मुद्दों की अदलाबदली

 

पता नहीं क्यों, आज टीवी पर समाचार देखते-सुनते समय मुझे सत्तर के दशक के दमदार कवि सुदामा पाण्डेय ‘धूमिल’ की कविता “भाषा की रात” कैसे याद आ गई ? पहले उस कविता की कुछ पंक्तियां ले लेते हैं, फिर आगे की बातें करते हैं :-

 

चन्द चालाक लोगों ने

जिनकी नरभक्षी जीभ ने

पसीने का स्वाद चख लिया है

बहस के लिए

भूख की जगह भाषा को रख दिया है ।

उन्हें मालूम है कि भूख से भागा हुआ आदमी

भाषा की ओर जाएगा

उन्होंने समझ लिया है कि

एक भुक्खड जब गुस्सा करेगा

अपनी ही अंगुलियां चबाएगा।

 

मुद्दे पर आने के पहले आज का वह समाचार भी जान लें । राहुल गांधी ने आज सोमनाथ मंदिर में पूजा अर्चना की। भाजपा की ओर से बताया गया कि राहुल जी ने मंदिर के रजिस्टर में स्वयं को गैर – हिन्दू लिखा है, कॉंग्रेस उस पर अपनी तरह का जवाब दे रही है।

अब, बहुत पुरानी बातों को याद करें। कश्मीरी ब्रह्मण पं. जवाहर लाल नेहरू की बेटी इंदिरा जी ने एक पारसी युवक फीरोज़ से शादी की थी। उसी के आधार पर इंदिरा गांधी को एक पारसी यानी गैरहिन्दू बताते हुए पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में प्रवेश करने से रोक दिया गया था क्योंकि उस मंदिर को केवल हिन्दुओं के प्रवेश के लिए आरक्षित बताया जाता है। बाद में शुद्धीकरण के माध्यम से इंदिरा जी द्वारा हिन्दू धर्म स्वीकार करने की खबरें आम हुई थीं। फीरोज़ गांधी की मृत्यु 1960 में ही हो गई थी। उन्हीं फीरोज़ गांधी और इंदिरा गांधी के बेटे राजीव गांधी थे, जिन्होंने एक ईसाई सोनिया जी से शादी की और राहुल गांधी उसी दम्पती के पुत्र हैं, ये बातें दुनिया जानती है।

आज प्रधान सेवक जी को किसी के परनाना, नाना, बाबा का उल्लेख कर किसी का मज़ाक उडाते भी टीवी पर देखा सुना । कमाल है ! यह तो बिहार में डीएनए की खोज के माफिक है!! इस झल्लाहट की वजह क्या हो सकती है? क्या हालात वहां तक पहुंच गए हैं ? परिणाम बिहार की तरह ही होने वाले हैं क्या ???

अब फिर से राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर जाने संबंधी आज के समाचार पर आते हैं।

भाजपा ने राहुल गांधी को गैर – हिन्दू बता कर सियासी बहस का मुद्दा बना दिया है। भाजपा द्वारा उस मुद्दे को तूल दिए जाने की कॉग्रेस भर्त्सना कर रही है। अन्दर की बात तो वे दोनों और मंदिर प्रशासन ही जानें , हमारे लिए उन बातों का कोई महत्त्व नहीं है। फिर भी, टीवी के विभिन्न चैनलों पर चिल्ल पों सुन कर कुछ सवाल जेहन में उठने लगे हैं।

धर्म-परिवर्तन समाज में एक पुराना हथकण्डा रहा है। लव ज़िहाद की अगलगी में अखिला हिन्दू का मुस्लिम युवक से शादी कर हदिया बन जाना आग में घी का काम कर रहा है। उस मुद्दे ने सुप्रीम कोर्ट तक का मुंह देख लिया है। हिन्दुत्व के झण्डावरदार हिन्दुओं द्वारा ईसाई, बौद्ध या इस्लाम धर्म कबूल करने की घटनाओं को हिन्दुत्व पर शाजिसी प्रहार बता रहे है, हालांकि हिन्दुओं को हिन्दू बनाए रखने के लिए अन्य धर्मों का विरोध करने के अलावा उनके स्तरों पर क्या प्रयास किए जा रहे हैं, पता नहीं चलता।

