सा रे ग म प टॉपर का ब्रेक थ्रु डेब्यू

सा रे ग म प टॉपर का ब्रेक थ्रु डेब्यू

पंजाब नैशनल बैंक क्षेत्रीय कार्यालय दरभंगा में राजभाषा अधिकारी के रूप में कार्यरत रहते हुए मेरी प्रोन्नति प्रबंधक पद पर हुई । कुछ दिनों बाद मुझे दरभंगा से क्षेत्रीय कार्यालय मुज़फ्फरपुर और फिर अंचल कार्यालय पटना स्थानान्तरित कर दिया गया । मैं पटना में भी राजभाषा तथा जन सम्पर्क एवं प्रचार विभाग के कार्य देखने लगा । बीते काल-खण्ड में दरभंगा, मुज़फ्फरपुर, पटना आदि कार्यालयों में, जहां भी मैं पदस्थापित रहा, मुझे और मेरे कार्यालय को भारत सरकार से प्रथम पुरस्कार प्राप्त होता रहा, फलस्वरूप अपने बैंक सहित दूसरे बैंकों, संस्थानों, सरकारी महकमों और मीडिया में मेरी अच्छी पहचान बन गई, मैं बहुत लोकप्रिय हो गया और दो वर्षों बाद वरिष्ठ प्रबंधक के रूप में प्रोन्नत भी हुआ।

मेरा कार्यालय पटना के आर. ब्लॉक स्थित चाणक्य होटल बिल्डिंग के दूसरे तल पर था। अधिकारियों के शीर्ष नेता नहीं चाहते थे कि मैं पटना आऊं, क्योंकि मेरे पटना आने से उनके खासमखास अधिकारी की चमक फीकी पड जाने का अंदेशा था। फिर भी, उनके न चाहते हुए भी, प्रधान कार्यालय ने मुझे पटना में पदस्थापित कर दिया था , परिणामस्वरूप नेताजी की परशुरामी भृकुटि मेरे ऊपर तन गई थी। नेता जी और स्थानीय प्रबंधन की मेहरबानी से सुबह 7.30 से रात के 10.30 बजे तक काम में निरंतर लगे रहने वाली ड्युटी पर मुझे लगा दिया गया था (इस विषय पर विशेष जानकारी मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” में देखें, 440 पृष्ठों की वह पुस्तक विकल्प प्रकाशन नई दिल्ली ने छापी है, पुस्तक प्राप्ति के लिए मोबाइल नम्बर 09211559886 पर सम्पर्क किया जा सकता है) ।

तो, पटना आए हुए कुछ माह बीते होंगे, एक दिन शाम को अचानक मेरे मित्र मुकेश रंजन ऑफिस में आए। मुकेश जी पंजाब नैशनल बैंक में ही मुज़फ्फरपुर में कार्यरत थे और एक अधिकारी संगठन के नेता भी थे। हालांकि मैं उनके संगठन का सदस्य नहीं था, लेकिन अपनी शाश्वत नीति के अनुसार मैं सभी संगठनों के सदस्यों और नेताओं से मित्रवत व्यवहार रखता था तथा मेरे व्यक्तिगत बात – व्यवहार में यूनियन और एसोसिएशन का अलग होना कोई मायने नहीं रखता था। मैं मुकेश जी से उम्र और सर्विस में सीनियर था, वे मेरा बहुत आदर करते थे।

मुकेश रंजन ने कहा – “सर, ऑफिस से घर के लिए निकलिए तो मैं आपसे कुछ बात करना चाहूंगा और कुछ सुनाना भी चाहूंगा ”। मैंने कहा –“ मुझे दस बजे रात तक ऑफिस में ही रहना है, बताएं, बात क्या है ” ? मुझे लगा कि शायद वे कहेंगे कि दरभंगा और मुज़फ्फरपुर में रहते हुए उनके संगठन का सदस्य मैं नहीं बन सका था तो कम से कम अब तो बन जाऊं; हालांकि मैं यह भी समझता था कि वे इतने परिपक्व तो अवश्य थे कि वैसी बात मुझसे नहीं कहेंगे। मेरी अपेक्षा के अनुसार वे सही साबित हुए , उन्होंने एसोसिएशन और मेम्बरशिप की कोई बात नहीं की । उन्होंने आग्रह पूर्वक कहा – “ सर, ज्यादा नहीं, अपना दस मिनट का ही समय मुझे दे दीजिए और नीचे पार्किंग में मेरी गाडी खडी है, वहां चलिए, गाडी में ही बैठ कर आप को सुनाऊंगा और बात भी कर लूंगा” । मैंने उन्हें चाय पिलवाई और उनके साथ चाणक्य होटल के सामने बैंक के लिए निर्धारित पार्किंग में खडी उनकी गाडी में जा कर बैठ गया।

मुकेश जी ने एक डिस्क गाडी की डेक में लगा दी, स्व. मोहम्मद रफी के मधुर स्वर में “जब जब फूल खिले” फिल्म का गीत शुरू हो गया –

“ कभी पहले देखा नहीं ये शमां
ये मैं भूल से आ गया हूं कहां यहां मैं अजनबी हूं, यहां मैं अजनबी हूं मैं जो हूं, बस वही हूं”।

मैं कला, साहित्य और विशेष कर गीत – संगीत का शाश्वत प्रेमी रहा हूं। मैं गीत सुनते हुए उसकी स्वर-लहरी में डूब-सा गया। जब गीत समाप्त हुआ तो मैं जैसे तंद्रा से जगा। मैंने कहा – “ रफी साहब को गुजरे हुए दो दशक से भी ज्यादा का समय बीत गया, उनका अनुकरण करते हुए कई गायक आए , बहुत मशहूर भी हुए, परंतु उनका अन्दाज़ कोई नहीं पकड सका, उनकी आवाज़ को अपने गले में कोई नहीं ढाल सका। इस आवाज़ में रफी साहब की आवाज़ की खनक के साथ कुछ अलग-सी अनुगूंज भी है ” । मुकेश जी ने कहा – “ सर, यह आप के बेटे की आवाज़ है ”। मैंने आश्चर्यचकित होते हुए कहा – “ मतलब !” उन्होंने बताया कि वह आवाज़ उनके बेटे ऐश्वर्य निगम की थी जो शौकिया तौर पर छोटे मोटे कार्यक्रमों में कभी – कभार गा लेता था। उसी की वह रेकॉर्डिंग थी, जिसे वे मुझे सुनाना चाहते थे और उस पर मेरी प्रतिक्रिया चाहते थे।

मैंने मुकेश जी को बधाई देते हुए कहा – “ अद्भुत ! अद्वितीय !!
इसे सुन कर कोई नहीं कह सकता कि यह आवाज़ रफी के अलावा किसी और की है। आप बेटे को पूरी ट्रेनिंग दिलाइए, उसका उत्साह बढाइए, वह बहुत आगे जाएगा ” । मुकेश जी ने मेरी टिप्पणियों को मान देते हुए कहा कि मैं उसे आशीर्वाद दूं और स्वयं भी उसका उत्साहवर्द्धन करूं। कुछ ही दिनों बाद मेरे कार्यालय द्वारा अंचल स्तर पर राजभाषा समारोह-सह-कविसम्मेलन किया जाना था। मैंने मन ही मन निर्णय ले लिया कि इस दफे कविसम्मेलन के बदले उस लडके के गायन का ही कार्यक्रम रखा जाए। मैंने मुकेश जी से कहा कि आने-जाने के लिए मुज़फ्फरपुर के एसआरएम से बात कर मैं बैंक की गाडी का प्रबंध करा दूंगा और कविसम्मेलन के लिए जो थोडी-सी राशि बजट में है, वह उसे ही दे दूंगा। मुकेश जी प्रसन्न हो गए।

मैंने अपने अंचल प्रबंधक से बात की और फिर मुज़फ्फरपुर के सीनियर रीजनल मैनेजर एसके शर्मा से भी बात की। शर्मा जी सहर्ष तैयार हो गए और उन्होंने मुझे सुझाव भी दे दिया कि जवाहरलाल रोड शाखा में एक स्टाफ है, जिसकी पुत्री भी बहुत बढिया गाती है, उसे भी बुला लिया जाए तो और भी अच्छा रहेगा। मैं सहमत हो गया और उसे भी मुकेश जी के साथ भिजवाने का काम शर्मा जी को ही सौंप दिया । मुज़फ्फरपुर से टीम जब पटना तारामंडल के सभागार में पहुंची तो मुकेश जी ने बताया कि उस स्टाफ ने कहीं और कार्यक्रम होने की बात कह कर अपनी पुत्री को लाने से मना कर दिया। चूंकि मैं अपने पूरे कार्यक्रम की गहमागहमी में मशगुल था, इसीलिए उस विषय में ज्यादा सोचने और बात करने का समय नहीं रह गया था , मैंने कार्यक्रम शुरू करा दिया।

बैंककर्मियों की बडी भीड के अलावा प्रिंट और एलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि भी बडी संख्या में उपस्थित थे। ऐश्वर्य निगम का गायन बहुत ही सफल और प्रभावपूर्ण रहा, मीडिया के कुछ साथियों ने मुझे सलाह दी कि उस लडके को रियलिटी शो ‘सारेगमप” में क्यों नहीं भिजवाते। जब सब विदा हो गए और मैं नीचे गाडी तक मुकेश जी और उनके बेटे ऐश्वर्य निगम को छोडने गया तो मुकेश जी ने अपने बेटे से जो कुछ कहा , उसे सुन कर मैं गौरवान्वित भी हुआ और आश्चर्यचकित भी कि उनकी नज़र में मेरा स्थान कितना ऊंचा था । मुकेश जी ने कहा – “ ऐश्वर्य ! अंकल के पांव स्पर्श कर इनके आशीर्वाद लो , ये पारस पत्थर हैं, लोहा को भी छू दें, तो वह सोना हो जाए ”।

ऐश्वर्य ने बडे अदब से मेरे पांव छू कर आशीर्वाद लिए । मुकेश जी ने मुझसे कहा – “ सर, इसे कोई टिप्स दीजिए गायन और शैली में निखार के लिए”। मैंने ऐश्वर्य की तारीफ करते हुए कहा – “ तुम्हारा गायन अतुलनीय है, मोहम्मद रफी की नकल न कर खुद रफी बनो, गायन के क्रम में हाथ में कॉर्डलेस माइक थाम कर उसे मोहक अदा में घुमाना अच्छा लग रहा था , फिर भी फिलहाल अन्दाज़ दिखाने से ज्यादा गायन पर विशेष ध्यान दो, अन्दाज़ खुद ब खुद डेवलप हो जाएगा ” । मुकेश जी को कहा– “भाई, इसे सारेगमप में भेजने की तैयारी करों, यह कल का टॉपर सोनू निगम है ”। ऐश्वर्य निगम के गायन को हाई लाइट करते हुए उस कार्यक्रम की बहुत ही बढिया रपट मीडिया के सभी माध्यमों में प्रमुखता से प्रकाशित – प्रसारित हुई। मुकेश जी ने फोन पर बहुत ही खुश होते हुए बताया था कि ऐश्वर्य की व्यापक पैमाने पर वह पहली प्रस्तुति थी और मीडिया में पहली बार उसे उतना कवरेज मिला, उससे उसकी अच्छी पहचान बन गई, उन्होंने उस ब्रेक थ्रु डेब्यू के लिए और व्यापक पैमाने पर मीडिया कवरेज के लिए मेरे प्रति आभार जताया ।

समय गुजरा, ऐश्वर्य निगम सारे सा रे ग म प टॉपर का ब्रेक थ्रु डेब्यू

पंजाब नैशनल बैंक क्षेत्रीय कार्यालय दरभंगा में राजभाषा अधिकारी के रूप में कार्यरत रहते हुए मेरी प्रोन्नति प्रबंधक पद पर हुई । कुछ दिनों बाद मुझे दरभंगा से क्षेत्रीय कार्यालय मुज़फ्फरपुर और फिर अंचल कार्यालय पटना स्थानान्तरित कर दिया गया । मैं पटना में भी राजभाषा तथा जन सम्पर्क एवं प्रचार विभाग के कार्य देखने लगा । बीते काल-खण्ड में दरभंगा, मुज़फ्फरपुर, पटना आदि कार्यालयों में, जहां भी मैं पदस्थापित रहा, मुझे और मेरे कार्यालय को भारत सरकार से प्रथम पुरस्कार प्राप्त होता रहा, फलस्वरूप अपने बैंक सहित दूसरे बैंकों, संस्थानों, सरकारी महकमों और मीडिया में मेरी अच्छी पहचान बन गई, मैं बहुत लोकप्रिय हो गया और दो वर्षों बाद वरिष्ठ प्रबंधक के रूप में प्रोन्नत भी हुआ।

