हार्दिक बधाइयां शुभकामनाएं शुभाशीष !!          

हार्दिक बधाइयां शुभकामनाएं शुभाशीष !!

 

मेरी सबसे छोटी बेटी शिप्रा आर्यन ने आज शुक्रवार दिनांक 21.12.2017 को प्रात: 6.21 बजे मदरहुड बंगलोर में पुत्री को जन्म दिया । मेरी दौहित्री (नतीनी) का हार्दिक स्वागत ! अभिनन्दन !!

बेटी शिप्रा आर्यन और दामाद अभिषेक आर्यन को लक्ष्मी, सरस्वती एवं शक्ति का समन्वित स्वरूप –  पुत्री प्राप्त होने पर हार्दिक बधाइयां , शुभकामनाएं व शुभाशीष तथा आदरणीय समधी जी एवं समधन जी को भी दादा – दादी बनने का सौभाग्य प्राप्त होने पर हार्दिक बधाइयां और शुभकामनाएं।

मेरी नतीनी सदा सर्वदा स्वस्थ–प्रसन्न रहे, दीर्घजीवी हो, सौभाग्य, यश और ऐश्वर्य उसकी सहचरी हो –

नाना-नानी, मामा-मामी एवं समस्त पूर्वजों, स्वजनों-परिजनों एवं शुभैषियों के आशीर्वाद उसके साथ हैं! ईश्वर की अनुकम्पा उस पर सदा बनी रहे और आप सबके आशीष उसे प्राप्त होते रहें!

हार्दिक बधाइयां, शुभकामनाएं और अशेष शुभाशीष !!          

ओपीनियन लांड्रिंग (एकांकी नाटक)

ओपीनियन लांड्रिंग (एकांकी नाटक)

डिस्क्लेमर ( ‘ओपीनियन लांड्रिंग’) नामक इस एकांकी नाटक का किसी भी चुनावी राजनीति से प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई सरोकार नहीं है, कथानक और पात्र बिल्कुल काल्पनिक हैं। धरती , आकाश या पाताल लोक में किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से यदि कहीं कोई साम्य दिख जाए तो वह महज संयोग होगा, उसके लिए लेखक उत्तरदायी नहीं होगा)

अंक एक : दृश्य एक

(परदा उठता है, सूत्रधार का प्रवेश)

 

सूत्रधार : मेहरबान ! कद्रदान !! शाहबान !!! सावधान,  दुनिया भर के शब्दकोशों में आज

एक नया शब्द जुडने वाला है , जुड रहा है, जुड गया है। स्वागत कीजिए, लेकिन

पहले स्वागत – अभिनन्दन नन्दी जी का।

 

(नन्दी का प्रवेश)

 

नन्दी : वह कौन-सा शब्द है सूत्रधार ?

 

सूत्रधार:ओपीनियन लांड्रिंग’’

 

नन्दी : ओपीनियन और लांड्रिंग , ये दोनों शब्द तो पहले से ही अंग्रेजी

शब्दकोशों में हैं!

 

सूत्रधार: होंगे , लेकिन इतिहास में पहली बार मेरे नाटककार ने दोनों को एक

साथ मिला कर एक नया शब्द बनाया है – ओपीनियन लांड्रिंग। मेरा

नाटककार जो भी करता है, वह इतिहास में पहली बार ही होता है।

 

नन्दी : ‘मनी लांड्रिंग’ शब्द तो सुना था परंतु ‘ओपीनियन लांड्रिंग’ तो पहली बार

सुन रहा हूं। लांड्रिंग का मतलब धुलाई, सफाई , कपडे की धुलाई, मनी लांड्रिंग का

मतलब काले धन की धुलाई यानी सफाई अर्थात काले धन को सफेद

करना, मतलब दो नम्बर को एक नम्बर बनाना होता है, कभी-कभी

भाई लोग सामने वाले की भी बात – बेबात लांड्रिंग कर

देते हैं, मगर तुम्हारे ‘ओपीनियन लांड्रिंग’ का मतलब क्या है ?

 

सूत्रधार: सही दिशा में जा रहे हैं नन्दी महाराज आप ! ठीक समझ रहे हैं !!

       ‘ओपीनियन लांड्रिंग’ का मायने है ‘मन की सफाई’, विचारों की सफाई,

        सलाहों की सफाई, रायशुमारी की सफाई, सफाई की सफाई, क्योंकि

        जो दिखता है, वह है नहीं, जो नहीं दिखता, वह था नहीं और जो वे

        कहते हैं, वह होता नहीं, फिर भी, कुछ न कुछ तो होता है, उसी ‘कुछ न

        कुछ’ को अपनी ओपीनियन बता देना और पहले बताई गई

        ओपीनियन को लोगों का मन बदलने के लिए ‘मन की बात’ बना देना

        ही ‘ओपीनियन लांड्रिंग’ है।

 

नन्दी : समझ गया , समझ गया, भलीभांति समझ गया यानी अपना उल्लू

सीधा करना। गंदा है, पर धंधा है, इसीलिए चलता है, यह भी चलेगा।

भगवान भोलेनाथ भला करें ! जय बाबा सोमनाथ !! द्वारिकाधीश

तुम्हारे नाटक के लिए सफलता के द्वार खोलें !!! जय हो !

(परदा गिरता है)      

 

 

                          दृश्य दो

(कलाकारों की दो टोलियां मेला में ‘तमाशा दिखाओ’ प्रतियोगिता में भाग ले कर थके-हारे

लौटी हैं। विजयी टीम के दो अहम कलाकार घर पहुंच कर वार्तालाप करते हैं)

 

गप्पू : अरे ओ शप्पू ! वो कितने सितारे थे ?

शप्पू : एक सितारा और मिट्टी के तीन दीपक  – कुल चार, उस्ताद !

गप्पू : वो चार थे और हम चवालीस, फिर भी हमारे घर जुगनू जैसी ही रोशनी

और उसके घर सफेदी की चमकार ! क्या समझ रखा है, उस्ताद खुश

होगा ? शाबाशी देगा ??

शप्पू : हमारे पास चवालीस नहीं, बयालीस सितारे ही थे उस्ताद !

दो तो हम खुद ही थे, आप सूरज और मैं चंदा !

गप्पू : कोई दीपक नहीं था क्या हमारे पास ?

शप्पू : नहीं उस्ताद। आप ही का हुक्म था कि चांद, सूरज और सितारों के होते

हुए मिट्टी के दीपकों की क्या औकात ! उनका भाव न बढाया जाए !

(कुछ सोचते हुए)

गप्पू : अरे ओ शप्पू !

शप्पू : जी, उस्ताद !

गप्पू : आज की आमदनी कितनी हुई है ?