अब, इस मामले को आज के सामाचार से जोडें।

राहुल गांधी के पूर्वज किस धर्म के अनुयायी थे और खुद राहुल गांधी आज किस धर्म को मानते हैं, यह अन्दरूनी मामला न हमारे किसी काम का है और न उसमें हमारी कोई दिलचस्पी है। हमारा सवाल तो यह है कि राहुल गांधी के सोमनाथ मंदिर प्रवेश पर हल्ला बोलने वाले लोग आखिर कहना क्या चाहते हैं ? क्या वे यह कहना चाहते हैं कि राहुल जी गैर – हिन्दू हैं ? क्या वे यह पूछना चाहते हैं कि एक गैर – हिन्दू ने सोमनाथ मंदिर में प्रवेश क्यों किया ?  क्या उन्हें इस बात पर ऐतराज़ है कि एक गैर – हिन्दू खुद को हिन्दू बताने की जुर्रत क्यों कर रहा है? क्या वे यह सवाल उठाना चाहते हैं कि एक गैर – हिन्दू व्यक्ति हिन्दू क्यों बन रहा है ?

कमाल है, उन्हें एक अखिला के हदिया बन जाने पर भी ऐतराज़ है और उसके उलट एक राहुल फीरोज़ राजीव से विशुद्ध राहुल गांधी बनने पर भी ऐतराज है! आखिर किसी को किसी ऐतराज किससे है – जवाहर से, इंदिरा से, फीरोज़ से, राजीव से अथवा राहुल गांधी यानी राहुल और गांधी से ? उन्हें तो खुश होना चाहिए कि (उनके अनुसार) एक गैर – हिन्दू आदमी हिन्दू बन रहा है ! लेकिन नहीं, शायद उन्हें यह भय सता रहा है कि राहुल भी खुद को हिन्दू सिद्ध करने में सफल हो गया तो हिन्दुत्व पर उनके एकाधिकार का बंटवारा हो जाएगा और सोमनाथ, द्वारिका आदि जैसे मंदिरों वाले राज्य के आगामी विधान सभा चुनाव में हिन्दू मतदाताओं का रूझान भी अपनी ओर मोडने में वह सफल हो जाएगा। और तब, तब 22 वर्षों का तमगा छिन जाएगा, और वे ऐसा कदापि नहीं चाहते । क्या यही कारण है कि राहुल को गैर – हिन्दू रहने देने में ही उन्हें अपना कल्याण दिख रहा है?

शायद इसीलिए बेरोजगारी मिटाने के लिए रोजगार सृजन , भूख मिटाने के लिए अन्न के उत्पादन , प्यास मिटाने के लिए पेय जल को सुलभ और सुगम बनाने के उद्यम तथा राज्य के सर्वांगीन विकास को मुद्दा बनाने के बदले जाति और धर्म को मुद्दा बनाया जा रहा है !

आज का समाचार देखते – सुनते समय धूमिल की कविता ऐसे ही प्रसंगों में मुझे अनायास याद आ गई।

सचमुच भेंड ही क्यों नहीं बन जाते

 

  • सुना है कि पृथ्वी लोक में भेंड नामक एक सीधा-सादा , निर्दोष और मासूम जानवर है।

 

  • यह भी सुना है कि भेड के पिछले हिस्से का मांस काट – काट कर यदि कोई मांसाहारी जानवर खाता भी रहे , तब भी वह नहीं मिमियाती , परंतु सामने से कोई उस पर वार करे तो अपने सिर से ढाही मार – मार कर बडे बडों को धराशायी कर देती है।

 

  • और यह देख भी लिया कि पिछवाडे पर मार से बिलबिलाते लोग तिलमिलाने के बदले कहते रहे “ तकलीफ तो है परंतु काला धन की वापसी के लिए , भ्रष्टाचार की समाप्ति के लिए, कैशलेश लेनदारी-देनदारी के लिए और आतंकवाद के खात्मे के लिए ऐसी तकलीफें हंसते – हंसते सह लेंगे ”। और सह भी लिया ।

 

  • सबने अब तक यह भी देख लिया कि “आ गया, चला गया, समाप्त हो गया” वाले जुमले भी चले गए।

 

  • तो क्या अब चौतरफा और सामने की मार से भी नहीं तिलमिलाएंगे ?

 

  • और क्या केवल मासूम भेंड समझने वालों को इस बार भी ढाही मार कर नहीं समझा पाएंगे ? मर्जी आपकी !

कमाल है –

 

 

कमाल है –

 

  • 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में डीएनए पर शोध करने वाले 2017 के गुजरात चुनाव में विरोधियों के बयानों का शव-परीक्षण कर रहे हैं !