मेरा कार्यालय पटना के आर. ब्लॉक स्थित चाणक्य होटल बिल्डिंग के दूसरे तल पर था। अधिकारियों के शीर्ष नेता नहीं चाहते थे कि मैं पटना आऊं, क्योंकि मेरे पटना आने से उनके खासमखास अधिकारी की चमक फीकी पड जाने का अंदेशा था। फिर भी, उनके न चाहते हुए भी, प्रधान कार्यालय ने मुझे पटना में पदस्थापित कर दिया था , परिणामस्वरूप नेताजी की परशुरामी भृकुटि मेरे ऊपर तन गई थी। नेता जी और स्थानीय प्रबंधन की मेहरबानी से सुबह 7.30 से रात के 10.30 बजे तक काम में निरंतर लगे रहने वाली ड्युटी पर मुझे लगा दिया गया था (इस विषय पर विशेष जानकारी मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” में देखें, 440 पृष्ठों की वह पुस्तक विकल्प प्रकाशन नई दिल्ली ने छापी है, पुस्तक प्राप्ति के लिए मोबाइल नम्बर 09211559886 पर सम्पर्क किया जा सकता है) ।

तो, पटना आए हुए कुछ माह बीते होंगे, एक दिन शाम को अचानक मेरे मित्र मुकेश रंजन ऑफिस में आए। मुकेश जी पंजाब नैशनल बैंक में ही मुज़फ्फरपुर में कार्यरत थे और एक अधिकारी संगठन के नेता भी थे। हालांकि मैं उनके संगठन का सदस्य नहीं था, लेकिन अपनी शाश्वत नीति के अनुसार मैं सभी संगठनों के सदस्यों और नेताओं से मित्रवत व्यवहार रखता था तथा मेरे व्यक्तिगत बात – व्यवहार में यूनियन और एसोसिएशन का अलग होना कोई मायने नहीं रखता था। मैं मुकेश जी से उम्र और सर्विस में सीनियर था, वे मेरा बहुत आदर करते थे।

मुकेश रंजन ने कहा – “सर, ऑफिस से घर के लिए निकलिए तो मैं आपसे कुछ बात करना चाहूंगा और कुछ सुनाना भी चाहूंगा ”। मैंने कहा –“ मुझे दस बजे रात तक ऑफिस में ही रहना है, बताएं, बात क्या है ” ? मुझे लगा कि शायद वे कहेंगे कि दरभंगा और मुज़फ्फरपुर में रहते हुए उनके संगठन का सदस्य मैं नहीं बन सका था तो कम से कम अब तो बन जाऊं; हालांकि मैं यह भी समझता था कि वे इतने परिपक्व तो अवश्य थे कि वैसी बात मुझसे नहीं कहेंगे। मेरी अपेक्षा के अनुसार वे सही साबित हुए , उन्होंने एसोसिएशन और मेम्बरशिप की कोई बात नहीं की । उन्होंने आग्रह पूर्वक कहा – “ सर, ज्यादा नहीं, अपना दस मिनट का ही समय मुझे दे दीजिए और नीचे पार्किंग में मेरी गाडी खडी है, वहां चलिए, गाडी में ही बैठ कर आप को सुनाऊंगा और बात भी कर लूंगा” । मैंने उन्हें चाय पिलवाई और उनके साथ चाणक्य होटल के सामने बैंक के लिए निर्धारित पार्किंग में खडी उनकी गाडी में जा कर बैठ गया।

मुकेश जी ने एक डिस्क गाडी की डेक में लगा दी, स्व. मोहम्मद रफी के मधुर स्वर में “जब जब फूल खिले” फिल्म का गीत शुरू हो गया –

“ कभी पहले देखा नहीं ये शमां
ये मैं भूल से आ गया हूं कहां यहां मैं अजनबी हूं, यहां मैं अजनबी हूं मैं जो हूं, बस वही हूं”।

मैं कला, साहित्य और विशेष कर गीत – संगीत का शाश्वत प्रेमी रहा हूं। मैं गीत सुनते हुए उसकी स्वर-लहरी में डूब-सा गया। जब गीत समाप्त हुआ तो मैं जैसे तंद्रा से जगा। मैंने कहा – “ रफी साहब को गुजरे हुए दो दशक से भी ज्यादा का समय बीत गया, उनका अनुकरण करते हुए कई गायक आए , बहुत मशहूर भी हुए, परंतु उनका अन्दाज़ कोई नहीं पकड सका, उनकी आवाज़ को अपने गले में कोई नहीं ढाल सका। इस आवाज़ में रफी साहब की आवाज़ की खनक के साथ कुछ अलग-सी अनुगूंज भी है ” । मुकेश जी ने कहा – “ सर, यह आप के बेटे की आवाज़ है ”। मैंने आश्चर्यचकित होते हुए कहा – “ मतलब !” उन्होंने बताया कि वह आवाज़ उनके बेटे ऐश्वर्य निगम की थी जो शौकिया तौर पर छोटे मोटे कार्यक्रमों में कभी – कभार गा लेता था। उसी की वह रेकॉर्डिंग थी, जिसे वे मुझे सुनाना चाहते थे और उस पर मेरी प्रतिक्रिया चाहते थे।

मैंने मुकेश जी को बधाई देते हुए कहा – “ अद्भुत ! अद्वितीय !!
इसे सुन कर कोई नहीं कह सकता कि यह आवाज़ रफी के अलावा किसी और की है। आप बेटे को पूरी ट्रेनिंग दिलाइए, उसका उत्साह बढाइए, वह बहुत आगे जाएगा ” । मुकेश जी ने मेरी टिप्पणियों को मान देते हुए कहा कि मैं उसे आशीर्वाद दूं और स्वयं भी उसका उत्साहवर्द्धन करूं। कुछ ही दिनों बाद मेरे कार्यालय द्वारा अंचल स्तर पर राजभाषा समारोह-सह-कविसम्मेलन किया जाना था। मैंने मन ही मन निर्णय ले लिया कि इस दफे कविसम्मेलन के बदले उस लडके के गायन का ही कार्यक्रम रखा जाए। मैंने मुकेश जी से कहा कि आने-जाने के लिए मुज़फ्फरपुर के एसआरएम से बात कर मैं बैंक की गाडी का प्रबंध करा दूंगा और कविसम्मेलन के लिए जो थोडी-सी राशि बजट में है, वह उसे ही दे दूंगा। मुकेश जी प्रसन्न हो गए।

मैंने अपने अंचल प्रबंधक से बात की और फिर मुज़फ्फरपुर के सीनियर रीजनल मैनेजर एसके शर्मा से भी बात की। शर्मा जी सहर्ष तैयार हो गए और उन्होंने मुझे सुझाव भी दे दिया कि जवाहरलाल रोड शाखा में एक स्टाफ है, जिसकी पुत्री भी बहुत बढिया गाती है, उसे भी बुला लिया जाए तो और भी अच्छा रहेगा। मैं सहमत हो गया और उसे भी मुकेश जी के साथ भिजवाने का काम शर्मा जी को ही सौंप दिया । मुज़फ्फरपुर से टीम जब पटना तारामंडल के सभागार में पहुंची तो मुकेश जी ने बताया कि उस स्टाफ ने कहीं और कार्यक्रम होने की बात कह कर अपनी पुत्री को लाने से मना कर दिया। चूंकि मैं अपने पूरे कार्यक्रम की गहमागहमी में मशगुल था, इसीलिए उस विषय में ज्यादा सोचने और बात करने का समय नहीं रह गया था , मैंने कार्यक्रम शुरू करा दिया।

बैंककर्मियों की बडी भीड के अलावा प्रिंट और एलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि भी बडी संख्या में उपस्थित थे। ऐश्वर्य निगम का गायन बहुत ही सफल और प्रभावपूर्ण रहा, मीडिया के कुछ साथियों ने मुझे सलाह दी कि उस लडके को रियलिटी शो ‘सारेगमप” में क्यों नहीं भिजवाते। जब सब विदा हो गए और मैं नीचे गाडी तक मुकेश जी और उनके बेटे ऐश्वर्य निगम को छोडने गया तो मुकेश जी ने अपने बेटे से जो कुछ कहा , उसे सुन कर मैं गौरवान्वित भी हुआ और आश्चर्यचकित भी कि उनकी नज़र में मेरा स्थान कितना ऊंचा था । मुकेश जी ने कहा – “ ऐश्वर्य ! अंकल के पांव स्पर्श कर इनके आशीर्वाद लो , ये पारस पत्थर हैं, लोहा को भी छू दें, तो वह सोना हो जाए ”।

ऐश्वर्य ने बडे अदब से मेरे पांव छू कर आशीर्वाद लिए । मुकेश जी ने मुझसे कहा – “ सर, इसे कोई टिप्स दीजिए गायन और शैली में निखार के लिए”। मैंने ऐश्वर्य की तारीफ करते हुए कहा – “ तुम्हारा गायन अतुलनीय है, मोहम्मद रफी की नकल न कर खुद रफी बनो, गायन के क्रम में हाथ में कॉर्डलेस माइक थाम कर उसे मोहक अदा में घुमाना अच्छा लग रहा था , फिर भी फिलहाल अन्दाज़ दिखाने से ज्यादा गायन पर विशेष ध्यान दो, अन्दाज़ खुद ब खुद डेवलप हो जाएगा ” । मुकेश जी को कहा– “भाई, इसे सारेगमप में भेजने की तैयारी करों, यह कल का टॉपर सोनू निगम है ”। ऐश्वर्य निगम के गायन को हाई लाइट करते हुए उस कार्यक्रम की बहुत ही बढिया रपट मीडिया के सभी माध्यमों में प्रमुखता से प्रकाशित – प्रसारित हुई। मुकेश जी ने फोन पर बहुत ही खुश होते हुए बताया था कि ऐश्वर्य की व्यापक पैमाने पर वह पहली प्रस्तुति थी और मीडिया में पहली बार उसे उतना कवरेज मिला, उससे उसकी अच्छी पहचान बन गई, उन्होंने उस ब्रेक थ्रु डेब्यू के लिए और व्यापक पैमाने पर मीडिया कवरेज के लिए मेरे प्रति आभार जताया ।

समय गुजरा, ऐश्वर्य निगम सारेगमप के ऑडीशन में गया, सेलेक्ट हुआ, जब फाइनल में पहुंचा तो मुकेश जी ने पर्चे छपवा कर शहर – शहर घूम कर ऐश्वर्य के लिए वोट मांगे , वे पटना के व्यस्ततम डाकबंगला चौराहा पर भी खडे हो कर पर्चे बांटते हुए दिखे ।

दुनिया जानती है कि ऐश्वर्य निगम सारेगमप का टॉपर हुआ और आजकल मुम्बई में रह कर अपना करियर आगे बढा रहा है। मुकेश जी या उनके बेटे ऐश्वर्य निगम से पटना वाले कार्यक्रम के बाद फिर कभी मुलाकात नहीं हुई, परंतु मीडिया में उसकी खबरें यदा – कदा आती रहती है। मेरी दुआ है, वह इससे भी बहुत आगे जाए।
गमप के ऑडीशन में गया, सेलेक्ट हुआ, जब फाइनल में पहुंचा तो मुकेश जी ने पर्चे छपवा कर शहर – शहर घूम कर ऐश्वर्य के लिए वोट मांगे , वे पटना के व्यस्ततम डाकबंगला चौराहा पर भी खडे हो कर पर्चे बांटते हुए दिखे ।

दुनिया जानती है कि ऐश्वर्य निगम सारेगमप का टॉपर हुआ और आजकल मुम्बई में रह कर अपना करियर आगे बढा रहा है। मुकेश जी या उनके बेटे ऐश्वर्य निगम से पटना वाले कार्यक्रम के बाद फिर कभी मुलाकात नहीं हुई, परंतु मीडिया में उसकी खबरें यदा – कदा आती रहती है। मेरी दुआ है, वह इससे भी बहुत आगे जाए।

आई जी पुलिस है आज, वह मासूम-सा लडका

आई जी पुलिस है आज, वह मासूम-सा लडका

(मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़ दो” से)

 

सुरेन्द्र कुमार नाम का एक मासूम-सा नौजवान दिल्ली से कृषि अधिकारी के रूप में ज्वाइन करने पंजाब नैशनल बैंक दरभंगा क्षेत्रीय कार्यालय आया। उसने आवेदन किया था, न्यू बैंक ऑफ इंडिया में, सारी परीक्षाएं दी थी वहीं, इंटरव्यू भी दिया था वहीं, उसका सेलेक्शन भी हुआ था उसी बैंक में, लेकिन जब पैनल रिलीज हुआ तो न्यू बैंक पीएनबी में मर्ज हो चुका था। चूंकि वह बिहार का था, इसीलिए उसे बिहार अंचल दिया गया और चूंकि वह बिहार में समस्तीपुर का रहने वाला था जो पीएनबी के दरभंगा क्षेत्र में आता था, इसीलिए अंचल कार्यालय पटना ने उसकी पोस्टिंग दरभंगा में कर दी थी।

