिए ..

अभी कुछ दिनों पहले देश के कुछ अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी या पता नहीं, किस कारण से दर्जनों बच्चे मर गए। ज्यादातर लोग अक्ल से काम नहीं लेते। वे खुद तो कोई बात याद नहीं रखते और खामखा दोष नेताओं को देने लगते हैं। उन तमाम मौतों के लिए लोग सरकार को कोसने लगे। हर बात में सरकार या नेताओं को ही दोष देने की लोगों की यह प्रवृत्ति मुझे ठीक नहीं लगती, खास कर उन नेताओं के विरुद्ध तो वैसे आरोप बिल्कुल ठीक नहीं लगते जो चुनाव में किए हुए अपने वादे पूरे करते हों। हालांकि वादा निभाने वाली सरकार की लोकप्रियता से खिझ कर  कुछ दिलजले लोग लगातार हो रहे हादसों के लिए सरकार, संविधान और आरक्षण को भी दोष देने से बाज नहीं आ रहे!

वैसे लोग यह याद नहीं रखते कि प्रधान जी ने क्या कहा था , और जब प्रधान जी ने कह दिया था तो फिर अप्रधान लोग भी ‘मिले सुर मेरा तुम्हारा’ की तर्ज़ पर राग आलापने लगे थे – कब्रिस्तान के लिए जमीन मिलेगी तो शमशान के लिए भी मिलेगी यानी कब्रिस्तान और शमशान की लम्बाई – चौडाई बढाने का भरपूर वायदा किया गया और कमाल देखिए, कब्रिस्तान और शमशान की जुगलबन्दी काम भी कर गई । सो, वायदे के अनुसार शमशान का पूरा ख्याल रखा गया और बिना मौत शमशान की शान ही क्या?

राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ की जयन्ती पर विशेष :

शीघ्र प्रकाश्य मेरी आत्मकथा से –

राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ की जयन्ती पर विशेष :

 

चम्पारण के लोग हंसेला

आसपास के इलाके में मेरा परिवार एक बहुत ही सम्मानित और लोकप्रिय परिवार माना जाता था , हालांकि कोई बहुत बडी ज़मीन ज़ायदाद नहीं थी, किंतु इतनी जरूर थी कि सैकडों मन धान की उपज होती थी , जिसमें उच्च क्वालिटी का बासमती धान भी पर्याप्त मात्रा में होता था जो पारिवारिक खर्च के काम आता था,  धान की अन्य किस्में बेचने और मजदूरी देने के काम आती थीं। हमारे यहा मजदूरी में नकद नहीं, अन्न दिए जाते थे। धान के अलावा अपने खर्च के लिए दलहन , तेलहन, साग – सब्जी – तरकारी आदि की भी उपज पर्याप्त हो जाती थी। एक फुलवारी भी थी , जिसमें कई तरह के आम, अमरूद और केला आदि फल होते थे, तब तक गेंहू की फसल हमारे क्षेत्र में लोकप्रिय नहीं हुई थी, हमारा इलाका धान का पीहर कहा जाता था, बाहर के लोग हमारे क्षेत्र को भतपेलवायानी केवल चावल यानी भात खाने वाला कहते थे, हमारे यहां भी भतपेलवा कहने वालों को जवाब देने के लिए दो पंक्तियों की एक कविता प्रचलित थी –

रात अलुआ, दिन सुथनी

 पहुना अइलन त भात चिखनी

अर्थात आलू, सकरकंद, गेंहू, बाजरे आदि खा कर ही गुजारा करने वाले लोगों को तो भात चखने का सौभाग्य तब मिलता था जब कोई अतिथि उनके घर आता था, जबकि हमारे क्षेत्र के लिए भात दैनिक भोजन था।

देशी रियासतों के जमाने में आवासीय पता की पहचान नाम और गांव के बाद तपा और परगना से होती थी, हमारा तपा था बहास और परगना था मझौआ। हमारे क्षेत्र के लोगों ने ‘भतपेलवा’ कहने वालों के जवाब और अपने इलाके की शान में दूसरी कविता भी बना ली थी –