 

  • लोग भूले नहीं हैं कि जिन्दा डीएनए की चीडफाड करने वालों ने न तो माफी मांगी थी और न ही खेद व्यक्त किया था, बल्कि सारी ताकत डीएनए शल्य-क्रिया का औचित्य सिद्ध करने में लगा दी थी ।

 

  • हालांकि बिहार के मतदाताओं ने अश्वमेधी घोडे की लगाम थाम कर औचित्य अनौचित्य का अंतर समझा दिया था।

 

  • उसके बाद ही यूपी में कब्रिस्तान और श्मशान जैसे शब्दों का इज़ाद हुआ था, आज फिर वैसे ही शब्द आकार लेने लगे हैं।

 

  • इसीलिए विपक्ष होशियार रहे और बयानवीरों पर लगाम लगावे ताकि उनका ‘संभवामि’ अश्वमेधी घोडा बेलगाम दौड लगा सके।

 

  • अभी भी कई सौ घंटे शेष हैं, अतीत की शौर्य-गाथाओं के वीयावान जंगलों में भटक रही चेतना की घर वापसी कराओ !
  • अतीत की भूलों को भूल से भी मत दुहराओ !!

कमियों को खूबियों में तबदील करने की महारत

कमियों को खूबियों में तबदील करने की महारत
 
कॉग्रेस के पास दो – तीन प्रवक्ताओं को छोड कर टु दि प्वाइंट बहस करने वाले प्रवक्ताओं का टोटा है, वरना भाजपा की खतरनाक कमियों को उजागर करने में वह पिछड नहीं जाती ।
जिन मुद्दों को ले कर विपक्ष सत्तापक्ष की धज्जियां उडा सकता था, विपक्ष के बेतरतीब बयानों के कारण उन्हीं मुद्दों से सत्तापक्ष अपनी चतुराई से रिसते हुए घावों पर मल्हम का काम ले रही है।
 
जो और जैसी गलती माननीय प्रधानमंत्री जी ने बिहार चुनाव के दौरान की थी, वही और वैसी ही गलती गुजरात चुनाव के दौरान कॉंग्रेस कर रहा है; कम से कम परिणामों को ही याद क्यों नहीं रखते लोग ?

कमियों को खूबियों में तबदील करने की महारत

कॉग्रेस के पास दो – तीन प्रवक्ताओं को छोड कर टु दि प्वाइंट बहस करने वाले प्रवक्ताओं का टोटा है, वरना भाजपा की खतरनाक कमियों को उजागर करने में वह पिछड नहीं जाती ।
जिन मुद्दों को ले कर विपक्ष सत्तापक्ष की धज्जियां उडा सकता था, विपक्ष के बेतरतीब बयानों के कारण उन्हीं मुद्दों से सत्तापक्ष अपनी चतुराई से रिसते हुए घावों पर मल्हम का काम ले रहा है।

जो और जैसी गलती माननीय प्रधानमंत्री जी ने बिहार चुनाव के दौरान की थी, वही और वैसी ही गलती गुजरात चुनाव के दौरान कॉंग्रेस कर रही है; कम से कम परिणामों को ही याद क्यों नहीं रखते लोग ?

हंसी नहीं आती

हंसी नहीं आती

(एक)

मुझे हंसी नहीं आती

मैं हंस नहीं पाता

बचपन में हर बात पे हंसी आती थी

मैं खूब हंसता था –

 

जब कोई साथी फिसल जाता

गिर जाता, रोने लगता

चोट से बिलबिलाने लगता

खेल में हार जाता

परीक्षा में फेल हो जाता

मास्टर जी की मार से

उसका पाजामा गिला हो जाता

मैं आंखें फाड – फाड कर देखता

हंसी रोके नहीं रूकती

बेतहासा हंस देता !

 

(दो)

 

अब, जब भी सामने आती है

बचपन जैसी कोई घटना

यानी कोई आदमी

बोझ से दब कर फिसल जाए

बीमार कमजोर बदन सम्भाल नहीं पाए

लडखडा कर गिर जाए

गरीबी की मार से कलपने लगे

भूख से बिलबिलाने लगे

थक हार कर घुटने टेकने लगे

बहुमंजिली इमारतों के लिए

ईंट कंकड बालू सीमेंट

माथे पे ले जाती कोई औरत

टोकरी सम्भाले तो आंचल फिसल जाए

मटमैले फटे पुराने कपडों में

अंग अंग विद्रोही हो जाए

मैं आंखें उठा नहीं पाता

कभी नम हो जाती हैं आंखें

कभी आंखों में खून उतर आता है

मुझे हंसी नहीं आती

मैं हंस नहीं पाता !!