सुरेन्द्र कुमार जब दिल्ली से चलने लगे थे तो मैनेजमेंट और यूनियन, दोनों पक्षों के लोगों ने उन्हें बताया था कि पटना में श्रीलाल प्रसाद हिन्दी अफसर हैं, उनसे जरूर मिल लेना। जब वे पटना आए तो उन्हें पता चला कि कुछ ही दिनों पहले मेरा ट्रांसफर दरभंगा हो गया था। यह संयोग था या सुरेन्द्र जी ने दरभंगा मांगा था; पता नहीं , लेकिन यह सच था कि उन दिनों दरभंगा को पीएनबी में कालापानी कहा जाता था और पैरवी वाले लोग वहां जाने से खुद को बचा लेते थे , इसलिए संभव था कि वह बिन मांगे ही उन्हें मिल  गया हो ( इस विषय पर मैंने कभी उनसे बात नहीं की), जो भी हो, दरभंगा पा कर वे बहुत खुश थे और आते ही सबसे पहले मुझसे मिले। न्यू बैंक 04 सितम्बर 1993 को पीएनबी में मर्ज हुआ था। मैं न्यू बैंक के रीजनल ऑफिस पटना में हिन्दी अफसर था, मर्जर के बाद नवम्बर 1993 में मुझे पटना से दरभंगा स्थांतरित कर दिया गया था। उसी के कुछ दिनों बाद सुरेन्द्र जी ने ज्वाइन किया।

चूंकि बच्चों के शैक्षिक सत्र के मध्य ही मेरा स्थानांतरण हुआ था, इसीलिए मेरा परिवार अभी पटना में ही था , मैं एक फ्लैट किराये पर ले कर अकेले रह रहा था।  मैं ने सुरेन्द्र जी को टिफिन के समय होटल में ले जा कर भोजन कराया और अपने फ्लैट में एक कमरा रहने के लिए दे दिया। उन्होंने मुझसे कहा –  “ दिल्ली और पटना में मुझे आप ही से मिलने के लिए कहा गया था, मुझे एसोसिएशन का सदस्य बनने के लिए कहा जा रहा है, आप बताएं कि मैं कौन – से एसोसिएशन में जाऊं ” ? मैंने उन्हें बैंक में विद्यमान अधिकारियों के दो प्रमुख संगठनों के बारे में विस्तार से बता दिया , मेजॉरिटी और माइनॉरिटी एसोसिएशन में होने का मतलब भी समझा दिया और कह दिया कि अब वे जिसमें चाहें, ज्वाइन कर लें। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि मैं जिस एसोसिएशन में था, वे भी उसी में ज्वाइन करेंगे। उन्होंने माइनॉरिटी ज्वाइन कर लिया।

अगले ही दिन शाम को बडे दुखी मन से सुरेन्द्र जी मेरे पास आए, बोले – “ सर, मेरे ऊपर दबाव डाला जा रहा है कि मैं मेजॉरिटी एसोसिएशन एआईबीओसी ज्वाइन कर लूं, नहीं तो पछताना पडेगा। सर, मेरा वास्तविक लक्ष्य है – यूपीएससी में सफल हो कर आईएएस / आईपीएस बनना। ऐसे तनाव की मैंने कल्पना नहीं की थी, अब आप ही बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए ”?  मुझे वे दिन याद आए , जब कुछ ही दिनों पहले मैंने दरभंगा में ज्वाइन किया था और एसोसिएशन वाले रोज मेरे ऊपर दबाव बनाते थे, लेकिन उन्हें अपनी हैसियत और मेरी हैसियत मालूम थी, इसीलिए मुझे अन्दर ही अन्दर वहां मेरे पूरे पांच – छह साल के कार्यकाल तक परेशान किया जाता रहा, परंतु कोई भी कभी भी सामने खुल कर मुझे धमकाने का साहस नहीं कर सका। मैंने सुरेन्द्र जी को सीधी सलाह दे दी कि वे आज ही और अभी ही मेजॉरिटी एसोसिएशन ज्वाइन कर लें तथा अपने वास्तविक लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करें। सुरेन्द्र जी ने वैसा ही किया।

मैंने धनबाद में एक साल तक बैंक में काम किया था । वहां कोयला मजदूर संघों के सदस्यों और नेताओं के बीच आपसी संघर्षों की कहानी स्थानीय अखबारों में छपती रहती थी । मैंने मजदूर यूनियन का बडा ही वीभत्स रूप वहां देखा था। दरभंगा में भी कुछ लोग वैसे ही थे, जो व्यक्तिगत सुख – दुख में शामिल होने या न होने, कार्यालय में बैठने की सीट सुविधाजनक उपलब्ध कराने या न कराने, बैंक नियमों के तहत अधिकारियों की पात्रता के अनुसार मिलने वाली सुविधाओं की स्वीकृति दिलाने या न दिलाने तथा परस्पर शिष्टाचार व सौमनस्यतापूर्ण व्यवहार करने या न करने का निर्णय एसोसिएशन के आधार लेते थे; जबकि मेरा मानना था कि बैंक और एसोसिएशन तथा व्यक्तिगत संबंध अलग – अलग विषय हैं, वैचारिक मतभेद के कारण किसी के प्राप्य को बाधित करना या व्यक्तिगत वैमंस्य रखना अथवा किसी न किसी बहाने परेशान करना सामान्य मानवीय आचरण के विपरीत था। चूंकि मैं छात्र जीवन से संघर्षों में पला – बढा था और आन्दोलनों से जुडा हुआ रहा था, इसीलिए मैं संघर्ष से घबडाता नहीं था, परंतु सुरेन्द्र कुमार तो बहुत ही शांत व सुशील युवा था, जिसके सामने करियर का अनंत आकाश खुला पडा था । यही कारण था कि मैंने उसे  संघर्षपूर्ण परिस्थितियों से दूर रह कर अपने वास्तविक लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित करने की सलाह दी।

वाकई, सुरेन्द्र जी पढने – लिखने वाले युवक थे, गंभीर विषयों पर वे लेख लिखते, उनके लेख बैंक की पत्रिकाओं में छपने लगे , विभिन्न प्रतियोगिताओं में भी वे पूरी गंभीरता से भाग लेते और प्राय: प्रथम पुरस्कार ही प्राप्त करते। वे अपने कार्यों के प्रति भी पूरी तरह समर्पित थे, जिज्ञासा, कर्मठता, मेहनत और ईमानदारी उनके व्यक्तित्व के मूल मंत्र थे। उन्हें ऋण विभाग के काम में लगाया गया । वे बैंक के सकुलर का भी गहन अध्ययन करते थे। नायक कमेटी और जीलानी कमेटी की अनुशंसाओं के अनुसार एमबीएफ (मैक्सीमम बैंक फाइनांस) की राशि निकालने में कई बार उन्हें अपने बॉस प्रबंधक से भी मतभेद हो जाया करता था, जिसमें प्राय: उन्हीं की गणना सही निकलती थी।

इस प्रकार सुरेन्द्र कुमार की अध्ययनशीलता और काम के प्रति लगन देख कर धीरे – धीरे लोगों में यह धारणा बलवती होती गई कि वह लडका अवश्य यूपीएससी में सफल होगा। सबका अनुमान सही भी साबित हुआ, कृषि अधिकारी के रूप में ज्वाइन करने के तीसरे साल में ही  सुरेन्द्र जी यूपीएससी की लिखित परीक्षा में सफल हो गए। उसके बाद इंटरव्यू की तैयारी कराने के लिए हम चार – पांच अफसरों और मैनेजरों ने मिल कर एक इंटरव्यू बोर्ड का गठन किया और रोज शाम को उनका मॉक टेस्ट लेने लगे। अंतत: सुरेन्द्र कुमार फाइनली सेलेक्ट हो गए, उन्हें आईपीएस में असम कैडर मिला, आजकल वे गुवाहाटी में आई जी पुलिस हैं। अब भी कभी – कभी वे बात कर लेते हैं।

उन दिनों मोबाइल प्रचलन में नहीं आया था और एसटीडी न तो इतना सस्ता था और न ही इतनी आसानी से उपल्ब्ध था। एसटीडी फोन करने के लिए टेलीफोन बुथ पर जाना पडता था । सुरेन्द्र जी स्वयं पहल कर ऑफिस के लैंड लाइन पर फोन कर मुझसे बात कर लिया करते थे । बाद के दिनों में मोबाइल फोन ने सूचना को जितना आसान बना दिया,  मेरे जैसे संकोची और लिहाजी आदमी के लिए थोडी परेशानी भी पैदा कर दी । लैंड लाइन फोन होने पर यह इत्मीनाना रहता था कि जिस व्यक्ति को  फोन किया जा रहा हो, यदि वह अपने फोन के पास होगा, तभी तो बात करेगा । परंतु मोबाइल फोन पर बात करने वाला व्यक्ति, पता नहीं, कब कहां और किसके पास हो , बात करने की स्थिति में हो भी या नहीं। यही सोच कर मैं अपनी नौकरी के दौरान और आज भी किसी विशिष्ट व्यक्ति को मोबाइल पर फोन करने में संकोच करता रहा हूं और समय का ध्यान विशेष रूप से रखता रहा हूं , ताकि ऐसा न हो कि मैं उसे फोन करूं और वह किसी महत्वपूर्ण बैठक में हो अथवा किसी संवेदनशील परिस्थिति में हो । और, किसी आईएएस व आईपीएस के मोबाइल पर फोन करने में तो मेरा मन कुछ ज्यादा ही संवेदनशील और संकोची हो जाता है, इसीलिए मोबाइल पर फोन करने के समय के मामले में मैं कुछ अधिक ही सतर्कता बरतता हूं। शायद सुरेन्द्र जी मेरे संकोच को बिना बताए ही समझते हैं, इसीलिए वे खुद ही पहल कर मुझे यदा – कदा फोन कर समाचार पूछ लेते हैं । इसे मैं उनका बडप्पन समझता हूं; आज भी वे मेरा बहुत आदर करते हैं और पहले जैसा ही सम्मानपूर्ण व्यवहार करते हैं।

शायद यह नीति वाक्य सच है कि कोई भला आदमी जितना ऊंचा उठता जाता है , उतना ही विनम्र होता जाता है।

ग़जल पूरी हो गई

जो मेरे दोस्त की फरमाईश थी

07 फरवरी को अपने फेसबुक वाल पर मैंने एक अंतरंग मित्र से मुलाक़ात का शब्दचित्र पोस्ट किया था और उस दोस्त के आग्रह पर ही उस मुलाकात एवं उससे हुई बातचीत पर एक ग़जल आज कही है :-

 

ये जख़्म वो जख़्म तो नहीं, फिर दर्द बेशुमार  क्यूं है?

हवा खुश्क है, नम तो नहीं,  फिर सर्द बेशुमार क्यूं हैं?

न तूफां, न ऊंटों  की  दौड  और ना काफिला ही कोई

आंखों  में  वीरान   सहरा,  फिर गर्द वो गुबार क्यूं हैं?

प्याले  में  तूफान  भी अब  तो हो गया खामोश   यूं ही

सहर  अब   होने  को आई  फिर नशा वो खुमार क्यूं है?

माना कि मुश्किल रहा सफर  और मंजिल भी आसां न थी

अब दौर –ए- गर्दिश भी नहीं  फिर भी तू बेजार   क्यूं  है?

फसल – ए – बहार भी आ गई दीदार – ए – यार भी हो गया

हर   ख्वाब  भी  हुआ   पूरा फिर एहसास – ए – हार क्यूं है?

तेरे  ही  कंधों  पर  रहा     दारोमदार  हार  जीत   का

कोई नकाब न ही चिलमन    फिर दर वो दीवार क्यूं है?

हिम्मत – ए – मर्दां की मिसाल रहा तू हर जद्दोजहद में

अब जंग खत्म होने को है    फिर तू  शर्मशार क्यूं  है?
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ये जख़्म वो जख़्म तो नहीं, फिर दर्द बेशुमार क्यूं है ?

ये जख़्म वो जख़्म तो नहीं, फिर दर्द बेशुमार क्यूं है ?
 