देस कहे मझौवा , जहां भात ना पूछे कौवा

मोतीहारी में भारतेन्दु प्रेस के मालिक और ‘भारतेन्दु’ नामक हिन्दी साप्ताहिक पत्रिका के प्रधान सम्पादक बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव एक प्रसिद्ध हास्य कवि थे (उन्हीं के सान्निध्य में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के जन्मदिन पर 1973 में आयोजित विराट कवि सम्मेलन में मैंने काव्यपाठ भी किया था)। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर  और बलदेव प्रसाद श्रीवास्तव आपस में घनिष्ठ मित्र  थे। बलदेव कवि चम्पारण की शान वाली कविताएं खूब लिखते थे। उनकी कविता चम्पारण के लोग हंसेला  स्थानीय जन-मानस में बहुत लोकप्रिय थी। उन दोनों मित्रों के बीच अपने – अपने क्षेत्र को श्रेष्ठ साबित करने के लिए परस्पर नोंकझोंक भी हुआ करती थी जो हमारे इलाके में खूब प्रचलित थीं।

दिनकरजी अपने करियर के शुरुआती दिनों में बेतिया में उपनिबंधक यानी सबरजिस्ट्रार रहे थे। बेतिया, जो आज बिहार के पश्चिमी चम्पारण जिले का मुख्यालय है, उन दिनों चम्पारण जिले का एक सबडिविजन यानी अनुमंडल हुआ करता था और जिला का मुख्यालय मोतीहारी था। ‘दिनकर’, जी बेगुसराय जिले के सिमरिया घाट के निकट ‘बारो’ गांव के रहने वाले थे, वहां की मुख्य फसल मकई यानी मक्का थी। मकई का पौधा गन्ना के पौधे की तरह लम्बा होता है, जिसमें लम्बे-लम्बे बाल लगते हैं, उसी बाल में दाने आते हैं जिसका भूंजा या सत्तू बना कर खाया जाता है, आजकल पॉपकॉर्न और कॉर्नफ्लेक के नाम से सिनेमा हॉल तथा होटलों में वह विशेष सम्मान पा रहा है। उसी प्रजाति का जनेरा भी होता है, किंतु उसके दाने विषैले – से होते हैं । जब मकई के बाल पकने वाले होते हैं तो कौवे उसे नोचने के लिए झपटते हैं, उन कौवों को भगाने के लिए रखवाले रखे जाते हैं जो टीन या अन्य आवाज करने वाली चीजों को बजा कर कौवे भगाते हैं, खेतों में आदमी का पुतला बना कर भी खडा कर दिया जाता है।

एक कहावत प्रसिद्ध थी कि बारो गांव के लोग बहुत ही बुडबक होते थे, वे मकई के खेत से कौवों को हांक कर भगाते थे और कौवे उडते हुए जिस गांव की ओर जाते थे , बारो वाले उस गांव के लोगों से झगडा करने लगते थे कि उनके गांव के कौवे जा कर मकई के बाल नोच लाते थे। वैसे ही , मझौआ के लोग बागड कहे जाते थे। ‘दिनकर’ जी और बलदेव जी में अपने – अपने क्षेत्र को श्रेष्ठ बताने की होड लगी रहती थी, बलदेव कवि ‘दिनकर’ जी को बारो का बुडबक कहते थे तो दिनकर जी बलदेव कवि को मझौआ का बागड कहते थे, ‘दिनकर’ जी ने मझौआ वालों की उपर्युक्त दोनों कविताओं के जवाब में अपने क्षेत्र के ऊपर चार पंक्तियों की एक कविता लिख दी थी –

 यह ठीक है कि बारो के वो हौवा चले गए

जो हांकते थे रात दिन कौवा,  चले गए

 पूछा जो चित्रगुप्त से, बारो का क्या हुआ ?