 

(तीन)

 

मैं समझ नहीं पाता

क्यों किसी के दुख में दुखी हो जाता हूं

किसी की खुशी में खुश हो लेता हूं

पर क्यों किसी पे हंस नहीं पाता

और कैसे कोई वक्ता प्रवक्ता

बना लेता है

राष्ट्रीय मान को बहुराष्ट्रीय मजाक ?

घर में, बाहर में, देश में, विदेश में

कैसे लगा लेता है अंतरराष्ट्रीय ठहाका

अपने ही भूखे नंगे लोगों की लाचारी पर

अपनी ही बदहाली  पर

घडी – घडी कैसे कर लेता है वैश्विक तमाशा ?

 

मैं समझ नहीं पाता

बचपन में गलत था

या आज गलत हूं?

क्यों मुझे हंसी नहीं आती

क्यों मैं हंस नहीं पाता !!!

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार

संभव है कि आप भ्रष्ट नहीं हों

क्योंकि कोई भी नाजायज राशि

आप को लालायित या लोभित नहीं करती।

 

संभव है कि आप व्यभिचारी नहीं हों

क्योंकि कोई भी रूपसी

आपको आकर्षित या मोहित नहीं करती।

 

संभव है कि आप दुराचारी भी नहीं हों

क्योंकि पाप-पुण्य की नैतिकता

आपको भटकने नहीं देती ।

 

संभव है कि आप अनाचारी भी नहीं हों

क्योंकि आपके मन की न्यायप्रियता

आपको डिगने नहीं देती ।

 

यह भी संभव है कि आप

निर्दयता और प्रतिहिंसा से नफरत करते हों

क्योंकि दया और संवेदनशीलता आपको नियंत्रित रखती है।

 

परंतु क्या

प्रशंसा के प्रहार से आप खुद को बचा पाते हैं?

भेद कर पाते हैं आप

सदाचार का शिकार करने वाली प्रशंसा और

गुणवत्ता को उभारने वाली  प्रशंसा में ?

क्या विश्वामित्र को तप – च्युत करने वाली अप्सरा

मेनका से भी अधिक मनमोहक

विषकन्या से भी अधिक मारक

प्रमादी प्रशंसा से निर्लिप्त हैं आप ?

नहीं ?

तो आप आपादमस्तक

भ्रष्टाचार के दलदल में धंसे हुए हैं।

मेरे मन का कुत्ता

मेरे मन का कुत्ता
 
जोर से, बहुत जोर से
भौंकता है मेरे मन का कुत्ता
जब भी मेरे अन्दर छुपा
इच्छा-जनित कोई चोर सुगबुगाता है
अथवा बाहर का कोई
लालची भयाकुल सुविधाभोगी चोर
सेंधमारी कर मेरे अन्दर घुसपैठ करना चाहता है ।
 
वफादारी सीख ही रहा था मैं
कि सजग सतर्क हो गया मेरे मन का कुत्ता
उसने अपना और कोई गुण या अवगुण
हथियाने नही दिया मुझे ।
 
डपट कर भौंका मेरे मन का कुत्ता –
“बात करता है धर्म की, समाज की
राष्ट्र के प्रति वफादारी की
चिंतनशील, मननशील
सामाजिक प्राणी होने की –
पहले खुद के प्रति ईमानदार होना तो सीख
आदमी तो हो ले
फिर कुत्ता बनने की सोचना ” ।
 
अब और भी अधिक जोर से
भौंकता है मेरे मन का कुत्ता
क्योंकि कुत्ता जानता है कि
उसका मालिक यदि खुद कुत्ता बन गया
तो कुत्ता पालने की उसकी औकात जाती रहेगी
और वह कुत्ता खुद बेरोजगार हो जाएगा ।
मेरे मन के कुत्ते ने
मुझे कुत्ता नहीं बनने दिया।
 
अब मैं निश्चिंत हूं
मेरे मन का कुत्ता
न तो मुझे कुत्ता बनने देगा
और न ही
बाहर के किसी कुत्ते को अन्दर आने देगा
जो भी थोडी-सी वफादारी मैं सीख सका
वह सुरक्षित है
क्योंकि
जोर से, बहुत जोर से भौंकता है
मेरे मन का कुत्ता॥

सोसल मीडिया : वरदान है ! ? ।

सोसल मीडिया : वरदान है ! ? ।
 
मैं तो मानता हूं कि सोसल मीडिया का उपलब्ध होना मानव जाति के लिए एक अनिर्वचनीय वरदान है, 21वीं सदी की अकल्पनीय उपलब्धि है, अभिव्यक्ति की आज़ादी का सपना सकार करने का सबसे आसान और प्रभावकारी साधन है।

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