पैंतीस साल बाद मेरा एक अंतरंग मित्र कल बंगलोर की भीड – भरी सडकों पर घूमता हुआ अचानक मिल गया, बडी मुश्किल से मैं उसे पहचान पाया, हालांकि उसने देखते ही मुझे पहचान लिया।
 
मैं एक चौराहे पर ट्रैफिक सिगनल खुलने का इंतजार कर रहा था । बंगलोर की सडकों पर हमेशा जाम – जैसी स्थिति रहती है। गाडी में बैठा –बैठा मैं अन्यमनस्क – सा सामने की ओर देख रहा था। तभी जेबरा क्रॉसिंग को पार करता हुआ एक बूढा-सा आदमी नजर आया। मुझे लगा कि मैं उसे जानता हूं । मैंने जोर से पुकारा, “ भाई साहब !” उसने अकचका कर मेरी ओर देखा। बंगलोर के कछुवे की चाल से सरकने वाली ट्रैफिक काम आ गई। मैंने गाडी का अगला दरवाजा खोल कर अपनी बगल वाली सीट पर उसे बैठा लिया। मैं याद कर ही रहा था कि मेरी पहचान का कौन-सा आदमी था वह कि इतने में उसके चेहरे में झांकते हुए मैं डर – सा गया। वह बहुत ही उदास, हताश और निराश – सा लगा। ऐसा महसूस हुआ कि वह गहरे अवसाद में डूबता चला जा रहा हो। मैं यह सब महसूस कर सहम गया क्योंकि अवसाद – ग्रस्त आदमी में जीने की इच्छा ही समाप्त हो जाती है।
 
वह बूढा – सा आदमी थोडी देर की चुप्पी के बाद डूबती हुई – सी आवाज़ में बोला – “ मुझे यह तो पता था कि तुम बंगलोर में ही हो, पर इस तरह मिल जाओगे, यह कहां पता था ?” इतना कह कर वह चुप हो गया। उसकी आवाज़ से अब मैं उसे पहचान सका । लेकिन ऐसा चुप्पा तो वह था नहीं। मुझे तो हंसता – गाता, चहचहाता – खिलखिलाता , दोस्तों के बीच हमेशा भचर – भचर बोलते रहने वाला मेरा वह जिन्दादिल दोस्त याद था, जो एक बार बोलना शुरू करता तो चुप होने का नाम ही नहीं लेता। दोस्त गाली गलौच करते हुए अलग होते और फिर दूसरे दिन गाली गलौच के साथ ही मिलते। ऐसा ही था हमारा दोस्ताना और प्यारा याराना। हम में से किसी के भी मन में किसी के भी लिए कोई दुराव – छुपाव नहीं था, मेरा वह दोस्त तो अपने चपर – चपर बोलने के अन्दाज़ के लिए ही हरदिल अजीज था।
 
पैंतीस साल ! बहुत होते हैं पैंतीस साल । बहुत कुछ था कहने – सुनने को, एक दूसरे से अपने ग़म वो खुशी शेयर करने को, परंतु उसकी चुप्पी ने मेरे भी होंठ सिल कर रख दिये । हम दोनों साथ पढे, साथ बडे हुए, साथ ही नौकरी पकडी और साथ ही रिटायर भी हुए, परंतु पिछले पैंतीस वर्षों में मिल बैठने का संयोग कभी नहीं बन सका। मैंने कुछ चिंतित होते हुए पूछा- “ सब कुशल तो है ?” उसने हां में सिर हिलाया। “तो फिर ऐसी मनहूसियत क्यों ? मुझे ऐसा क्यों लग रहा है कि तुम मुझसे कुछ छुपा रहे हो क्योंकि तुम अन्दर ही अन्दर ग़मज़दा ही नहीं, खौफ़ज़दा भी लग रहे हो ”।
 
मैंने पास के ही एक पार्क की ओर गाडी मोड दी। पार्क में तफरीह करने वालों की चहल – पहल सुबह शाम में ही रहती है । अभी पार्क वीरान – सा था । मैंने पार्क के किनारे गाडी खडी कर दी। दोनों खामोश, बेजुबां, बेआवाज़, गुमसुम, चुपचाप बैठे रहे। उसने मेरे कंधे पर अपना सिर रख दिया , उसकी आंखों में फरवरी के इस शुष्क मौसम में भी बादल उमडने घुमडने लगे, वह रोए जा रहा था, मैं भी खुद को रोक नहीं सका। दोनों यार चुपचाप रोते रहे, बिन कुछ कहे हम एक – दूसरे का दर्द दिल की गहराई तक महसूस कर रहे थे।
 
 
मैंने उसके अंतर्मन में घूसने की कोशिश की – “ सुना था कि तुम्हारे सभी बच्चों ने उच्च शिक्षा प्राप्त कर अच्छी नौकरियां भी कर ली हैं, सभी बाल बच्चेदार भी हो गए हैं और वेल सेटल्ड हैं, तुम्हें अच्छी – खासी पेंशन भी मिल रही होगी, फिर परेशानी कहां है ”? अब आंखों के बादल बरस चुके थे, आसमान साफ था, हम दोनों अपने में लौट आए थे। उसने कहा – “ ठीक सुना है तुमने। सब कुछ ठीकठाक है। तू अपनी भी तो सुना। तुम्हारी आत्मकथा प्रकाशित होने की खबर फेसबुक से मिली थी, मैंने खरीद कर पढी है। बहुत गहरे डूब कर तुमने बचपन से ले कर अब तक की सारी बातें रख दी हैं, फिर भी मुझे लगता है कि तुमने या तो जानबूझ कर कुछ बातें छोड दी है अथवा अनजाने में छुट गईं हैं ”। मैंने जवाब दिया – “ कुछ बातें छुट गईं होंगी तो अगले संस्करण में आ जाएंगी। छोडो ये सब , सवालों को टालो मत ”।
 
वह फिर उदास हो गया । उसने कहना शुरू किया – “ तुम तो जानते हो कि बहुत सम्पन्न नहीं था मेरा परिवार। नौकरी लगी तो गांव – घर – परिवार की जिम्मेदारियों में उलझा रहा । सगे संबंधियों ने भी बहुत मान – सम्मान दिया। यहां तक कि मुझसे पूछे वगैर कोई भी काम कहीं नहीं भी होता था। वर्षों बाद गांव – घर – परिवार से फुर्सत मिली तो बच्चे बडे हो गए। उन्हें सेटल करते – करते रिटायरमेंट के दिन आ गए। रिटायरमेंट पर मिली रकम और पेंशन की जमानत पर हाउसिंग लोन ले कर एक अच्छा – सा फ्लैट खरीद लिया ताकि बहू – बेटे के साथ आराम से रह सकूं, किंतु उनका अपना करियर भी था, सो वे मेरे पास नहीं आए, मुझे ही अपने पास बुला लिया , अब उन्हीं के पास रहता हूं ”। मैंने उसे आश्वस्त किया – “ यह तो अच्छी बात है , दिक्कत कहां है ”?
 
उसने एक लम्बी सांस ली और फिर कहना शुरू किया – “ आधी पेंशन हाउसिंग लोन की किस्त में चली जाती है । कोई जमा – पूंजी बची नहीं है मेरे पास । अब सगे संबंधियों को पता है कि मेरे पास उनके लिए कुछ भी नहीं है। अब मुझे कोई पूछता भी नहीं, कोई फोन पर हाल – चाल भी नहीं पूछता । पहले जिन लोगों के लिए मेरी इच्छा और सलाह आदेश के समान हुआ करती थी, अब वे ही मेरी उपेक्षा करने लगे हैं , जैसे मेरा कोई अस्तित्व ही नहीं हो। बस, उपेक्षा का वह दंश ही मुझे अन्दर तक कुरेद डालता है, दूसरी कोई बात नहीं है ”।
 
मैंने थोडा फिलॉस्फर का अन्दाज़ लाते हुए कहा – “ यह तो तुम्हारी नासमझी है, सगे संबंधियों से तुमने बहुत अपेक्षा पाल रखी है , उनके लिए तुमने जो कुछ किया है, वैसा ही उनसे पाने की चाह रखते हो और वैसा नहीं मिलने पर तुम्हें उपेक्षा महसूस होती है। बच्चों को भी उनके अपने ढंग से जीने दो , उनकी भी कोई बात अगर तुम्हें उपेक्षा जैसी लगती है तो समझ लो कि तुमने वह बात सुनी ही नहीं। अपने में मस्त रहो, उन्हें भी मस्त रहने दो और सगे संबंधियों की तो बात ही भूल जाओ ”।
 
उसने कहा – “उन्हें रोकता – टोकता कौन है यार, किंतु जब भी देखता हूं कि वे अनुभवहीनता के कारण किसी निर्णय से खुद को गड्ढे में ढकेलने जा रहे हैं, तो खुद को रोक नहीं पाता अपने अनुभव से उन्हें बचाने का प्रयास करने से। बस, यही बात उन्हें खल जाती है। अब मेरा क्या है, बाकी दिन भी किसी तरह कट ही जाएंगे। एक ही चिंता लगी रहती है कि हाउसिंग लोन सध जाए ताकि अगर पहले मैं चल बसूं तो श्रीमती जी के ऊपर कोई बोझ न आए, फेमिली पेंशन की रकम से उनका जीवन – बसर हो ही जाएगा । दूसरी चिंता यह भी लगी रहती है कि मेरे बच्चे अपने सीधेपन के कारण किसी मुसीबत में न फंस जाएं । सबसे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब बेटे – बहू के सामने भी मुझे सफाई देनी पड जाती है कि मैं जो कुछ भी कहता और करता हूं, उनके भले के लिए ही कहता करता हूं। ऐसे में मुझे अपना वजूद ही बेमानी लगने लगता है। ”
 
मुझे अपने दोस्त की बातों से सहानुभूति तो हुई , परंतु गुस्सा भी आया। मैंने झिडकते हुए कहा – “ ज्यादा सेंटी मत मार यार, बात – बात पर इतना इमोशनल क्यों हो जाता है ? खुद भी खुश रहो , श्रीमती जी को भी खुश रखो और ऐसे रहो कि बच्चे तुम्हें बोझ न समझें। चलो, घर चलते हैं, निकट ही है, वर्षों बाद मिले हैं, ढेर सारी बातें करेंगे, अपनी कुछ गजल भी तुम्हें सुनाऊंगा, फिर कुछ चाय – नास्ता कर के जाना ” । उसने कुछ हडबडी दिखाते हुए कहा – “ फिर कभी आऊंगा तो इत्मीनान से बैठूंगा, भोजन भी करूंगा, तुम्हारी ग़जलें भी सुनूंगा, अभी तो कुछ काम से निकला था, बहू रास्ता देख रही होगी। और हां, हो सके तो हमारी मुलाकात पर भी एक ग़जल कहना, आऊंगा तो सुनाना, मैं पहले की तरह ही तेरी गजलों का सस्वर पाठ करूंगा ”। वह चला गया , मैं भी अपने रास्ते चल पडा। अभी भी मेरे जेहन में उसका उदास चेहरा घूम रहा है, उसकी एक – एक बात कुछ भूल जाने और कुछ याद रखने के लिए कुरेद रही है। मैं उससे हुई मुलाक़ात को ग़जल में ढालेने की कोशिश कर रहा हूं।

राजनीति में ‘पकौडावाद’

राजनीति में ‘पकौडावाद’

संसद से सडक तक पकौडा पुराण पर प्रवचन जारी है। शासन में मन से प्रधान सेवक और कुनबे में तन से प्रधान प्रबंधक आजकल राजनीति में ‘पकौडावाद’ का प्रवर्तन कर रहे हैं। हालांकि साहित्य में पिछली सदी में ही सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, प्रभाकर बलवंत माचवे, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, भवानी प्रसाद मिश्र सरीखे दिग्गज कवियों ने जाने – अनजाने ‘पकौडावाद का प्रवर्तन कर दिया था। सचमुच रवि से अधिक पहुंच कवि की होती है, तभी तो उन्होंने बहुत पहले ही भांप लिया था कि-

एक दिन ऐसा आएगा

बेरोजगार पकौडा तलेगा

सेवक हथौडा मारेगा ।

मगर हाय रि किस्मत ! छायावाद, प्रयोगवाद, प्रगतिवाद, हालावाद, नकेनवाद आदि के प्रवर्तकों के नाम तो हिन्दी साहित्य के इतिहासकारों ने शामिल कर लिया, परंतु ‘पकौडावाद’ के प्रवर्तकों के नाम लेने से वे चुक गए। गलतियां तो उन महान कवियों से भी हुई , वे खुद भी उसका श्रेय लेने के प्रति उदासीन बने रहे। हालांकि माचवे जी ने तो अपने एक कविता – संग्रह का नाम ही “तेल की पकौडियां” रख दिया और निराला जी ने ‘गर्म पकौडी’ भी लिख दी, आजकल तो सरकारी महकमे के एक शिक्षा बोर्ड ने भी बच्चों के सिलेबस में  “दौडी – दौडी आई पकौडी” कविता शामिल कर ली है। नमूने देखिए –