शप्पू : एक कम सौ उस्ताद !

गप्पू : अब तक की कुल कमाई कितनी थैलियों में है?

शप्पू : एक कम बीस में उस्ताद !

गप्पू : और वो इसलिए कि एक कम तीस कोस दूर जब कोई पप्पू बाजीगर बनने की

कोशिश करता है तो तमाशबीन समझाते हैं, “चुप हो जा पप्पू, नहीं तो गप्पू आ

जाएगा”, और एक तुम हो कि इतने सितारों के होते हुए भी अपने घर में अंधियारा

फैला रखे हो। तुमने हमारा नाम मिट्टी में मिलाय दियो। पप्पू के मिट्टी के दीयों में

तेल और बाती भी नहीं, तमाशायियों ने उसे उतने पैसे भी नहीं दिए, फिर भी उसके

घर दिवाली जैसी रौनक है और हमारे घर सितारों के बावजूद अंधियारा ! हमारी जीत

में भी लोग हार बता रहे हैं और उसकी हार में भी जीत का मज़ा !

शप्पू : वह इसलिए उस्ताद कि मुकाबला हमारे इलाके में था, दर्शक हमारे अपने थे। फिर भी

हम हारते–हारते जीते । दर्शकों ने शायद घर की मुर्गी को दाल बराबर समझ लिया।

और सच पूछिए उस्ताद तो वास्तव में हम घर के जोगडा ही हैं, बाहर वालों ने हमें

जोगी बना रखा है, यह सब भक्तों का कमाल है।

 

गप्पू : जो भी हो, केवल नाम के सितारे कलाकारों का जमावडा कर रखा है तुमने ? इसकी

सजा मिलेगी, बरोबर मिलेगी ।

शप्पू : मैंने आपका नमक खाया है उस्ताद  !

गप्पू : तो अब बोली खा ।

शप्पू : दुहाई उस्ताद ! वह बोली आप ही को लगेगी, क्योंकि आप मुझमें और

मैं तो आप में ही हूं ! दूसरे सितारे तो केवल नाम के थे ।

गप्पू : ठीक है, ठीक है, बडी हाडतोड मेहनत हुई है, इतनी मेहनत तो बाहरी इलाके में

तमाशा करने में भी नहीं हुई थी। हम थक गए हैं, चलो आराम करें,कोई भजन सुना।

शप्पू : (गाल बजाते हुए) ‘आराम है हराम’ प्रभु जी ….  !

गप्पू : अरे चुप्प ! इसे तो पप्पू की टोली वाले गाते हैं । तुम नकल काहे

मारता है जी ? अरे बुडबक, नकल मारना है तो मार, लेकिन उसे

असल बता और इस तरह बता कि पब्लिक को लगे कि इतिहास में

पहली बार हम ही यह भजन सुना रहे हैं।

शप्पू : इतिहास की शुरुआत कहां से मानें उस्ताद ?

गप्पू : अरे चांद के चचेरे चाचा ! इतना भी नहीं समझ पाए ? हम जहां

खडे होते हैं, इतिहास वहीं से शुरू होता है।

शप्पू : तो फिर कौन-सा भजन सुनाएं उस्ताद ?

गप्पू : जैसे-  उसका वाला भजन है ‘आराम है हराम’ तो तुम अपना भजन

गाओ –   ‘हराम है आराम’ ।

शप्पू : जी उस्ताद –  ‘हराम है आराम’ । मगर इससे क्या होगा उस्ताद !

गप्पू : अरे ओ शप्पू , मेरी डंवाडोल नाव के चप्पू ! इसे ही कहते हैं

‘ओपीनियन लांण्डरिंग’ यानी मन की सफाई अर्थात भक्तजनों को भ्रमित

कर पब्लिक पर वशीकरण मंत्र मारना । हमारा तमाशा देखने पब्लिक

यूं ही नहीं आती । मगर एक बात तो बता , हम हुनरबाजों की बेहतरीन बाजीगरी

को जादूगरी मानने के बजाय लोग मदारी का तमाशा कह रहे हैं और अनाडी

बेहुनर पप्पू को लोग खिलाडी कह रहे हैं, ऐसा क्यों ?

शप्पू :  वह इसलिए उस्ताद कि हम वास्तव में खेल तो मदारी वाला ही दिखाते

हैं परंतु उसे जादूगरी और बाजीगरी बताने के लिए भक्तजनों की टोली

तैयार कर लेते हैं । बस, पब्लिक ‘मैजिक. मैजिक’ कहते हुए पागल

हो जाती है ।

गप्पू : रस्सी पर चलने वाला खेल है बडा खतरनाक ! आज तो मैं धडाम से

नीचे गिर गया होता और हड्डी पसली बराबर हो गई होती !

शप्पू : आप सचमुच नीचे गिर गए थे उस्ताद , वह तो पप्पू की टोली का खेल देख

कर आ रहे एक दर्शक ने रस्सी थाम ली, वरना …. !

गप्पू : वरना क्या ?

शप्पू : अब जाने भी दीजिए उस्ताद ! घर की बात घर में ही रहे तो ठीक ।

 

दृश्य तीन

(दोनों करवटें बदलते हुए )

 

शप्पू : नींद नहीं आ रही उस्ताद  ।

गप्पू : तुम किधर से बोल रहे हो शप्पू ? केवल तुम्हारी आवाज सुनाई पड रही है , तुम्हारा

हमेशा चम-चम चमकने वाला चांद-सा चमकीला चेहरा मुझे क्यों नज़र नहीं आ रहा ?

शप्पू : मुझे भी केवल आपकी आवाज ही सुनाई पड रही है उस्ताद , दम-दम दमकने वाला

दमदार मुखमंडल आप का मुझे भी नहीं  दिख रहा !

 

(अंधेरे में टटोलते हुए दोनों एक दूसरे के गले मिल कर रोते हैं। दोनों के चेहरे आंसू से

      तर ब तर हो जाते हैं। आंसू से धुल जाने पर एक दूसरे का चेहरा नज़र आने लगता

      है। आंसू पोंछने पर हाथ में कुछ लग जाता है)

 

 गप्पू : (हाथ को निहारते हुए ) कहीं पप्पू गुलाल के बदले हमारे चेहरे पर कुछ और तो नहीं

लगा गया?

शप्पू : जी उस्ताद , ऐसा ही कुछ हुआ-सा लगता है।

 

 

 

 

गप्पू : तुम तो बहुत बडे चाणक्य बनते थे ! इतना भी न सूझा कि अंधेरी रात में न चांद

काम आता है , न सूरज ; और सितारों से तो वैसे भी अंधेरा नहीं भागता, सितारे

दिशा-बोध करा सकते हैं, रास्ता नहीं बताते। कुछ दीयों का इंतजाम क्यों नहीं किया?

