खबरों की खबर पर एक खबर

खबरों की खबर पर एक खबर
 
‘बेल्लजत गुनाह’, ‘मुफ्त हुए बदनाम’ ‘न घर के न घाट के’, ‘खाए न पीए प्लेट फोडे बारह आना’ , ‘जातो गंवाए भातो न खाए’ और ‘प्याजो खाए – दण्डो भुगते – मारो खाए’ आदि जैसे मुहावरे व लोकोक्तियां आजकल राजस्थान और दिल्ली के सत्ता – गलियारे में वायब्रेशन मोड में हैं।
 
खबर है कि एक स्वयंभू सेना के एक शीर्ष नेता ने उस खबर का खण्डन किया है जिसके अनुसार यह खबर फैली थी कि उसी सेना के एक अन्य शीर्ष नेता ने एक पत्र जारी करते हुए यह खबर फैलाई थी कि संजय लीला भंसाली ने ‘पद्मावत’ फिल्म के माध्यम से उनकी आन – बान – शान को कोई आंच नहीं पहुंचाई है, बल्कि उसमें चार चांद ही लगाया है, इसीलिए उस फिल्म का विरोध करने का फैसला वापस ले लिया गया है।
 
बचपन में बडे बुजूर्ग सिखाते थे कि यदि कोई कहे कि कौवा तुम्हारा कान काट कर ले जा रहा है, तो लट्ठ ले कर कौवे के पीछे मत भागो, अपने कान टटोल कर देख लो। अब कौन किसको सिखाए ?
 
‘पद्मावत’ फिल्म और उसका विरोध करने वालों के बारे में मुझे अब कुछ नहीं कहना है, क्योंकि 01 दिसम्बर 2017 के अपने फेसबुक और ब्लॉग shreelal.in पोस्ट में ऐतिहासिक तथ्यों के साथ मैं बहुत कुछ कह चुका हूं । हां, तरस आता है उन भक्तजनों की अंधभक्ति पर, जो छद्म धर्मवाद  का सहारा ले कर फिल्म का विरोध करने वालों का समर्थन करने के नाम पर भक्ति – भाव में सराबोर हो कर नग्न नर्तन गायन कर रहे थे। कमाल है जी, मुद्दई सुस्त , गवाह चुस्त ! हर जगह बीच – बीचवों की हालत ऐसी होती है। सवाल है कि वो बीचबीचवा कौन हैं ? यह भी कोई पूछने वाला सवाल है ?
चुनावी हार – जीत तो लगी रहती है और लगी रहेगी, परंतु नीति एवं नीयत का इस तरह बेपर्द होना, ग़जब का तमाशा है !
 
दरअसल, उस तमाशे में महज दो लोकसभा और एक विधान सभा सीट का ही सवाल नहीं था, किसी की लम्बी नाक का भी सवाल था। सच, यह भी उत्तर प्रदेश की तरह श्मशान बनाम कब्रिस्तान और गुजरात की तरह सोमनाथ बनाम ‘आंखों में आंसू लिए चाय वाला अपना लडका ‘ , जैसा ही इतिहास और समाज के नाम पर जातिवाद, क्षेत्रवाद और छद्म धर्मवाद का एक राजनीतिक कार्ड था।
 
अनगिनत बेगुनाहों की गर्दनें कट गईं उस लम्बी नाक न कटने देने के फेर में, मगर हाय री किस्मत ! नाक भी कटी और बेगुनाहों की गर्दनें भी , हालांकि कई राज्य सरकारों की गर्दनें कटते – कटते बच गईं , परंतु नाक नहीं बची किसी की भी । फिर भी नाक कटाने वालों के सिर नहीं झुके, क्योंकि सिर झुकने के लिए आंखों में पानी का होना जरूरी है, परंतु सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना और संविधान की सत्ता को धत्ता बताना शासन- प्रशासन की शर्म वो हया का मर जाना तो साबित कर ही गया, क्योंकि तीनों सीटें भी गौरैया की भांति झोली से फुदक कर भाग गईं और शासन सत्ता के निकम्मेपन तथा उसके पीछे की नीति व नीयत की बदनामी भी देश – दुनिया में फैल गईं । फजीहतों का ऐसा गुब्बार तो गुजरात में हारते – हारते जीत जाने अथवा उत्तराखण्ड में राज्य सरकार की बर्खास्तगी के खिलाफ कोर्ट के आदेश हो जाने पर भी नहीं उठा था।
 