दौड़ी दौड़ी आई पकौड़ी

छुन छुन, छुन छुन तेल मै नाची

प्लेट में आ शरमाई पकौड़ी।

हाथ से उछली, मुंह मे पहुंची

पेट में जा घबराई पकौड़ी ।

दौड़ी दौड़ी आई पकौड़ी

मेरे मन को भाई पकौड़ी ॥

 

गर्म पकौडी

 

ऐ गर्म पकौडी

तेल की भुनी

नमक मिर्च की मिली

ऐ गर्म पकौडी ।

मेरी जीभ जल गई

सिसकियां निकल रहीं

लार की बूंदे कितनी टपकीं

पर दाढ तले दबा ही रक्खी

मैंने

कंजूस ने ज्यों कौडी ।

पहले तूने मुझको खींचा

दिल लेकर फिर कपडे-सा फींचा

अरि, तेरे लिए छोडी

बम्हन की पकाई

मैंने, घी की कचौडी ॥

तब के महान कवि तो ‘पकौडावाद’ को अपने नाम देने में चुक गए, इसीलिए कॉपीराइत का दावा उनके वंशज नहीं कर सकते। आज के दो महान राजनीति के  कवि या कविता के राजनेता राजनीति में चुनावी ‘पकौडावाद’ का प्रवर्तन कर रहे हैं, यह बात पक्की है कि उसके प्रवर्तन का कॉपीराइट उनके ही नाम होगा। अब तो भक्तजन भी उसे एक आन्दोलन बनाने के प्रचार अभियान पर निकलने की तैयारी में हैं, भले ही ‘पकौडी’ जैसा शब्द जबान की फिसलन में मुंह से निकल गया हो, परंतु, जब प्रधान जी के मुंह से आखिर वह निकल ही गया तो भक्तजनों को तो उसका औचित्य सिद्ध करने के लिए चर्चा – परिचर्चा करनी ही है। सही भी है , जब चाय – चर्चा प्रधानी तक पहुंचा सकती है तो उसे बनाए रखने के लिए चाय की चचेरी चाची पकौडी को तो भाव देना ही पडेगा न ! क्या पता, चाय-पकौडी-संगम जैसी अभूतपूर्व ऐतिहासिक अवधारणाओं की स्थापना के कारण उनके लिए कल ज्ञानपीठ पुरस्कार और नॉबेल प्राइज का रास्ता भी खुल जाए !

मैं निराला, मुक्तिबोध, धूमिल, राजकमल चौधरी आदि महान कवियों की दिवंगत आत्माओं के प्रति विनम्र श्रद्धांजलि, संवेदनाएं और सहानुभूति व्यक्त करता हूं, वे कविता और समाज में क्रांति लाने के लिए लिखते रहने के बावजूद सत्ता – सुख – प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करने लायक कविताएं नहीं लिख पाए, जैसा कि आज श्मशान – कब्रिस्तान, जाति – धर्म, मंदिर – मस्जिद और हिन्दू – मुसलमान की भावनाओं से ओतप्रोत  राजनीतिक क्रांति के पुरोधा द्वय चाय – पकौडावाद की स्थापना कर रहे हैं।

अब देखना है कि देश के बेरोजगार कविताप्रेमी पकौडे तलते हैं या गर्म तेल से भरी कडाही ही उडेल देते हैं? अपुन तो सबके लिए दुआ ही करेंगे !

 

 

खबरों की खबर पर एक खबर

खबरों की खबर पर एक खबर
 
‘बेल्लजत गुनाह’, ‘मुफ्त हुए बदनाम’ ‘न घर के न घाट के’, ‘खाए न पीए प्लेट फोडे बारह आना’ , ‘जातो गंवाए भातो न खाए’ और ‘प्याजो खाए – दण्डो भुगते – मारो खाए’ आदि जैसे मुहावरे व लोकोक्तियां आजकल राजस्थान और दिल्ली के सत्ता – गलियारे में वायब्रेशन मोड में हैं।
 
खबर है कि एक स्वयंभू सेना के एक शीर्ष नेता ने उस खबर का खण्डन किया है जिसके अनुसार यह खबर फैली थी कि उसी सेना के एक अन्य शीर्ष नेता ने एक पत्र जारी करते हुए यह खबर फैलाई थी कि संजय लीला भंसाली ने ‘पद्मावत’ फिल्म के माध्यम से उनकी आन – बान – शान को कोई आंच नहीं पहुंचाई है, बल्कि उसमें चार चांद ही लगाया है, इसीलिए उस फिल्म का विरोध करने का फैसला वापस ले लिया गया है।
 
बचपन में बडे बुजूर्ग सिखाते थे कि यदि कोई कहे कि कौवा तुम्हारा कान काट कर ले जा रहा है, तो लट्ठ ले कर कौवे के पीछे मत भागो, अपने कान टटोल कर देख लो। अब कौन किसको सिखाए ?
 
‘पद्मावत’ फिल्म और उसका विरोध करने वालों के बारे में मुझे अब कुछ नहीं कहना है, क्योंकि 01 दिसम्बर 2017 के अपने फेसबुक और ब्लॉग shreelal.in पोस्ट में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ मैं बहुत कुछ कह चुका हूं । हां, तरस आता है उन भक्तजनों की अंधभक्ति पर, जो छद्म धर्मवाद  का सहारा ले कर फिल्म का विरोध करने वालों का समर्थन करने के नाम पर भक्ति – भाव में सराबोर हो कर नग्न नर्तन गायन कर रहे थे। कमाल है जी, मुद्दई सुस्त , गवाह चुस्त ! हर जगह बीच – बीचवों की हालत ऐसी होती है। सवाल है कि वो बीचबीचवा कौन हैं ? यह भी कोई पूछने वाला सवाल है ?
चुनावी हार – जीत तो लगी रहती है और लगी रहेगी, परंतु नीति एवं नीयत का इस तरह बेपर्द होना, ग़जब का तमाशा है !
 
दरअसल, उस तमाशे में महज दो लोकसभा और एक विधान सभा सीट का ही सवाल नहीं था, किसी की लम्बी नाक का भी सवाल था। सच, यह भी उत्तर प्रदेश की तरह श्मशान बनाम कब्रिस्तान और गुजरात की तरह सोमनाथ बनाम ‘आंखों में आंसू लिए चाय वाला अपना लडका ‘ , जैसा ही इतिहास और समाज के नाम पर जातिवाद, क्षेत्रवाद और छद्म धर्मवाद का एक राजनीतिक कार्ड था।
 
अनगिनत बेगुनाहों की गर्दनें कट गईं उस लम्बी नाक न कटने देने के फेर में, मगर हाय री किस्मत ! नाक भी कटी और बेगुनाहों की गर्दनें भी , हालांकि कई राज्य सरकारों की गर्दनें कटते – कटते बच गईं , परंतु नाक नहीं बची किसी की भी । फिर भी नाक कटाने वालों के सिर नहीं झुके, क्योंकि सिर झुकने के लिए आंखों में पानी का होना जरूरी है, परंतु सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना और संविधान की सत्ता को धत्ता बताना शासन- प्रशासन की शर्म वो हया का मर जाना तो साबित कर ही गया, क्योंकि तीनों सीटें भी गौरैया की भांति झोली से फुदक कर भाग गईं और शासन सत्ता के निकम्मेपन तथा उसके पीछे की नीति व नीयत की बदनामी भी देश – दुनिया में फैल गईं । फजीहतों का ऐसा गुब्बार तो गुजरात में हारते – हारते जीत जाने अथवा उत्तराखण्ड में राज्य सरकार की बर्खास्तगी के खिलाफ कोर्ट के आदेश हो जाने पर भी नहीं उठा था।
 
आखिर स्कूली मासूमों के दिलों में दहशत का दरिया बहाने का खेल हाथ पर हाथ धरे चुपचाप देखते रहने वाले खुद ही इतनी दहशत में क्यूं आ गए कि बदनामी के वो सारे साजोसामान हादसों के अंदेशे मात्र से खरीदने लगे ? शायद इसलिए कि अभी 2019 भले ही कुछ दूर हो , परंतु 2018 में भी तो कुछ खेल – तमाशे होने हैं। सचमुच, तमाशबीनों को बहुत कुछ देखने – सुनने को जल्दी ही मिलने वाले हैं। राजनीति का खेल देखने का शौक फरमाने वाले बच्चे अभी से ही ऊंचे कंधों के जुगाड में रहने लगे हैं ताकि उन पर सवार हो कर वे तमाशे देख सकें , अपुन तो ‘राम झरोखा बैठ के सबकी खबर’ लेते ही रहेंगे।

धुएं की लकीरें नहीं हैं वे यादें

धुएं की लकीरें नहीं हैं वे यादें

(मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़  दो” से)

              सूरज जब बांस की झुर्मुट के पीछे सोने चला जाता, सांझ अपनी चादर में सितारे टांकने लग जाती और पंछी अपने घोसलों की ओर लौटने लग जाते, तब हम भी अपने आशियाने की ओर लौट चलते | उस बीच पशाह नदी गाती गुनगुनाती मचलती चली जा रही होती, उसकी कल – कल – ध्वनि कुछ ज्यादा ही साफ सुनाई पडने लग जाती,  चिडियों की चह – चह मन्द पडने लग जाती  और शाम के शामियाने में तारों की महफिल सजने के पहले रोशनी का जुगाड लिए जुगनुओं की टोली निकल रही होती ,  तब हम अपने – अपने गांव की ओर लौटते हुए बडी शिद्दत से महसूस करने लग जाते कि नदी जितनी तेज गति से नाचती – गाती – भागती दूर चली जा रही होती है, उतनी ही करीब आती हुई महसूस होती है।

मैं और राजेन्द्र हर शनिवार – रविवार की शाम पशाह नदी किनारे डूबते हुए सूरज को नीहारते, पक्षियों का कलरव गान सुनते और साहित्य, कला व स्कूली होम वर्क की चर्चा करते हुए बिताते । न गांव – गंवई की राजनीति, न सामाजिक – आर्थिक मसलों की चिंता, न इधर – उधर की बातें , न शिकवा न शिकायत, हर मुश्किल से बेखबर हम अपनी ही दुनिया में रमे अपना ज्यादातर खाली समय पढाई की चर्चा करते हुए खुशनुमा अंदाज़ में गुजारते।

हम दोनों का गांव आमने – सामने था, केवल एक छोटी – सी नदी ‘पशाह’ दोनों गांवों के बीच नई नवेली दुल्हन की छनछनाती पाजेब की तरह अपनी पतली-सी धार को झमकाती हुई उछलती – कूदती भागती रहती । राजेन्द्र का घर भतनहिया गांव के पश्चिमी छोर पर और मेरा घर सिसवनिया गांव के पूर्वी छोर पर था।  भतनहिया गांव सिसवनिया गांव के पूरब में था, इस प्रकार हम दोनों के घर, दो – चार अन्य घरों की ओट के बाद, लगभग आमने – सामने थे । हमलोग शनिवार एवं रविवार की शाम को अपने – अपने गांव की ओर से आ कर नदी किनारे बैठते, पानी कम होता तो नदी पार कर साथ बैठते, ज्यादा होता तो अपने – अपने किनारे देर शाम तक खडे – खडे अथवा बैठ कर बातें करते ।

नौवीं क्लास से विज्ञान और कला संकाय अलग हो गए थे। मेधावी विद्यार्थी विज्ञान संकाय में और मेरे जैसे आम छात्र कला संकाय में गए थे । नौवीं से गणित जैसे उस नीरस विषय से मेरा पीछा छूट गया था, जिसमें मैं पूरी तरह फिसड्डी था। नौवीं की छमाही परीक्षा के बाद घरेलू काम भी मुझसे हटा लिए गए थे और मैं रिहाइशी घर से अलग एक कमरे में रह कर पढाई करने लगा था, सिर्फ भोजन करने के लिए ही घर आता था, ये सभी चरण मेरी पढाई में उत्तरोत्तर सुधार के कारक सिद्ध हुए थे। अब पढने के प्रति पूरी तरह समर्पित रहने का माहौल मुझे मिल गया था, मैं अपना होम वर्क पूरा करने लगा था और धीरे – धीरे अपनी कक्षा में शिक्षकों के सवालों के सही उत्तर देने लगा था । जब नौवीं की वार्षिक परीक्षा के परिणाम आए थे तो ऐसा पहली बार हुआ था कि मैं सभी विषयों में पास हुआ था।