  बोले, कि सभी लोग  मझौवा  चले  गए

यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि किसी ने किसी की भी बात से इंकार नहीं किया, ‘दिनकर’ जी की उपर्युक्त कविता से यह स्वीकारोक्ति झलकती है कि बारो में बुडबक लोग थे, किंतु अब वे सभी लोग वहां से चले गए हैं और जा कर मझौवा में बस गए हैं। वह दो महान हस्तियों के बीच का मनोविनोद था, इसीलिए व्यंग्य में शालीनता थी, वरना आज के महान (?) लोग होते तो सीधे डीएनए पर उतर आते!

राष्ट्रकवि ‘दिनकर’ की स्मृति को शतशत प्रणाम!

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

हिन्दी की आस्तीन में…?

14 सितम्बर – हिन्दी दिवस पर विशेष:

 

 हिन्दी की आस्तीन में ?

 

किसकी हिन्दी , कौन-सी हिन्दी, कैसी हिन्दी, कब की हिन्दी,

कहां की हिन्दी, किसलिए हिन्दी (?!।)

 शास्वत प्रश्न है यह , हालांकि प्रश्न है आश्चर्यजनक और उसका उत्तर भी हैरतअंगेज़ है, फिर भी, कुछ तो लोग पूछेंगे !

हिन्दी का एक विद्यार्थी और राजभाषा का अधिकारी होने के नाते मैंने इन तमाम सवालों के जवाब देने की कोशिश की है जो भारत सरकार की आधिकारिक वेबसाइट rajbhasha.nic.in पर “महत्वपूर्ण सूचनाएं” खण्ड में “राजभाषा हिन्दी : विद्वानों के विचार” शीर्ष के अंतर्गत “हिन्दी एक मत से नहीं, एकमत से बनी थी राजभाषा” नामक मेरे आलेख में उपलब्ध है। हिन्दी दिवस के मौके पर कुछ बडे – बडे सवालों के छोटे – छोटे जवाब मैं यहां भी दे देना चाहता हूं। 

                                        हिन्दी बनाम राजभाषा हिन्दी

प्राय: ऐसे आरोप लगाए जाते हैं कि हिन्‍दी के साथ विश्‍वासघात और  राजनीतिक षड्यंत्र हो रहा है। इस विषय में मैं सिर्फ इतना निवेदन करना चाहूंगा कि हिन्‍दी भाषा एवं साहित्‍य के इतिहास का अध्‍ययन-अध्‍यापन करने वाले हिन्‍दी के समस्‍त विश्‍वविद्यालयीन प्राध्यापकों और लेखकों, सम्‍पादकों को राजभाषा हिन्‍दी के इतिहास का भी अध्‍ययन अवश्‍य कर लेना चाहिए ताकि उन्‍हें यह तो मालूम हो कि आजादी के बाद संविधान सभा द्वारा भारत संघ की राजभाषा के रूप में स्‍वीकार किए जाने से लेकर अब तक हिन्‍दी अपने अस्तित्‍व की तलाश में कहां-कहां भटकी है, इस बहुभाषी और बहुसंस्‍कृतिवेशी देश को अपनी राजभाषा लागू करने में दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने के अपने स्‍वरूप को बनाए रखने के लिए कहां-कहां, क्‍यों और कैसे-कैसे समझौते करने पड़े हैं?