शप्पू : इंतजाम करने की कोशिश की थी उस्ताद, किंतु कहीं से एक दीया भी न मिला ।

गप्पू : तो भगवान सोमनाथ, द्वारिकाधीश या जगन्नाथ जी से ही मांग लेते !

शप्पू : उनके दरबार में पप्पू भी गया था उस्ताद और लगता है कि वहां जा कर कुछ ज्यादा

ही रोया–धोया, शायद इसीलिए भगवान उस पर पसीज गए।

गप्पू : तो फिर अम्बा मैया से गुहार लगाते या राम जी से मांग लेते !

शप्पू : मांगा था उस्ताद ! लेकिन पप्पू वहां भी चला गया  ।

गप्पू : तो श्मशान और कब्रिस्तान भेजने की धमकी दे देते ।

शप्पू : दी थी उस्ताद ! परंतु डरने के बजाय पप्पू श्मशान में जा कर भगवान भूतनाथ को

ही डायलग मार आया ।

गप्पू : हमसे बडा डायलगबाज कौन हो गया रे ? पप्पू ने कौन-सा डायलग मारा ?

शप्पू : वही वाला उस्ताद -“ तेरे दर पर आया हूं, कुछ कर के जाऊंगा;

                       झोली भर के जाऊंगा या मर के जाऊंगा”।  

( मरघटी चुप्पी छा जाती है , परदा गिरता है, फिर परदा उठता है )

 

 

 

दृश्य चार

(दातून करते हुए मनुहार से )

 

गप्पू : शप्पू भाई, दीये मांगने से नहीं मिले तो तुमने बना क्यों नहीं लिये ?

शप्पू : कोशिश की थी उस्ताद ! किंतु दीये बने ही नहीं क्योंकि मिट्टी सूख गई थी, उसे

गीला करने के लिए चुल्लू भर पानी भी नहीं मिला।

गप्पू : अरे चुप्प ! अंट शंट बोलते रहते हो । चुल्लू भर पानी मिल भी जाता तो क्या कर

लेते ? उसमें खुद डूबते और मुझे भी डुबाते ?

 

     (दोनों चिंतामग्न बैठे हैं। गप्पू अचानक चीखता है )

गप्पू :  तो फिर तुमने दीये खरीद क्यों नहीं लिये ?  

शप्पू : चिल्लाइए मत उस्ताद ! आप ही का हुक्म था कि मिट्टी के दीयों का भाव न बढाया

जाए।इसलिए मैंने ज्यादा जोर नहीं लगाया वरना मेरे मन में तो वह बात आई ही थी।

गप्पू : तो तुमने क्यों नहीं बताई अपने मन की बात ?

शप्पू : अपने मन की बात कब बताता ? सारा समय तो आप के मन की बात सुनने में लग

गया !

गप्पू : ठीक है , ठीक है । ध्यान रहे कि रो – धो कर और गिडगिडा कर पब्लिक की

सहानुभूति ज्यादा दिनों तक नहीं बटोरी जा सकती, भक्तजनों की टोली को भी

टिकाए रखने के लिए कोई दूसरी जुगत  लगानी पडेगी।

शप्पू :  तो खेल में सुधार लाना ही होगा उस्ताद !

गप्पू : तुम भी नहीं सुधरोगे । खेल सुधारने से क्या होगा ? पप्पू की टोली में हमसे बेहतर

खेल दिखाने वाले हैं और पप्पू अब हमारी टेकनिक भी समझ गया है । सबसे आसान

तरीका है दर्शकों में भक्तिभाव जगाना। भक्तजनों की संख्या बढा दो, खिलाडियों का

नहीं, तालियों का प्रबंध करो ।

शप्पू : जी उस्ताद !

गप्पू : इस बात का खास ध्यान रहे कि हमारी बातें पब्लिक में न पहुंचे, वरना उनके मन से

हमारा आकर्षण समाप्त हो जाएगा । यह भी ध्यान रहे कि हमारी टोली में भी ये

बातें न पहुंचे , नहीं तो टोली के सदस्य  विद्रोह पर उतर आएंगे और हमारी उस्तादी

मानने से भी इंकार कर देंगे। अभी और भी कई मेलों में तमाशे दिखाने हैं।

शप्पू : जी उस्ताद, समझ गया ।

गप्पू : यह लो, पाकिस्तानी घास से बना चाइनीज टीस्सु पेपर, इसमें अमेरीकी परफ्यूम वाला

जापानी केमिकल लगा है, इससे चेहरा चमकेगा भी और गम गम गमकेगा भी , मल

लो अपने चेहरे पर और खूब ढोल बजवाओ । चलो, बाहर भक्तजन भजन गाने में

मगन हो रहे हैं, जयकारे लगा रहे हैं।

 

(दोनों चेहरा साफ कर लेते हैं, हाथ में हाथ डाले कदमताल कर हंसते – गाते निकलते हैं)

युग्म गीत : इमली का बूटा, बेरी का बेर; इस जंगल में हम दो शेर!!

समूह गान : शेर के घर में सवा सेर ; शोर मचाने लग गए शेर !!

(भक्तजन जोर – जोर से भजन गाने लगते हैं, जयकारे शोर में बदलते जा रहे हैं, धीरे –

धीरे शोर की ध्वनि धीमी पडती जा रही है , परदा गिर जाता है) ।

मेरा पौत्र अपूर्व अमन आज तीन वर्ष का हो गया

मेरे एकमात्र पुत्र कुमार पुष्पक और पुत्रबधू आरती पुष्पक

के प्रथम पुत्र अपूर्व अमन को

जन्मदिन की हार्दिक बधाइयां, शुभकामनाएं और शुभाशीर्वाद !

 अपूर्व सदा स्वस्थ – प्रसन्न रहे, दीर्घायु हो

मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण हो

उसे वह हर सुख सुविधा सम्मान व ऐश्वर्य प्राप्त हो

जिसके लिए वह स्वयं को सक्षम व समर्थ साबित कर सके

माता-पिता, दादा-दादी, समस्त पूर्वजों

 स्वजनों – परिजनों एवं सुहृद शुभैषियों

के अशेष स्नेहिल आशीष हैं कि

मेरा पोता अपूर्व अमन

अपने प्राप्य को प्राप्त करने में

सर्वथा समर्थ व सक्षम बने ..