नौवीं पास करने के बाद स्कूल में मेरी पहचान अच्छे छात्र के रूप में होने लगी थी। उसी के बाद मेरे सहपाठी राजेन्द्र कुमार मिश्र से दोस्ती होने लगी थी। उसके पहले हम कई वर्षों से हर कक्षा में साथ – साथ पढते रहे थे, परंतु एक – दूसरे का नाम जानने के अलावा मित्रता जैसी कोई बात हमारे बीच नहीं थी। नौवीं तक राजेन्द्र के घनिष्ठ मित्रों में नरकटिया गांव के बडे लोगों के बेटे और कक्षा में तेज समझे जाने वाले विद्यार्थी हुआ करते थे, परंतु नौवीं पास करते – करते वे सभी बैक बेंचर और अप्रासंगिक हो चुके थे,  मैं उन सब के आगे आ चुका था। दसवीं की वार्षिक परीक्षा हुई तो मैंने सेकण्ड किया और फर्स्ट आया राजेन्द्र कुमार मिश्र, ग्यारहवीं क्लास में मैं राजेन्द्र का घनिष्ठतम मित्र हो गया था।

मेरे परिवार की तरह राजेन्द्र का परिवार खेतीहर नहीं था। वह ब्रह्मण – पुत्र था, उसका व्यक्तित्व सुन्दर, सुकुमार और बात– व्यवहार सलीकेदार था, जबकि मैं व्यक्तित्व से थोडा रफटफ और व्यवहार से कुछ – कुछ बेलौस था, फिर भी हम दोनों सभ्य, सुसंस्कृत और अनुशासित थे। साथ ही, हम दोनों एक ही सामाजिक – आर्थिक हैसियत वाले परिवार से थे और हमारे परिवार में पढे–लिखे प्रगतिशील लोग भी थे, इसीलिए हम दोनों का एक – दूसरे के परिवार में आना – जाना होने लगा, हम एक – दूसरे के सुख – दुख में शामिल होने लगे, और, हर जगह हम दोनों को एक ही तरह का स्नेह व सम्मान मिलने लगा, यहां तक कि हम दोनों एक – दूसरे के घर – परिवार के सदस्यों को उन्हीं संबोधनों से संबोधित करने लगे, जैसे हम खुद अपने घर – परिवार के लोगों को संबोधित करते थे। हमारी मित्रता स्कूल से ले कर आस-पास के गांवों में भी एक आदर्श मित्रता की मिसाल मानी जाने लगी, हम चर्चा का विषय हो गए और हमारे सहपाठियों के गार्जियन अपने बच्चों को हमारी तरह बनने की सीख देने लगे ।

ऐमामुल हक साहब स्कूल के सबसे लोकप्रिय शिक्षक थे, बच्चों से ले कर गार्जियन तक उनका बहुत आदर करते थे, लेकिन वे किसी बात पर खुन्दक भी बहुत जल्दी खा जाते थे। हमारे स्कूल में और पूरे क्षेत्र के स्कूलों में दसवीं – ग्यारहवीं क्लास तक के विद्यार्थियों को भी बांस की करची यानी छडियों से खूब मार पडती थी , होमवर्क नहीं होने पर सभी टीचर मारते थे ।  ग्यारहवीं में आए कई महीने बीत गए थे, किंतु अभी तक हक साहब को मुझे और राजेन्द्र को छडी से मारने का कोई मौका नहीं मिल पाया था, वे वैसे मौके की ताक़ में रहने लगे। हक साहब समाज अध्ययन भी पढाते थे, जिसमें विधायिका, कार्यपालिका  और न्यायपालिका आदि से संबंधित हर तरह का चैप्टर था। शनिवार का दिन था, उन्होंने कहा कि सोमवार को पेज नम्बर एक से सौ तक जो भी मैटर है, उससे सवाल पूरी क्लास से पूछे जाएंगे। हम समझ गए कि बहाना पूरी क्लास का था, टार्गेट तो हम ही दोनों थे।

मैं और राजेन्द्र शनिवार की शाम और रविवार को पूरा दिन किताब ले कर नदी किनारे बैठ कर एक – दूसरे से सवाल – जवाब करते रहे , वैसा कर हम सौ प्रतिशत तैयार हो गए। साढे दस बजे से स्कूल होता था, क्लास शुरू होते ही हक साहब ने सीधे पहले मुझसे सवाल करना शुरू किया, जवाब सौ प्रतिशत सही मिले। फिर, राजेन्द्र से उन्होंने सवाल करना शुरू किया, उससे भी जवाब सौ प्रतिशत सही मिले। छडी कोने में रखी थी, रखी रह गई, हक साहब ऐंठ कर रह गए।

दो पहर में हम सभी रोज की भांति टिफिन करने गए, टिफिन के बाद वाली क्लास उमाशंकर बाबू की थी। थोडी देर के बाद स्कूल के चपरासी रामदेव भाई ने सूचना दी कि मुझे और राजेन्द्र को हेडमास्टर गुप्ता जी बुला रहे थे। हम लोग ऑफिस की ओर जा रहे थे तो हक साहब ऑफिस से निकल कर किसी क्लास में जा रहे थे। ऑफिस में हम पहुंचे तो गुप्ता जी नहीं थे, वे बगल वाली क्लास में थे। हम जब वापस अपनी क्लास में लौट रहे थे तो हक साहब हमारी क्लास से निकल रहे थे। क्लास में हमें बताया गया कि कल हक साहब कि जो क्लास शाम को अंत में थी, उसे वे सुबह साढे नौ बजे ही लेंगे , छुट्टी चार बजे के वजाय तीन बजे ही हो जाएगी। क्लास की रंगत कुछ रहस्यपूर्ण लगी, पर हमें कुछ और पता न चला। स्कूल का नियमित समय साढे दस बजे से शाम चार बजे तक का था ।

मैं और राजेन्द्र आधी दूरी तक साथ ही जाते – आते थे , भेलवा टोला के नहर – पुल से ह्म दोनों के रास्ते अलग होते थे, इस तरह हम स्कूल से साथ ही निकलते और स्कूल पहुंचते भी एक ही साथ। अगले दिन हम दोनों अपनी तरफ से एहतियात बरतते हुए निर्धारित समय से आधा घण्टा पहले नौ बजे ही स्कूल पहुंच गए । सब कुछ शांत व सुनसान जैसा लगा। गुप्ता जी बरामदे से नीचे फूलों की क्यारियों में खडे धूप सेंक रहे थे, हम भी वहीं चले गए, सदा की भांति उनके पांव छुए और उनकी बगल में खडे हो गए । हम हाई स्कूल तक भोजपुरी में ही बात करते थे। गुप्ता जी ने मुस्कुराते हुए कहा – “ इहां का खडा होतार लोगन, तोहनी के यमराजवा त क्लास ले रहल बा, क्लास में जा, आज दुनू आदमी के छुदरा छोडा दी ”। गुप्ता जी की बात सुन कर हम दंग रह गए, क्लास तो साढे नौ बजे से थी, नौ बजे कैसे लग गई? गुप्ता जी ने बताया कि साढे नौ से नहीं, साढे आठ से क्लास रखी गई थी , तुम दोनों को कल जानबूझ कर एक घंटा पीछे बताने के लिए छात्रों को हक साहब ने हिदायत दी थी। अब रहस्य समझ में आया कि कल हम दोनों को क्लास से ऑफिस में भिजवाने के बहाने हक साहब हमारी क्लास में क्यों आए थे !

हम दोनों अनुमति ले कर क्लास के अन्दर गए और अपनी सीट पर बैठ गए। हमेशा की तरह हमारी सीट पर कोई दूसरा नहीं बैठा था। कोने में देखा तो मोटी करची की नई छडी रखी हुई थी, मामला हम समझ गए। देर से आने के कारण गुस्साए हक साहब ने पहले मुझे मारना शुरू किया , जी भर मार लेने के बाद उन्होंने राजेन्द्र की तरफ रूख किया और अन्धाधुन मारने लगे, हाथ पर, बदन पर , चारों तरफ चकते निकल आए, कई जगह से खून उभर आया । वह मेरी तरह किसान का बेटा तो था नहीं कि मवेशियों को खिलाने या किसानी की रसद पहुंचाने में थोडा बहुत रफटफ हो गया हो, वह तो पंडिताई करने वाले परिवार का नाजुक और सुकुमार लडका था, चोट से रोने लगा ।

मुझे याद आया, जब मैं दूसरी क्लास में था तो चुर्की – चुर्की के खेल में दारोगा मुखिया और तिलकधारी मुखिया ने घपला कर मुझे हरा दिया था। उन दोनों ने मुझे जोर – जोर से मारा था , बाद में मेरे बदले ध्रुव भाई ने मार झेली थी। मैं भी अपने मित्र को मार खाते और रोते देख कर आगे बढा, हक सहब की छडी को अपने पर लेने लगा और मन ही मन कहने लगा – “ जितना चाहें, मार लें, मैं उफ तक नहीं करूंगा ”। मेरे बदन पर छडी पर छडी बरसती रही , मेरी आंखें लाल हो गईं , पर मैंने आंसू का एक कतरा भी नहीं निकलने दिया, मेरे बाजू फडकने लगे और मेरे मन में आया कि छडी को हाथ में थाम लूं और हक साहब को छडी बरसाने से रोक दूं, मगर अनुशासन-हीन नहीं कहलाना चाहता था , इसलिए जब तक हक साहब ने खुद ही छडी नहीं फेंक दी, तब तक मैं अपने मित्र के लिए चुपचाप मार खाता रहा। छडी टूट गई थी, हक साहब हांफ रहे थे, राजेन्द्र रो रहा था और मैं निर्विकार खडा था। आखिरकार, हक साहब ने छडी फेंक दी, वे क्लास से निकल चले गए , उस दिन उन्होंने अन्य किसी भी क्लास को नहीं पढाया। उसी के बाद मैं हक साहब का सर्वाधिक प्रिय छात्र हो गया, ग्यारहवीं में पढते रहने के दौरान हक साहब ने ही मुझे 9वीं और 10वीं क्लास तक को भी पढाने का अवसर दिया था और कॉलेज में जाने के बाद छुट्टियों में गांव आने पर स्कूल में पढाने के लिए वे ही मुझे बुला लिया करते थे। उनके द्वारा दिए गए उन्हीं अवसरों ने आगे चल कर एक्स्ट्रोवर्ट और एक अच्छा वक्ता बनने का मेरा मार्ग प्रशस्त किया।

तब तक स्कूल के मेरे साथी रोमानी उपन्यास पढ कर उसकी प्रेम कथाओं की चर्चा करने लगे थे और फिल्में देख कर नायक – नायिकाओं, राज कपूर – नर्गिस, दिलीप कुमार – मधुबाला, देवानन्द – सुरैया आदि के रोमांस की रोचक व मनमोहक कहानियां सुनाने लगे थे । उन्हीं दिनों राजेन्द्र और मैं घर से पराठे और आलू – परवल की भुजिया ले कर बेतिया गए, आना – जाना मिला कर लगभग 90 किलोमीटर की दूरी में से 30 किलोमीटर की दूरी पैदल और शेष दूरी ट्रेन से हमने तय की। बेतिया में एक दिन में हमने दो फिल्में, सुनील दत्त – नूतन की ‘मिलन’ एवं दिलीप कुमार – वहीदा रहमान व मुमताज की ‘राम और श्याम’ देखी , रात प्लेटफॉर्म पर गुजारी , दूसरे दिन घर आए।

जब मेरा मैट्रिक (बिहार सेकंडरी बोर्ड की ग्यारहवीं) का रिजल्ट आया तो मैं सेकण्ड डिविजन में बहुत अच्छे अंक ले कर पास हुआ था, और, राजेन्द्र फर्स्ट डिविजन में बहुत अच्छे अंकों के साथ, उसे कुल 900 अंकों में से लगभग 700 तो मुझे लगभग 500 अंक मिले थे। मोतीहारी एमएस कॉलेज में मैं प्री यूनिवर्सिटी कला संकाय में और राजेन्द्र विज्ञान संकाय में पढने लगा। एक वर्ष का प्री यूनिवर्सिटी कोर्स पूरा होने को आया, किंतु इतने दिनों में राजेन्द्र से दो – चार बार ही भेंट हो पाई। वह जब भी मिलता, फिल्म और उपन्यासों की बात करता, पढाई के बारे में न बात करता और न ही बात करने का कोई मौका देता। प्री की फाइनल परीक्षा हुई , मैं द्वितीय श्रेणी में उच्च अंक ले कर पास हुआ, मैट्रिक में अपने परफर्मेंस से बेहतर कर सका, परंतु मैट्रिक प्रथम श्रेणी में भी उच्च अंकों से पास होने वाले मेरे प्रिय मित्र राजेन्द्र का प्री यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन सम्मानजनक नहीं रहा और अगले साल बीएस-सी पार्ट वन में तो वह मुश्किल से पास हो सका, जबकि मेरे परफरमेंस में उत्तरोत्तर सुधार होता गया।