अत: हिन्‍दी में लालित-पालित हिन्‍दी के लिए लालायित हिन्‍द के लालों को हिन्‍दी पढ़ाने वाले उन विश्‍वविद्यालयीन हिन्‍दीजीवियों से प्रार्थना है कि ‘हिन्‍दी अधिकारियों की हिन्‍दी’ अथवा ‘सरकारी हिन्‍दी’ का फतवा जारी करने से पहले वे उस उल्‍लासजनित हिन्‍दीमय वातावरण से कुछ क्षण बाहर निकलकर किसी सरकारी कार्यालय में हिन्‍दी का प्रयोग कराने वाले किसी हिन्‍दी अधिकारी के कार्यों का और उस माहौल का प्रत्‍यक्षीकरण करें और तब हिन्‍दी की सुघड़-सलोनी सूरत की सौन्‍दर्य-वृद्धि के लिए साहित्यिकता का सुरमा, तत्‍सम शब्‍दों की मेंहदी, आलंकारिक प्रयोगों के आभूषण और शुद्धतावादी प्रसाधन सामग्रियों के लेप लगाने के अपने दृष्टिकोण के औचित्‍य पर विचार करें। शुद्ध हिन्‍दी का वितंडावाद खड़ा करने वाले लोग यह बतलाने की कृपा करें कि उनके निजी प्रयासों ने कितने हिन्‍दीतर-भाषियों को हिन्‍दी की ओर आकृष्‍ट किया है, कितने हिन्‍दीतर-भाषियों को उन्‍होंने हिन्‍दी सिखाई है।  यदि एक भी नहीं, तो उनके हिन्‍दी पांडित्‍य से हिन्‍दी को क्‍या मिला? दूसरी तरफ एक अदना-सा हिन्‍दी अधिकारी है जो  अपने सेवा-काल में सैकड़ों की संख्‍या में हिन्‍दीतर-भाषियों को हिन्‍दी सिखाकर हिन्‍दी में काम करने के लिए तैयार करा चुका होता है।

विशुद्ध हिन्‍दी के पक्षधर ये विद्वान ही अन्‍य भारतीय भाषाओं या विदेशी भाषाओं के लोकप्रचलित शब्‍दों को भी हिन्‍दी में अपनाने से परहेज रखते हैं जबकि हिन्‍दी का शब्‍द भंडार ही तत्‍सम, तद्भव, देशज और विदेशज शब्‍दों के योग-संयोग से बना है। ऐसे ही लोग स्‍टेशन, बैंक, चेक, रेल, ट्रेन, इंजन आदि की भी हिन्‍दी बनाने का आग्रह रखते हैं और वैसे अंग्रेजी शब्‍दों का हिन्‍दी वाक्‍यों में देवनागरी लिपि में ज्‍यों का त्‍यों प्रयोग करने वाले हिन्‍दी अधिकारियों की आलोचना करते हैं और हिन्‍दी के दुश्‍मन हिन्‍दी अधिकारी का फतवा जारी करते हैं। आखिर हमारी हिन्‍दी इतनी संकुचित क्‍यों हो कि वह किसी अन्‍य भाषा के शब्‍द को पचा न सके।

समावेशी हिन्‍दी की यदि हिन्‍दी के कोई महारथी हिन्‍दी अधिकारियों की हिन्‍दी कहकर खिल्‍ली उड़ाते हैं तो उड़ाएं, हम आश्‍वस्‍त हैं कि यही हिन्‍दी, हिन्‍दी को जिन्‍दा रख पाएगी क्‍योंकि हिन्‍दी मुट्ठी भर महापंडितों की नहीं, इस विशाल देश के विशाल जनमानस की भाषा है और हमें याद रखना होगा कि ऐसे ही शुद्धतावादी दृष्टिकोण रखने वाले महापंडितों ने विश्‍व की प्राचीनतम और समृद्धतम भाषाओं में परिगणित संस्‍कृत भाषा पर प्राणघातक हमला किया था जिसकी मर्मांतक पीड़ा आज भी वह झेल रही है। उस मूर्छित संस्‍कृत को ममीकृत शव का स्‍वरूप देकर अजायबघरों में इतिहास की वस्‍तु भर बना देने की साजिश भी रची गई। जब कभी भी उस ममीकृत शव में स्‍पन्‍दन होता है, उसकी बंद आंखों से आंसू नहीं, खून टपकता है और  उसका चेहरा लहूलुहान हो जाता है। आखिर कौन हैं वे लोग जो ब्रह्मांड वरेण्‍या संस्‍कृत माता की इस दुर्दशा के लिए जिम्‍मेदार हैंइतिहास अपने-आपको दोहराता हो तो दुहराए, हम संस्‍कृत का अतीत हिन्‍दी का भविष्य नहीं बनने देंगे।