अब तक के तीन वर्षों में कुछ खास चित्रों में अपूर्व अमन  …

रामसेतु मानवनिर्मित्त बांध या प्राकृतिक भू-समुद्री ढांचा

रामसेतु मानवनिर्मित्त बांध या प्राकृतिक भू-समुद्री ढांचा

 

भारत से श्रीलंका को जोडने वाले रामसेतु की वैज्ञानिक पुष्टि के बारे में अमेरीकी साइंस चैनल द्वारा जारी एक वीडियो की चर्चा जोरों से हो रही है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भारत और श्रीलंका को जोडने वाला जो बांध समुद्र में आज भी दिखता है, उसका निर्माण राम की सेना के लंका – गमन के लिए सेनापति नल – नील ने किया था। इसका उल्लेख आदि कवि वाल्मीकि कृत ‘रामायण’ और तुलसी कृत ‘रामचरित मानस’ तथा अन्यान्य रामकथाओं में भी  है।

आस्थावान हिन्दू उस बंध को रामसेतु मानते हैं, जबकि वैज्ञानिक प्राकृतिक भू-समुद्री बंध कहते है और विदेशों में उसे एडमब्रिज कहा जाता है । वायरल हो रहे साइंस चैनल के वीडियो में उस बंध को प्रामाणिक रूप से रामसेतु बताया जा रहा है। यह भी बताया जा रहा है कि रामसेतु में जिन पत्थरों का इस्तेमाल हुआ है, वे पत्थर 7000 (सात हजार) साल पुराने हैं तथा जिस रेत के ऊपर उन पत्थरों को रख कर बांध बनाया गया है, वह रेत 5000 (पांच हजार ) साल पुरानी है।

इस मुद्दे पर एक महामंडलेश्वर, भाजपा के एक सांसद डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी, एक पूर्व आईपीएस एवं बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. किशोर कुणाल , भूगोल – खगोल के बारे में गहरी जानकारी रखने वाली एक विदुषी डॉ. सरोज बाला तथा एक अन्य वैज्ञानिक का इंटरव्यू भी कुछ भारतीय चैनलों पर दिखाया गया।

सिर्फ उस एक अन्य वैज्ञानिक ने कहा है कि केवल एक वीडियो के आ जाने से उसमें दी गई जानकारी की प्रामाणिकता पर मुहर नहीं लगाई जा सकती,क्योंकि उस संबंध में किसी पुरातत्त्ववेत्ता अथवा भूवैज्ञानिक की राय नहीं ली गई है।

 

डॉ. सरोज बाला को यह कहते हुए दिखाया गया है कि ‘रामायण’ की काल -गणना उन्होंने वैज्ञानिक रीति से की है, जिसके अनुसार उन्होंने सिद्ध किया है कि राम का जन्म 10 जनवरी 5114 वर्ष ईसापूर्व हुआ था। तदनुसार लगभग 7000 हजार साल पहले राम का होना साबित होता है, इसीलिए साइंस चैनल द्वार रामसेतु में लगे पत्थरों को 7000 साल पुराना बताया जाना इस बात का प्रमाण है कि वह बांध राम ने ही बनवाया था।

डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी को यह कहते हुए दिखाया गया है कि वे तो पहले से ही यह बात बोलते रहे थे, किंतु ‘कुछ लोग’ ऐसे हैं जो तभी किसी सच को सच मानते हैं जब पश्चिम से उसकी पुष्टि हो जाए।

यह ध्यान देने योग्य बात है कि यह वीडियो उस साइंस चैनल द्वारा जारी किया गया बताया जा रहा है जो अमेरीकी डिस्कवरी साइंस नेटवर्क इंटरनेशनल की सब्सीडियरी है। यह वीडियो उस समय जारी किया गया , जब केन्द्र की राजनीति के लिए बहुत ही अहम मायने रखने वाले गुजरात विधानसभा के अंतिम चरण के चुनाव में महज कुछ घंटे ही शेष रह गए थे तथा चुनाव प्रचार थम गया था।

मैं एक आस्थावान हिन्दू हूं किंतु अन्धविश्वासी नहीं हूं; मैं भगवद्भक्त हूं परंतु अन्धभक्त नहीं हूं, मैं पुरातत्त्ववेत्ता या भू-समुद्र-विज्ञानी नहीं हूं लेकिन इतिहास और साहित्य का विद्यार्थी अवश्य हूं, मैंने राम और कृष्ण कथा का भी अध्ययन किया है, प्रमुख लोक प्रचलित धर्म – ग्रंथों , विशेष कर सनातन हिन्दू धर्म – ग्रंथों का भी थोडा – बहुत अध्ययन किया है, इसीलिए जिन विषयों में कोई प्रामाणिक वैज्ञानिक खोज पर आधारित स्थापनाएं सामने नहीं आई हैं, उन पर विश्वास या अविश्वास करने के पहले मैं प्राप्त ज्ञान, ग्रंथों और उनके बारे में विद्वानों द्वारा दी गई स्थापनाओं के आलोक में खुद तर्क-वितर्क करता हूं और ज्ञान-विज्ञान-आस्था व तर्क की कसौटी पर ही कोई विचार बनाता हूं। संभव है, मेरे तौरतरीकों और मंतव्यों से बहुधा लोग सहमत न हों, फिर भी, मेरा इतना तो हक बनता ही है कि जो मुझे समझ में आता है, उसे सहज ही बता दूं, उसमें किसी की आस्था या विश्वास को ठेस पहुंचाने जैसी न कोई मंसा है और न ही कोई बात है।

मेरा मानना है कि धर्म , देवी-देवता, ईश्वर आदि जैसे बहुत-से विषयों पर मन में उठ रहे सवालों को पूछने से लोग डरते हैं क्योंकि उसमें कहीं न कहीं दूसरों की आस्था को चोट पहुंचाने, भावनाओं को आहत करने, ईशनिंदा करने आदि के खिलाफ बनाए गए कानून संबंधी कोई न कोई धारा जाने अनजाने शामिल हो जाने का अंदेशा बना रहता है। इस इक्कीसवीं सदी में भी सारे संसार में धार्मिक झगडों का निपटान न हो पाने के पीछे मूल कारण ऐसे कानून ही हैं। यही कारण है कि आस्था और अन्धविश्वास के बीच की सीमा रेखा का निर्धारण हो पाना मुश्किल ही नहीं, नामुमकीन भी है।

साहित्य से एमए करने के दौरान यह बताया गया था कि भाषा वैज्ञानिक स्थापनाओं के आधार पर ‘रामायण’ की भाषा ‘महाभारत’ की भाषा से अधिक परिष्कृत और आधुनिक है, जिससे प्रतीत होता है कि ‘रामायण’ की रचना ‘महाभारत’ की रचना के बाद हुई होगी, जबकि हिन्दू आस्था के अनुसार ‘महाभारत’ से हजारों-लाखों साल पहले राम हुए थे और ‘रामायण’ की रचना उसी समय हुई थी, किंतु इस बिन्दु को मैं यहां चर्चा का हिस्सा बनाना नहीं चाहता।