आखिर स्कूली मासूमों के दिलों में दहशत का दरिया बहाने का खेल हाथ पर हाथ धरे चुपचाप देखते रहने वाले खुद ही इतनी दहशत में क्यूं आ गए कि बदनामी के वो सारे साजोसामान हादसों के अंदेशे मात्र से खरीदने लगे ? शायद इसलिए कि अभी 2019 भले ही कुछ दूर हो , परंतु 2018 में भी तो कुछ खेल – तमाशे होने हैं। सचमुच, तमाशबीनों को बहुत कुछ देखने – सुनने को जल्दी ही मिलने वाले हैं। राजनीति का खेल देखने का शौक फरमाने वाले बच्चे अभी से ही ऊंचे कंधों के जुगाड में रहने लगे हैं ताकि उन पर सवार हो कर वे तमाशे देख सकें , अपुन तो ‘राम झरोखा बैठ के सबकी खबर’ लेते ही रहेंगे।

धुएं की लकीरें नहीं हैं वे यादें

धुएं की लकीरें नहीं हैं वे यादें

(मेरी आत्मकथा “आवाज़ बन आवाज़  दो” से)

              सूरज जब बांस की झुर्मुट के पीछे सोने चला जाता, सांझ अपनी चादर में सितारे टांकने लग जाती और पंछी अपने घोसलों की ओर लौटने लग जाते, तब हम भी अपने आशियाने की ओर लौट चलते | उस बीच पशाह नदी गाती गुनगुनाती मचलती चली जा रही होती, उसकी कल – कल – ध्वनि कुछ ज्यादा ही साफ सुनाई पडने लग जाती,  चिडियों की चह – चह मन्द पडने लग जाती  और शाम के शामियाने में तारों की महफिल सजने के पहले रोशनी का जुगाड लिए जुगनुओं की टोली निकल रही होती ,  तब हम अपने – अपने गांव की ओर लौटते हुए बडी शिद्दत से महसूस करने लग जाते कि नदी जितनी तेज गति से नाचती – गाती – भागती दूर चली जा रही होती है, उतनी ही करीब आती हुई महसूस होती है।

मैं और राजेन्द्र हर शनिवार – रविवार की शाम पशाह नदी किनारे डूबते हुए सूरज को नीहारते, पक्षियों का कलरव गान सुनते और साहित्य, कला व स्कूली होम वर्क की चर्चा करते हुए बिताते । न गांव – गंवई की राजनीति, न सामाजिक – आर्थिक मसलों की चिंता, न इधर – उधर की बातें , न शिकवा न शिकायत, हर मुश्किल से बेखबर हम अपनी ही दुनिया में रमे अपना ज्यादातर खाली समय पढाई की चर्चा करते हुए खुशनुमा अंदाज़ में गुजारते।

हम दोनों का गांव आमने – सामने था, केवल एक छोटी – सी नदी ‘पशाह’ दोनों गांवों के बीच नई नवेली दुल्हन की छनछनाती पाजेब की तरह अपनी पतली-सी धार को झमकाती हुई उछलती – कूदती भागती रहती । राजेन्द्र का घर भतनहिया गांव के पश्चिमी छोर पर और मेरा घर सिसवनिया गांव के पूर्वी छोर पर था।  भतनहिया गांव सिसवनिया गांव के पूरब में था, इस प्रकार हम दोनों के घर, दो – चार अन्य घरों की ओट के बाद, लगभग आमने – सामने थे । हमलोग शनिवार एवं रविवार की शाम को अपने – अपने गांव की ओर से आ कर नदी किनारे बैठते, पानी कम होता तो नदी पार कर साथ बैठते, ज्यादा होता तो अपने – अपने किनारे देर शाम तक खडे – खडे अथवा बैठ कर बातें करते ।

नौवीं क्लास से विज्ञान और कला संकाय अलग हो गए थे। मेधावी विद्यार्थी विज्ञान संकाय में और मेरे जैसे आम छात्र कला संकाय में गए थे । नौवीं से गणित जैसे उस नीरस विषय से मेरा पीछा छूट गया था, जिसमें मैं पूरी तरह फिसड्डी था। नौवीं की छमाही परीक्षा के बाद घरेलू काम भी मुझसे हटा लिए गए थे और मैं रिहाइशी घर से अलग एक कमरे में रह कर पढाई करने लगा था, सिर्फ भोजन करने के लिए ही घर आता था, ये सभी चरण मेरी पढाई में उत्तरोत्तर सुधार के कारक सिद्ध हुए थे। अब पढने के प्रति पूरी तरह समर्पित रहने का माहौल मुझे मिल गया था, मैं अपना होम वर्क पूरा करने लगा था और धीरे – धीरे अपनी कक्षा में शिक्षकों के सवालों के सही उत्तर देने लगा था । जब नौवीं की वार्षिक परीक्षा के परिणाम आए थे तो ऐसा पहली बार हुआ था कि मैं सभी विषयों में पास हुआ था।