हिन्‍दी बनाम शुद्ध हिन्दी का अघोषित शीत युद्ध छेड़ने वाले अध्‍यापकों, आलोचकों, लेखकों, साहित्‍यकारों और सम्‍पादकों से विनम्र आग्रह है कि वे कुछ ऐसे शब्‍दकोश तैयार करें जिनमें हिन्‍दी के तमाम रूपों का प्रतिनिधित्‍व करने वाले सहज- स्‍वाभाविक एवं लोक-प्रचलित मानक शब्‍द हों तथा वे कुछ ऐसी रचना करें जिससे हिन्‍दीतर- भाषी व्‍यक्तियों में भी हिन्‍दी सीखने-पढ़ने, लिखने-बोलने की स्‍वाभाविक ललक पैदा हो सके और जो हिन्‍दी के पाठकों की अभिरूचि को भी परिष्‍कृत कर सके। साहित्यिक हिन्‍दी का दंभ भरने वाले ये रचनाकार हिन्‍दी के लिए भूखे हिन्‍दी-जनमानस के इस सवाल का जवाब दें कि वह क्‍यों और कब तक सत्‍यकथाओं और अपराध कथाओं को पढ़कर अपनी पाठकीय भूख मिटाता रहे?  कब तक घिसी-पिटी और उबाऊ खबरों तथा टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ाऊ दिमाग की नस तोड़ू प्रोग्रामों से अपनी बौद्धिक वुभुक्षा को शांत करता रहे, क्‍यों फंतासी उपन्‍यास अपने पहले संस्‍करण में ही लाखों की संख्‍या में छपते हैं और बिक जाते हैं? यह दलील हम बहुत सुन चुके हैं कि हर क्षेत्र में अच्‍छी चीजों के खरीददार बहुत कम होते हैं। इस दलील से उनकी रचनाधर्मिता पाक-साफ नहीं करार दी जा सकती।

यदि वे साहित्‍यकार हैं तो क्‍या उनका कर्तव्‍य  नहीं कि वे ऐसी रचना दें जो अच्‍छी भी हों, रूचिकर भी हों, सरल और सस्‍ती भी हों? क्‍यों उनकी रचनाधर्मिता इतनी अशक्‍त हो गई है कि वे पाठकों की अभिरूचि को परिष्‍कृत कर सकने लायक कुछ भी लिख पाने में अपने को सक्षम नहीं पा रहे हैं ?  क्‍या उन्‍हें यह नहीं मालूम की पिछली सदियों में हिन्‍दी में कुछ ऐसी रचनाएं भी आईं जिन्‍हें पढ़ने के लिए हिन्‍दीतर भाषियों ने हिन्‍दी  सीखी, तो वैसा लेखन अब क्‍यों नहीं हो सकता ? क्‍या उन्‍हें नहीं मालूम की प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक अध्‍यात्‍म, दर्शन-राजनीति या समाज में जो भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, उनके मूल में साहित्‍य और साहित्‍यकार ही रहे हैं और वे साहित्‍यकार किसी राज्‍याश्रय में नहीं पले-बढ़े या राजकोष से सहायता लेकर उन्‍होंने लेखनी  या कागज नहीं खरीदा और उन्‍होंने राजा से यह गुहार नहीं लगाई कि हमें अर्थ दो ताकि तुम्‍हारे अनर्थ के लिए तुम्‍हारी जनता को हम नए शब्‍द और नए अर्थ दे सकें ।