पिछले साल पंडित और संत बता रहे थे कि 2016 में कृष्ण जन्माष्टमी के दिन कृष्ण का 5242वां जन्म दिवस था और उस दिन ग्रह नक्षत्रों का योग संयोग ठीक वैसा ही था , जैसा कृष्ण जन्म के समय था। पंडित और संत यह भी बतलाते हैं कि कृष्ण द्वापर युग के अंतिम दिनों में अवतरित हुए थे , उनके तत्काल बाद परीक्षित के समय कलियुग का आगमन हो गया, त्रेता कई लाख वर्षों का युग था, जिसमें राम अवतरित हुए थे और अयोध्या में राम मंदिर का अस्तित्व भी लाखों वर्ष पुराना बताया जाता है।

मैं ऊपर दी गई मान्यताओं में से किसी को भी सही या गलत होने पर अपनी राय नहीं दे रहा हूं, बल्कि उन्हीं मान्याताओं में व्याप्त विरोधाभासों के बारे में अपने खुद के ज्ञानवर्द्धन के लिए कुछ सवाल उठा रहा हूं। साइंस चैनल के वीडियो के आधार पर भारत-श्रीलंका को जोडने वाले भू-समुद्री बंध को रामसेतु मान कर प्रसन्न होने वाले तथा रामसेतु की प्रामाणिकता पर मुहर लगाने वाले डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी, डॉ. किशोर कुणाल, डॉ. सरोज बाला , महामंडलेश्वर आदि महानुभाव क्या यह भी मानते हैं कि रामसेतु में लगे पत्थर 7000 साल ही पुराने हैं और राम का जन्म 10 जनवरी 5114 वर्ष ईसापूर्व हुआ था।

यदि नहीं तो फिर साइंस चैनल के वीडियो को चुनाव के अंतिम दौर में चुनाव प्रचार की अवधि कानून समाप्त हो जाने के बाद इतना क्यों उछाला जा रहा है?  और यदि हां तो फिर राम का होना कृष्ण के होने से महज 2000 साल पहले सिद्ध हो जाएगा, ऐसे में लाखों साल पहले त्रेता युग में अवतरित दशरथ – पुत्र राम के बारे में क्या कहना चाहेंगे? अयोध्या में राम मंदिर होने का अस्तित्व हम निर्विवाद मान लेते हैं तो फिर जो राम लाखों वर्ष पहले हुए थे, उस राम द्वारा महज 7000 साल पहले समुद्र में सेतु का निर्माण कराए जाने की पुष्टि के बारे में क्या कहना चाहेंगे? क्या यहां विरोधाभास स्पष्ट रूप में नहीं दिख रहा है ?

क्या इस तरह के सवाल उन टीवी चैनलों के संवाददाताओं के जेहन में नहीं उभरे होंगे ? साइंस चैनल के वीडियो पर खुश होने वाले उपर्युक्त महानुभावों से उनके उत्तर भी उन्होंने क्यों नहीं मांग लिये ? ऐसे सवाल उभरे क्यों नहीं होंगे जनाब !  मगर चैनल का टीआरपी बढाने का लोभ , सत्ता से विज्ञापन पाने का लालच, समाज में आलोचना का केन्द्र बनने की आशंका, आस्था आहत होने और ईशनिंदा होने का भय भी तो कोई चीज है!

यहां मैंने अपना कोई विचार नहीं दिया है, बल्कि केवल सवाल उठाए हैं और वह भी उन्हीं प्रमाणों पर जिनके आधार पर प्रामाणिकता की मुहर लगाई जा रही है। ऐसा तो हो नहीं सकता कि एक ही सबूत को एक के लिए प्रामाणिक तथा उसी से जुडे दूसरे के लिए अप्रामाणिक मानने की मनमानी की जाए । यदि ऐसा होगा तो आस्था के नाम पर वैचारिक अराजकता को बढावा देना कहलाएगा।

एक बात तो साफ महसूस हो रही लगती है कि ऐसे विवादित विषय पर ऐसे नाजुक समय में अमेरीकी चैनल द्वारा ऐसा वीडियो जारी किया जाना नीयत में कहीं कुछ अन्यथा होने का संदेह की गुंजाइश बनाता है और यह पूरी कवायद चुनाव प्रचार समाप्त हो जाने के बाद किसी को लाभ पहुंचाने के लिए छद्म चुनाव प्रचार जैसी लगती है। जब  देश के एक राज्य में हो रहे चुनाव के दौरान पाकिस्तान चर्चा का विषय बन चुका हो तो फिर अमेरीका कैसे अछूता रह सकता है ? अमेरीकी प्रेसीडेंट ट्रंप के चुनाव में पिछले ही साल से रूसी खुफिया एजेंसी की भूमिका भी तो चर्चा में रही है ! आखिर ‘ओबामा माइ फ्रेंड’ और ‘माइ फ्रेंड मिस्टर ट्रंप’ जैसा भी तो कोई फैक्टर है !!

क्या साइंस चैनल द्वारा किया गया खुलाशा एक सोची – समझी रणनीति का हिस्सा है और गुजरात की चुनावी राजनीति में धार्मिक ध्रुवीकरण का अंतिम पाशा है जिससे न चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन भी न हो और मतों का ध्रुवीकरण भी हो जाए यानी हर्रे न फिटकीरी, रंग आवे चोखा !

मेरे पुत्र कुमार पुष्पक को जन्मदिन की हार्दिक बधाई और शुभाशीर्वाद

मेरे पुत्र कुमार पुष्पक को जन्मदिन की हार्दिक बधाई और शुभाशीर्वाद!
बेटा,आप सदा सर्वदा स्वस्थ प्रसन्न रहें,
आपका जीवन सुदीर्घ स्नेहिल सुयश एवं ऐश्वर्यपूर्ण हो,
आप दूसरों के प्रति स्नेह व सम्मान तथा अपने स्वाभिमान की श्रीवृद्धि करते रहें,
आपका करियर एवं जीवन सक्रिय व प्रगतिशील रहे तथा देश व मानव-प्रेम के प्रति समर्पित रहे,
मां और पापा , समस्त स्वजन-परिजन व शुभैषियों की शुभकामनाएं एवं आशीर्वाद आपके साथ हैं।

(मेरा पुत्र कुमार पुष्पक और पुत्रबधू आरती पुष्पक अपने पुत्र (मेरे पौत्र ) अपूर्व अमन के साथ हैं। मेरे पौत्र यानी पोता अपूर्व अमन का जन्मदिन भी ठीक सात दिन बाद आज ही के दिन 16 दिसम्बर को है।)