बीएस-सी पार्ट वन के बाद राजेन्द्र पढाई छोड कर कोई वोकेशनल कोर्स करने के लिए दिल्ली चला गया। वहां से लौट कर उसने टीचर्स ट्रेनिंग कर ली और मिड्ल स्कूल में टीचर हो गया। मैंने पढाई जारी रखी और बीए ऑनर्स कर उसी हाई स्कूल में शिक्षक हो गया, जिसमें हम पढे थे। मैं स्कूल छोड कर जेपी आन्दोलन में शामिल हुआ, इमर्जेंसी बीती तो बैंक में आ गया, एमए भी कर लिया, राजभाषा अधिकारी के रूप में मेरा चयन हो गया और पदोन्नत होता रहा , उस बीच देश में भारत सरकार और केन्द्रीय संस्थानों में कार्यरत हजारों राजभाषा अधिकारियों में मैं नम्बर एक माना जाने लगा , मेरे परफर्मेंस के लिए मुझे विभिन्न राज्यों के राज्यपालों, रिज़र्व बैंक के गवर्नरों, केन्द्रीय मंत्रियों और भारत के राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत भी किया गया, कुछ साल पहले मैं चीफ मैनेजर पद से रिटायर हो गया, राजेन्द्र भी मिड्ल स्कूल के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुआ।

राजेन्द्र मेरा घनिष्ठतम मित्र रहा है, मैं आज भी उसे उसी रूप में देखता हूं, क्योंकि मेरे अब तक के जीवन में अंतरंग मित्रों की संख्या दो अंकों में भी नहीं पहुंची है, मित्रों की गिनती राजेन्द्र से ही शुरू होती है। कुछ साल पहले वह मिला था तो उसके हर शब्द में व्यंग्य था, मुझे लगा था कि वह शायद अवसाद या हीनताबोध के घेरे में रहा हो, वरना उसके बोल दोस्ती के मक़तब में पढाए जाने वाले हर सिलेबस से बाहर के नहीं होते ।

जीवन की आपाधापी में दूरियां बढती चली गईं थीं। वह खुद में खोया वहीं खडा रहा, आगे देखने की जहमत भी नहीं उठाई उसने; मैं आगे बढता रहा, फिर भी मुड – मुड कर पीछे देखता रहा, वह गांव में रह कर भी शहरीपन में घिरा रहा और मैं नगरों – महानगरों में रह कर भी अपने गंवारपन का दामन नहीं छोड सका। इस लम्बे अन्तराल में उसकी कोई सदा न आई और न पहुंची मेरी आवाज़ उस तक। कुछ महीने पहले मैं अपनी आत्मकथा की पुस्तक उसे खुद दे आया था, शायद….. ?

अब जा कर फेसबुक ने हम दोनों को एक – दूसरे के सामने ला खडा कर दिया है, दूरियां कम होते हुई लग रही हैं, शुक्रिया फेसबुक !

गणतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं !

यह आलेख मेरे ब्लॉग   shreelal.in   पर भी पढा जा सकता है ।

वह अक्खड लडका जो आज एक नामी फिल्मकार है

वह अक्खड लडका जो आज एक नामी फिल्मकार है

(मेरी आत्मकथा ‘आवाज़ बन आवाज़ दो’ से)

                                                                    

     अनायास एक महत्त्वपूर्ण, किंतु खतरनाक किस्म की सुखद साहित्यिक दुर्घटना हो गई !

दरभंगा में मैं नया – नया था। न्यू बैंक ऑफ इंडिया का 04 सितम्बर 1993 को पंजाब नैशनल बैंक में विलय हो जाने के बाद नवम्बर 1993 में मेरा स्थानांतरण पटना से दरभंगा हो गया ।  दरभंगा साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र था। वहां बिहार का सबसे पुराना रेडियो स्टेशन था , वहां से मेरे प्रोग्राम प्रसारित होने लगे। दरभंगा में दो सरकारी और एक गैर- सरकारी, तीन विश्वविद्यालय थे। सरकारी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनारों के संचालन के लिए तो कभी अन्य प्रतिष्ठानों द्वारा आयोजित सेमिनारों में अतिथि वक्ता के रूप में और कभी साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आयोजित कविसम्मेलनों के संयोजन व संचालन के लिए मुझे आमंत्रित किया जाने लगा, परंतु उन सबके पहले एक महत्त्वपूर्ण, किंतु खतरनाक किस्म की सुखद साहित्यिक दुर्घटना हो गई ।

समस्तीपुर रेलवे मंडल की ओर से हिंदी दिवस के अवसर पर दरभंगा रेलवे क्लब हाउस में विराट कविसम्मेलन का आयोजन था। एक हिंदी अधिकारी होने के नाते मैं भी श्रोता के रूप में आमंत्रित था । उस कविसम्मेलन का संचालन कर रहे थे अविनाश दास, जो उस वक्त मिथिला विश्वविद्यालय (सीएम कॉलेज) में हिन्दी के छात्र थे, अच्छी कविताएं लिखते थे और अच्छा मंच संचालन करते थे ।  कुछ कवियों द्वारा काव्यपाठ के बाद अविनाश जी ने स्वयं काव्यपाठ किया और अचानक घोषणा कर दी कि आवश्यक कार्यवश उन्हें जाना होगा,  इसीलिए मंच संचालन किसी और से करा लिया जाए।

मौजूद कवियों में कवि तो अच्छे थे, किंतु उनमें से किसी की भी संचालन – क्षमता पर आयोजक रेलवे के वरिष्ठ हिंदी अधिकारी रामविलास महतो को भरोसा नहीं था और कविसम्मेलन फ्लॉप होने पर रेलवे के उच्चाधिकारियों की नजरों में महतो जी की भद्द पिटती, इसीलिए वे बार-बार अविनाश जी से रूकने का आग्रह कर रहे थे। अविनाश जी में ओवर कंफिडेंस था और शायद वह कहीं न कहीं अहंकार की सीमा तक पहुंच गया था, उन्होंने महतो जी का आग्रह ठुकरा दिया और अनायास, बिना किसी अनुमान या सूचना के,  संचालन के लिए मेरे नाम का ऐलान कर दिया, शायद उन्हें लगा होगा कि यह हिंदी अधिकारी भी कविता और कविसम्मेलन के मामले में फिसड्डी साबित होगा तथा ना – नुकुर करेगा, तब उन्हें यह कहने का मौका मिल जाएगा कि सभी हिंदी अधिकारी ऐसे ही बकलोल होते हैं और उन्हें एकछत्र संचालक होने का तमगा मिल जाएगा, किंतु उनकी सोच के विपरीत श्रोता – दर्शक दीर्घा से मंच पर आ कर  मैंने माइक सम्भाल लिया, हकबकाए-से अविनाश कवियों के बीच बैठ गए।

कविसम्मेलन तीन घंटों तक चला, अविनाश जी कहीं नहीं गए , पूरे तीन घंटे बैठे रहे और कविसम्मेलन का आनन्द लेते रहे । दीपक कुमार गुप्ता , जो उन दिनों मिथिला विश्वविद्यालय में एमए (हिंदी) अंतिम वर्ष के छात्र थे और आजकल नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली में सम्पादक हैं, सहित अनेक श्रोता-दर्शक, कविगण, रेलवे के उच्चाधिकारी आदि मुझे घेर कर मेरी प्रशंसा करने लगे। अविनाश जी भी सकुचाए हुए आए और सॉरी बोलते हुए बडी ईमानदारी से उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें लगा था कि दूसरा कोई भी संचालन के लिए होगा ही नहीं। उसके बाद अविनाश मेरे प्रशंसक हो गए और कभी – कभी अपनी कविताएं सुनाने मेरे पास आने लगे। उस कविसम्मेलन के बाद क्षेत्र के साहित्य – जगत में मेरी लोकप्रियता ऐसी हो गई कि दरभंगा एवं आसपास के शहरों में कविसम्मेलनों और मुशायरों आदि की तिथियां मेरी डेट्स लेने के बाद ही निर्धारित की जाने लगीं । अविनाश जी के विरोधाभासी व्यक्तित्व ने मेरे मन में उनके प्रति उत्सुकता जगा दी । मैंने महसूस किया कि वह लडका अक्खड तो था, किंतु अपनी कमी स्वीकारने का साहस भी था उसमें और साथ ही, गुणग्राहकता व कुछ कर गुजरने की उद्याम लालसा भी भरपूर थी, परंतु “नाम बडे और दर्शन छोटे” वाले लोगों को बर्दास्त करने का संयम नहीं था। उस तरह का एक और उदाहरण उस घटना के दो – तीन साल बाद फिर से देखने – समझने  को मिला।

बिहार सरकार की राष्ट्रभाषा परिषद ने पटना के गांधी मैदान में विराट कविसम्मेलन का आयोजन कराया। उसके निदेशक थे प्रसिद्ध कथाकार और सीएम कॉलेज दरभंगा के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. रामधारी सिंह ‘दिवाकर’। उस कविसम्मेलन में काव्यपाठ के लिए दरभंगा से भी कुछ कवि आमंत्रित थे, जिनमें अविनाश दास और मैं भी था। कविसम्मेलन का संचालन मुझे दिया गया। कवियों की संख्या दो दर्जन से भी अधिक थी,  श्रोताओं का विशाल समूह था । सभी कवियों को विशिष्ट दर्शक दीर्घा में सामने पहली पंक्ति में लगीं विशेष कुर्सियों पर बैठाया गया था ।  मंच पर मंत्री, निदेशक के अलावा मुझे और सरकार के विभागीय सचिव आदि आईएएस अफसरों को बैठाया गया था।

कवि सम्मेलन शानदार तरीके से चल रहा था, कवि मंच पर आते, काव्यपाठ करते और फिर अपनी जगह पर जा कर बैठ जाते। जब मैंने अविनाश जी को अवाज़ दी तो वे मंच पर आए और  माइक थामते ही तैश में आ गए – “ राजनेता और नौकरशाह मंच पर बैठें,  कवि जमीन पर ! यह तो कवियों का अपमान है !! मैं इस व्यवस्था के विरोध में  कविसम्मेलन का बहिष्कार करता हूं उतना कह कर बिना काव्यपाठ किए ही वे मंच से उतर गए और पंडाल से बाहर जाने लगे। सभी हक्के – बक्के रह गए, कविसम्मेलन के आयोजक राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक और अविनाश जी के गुरू डॉ. रामधारी सिंह ‘दिवाकर’ बहुत दुखी हो गए।

चूंकि मैं संचालक था, इसलिए मंच को सम्भालना मेरी ही जिम्मेदारी बनती थी । अविनाश जी का विरोध जितना स्वीकार्य था, उनका तरीका उतना ही अस्वीकार्य था। अब उपलब्ध व्यवस्था में ही राष्ट्रभाषा परिषद और अविनाश जी सहित अन्य सभी कवियों का मान–सम्मान बढाने व विशाल श्रोता – समूह में शांति बनाये रखने का दायित्व स्वाभाविक रूप से मेरे ही कंधों पर था। मैंने कहा – “ सामने जमीन से जुडे कविगण हैं, इधर चौकी (काठ की चारपाई) रख कर बना मंच है। जिनके पास जमीन होती है , उन्हें जमीन्दार कहते हैं तो जिनके पास चौकी है, उन्हें क्या कहेंगे ”? श्रोताओं ने जोरदार तरीके से प्रतिक्रिया दी – “चौकीदार। मैं ने कहना जारी रखा–“ तो, राष्ट्रभाषा परिषद ने कवियों को जमीन्दार बनाया, परंतु मेरे भाई अविनाश जी, पता नहीं क्यों , जमीन्दार से चौकीदार बनना चाहते हैं”? जमीन्दर और चौकीदार की जुगलबन्दी पर बहुत देर तक तालियां बजतीं रहीं,  ‘दिवाकर’ जी खुशी से उछल पडे, अविनाश जी सभागार के मुहाने तक पहुंच गए थे, वे लौट पडे और अपनी जगह पर बैठ गए।

कुछ दिनों बाद एक बडे कार्यक्रम का संचालन करते हुए मैंने कहा कि अविनाश का स्वाभिमान और आत्मसम्मान का भाव सराहनीय है, परंतु यदि वे उसे अहंकार बनने से बचा सकें और अपनी क्षमता, रचनात्मकता, निर्भीकता व ऐंग्री यंग मैन की छवि को चैनलाइज कर सकें तो वे एक दिन हिंदी पत्रकारिता के राजकिशोर बनेंगे (राजकिशोर जी 80 के दशक में कोलकाता से प्रकाशित लोकप्रिय हिन्दी साप्ताहिक “रविवार” से जुडे एक ईमानदार व स्वाभिमानी पत्रकार थे , जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर निर्भीक पत्रकार होने की प्रतिष्ठा व प्रसिद्धि प्राप्त हुई )।