यदि किसी को लगता है कि हिन्‍दी के साथ षडयंत्र हो रहा है तो सबसे पहले यह बताइए कि उसमें किस हद तक आप शामिल नहीं है। यदि यह मानते हैं कि सरकारी हिन्‍दी में अपच पैदा करने वाले शब्‍द भर दिए गए हैं, तो पहले यह तो बताइए कि विषयगत शब्‍दों का कौन-कौन-सा कोश आप तैयार कर रहे हैं या करा रहे हैं।  क्‍या गारंटी है कि शब्‍दावली निर्माताओं में यदि आप भी होते तो अपने कुछ पसंदीदा शब्‍दों को रख-रखवाकर संतुष्‍ट नहीं हो गए होते? सरकार ने तो सिर्फ यह कहा था कि सरल हिन्‍दी का प्रयोग हो। अब सरल हिन्‍दी की क्‍या परिभाषा हो, वह तो शब्‍दावली आयोग में सदस्‍य मनोनीत किए गए हिन्‍दी के उन विद्वानों को ही तय करना था, तो फिर  इसके लिए सरकार या हिन्‍दी अधिकारियों को क्‍यों कोसते हैं आप? इसके अतिरिक्‍त यह भी विचारें कि कोई भी भाषा सरल या मुश्किल नहीं होती, कोई भी शब्द सहज या कठिन नहीं होता, बल्कि परिचित या अपरिचित होते हैं। साथ ही, अपने गिरेवान में झांक कर भी देखें कि जिस अंग्रेजी को हजारों-लाखों खर्च करके वर्षों पढ़ते रहे, उसे तो आप शुद्ध लिख-बोल नहीं सकते और हिन्‍दी सीखने में परिणाम तत्‍काल चाहते हैं। कुछ इसके शब्‍द यदि गूढ़ लगते हैं तो उन्‍हें सीखने में कुछ अभ्‍यास क्‍यों नहीं करते? उनसे परिचय क्यों नहीं बढाते । अंग्रेजी तो चोटी को खंभे में बांधकर पढ़ते रहे, परन्‍तु हिन्‍दी सीखने में अलादीन के चिराग की अपेक्षा रखते हैं।

लेकिन यहां तो हिन्दी की आस्तीन में ही  ….?

हिन्दी दिवस की बधाइयां और अशेष शुभकामनाएं !

 

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

9310249821

 

 

 

 

पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के मायने

पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या के मायने

असहमत होना बौद्धिक स्तर पर विचारवान होने का प्रमाण है और असहमति का सम्मान करना मानसिक स्तर पर स्वस्थ होने का सबूत, इसीलिए हर चिंतनशील व्यक्ति के पास ‘असहमति का अधिकार’ तथा हर संवेदनशील व्यक्ति के पास ‘असहमति का सम्मान’ करने का धैर्य होना ही चाहिए, वरना आदमी दोपाया जानवर तो हो सकता है, सामाजिक प्राणी कदापि नहीं ।

कन्नड भाषा की निर्भीक और बेबाक पत्रकार गौरी लंकेश की कुछ सिरफिरों ने कल उनके घर पर ही गोली मार कर हत्या कर दी। गौरी अपने पिता और कन्नड साहित्य में यू. आर. अनंतमूर्ति एवं पीसी तेजस्वी के साथ एक नई धारा का सूत्रपात करने वाले प्रसिद्ध लेखक पी. लंकेश द्वारा स्थापित कन्नड समाचार पत्र ‘लंकेश पत्रिके’ की सम्पादक थीं। वे तीनों लेखक राम मनोहर लोहिया के विचारों से प्रभावित थे और समानता, स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता तथा सत्ता के सम्मोहन से निर्लिप्त सोच के पोषक थे। भ्रष्ट सत्ता और साम्प्रदायिक सोच का विरोध व परदाफाश करना तथा कमजोर तबके एवं उपेक्षित लोगों की आवाज़ बनना उनकी विचारधारा के मूल तत्त्व थे।  ‘लंकेश पत्रिके’ उन्हीं प्रतिबद्धताओं का संवाहक रहा है। इसीलिए गौरी लंकेश की हत्या केवल एक महिला अथवा लेखक या पत्रकार की हत्या नहीं है, बल्कि भ्रष्ट सत्ता, साम्प्रदायिक शक्तियों, फासिस्ट सोच एवं सामाजिक शोषण के खिलाफ उठने वाली असरदार आवाज़ की हत्या है, ‘असहमति के अधिकार’ की हत्या है।