गुजरात – बिहार का अंतर्संबंध और जीत – हार का इतिहास

गुजरात – बिहार का अंतर्संबंध और जीत – हार का इतिहास

 

गुजरात विधान सभा के लिए दो चरणों में होने वाले चुनाव (2017) का पहला चरण 09 दिसम्बर को और अंतिम चरण 14 दिसम्बर को सम्पन्न होगा, परिणाम 18 दिसम्बर को आएंगे। राज्य में पिछले 22 वर्षों से सत्तारूढ भाजपा के प्रवक्ता बता रहे हैं कि कॉंग्रेस ने अपने सारे पत्ते खोल दिए हैं, जबकि उनका तुरूप का पत्ता अभी बाकी है । खबरों के अनुसार भाजपा अपना तुरूप का पत्ता इसी सप्ताह चलेगी यानी प्रधानमंत्री जी का तीन दिवसीय चुनावी दौरा होने वाला है। समाचार यह भी है कि  लम्बे समय से सत्तारूढ भाजपा  ढलान पर है, जबकि वर्षों से हाशिए पर रह रही कॉंग्रेस उत्थान पर है।

माननीय मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मैं तीन बार गुजरात गया हूं और 1000 किलोमीटर से भी अधिक की यात्रा सडक मार्ग से की है। मेरी कार के ड्राइवर और यात्रा – मार्ग में आने वाले कस्बों, गांवों एवं शहरों के लोगों से वार्तालाप से जो भीतरी बात उभर कर आई, वह भाजपा के पक्ष में नहीं है। मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के बाद ऐसा लग रहा है कि भाजपा वालों ने मान लिया है कि मुख्यमंत्री रहते जिस मोदी जी ने राज्य में जीत का सिलसिला बनाए रखा, उस मोदी जी के प्रधानमंत्री रहते तो कुछ और करने की जरूरत ही नहीं है, चुनावी दंगल में तो गुजराती भावनाओं को उभार कर और कॉग्रेस को वंशवादी बता कर ही फतह की जा सकती है। शायद इसीलिए भाजपा के नेता, प्रवक्ता, समर्थक और भक्त आत्मविश्वास की अति तक पहुंच गए हैं और मुग्धा नायिका की भांति व्यवहार कर रहे हैं।

इतिहास की नज़रों में गुजरात – बिहार के अंतर्संबंधों की पडताल करें तो पाएंगे कि दक्षिण अफ्रीका से लौटे मोहन दास करमचन्द गांधी का भारत भूमि पर पहला  सत्याग्रह 1917 में बिहार के चम्पारण जिले में हुआ, उस आन्दोलन का यह शताब्दी वर्ष है। चम्पारण सत्याग्रह अंग्रेजों के खिलाफ देशव्यापी आन्दोलन फैलाने में बीजमंत्र के रूप में काम आया, अंतत: कभी न सूर्यास्त देखने वाली ब्रितानिया हुकूमत चली गई, मोहन महात्मा हो गए और बापू राष्ट्रपिता ।

सन 1973 ई. के अंतिम दिनों में छात्र आन्दोलन की शुरूआत गुजरात में हुई , जिसने गुजरात नवनिर्माण आन्दोलन का स्वरूप ले लिया, आन्दोलन सफल हुआ, मुख्यमंत्री चिमन भाई पटेल की सरकार चली गई, विधान सभा भंग हो गई। उस आन्दोलन की चिंगारी बिहार पहुंची , वहां छात्र आन्दोलन शुरू हुआ, नेतृत्व छात्र संघर्ष समिति से जेपी के हाथ में आ गया, केन्द्र की सरकार हिल गई, आपात्काल लगा दिया गया, वह आन्दोलन बिहार विधान सभा भंग कराने में तो सफल नहीं हुआ, किंतु पूरे देश में अपना प्रभाव फैलाने में सफल हुआ, अंतत: केन्द्र की सरकार चली गई।

सन 2015 में बिहार विधान सभा का चुनाव हुआ, प्रधानमंत्री ने धुंआधार प्रचार किया, डीएनए वाला उनका जुमला उल्टा पड गया और भाजपा की करारी हार हुई, पार्टी की  की वह हार अमित शाह और मोदी जी की व्यक्तिगत हार मानी गई ।

सन 2017 में आगामी एक सप्ताह में गुजरात विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं। प्रधानमंत्री ने धुंआधार प्रचार अभियान चलाया है, फिर से उनका तीन दिवसीय चुनाव प्रचार अभियान होने वाला है। बिहार विधान सभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री जी ने जैसी अनपेक्षित शब्दावली का प्रयोग किया था , उसका परिणाम दुनिया देख चुकी है। प्रधान मंत्री जी ने अब तक के चुनावी भाषणों में अपने ही गृह राज्य गुजरात में बिहार में प्रयोग में लाई गई शब्दावली से भी अधिक अनपेक्षित, तीखी, जन-भावनाओं को आहत करने वाली और प्रधानमंत्री के पद की गरिमा से मेल नहीं खाने वाली शब्दावलियों का प्रयोग किया है। उन शब्दावलियों में प्रधान मंत्री जी की और उनकी पूरी पार्टी की बौखलाहट झलक रही है, आगामी तीन दिनों की चुनावी रैलियों में अगर उन्होंने सावधानी नहीं बरती तो उनकी वह असावधानी गुजरात में भाजपाई सत्ता के ताबूत में आखिरी कील साबित होगी, जिसका परिणाम 2019 के आम चुनावों में भाजपा के लिए अशुभ संकेत होगा।

बिहार विधान सभा का 2015 वाला चुनाव किसी दल या दलों के बीच नहीं लडा गया था, बल्कि एक तरफ प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह थे तो दूसरी तरफ लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार थे। उसका परिणाम भी दुनिया देख चुकी है।

गुजरात विधान सभा का यह चुनाव भी भाजपा और कॉग्रेस के बीच नहीं है, बल्कि एक तरफ प्रधानमंत्री और अमित शाह हैं तो दूसरी तरफ राहुल गांधी और हार्दिक पटेल हैं। मोदी जी और अमित जी का चुनाव प्रचार पुराने ढर्रे पर और पुरानी शब्दावलियों व जुमलों के सहारे है, वे और उनकी टीम के लोग राहुल गांधी को पप्पू कह चुके हैं ।

राहुल जी और हार्दिक जी का चुनाव प्रचार ताज़ा तरीन तरीकों के सहारे है, राहुल जी और उनकी टीम के लोग मोदी जी को गप्पू और फेंकू कह चुके हैं। सीधे तौर पर कहें तो दो धाकडों के सामने दो नौसीखिए हैं, जिन्हें जनता की सहानुभूति मिलती दिख रही है।