उस घटना के कई साल बाद मैं पीएनबी के अंचल कार्यालय पटना में पदस्थापित था, अविनाश जी एक युवती के साथ आए, बोले – “ सर, ये आपकी भावे (बडे भाई की पत्नी को हमारे यहां भाभी या भौजी कहा जाता है तो छोटे भाई की पत्नी को भावे कहा जाता) हैं, छपरा की क्षत्राणी हैं” अर्थात अविनाश जी ने अंतरजातीय विवाह कर लिया था। मैंने दोनों को बधाइयां व शुभकामनाएं दीं और स्वस्थ – प्रसन्न  सुखी एवं दीर्घ दाम्पत्य जीवन के लिए आशीर्वाद दिए, साथ ही, उपहार-स्वरूप उच्च क्वालिटी की कलम भी दी।

वर्षों बाद मेरा कहा बिल्कुल सही साबित हुआ, अविनाश जी एक प्रसिद्ध पत्रकार हुए और पटना में हिंदी दैनिक ‘प्रभात खबर’ के स्थानीय संपादक हो गए। उन दिनों मैं बैंक का पीआरओ भी था, सो उनसे हमेशा मिलना – जुलना होता रहा।  ‘प्रभात खबर’ में उनकी नहीं बनी, फिर वे घूमते – घामते एनडीटीवी में आउटपुटएडिटर के महत्त्वपूर्ण पद तक पहुंचे, किंतु वहां भी फिर उनका अहम – पगा आत्मसम्मान आडे आ गया, सब कुछ छोड – छाड कर “मोहल्ला डॉट कॉम” नाम से ब्लॉगर बन गए।

 अविनाश जी की सोच में नवोन्मेष चिंतन था, कुछ नया करने की अकुलाहट थी, वे बहुत कुछ करना चाहते, लेकिन जी हुजूरीसंस्कृति में खप नहीं पाते थे, इसीलिए उनकी क्षमता व गुणवत्ता से प्रभावित हो कर बडी बडी जगह बडे बडे लोग बडा – बडा काम उन्हें दे तो देते थे, परंतु उनके अक्खडपन से तुरंत ही अप्रसन्न हो जाते थे, फलस्वरूप अविनाश अपना दूसरा रास्ता नाप लेते थे। जब मैं पीएनबी हेड ऑफिस नई दिल्ली में राजभाषा विभाग का प्रभारी मुख्य प्रबंधक बना तो अविनाश जी से फोन पर बातें होती थीं, तब वे एनडीटीवी में आउटपुट एडिटर थे । उसके बाद वे ब्लॉगर बने , तब भी बातें होती रहतीं थी, लेकिन अचानक वे दिल्ली से गायब हो गए, उनका फोन नम्बर भी बदल गया, उनकी कोई खोज-खबर नहीं लगी, उन्होंने भी मेरी कोई खोज-खबर नहीं ली, वे गुमनामी में खो गए , मगर इस बार वे शायद किसी अन्य महत्ती उद्देश्य के लिए गुमनाम हुए थे।

वर्षों बाद पता चला कि अविनाश मुम्बई में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में हैं, उनकी कहानी पर उन्हीं के निर्देशन में बनी हिन्दी फिचर फिल्म अनारकली ऑफ आरा रिलीज हो चुकी है। मैंने उनकी फिल्म देखी है । किसी अनाम किंतु मशहूर लोकनर्त्तकी की बायोपिक-सी लगती है वह फिल्म, जो दर्शकों को हर एक पल से बांध कर रखती है। फिल्म देखते हुए क्षण-भंग का एहसास इंटर्वल और दि एंड के अलावा कभी भी नहीं होता । फिल्म अपने दर्शकों के एक –एक पल और टिकट के एक – एक पैसे का हिसाब चुकता कर देती है। बहुत ही उम्दा फिल्म है वह, जो कला और कॉमर्शियल सिनेमा की खूबियों को समेटे बायोपिक और लोकप्रिय कथा-फिल्म होने की भी अनुभूति कराती है तथा दर्शकों के मानस को मनोरंजन व सामाजिक सरोकार के बीच मरोड कर रख देती है।

उस फिल्म के कथानक और छायांकन में नौटंकी और विदेसिया शैली की लचक, कसक व ठसक महसूस की जा सकती है । हालांकि फिल्म में द्विअर्थी लगने वाले दो – तीन छोटे – छोटे संवाद हैं, जिन्हें सुन कर खुद को संभ्रांत और प्रबुद्ध कहने वाले लोग ओठ बिचका सकते हैं, परंतु मेरा मानना है कि वे संवाद ही फिल्म के असल कथ्य हैं। अविनाश ने इस फिल्म के माध्यम से गोबरपट्टी में जीवंत मनोरंजन का पर्याय माने जाने वाले स्थानीय कलाकारों के संघर्ष को स्वर दे कर लेखन व निर्देशन, दोनों ही क्षेत्रों में, अपनी दमदार धमक दर्ज कराई है।

मैं ने दो दशक पहले अविनाश जी के बारे में जैसी आश्वस्ति अभिव्यक्त की थी, वैसी आश्वस्ति आज एक बार फिर व्यक्त करना चाहता हूं – “अविनाश दास में महेश भट्ट, मृणाल सेन और प्रकाश झा की तरह जहीन व बेहतरीन फिल्म लेखक – निर्देशक होने की समझ व संभावनाएं हैं, शर्त्त बस, वही पुरानी, कि….” !

अपनी तो औक़ात ही नहीं जी !

अपनी तो औक़ात ही नहीं जी !

  1. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मरहूम जस्टिस लोया के सुपुत्र ने अपने वकील के माध्यम से कहा है कि उनके पिता की मृत्यु संदिग्ध नहीं थी, इसलिए बेकार में उस मामले को तूल न दिया जाए यानी कि उनकी मौत स्वाभाविक थी। गोया इस देश में कानून की कोई किताब नहीं, जिसमें साक्ष्य या संकेत अथवा संदेह के आधार पर कोई जांच शुरू किए जाने की बात लिखी हो , केवल मृतक के परिजनों का बयान ही निर्णायक हो ! उनका यह भी कहना है कि जब उनके पिता की मौत हुई थी , तब वे 17 साल के नाबालिग थे, बहुत कुछ जान-समझ नहीं सके थे । शायद अब वे समझदार हो गए हैं और दुनियाबी बातों को समझने लगे हैं ! शंकालू लोग जस्टिस लोया की मौत के पीछे देश के किसी खासमखास ताकतवर व्यक्ति की ओर कुछ संकेत कर रहे हैं। फिटे मुंह लोग कुछ भी सोच लेते हैं।

कमाल की बात है कि यह पता नहीं चल पा रहा है कि वैसी समझदारी के पीछे क्या है ? मगर अपनी तो औकात ही नहीं है ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !

  1. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को खत लिखते हुए उन्हीं के चार सहकर्मियों द्वारा प्रेस कॉंफ्रेंस किए जाने को लोग न्यायापालिका के अन्दर की बात बाहर लाने का दोष मढते हुए बहुत कुछ सुना रहे हैं।

कमाल की बात है कि यह समझ में नहीं आ रहा कि न्यायालय की पवित्रता चुप रहने में है या सच्चाई की खोज खबर लेने में? मगर अपनी तो औकात ही नहीं है ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !

  1. सेना के एक जवान ने भी पिछले साल मेस में भोजन की गुणवत्ता को ले कर कुछ वैसा ही किया था , बीएसएफ के जवान ने भी वैसा ही किया था, अनुशासन तोडने के नाम पर शायद उनकी नौकरी चली गई थी। अन्य नौकरियों में भी कुछ सिरफिरे ईमानदारी के भूत को सिर पर चढाए घूमते हुए पाये जाते हैं, उन्हें भी किसी न किसी तरह वैसा ही कुछ झेलना पडता है।  

कमाल की बात है कि वैसे मामलों की जांच क्यों नहीं कराई जाती और कराई भी जाती है तो नतीजे हमेशा एक जैसे ही क्यों आते हैं? मगर अपनी तो औकात ही नहीं ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !

  1. चापलुसी और चमचागीरी एक संस्कृति है । वैसे लोगों की चांदी तो

        अंग्रेजों के जमाने में भी थी और आज भी है, आगे भी रहेगी। वे भूल जाते

        हैं कि आदमी के शब्द उसके संस्कार के संवाहक होते हैं और आचरण उसके  

        पूर्वजों के साथ – साथ वंशजों के चरित्र की ओर भी साफ – साफ संकेत कर

        देता है। कल फेसबुक पर ही वैसा ही एक आदमी किसी के इस जन्म की

        जाति के आधार पर उसके अगले कई जन्मों की जाति की चर्चा भी कर

        गया ।

        कमाल की बात है कि वैसा आदमी भी खुद को समझदार और ईज्जतदार

        लोगों में गिने जाने की जिद्द करता है। मगर अपनी तो औकात ही नहीं है

        ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !

  1. फिल्म लाइन में कास्टिंग काउच तथा समाज में मासूम बच्चे – बच्चियों और औरतों के साथ यौन हरक़त करने वालों के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों को भी कुछ ज्यादा समझदार लोग नासमझ, घर की ईज्जत को सरेआम बाजार में उछालने का दोषी करार दे कर लताडते रहते हैं तथा उन्हें चुप रहने की नसीहत भी देते हैं ।

कमाल की बात है कि वैसे चुप कराने वाले लोग भी खुद को ईज्जतदार और समझदार लोगों में गिने जाने की जिद्द करते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि उनका वह आचरण खुद उनके बारे में ही यह आम धारणा बना सकता है कि उन्होंने भी खुद और उनके घर के बच्चे-बच्चियों के साथ हुए वैसे कृत्यों को चुपचाप सह लिया होगा और आज भी सह रहे होंगे, चाहे घर – परिवार में हो या दफ्त्यर में ! मगर अपनी तो औकात ही नहीं है ऐसे विषयों में कोई टिप्पणी करने की !

  1. केन्द्र सरकार ने राजनीतिक चन्दों को पारदर्शी बनाने के नाम पर चुनावी बॉंड जारी कराने की बात कही है, हालांकि उस बॉंड पर न खरीदने वाले का नाम होगा, न देने वाले का और न ही लेने वाले का ; वह बॉंड भी एक विशेष बैंक ही द्वारा जारी किया जाएगा, जिसके पास बॉंड खरीदने वाले के बारे में ज्ञान होगा। सांविधिक दायित्वों के तहत वह बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ तो उस ज्ञान को शेयर करेगा ही जो ज्ञान वित्त मंत्रालय यानी केन्द्र सरकार के पास पहुंच जाएगा जबकि बाकी लोग ज्ञान-पिपासु बने रहेंगे।  

कमाल की बात है कि बॉंड जारी कराने वाले यह समझ नहीं रहे हैं कि नोटबंदी का गुपचुप फायदा कुछ खास लोगों को दिला देने का आरोप लगाने वाले यहां भी यह आरोप लगा सकते हैं कि प्राप्त ज्ञान का वैसा ही कुछ उपयोग हो सकता है। पहले राजनीतिक चन्दा देने – लेने के पीछे कई तरह की सांविधिक पाबंदियां थीं, जिन्हें ठीक से लागू करा कर और कुछ प्रावधानों को ही ज्यादा पारदर्शी बना कर पूरी पारदर्शिता लाई जा सकती थी, परंतु उन्हें ठीक से लागू कराते तो बना नहीं, ऊपर से 2000 रूपयों तक के चन्दे नकद लेते – देते रहने की नीति जारी रखते हुए नये बेनामी बॉंड जारी होंगे । अब पता नहीं, ऐसे बॉंड से से कौन-सी और कैसी पारदर्शिता लाई जाई जा सकेगी ? मगर अपनी तो औकात ही नहीं ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !      

कौन ग़लत, कौन सही

कौन ग़लत, कौन सही

लोहिया जी ने कहा था – “ जिन्दा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं”,

परंतु उन्होंने यह नहीं बताया कि जब लोग भक्तिभाव में डूब कर आंखें मूंद कर  झाल – करताल ले कर शमशान से ले कर कब्रिस्तान तक और मंदिर से ले कर मस्जिद तक अहर्निश भजन – कीर्तन करने लगें तो नाज़ी के सामने क़ाज़ी को  आना चाहिए या नहीं ?

चूडा का गवाह दही , रही – सही बात चीनी ने कही

तिलकूट तिल-तिल जल पूछ रहा, कौन ग़लत है,कौन सही

 

पोंगल, बिहू, लोहडी और मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!

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