गौरी लंकेश की हत्या को महाराष्ट्र में हुई नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर, गोविन्द पनसारे और कर्नाटक में ही हुई एमएम कलबुर्गी की हत्या की एक अगली कडी के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि उन लोगों ने भी तो अन्धविश्वास, साम्प्रदायिकता, धार्मिक उन्माद, भ्रष्ट सत्ता और शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाई थी।

मिल रही खबरों के अनुसार केन्द्र में सत्तासीन पार्टी के कुछ नेताओं के गौरी लंकेश के खिलाफ मानहानि के मुकदमे चल रहे थे तथा हिन्दुत्ववादी संगठनों से गौरी को जान से मारने की धमकी भी मिल रही थी। गौरी की हत्या का सच और उसके असली हत्यारों का चेहरा तो कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद सामने आएगा , फिर भी , आशंकाओं और संदेहों की ऊंगली किस तरफ उठेगी, उसके लिए न तो मीडिया ट्रायल की जरूरत है और न ही चौक चौराहों पर सुनाए जाने वाले फैसलों की; जरूरत है तो केवल आईने से धूल झाड कर उसे साफ करने की और ईमानदारी से उस आईने में अपना चेहरा देखने की।

‘अमन’ श्रीलाल प्रसाद

बोल , हरदी घोंघा  बोल

 

बोल , हरदी घोंघा  बोल

मैं बचपन में अपने गांव के अखाडे में कुश्ती सीखने भी जाता था। घुडसवारी, तीरंदाजी , निशानेबाजी, तलवारबाजी और लट्ठबाजी यानी गांव में होने वाले हर खेल में शामिल रहता था। घुडसवारी भैंस की पीठ पर बैठ कर होती थी, कभी – कभी धोबी के गधे की पीठ पर भी हम सवारी गांठ लेते थे । तीरंदाजी के लिए एक पुरानी बाल्टी को कटवा कर नुकीले तीर लोहार से बनवाए थे, निशानेबाजी गुलेल, शीशे की गोली, लट्टू तथा ढेला फेंक कर आम, जामुन आदि तोडने में होती, तलवारबाजी लकडी की तलवार और बांस के पैने से गद्दका पर सीखी जाती, पतंगबाजी का नशा तो कुछ और था ही। किंतु सबसे मजेदार था कुश्ती लडना। कुश्ती अखाडे के अलावा कहीं भी, कभी भी, आमीर खान की दंगल वाली चुनौती की स्टाइल में, हो जाती थी। जरूरी नहीं कि वह घोषणा कर के ही हो, किसी भी बात पर मनमुटाव होने पर झगडा हो जाता और वह झगडा प्राय: कुश्ती में बदल जाता।

गांव में झग़डे वाली कुश्ती आज की फ्री स्टाइल से भी ज्यादा घातक होती। एक पक्ष दूसरे को पछाड देता , तब भी जीत हार की घोषणा नहीं होती; यदि कोई व्यक्ति अपने प्रतिद्वन्द्वी को पछाड कर, चित कर उसकी छाती पर बैठ जाए , तब भी जीत की घोषणा नहीं होती; उसके लिए जरूरी होता था कि नीचे वाला व्यक्ति बोल कर स्वीकार कर ले कि वह हार गया, उसे ‘हरदी घोंघा मानना’ कहते थे यानी पटखनी खाया हुआ व्यक्ति बोल दे ‘हरदी घोंघा’ तभी उसे हारा हुआ और ऊपर वाले को जीता हुआ माना जाता था। जीतने वाला यदि ज्यादा जिद्दी बदमाश टाइप का हुआ तो हारने वाले से तीन बार ‘हरदी घोंघा’ बोलवाता था। खेल – खेल में थोडी – बहुत सीखी गईं उन सभी चालों की कुछ – कुछ चालें मुझे समझ में आती हैं।