इसीलिए एक टेलीविजन चैनल द्वारा प्रसारित ओपीनियन पोल में भाजपा की सरकार बनते दिखाए जाने के बावजूद मेरा मानना है कि सरकार कॉंग्रेस की बनेगी और पूरे बहुमत से बनेगी। अमित शाह और मोदी जी, दोनों के लिए यह बहुत बडा सेटबैक होने वाला लगता है।

यही कारण है कि मुझे गुजरात-बिहार के अंतर्संबंधों के बीच आसन्न चुनावी समर में इतिहास की पुनरावृत्ति की ध्वनि सुनाई पड रही है।

फिल्म पद्मावती के बहाने साहित्य और इतिहास की यात्रा  

फिल्म पद्मावती के बहाने साहित्य और इतिहास की यात्रा  

 

संजय लीला भंसाली की फिल्म में रानी पद्मावती को किस रूप में प्रस्तुत किया गया है, मैं नहीं जानता, क्योंकि मैंने फिल्म देखी नहीं है।

यह पोस्ट उन लोगों के लिए है जो इतिहास और साहित्य को पढते –   समझते हैं, कला व संस्कृति को जानते हैं तथा विरासत और सियासत के बीच की विभाजक रेखा को भी मानते हैं। यह उन लोगों के लिए नहीं है जो अपने कान को न टटोल कर कौवे के पीछे दौडते हैं, जो किसी को अपशब्द कहने में ही अपना शौर्य समझते हैं और मुद्दे को जाने –  समझे – देखे वगैर मरने – मारने पर उतारू हो जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी तल्ख टिप्पणियों के माध्यम से वैसे लोगों को तो नसीहत दी ही है, कुछ माननीयों को भी आईना दिखाया है।

मैं भारतीय सेना पर गर्व करता हूं, उसके अलावा कोई जातीय सेना भी भारत वर्ष में है, मैं न तो उसे जानता हूं और न ही जानने की आवश्यकता समझता हूं। महारानी पद्मावती और महाराजा रतन सेन किसी जाति या समाज विशेष की ही नहीं, पूरे भारत वर्ष की आन-बान-शान के प्रतीक हैं ।

देशगौरव, लोक संस्कृति और पारम्परिक आस्था का संरक्षण प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है, हमारी गौरवशाली परम्पराएं अपने संरक्षण के लिए किसी भी जातीय सेना की मुहताज़ नहीं हैं, भारत का संविधान उन सबका संरक्षण करने में सक्षम है।

रानी पद्मावती की कथा को मैंने इतिहास और साहित्य, दोनों ही माध्यमों से जानने तथा उन माध्यमों की मर्यादाओं को भी समझने की कोशिश की है। मैंने बीए ऑनर्स तो हिन्दी में किया, किंतु साथ में इतिहास विषय भी रखा और एमए भी हिन्दी से ही किया। एमए के आठ पेपर्स में से एक पेपर में जायसी कृत “पद्मावत” महाकाव्य भी था।

पद्मावत नामक महाकाव्य मलिक मुहाम्मद जायसी ने नस्तालिक (पर्शियन) लिपि और अवधि भाषा में 1540 ई. में लिखा । पूरा महाकाव्य  मुख्य रूप से चौपाई छन्द में लिखा गया । सन 1477 ई. में जन्मे जायसी की उम्र उस समय 63 वर्ष थी। सूर दास जायसी से एक वर्ष छोटे थे । तुलसी दास ने रामचरित मानस नामक महाकाव्य सन 1574 ई. में देवनागरी लिपि और अवधि भाषा में लिखना शुरू किया, पूरा महाकाव्य मुख्य रूप से चौपाई छन्द में लिखा गया। सन 1511 ई. में जन्मे तुलसी दास की उम्र उस समय 63 वर्ष थी यानी वे जायसी से 34 वर्ष छोटे थे और ‘मानस’ तथा ‘पद्मावत’ की रचना में भी 34 वर्षों का ही अंतर है।

जायसी रचित पद्मावत अवधि भाषा में लिखा गया पहला महाकाव्य है और तुलसी रचित रामचरित मानस दूसरा। तुलसी ने जायसी के छन्द विधान का ही अनुकरण किया और पद्मावत की रचना-शैली में ही रामचरित मानस की रचना की। पद्मावत महाकाव्य अपने कथानक राजा रतन सिंह और रानी पद्मावती तथा दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के काल से तीन सदी बाद की रचना है जबकि रामचरित मानस की रचना और उसके मूल कथानक राम के काल के बीच का अंतर कथनातीत है, हालांकि कुछ विद्वान राम का काल कुछ हजार वर्ष तो कुछ विद्वान कई लाख वर्ष पहले का बताते हैं।

पद्मावत की कथावस्तु में चितौड के महाराजा रतनसेन और उनकी परम रूपवती महारानी पद्मावती के प्रेम, सौन्दर्य व शौर्य की कथा है, रानी के अप्रतिम सौन्दर्य पर मोहित आततायी अलाउद्दीन खिलजी द्वारा धोखे से राजा रतन सेन को कैद करने तथा वीर सेनानी गोरा और बादल के बलिदान से राजा को खिलजी की कैद से मुक्त कराने की कथा है,  चितौड गढ पर खिलजी द्वारा आक्रमण करने और महाराजा की हत्या के बाद रानी को वश में करने के कुचक्र रचने की कथा भी है और है महारानी द्वारा खिलजी के समक्ष समर्पण करने के वजाय हजारों वीरांगनाओं के साथ जौहर कर लेने की कथा । सचमुच, शौर्य, सौन्दर्य, ऐश्वर्य और रणकौशल की बेमिसाल प्रतिमूर्ति महारानी पद्मावती के अदम्य साहस की कथा है पद्मावत महाकाव्य।

जायसी ने पिंजडे में बंद सुआ यानी सुग्गा अर्थात तोता के बहाने खिलजी की कैद में पडे महाराजा रतन सिंह और उनकी विरह-वेदना से विदग्ध महारानी पद्मावती की प्रेम कथा को आत्मा और परमात्मा से जोडते हुए कथा को आध्यात्मिक स्वरूप देने का भी प्रयास किया है। इतिहास और साहित्य में जो स्वाभाविक फर्क होता है, वह इस कथा में ऐसे ही प्रसंगों के चलते है, विरासत और सियासत का द्वन्द्व ऐसे ही क्षणों में पैदा होता है।