अब मेरे फेसबुक के इसी टाइम लाइन पर 28 जुलाई का       “सियासी हरम में बेगमों की सौगात” शीर्षक वाला मेरा पोस्ट देखें, जिसमें बिहार सरकार से इस्तीफा दे कर नीतीशा कुमार द्वारा भाजपा के समर्थन से नई सरकार बनाए जाने की बात मैंने की थी, उसे पढे वगैर इस पोस्ट को नहीं समझा जा सकेगा। मैंने उस पोस्ट में लिखा था कि बादशाह विवाह कर, जीत कर, खरीद कर अथवा छीन कर बेगमें लाते थे और अपने शाही हरम में बेगमों की संख्या बढाते थे, वैसा करने से उनकी शान-वो-शौकत में इजाफा होता था। बादशाह के लिए यह जरूरी नहीं होता था कि उस बेगम को वह विवाहिता होने का हर सुख दे ही दे , हां, आभूषण, धन – दौलत और जागीरें तक भी दे दी जाती थीं, किंतु उन बेगमों के पास नहीं होता था तो बादशाह का प्यार। वैसे ही शाही हरम में जनता दल (यू) शामिल हुई थी। केन्द्रीय मंत्रीमंडल में ताज़ा फेरबदल के जश्न में उस नई नवेली बेगम को न्योता तक न दे कर बादशाह ने उसकी असली औकात बता दी कि गहने ले, सोलहो सिंगार भी कर ले, परंतु शौहर के सामने बेगम होने का हक जताने की जुर्रत करना क्या, मुगालता भी मत पाल।

पत्रकार पूछते तो प्रवक्ता बोलते रहे- “अभी समय है, निमंत्रण आ जाएगा”, शपथग्रहण समारोह के एक दिन पहले पत्रकार ने पूछा – “ उनका संदेशा आया”? जवाब मिला  – “ संदेशे आते हैं, संदेशे जाते हैं, लेकिन वो नहीं आते, फिर भी उम्मीद तो है ”, अंतिम दिन शाम को पत्रकार ने पूछा – “ चिट्ठी आई”? जवाब मिला – “ आएगी जरूर चिट्ठी मेरे नाम की, तब देखना ” !

रात में खबरिये ने पूछा – “ आई ”? जवाब मिला – “ लो आ गई उनकी याद , वो नहीं आए”।

और आज, नई बेगम साहिब ने यह कह कर ‘हरदी घोंघा; बोल दिया है कि हरम में शामिल होने के समय बेगम – ए – खास का ओहदा देने यानी मंत्रीमंडल में शामिल होने की बात हुई ही नहीं थी तो उसे ले कर लोग हायतोबा क्यों मचा रहे हैं?

किसी को क्या गरज पडी है जी , कोई खुद बादशाहत छोड कर गुमनाम बेगमात की जमात में  शामिल होता रहे। अवाम को तो यह समझ है कि यह बादशाह, शाम, दाम, दण्ड, भेद, चाहे जैसे भी हो, तीसमार खां बनने वालों से हरदी घोंघा बोलवाए वगैर मानता नहीं।

हालांकि अब खुद बादशाह की बादशाहत की बाढ भी ढलान पर है, बादशाह तो जमीनी हकीकत समझने लगा है, किंतु दास जन ढलान को उठान बताने में ही लगे हुए हैं, यानी मुद्दई सुस्त, गवाह चुस्त !

ओणम, अनंत चतुर्दशी और शिक्षक दिवस की

हार्दिक शुभकामनाएं !

 

“अमन” श्रीलाल प्रसाद

04 सितम्बर 2017

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