तुलसी के रामचरित मानस में राम और उनकी पत्नी सीता के पूरे जीवन की कथा है, जिसमें एक-दूसरे के प्रति दोनों के प्रेम एवं समर्पण की तथा रावण द्वारा सीता का हरण करने और राम द्वारा युद्ध कर सीता को मुक्त कराने आदि की कथा प्रमुख है। तुलसी ने मानस में राम को जिस तरह साक्षात भगवान के रूप में प्रतिपादित किया है, वह रामकथा के आदि महाकाव्य वाल्मीकि कृत रामायण से भिन्न है। दोनों महाकाव्यों में यदि परस्पर तुलना की जाए तो वाल्मीकि की रामायण को इतिहास माना जाना चाहिए और तुलसी के रामचरित मानस को साहित्य। यह अलग बात है कि इन दोनों महाकाव्यों के मूल कथानक को इतिहासवेत्ता और भाषाविद किसी और रूप में ही देखते – समझते हैं । फिर भी, इन दोनों महाकाव्यों के बीच का स्वाभाविक अंतर ही इतिहास और साहित्य के बीच का अंतर्द्वन्द्व है तथा विरासत एवं सियासत के बीच की विभाजक रेखा भी।

‘पद्मावती’ के फिल्मकार का दावा है कि उन्होंने इतिहास और साहित्य , दोनों ही की मर्यादाओं के बीच सामंजस्य बनाते हुए फिल्म बनाई है तथा  महारानी पद्मावती और महाराजा रतन सेन के शौर्य, स्वाभिमान व सम्मान को सर्वोपरि स्थान दिया है।

कमाल तो यह है कि आठ सौ वर्ष पहले के कथानक पर पांच सौ वर्ष पहले महाकाव्य रचा गया, उसके बाद मातृभूमि की रक्षा के लिए भारत की गौरव-गरिमा की प्रतिमूर्ति महारानी झांसी के बलिदान का युग भी गुजर गया  और स्वतंत्र भारत के अनेक विश्वविद्यालयों में उच्चतर डिग्री के आधिकारिक पाठ्यक्रमों में भी वह महाकाव्य पढाया जाता रहा, फिर भी कोई विवाद नहीं हुआ, किसी तरह का रोष-असंतोष सामने नहीं आया , किसी वाइस चांसलर या प्रोफेसर को मौत के घाट उतारने की धमकी देने की बात किसी को नहीं सूझी ; जबकि पद्मावती फिल्म के निदेशक और उसकी नायिका दीपिका पादुकोणे का सर कलम करने वाले के लिए कोई करोडों रूपये का ईनाम रख रहा है तो कोई निदेशक भंसाली की मां लीला भंसाली को लैला के रूप में चित्रित करते हुए फिल्म बना कर उनका चरित्र हनन करने की धमकी दे रहा है। आखिर इस फिल्म में है क्या ? यह कैसी आस्था और कैसा विश्वास है कि कोई अपनी भावनाओं के आहत होने के बहाने दूसरे की भावनाओं की हत्या करने की खुली धमकी दे रहा है और पूरा शासन – प्रशासन मौन है? यह देश, समाज और संविधान के लिए गंभीर चुनौती है।

जहां तक आस्था और आदर्श का प्रश्न है, तत्कालीन परिस्थितियों में रानी पद्मावती द्वारा हजारों वीरांगनाओं के साथ जौहर का रास्ता अपनाना आदर्श था, किंतु परवर्ती काल में राजा राममोहन राय के प्रयासों से लॉर्ड बेंटिक द्वारा सन 1822 में सती-प्रथा-उन्मूलन बिल पास कराए जाने के बाद 1857 की क्रांति में महारानी झांसी ने सैकडों दुश्मनों को मार कर मरने का आदर्श प्रस्तुत किया और 21वीं सदी की भारतीय नारी पूरे स्वाभिमान व सम्मान के साथ हर मोर्चे पर पुरुषों से दो – दो हाथ करने तथा चार कदम आगे रहने का आदर्श प्रस्तुत कर रही है, उसी नारी के लिए कुछ लोग खुलेआम अपमानजनक ऐलानों के जरीए कौन-से ऐतिहासिक संस्कार का परिचय दे रहे हैं?

कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा बिना फिल्म देखे ही फिल्म पर पाबंदी लगाने की अतिउत्साही घोषणा करने और किन्हीं जातीय सेनाओं और दबंगों द्वारा उस फिल्म को दिखाने वाले सिनेमा घरों को क्षति पहुंचाने की धमकियां देने तथा वैसे लोगों द्वारा किसी खास राजनीतिक दल या दलों से जुडे होने जैसे क्रिया-कलापों को देख – सुन कर मन में यह सवाल तो उठता ही है कि जब देश के प्रधान सेवक के गृह राज्य जैसे एक संवेदनशील राज्य में चुनाव दरवाजा खटखटा रहा हो तथा देश के सबसे बडे राज्य में स्थानीय निकायों के चुनाव हो रहे हों तो ऐन मौके पर ऐसी गतिविधियां को सरपट दौडाने का क्या मतलब है? कहीं ये धमकियां और घोषणाएं भी 2015 में बिहार चुनाव के दौरान डीएनए की तलाश तथा 2017 में यूपी चुनाव के दौरान कब्रिस्तान बनाम श्मशान जैसे जुमलों की तरह जुमलेबाजी तो नहीं ? आखिर अपने प्रतिद्वंद्वियों की जाति व धर्म नीहारने के साथ-साथ उनके दादा-परदादा, नाना-परनाना आदि की जाति व धर्मों का शव-परीक्षण तो किया ही जा रहा है और यूपी में स्थानीय निकायों के लिए हुए चुनावों के आज आए परिणामों ने तो साफ कर दिया है कि हमेशा की तरह जुमलेबाजी से चुनाव की फसल बडी सफाई से काटी जा सकती है ।

हालांकि उच्चस्तरों पर कवायद अब शुरू हो गई है, भारत सरकार सूचना प्रसारण मंत्रालय की स्टैण्डिंग कमेटी द्वारा पद्मावती फिल्म के पक्षकारों और सेंसर बोर्ड को तलब किए जाने की खबर है, ऊंट किस करवट बैठेगा, जनता नहीं जानती, ऐसे माहौल में हम भी कोई टिप्पणी करना नहीं चाहते। फिर भी, इतना तो कहा ही जा सकता है कि बेहतर यह होता कि फिल्म को रीलीज होने दिया जाता, सच्चाई को जनता के सामने आने दिया जाता, जन-भावनाओं के खिलाफ अगर कुछ होता तो फिल्म को परदे से उतरवाने में कितना समय लगता । तब वह सही मायने में जनभावनाओं के उभार का परिणाम होता , वरना वर्तमान गतिविधियों से तो उसके पीछे कुछ और ही होने का अन्देशा हो रहा है।

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