नौवीं पास करने के बाद स्कूल में मेरी पहचान अच्छे छात्र के रूप में होने लगी थी। उसी के बाद मेरे सहपाठी राजेन्द्र कुमार मिश्र से दोस्ती होने लगी थी। उसके पहले हम कई वर्षों से हर कक्षा में साथ – साथ पढते रहे थे, परंतु एक – दूसरे का नाम जानने के अलावा मित्रता जैसी कोई बात हमारे बीच नहीं थी। नौवीं तक राजेन्द्र के घनिष्ठ मित्रों में नरकटिया गांव के बडे लोगों के बेटे और कक्षा में तेज समझे जाने वाले विद्यार्थी हुआ करते थे, परंतु नौवीं पास करते – करते वे सभी बैक बेंचर और अप्रासंगिक हो चुके थे,  मैं उन सब के आगे आ चुका था। दसवीं की वार्षिक परीक्षा हुई तो मैंने सेकण्ड किया और फर्स्ट आया राजेन्द्र कुमार मिश्र, ग्यारहवीं क्लास में मैं राजेन्द्र का घनिष्ठतम मित्र हो गया था।

मेरे परिवार की तरह राजेन्द्र का परिवार खेतीहर नहीं था। वह ब्रह्मण – पुत्र था, उसका व्यक्तित्व सुन्दर, सुकुमार और बात– व्यवहार सलीकेदार था, जबकि मैं व्यक्तित्व से थोडा रफटफ और व्यवहार से कुछ – कुछ बेलौस था, फिर भी हम दोनों सभ्य, सुसंस्कृत और अनुशासित थे। साथ ही, हम दोनों एक ही सामाजिक – आर्थिक हैसियत वाले परिवार से थे और हमारे परिवार में पढे–लिखे प्रगतिशील लोग भी थे, इसीलिए हम दोनों का एक – दूसरे के परिवार में आना – जाना होने लगा, हम एक – दूसरे के सुख – दुख में शामिल होने लगे, और, हर जगह हम दोनों को एक ही तरह का स्नेह व सम्मान मिलने लगा, यहां तक कि हम दोनों एक – दूसरे के घर – परिवार के सदस्यों को उन्हीं संबोधनों से संबोधित करने लगे, जैसे हम खुद अपने घर – परिवार के लोगों को संबोधित करते थे। हमारी मित्रता स्कूल से ले कर आस-पास के गांवों में भी एक आदर्श मित्रता की मिसाल मानी जाने लगी, हम चर्चा का विषय हो गए और हमारे सहपाठियों के गार्जियन अपने बच्चों को हमारी तरह बनने की सीख देने लगे ।

ऐमामुल हक साहब स्कूल के सबसे लोकप्रिय शिक्षक थे, बच्चों से ले कर गार्जियन तक उनका बहुत आदर करते थे, लेकिन वे किसी बात पर खुन्दक भी बहुत जल्दी खा जाते थे। हमारे स्कूल में और पूरे क्षेत्र के स्कूलों में दसवीं – ग्यारहवीं क्लास तक के विद्यार्थियों को भी बांस की करची यानी छडियों से खूब मार पडती थी , होमवर्क नहीं होने पर सभी टीचर मारते थे ।  ग्यारहवीं में आए कई महीने बीत गए थे, किंतु अभी तक हक साहब को मुझे और राजेन्द्र को छडी से मारने का कोई मौका नहीं मिल पाया था, वे वैसे मौके की ताक़ में रहने लगे। हक साहब समाज अध्ययन भी पढाते थे, जिसमें विधायिका, कार्यपालिका  और न्यायपालिका आदि से संबंधित हर तरह का चैप्टर था। शनिवार का दिन था, उन्होंने कहा कि सोमवार को पेज नम्बर एक से सौ तक जो भी मैटर है, उससे सवाल पूरी क्लास से पूछे जाएंगे। हम समझ गए कि बहाना पूरी क्लास का था, टार्गेट तो हम ही दोनों थे।

मैं और राजेन्द्र शनिवार की शाम और रविवार को पूरा दिन किताब ले कर नदी किनारे बैठ कर एक – दूसरे से सवाल – जवाब करते रहे , वैसा कर हम सौ प्रतिशत तैयार हो गए। साढे दस बजे से स्कूल होता था, क्लास शुरू होते ही हक साहब ने सीधे पहले मुझसे सवाल करना शुरू किया, जवाब सौ प्रतिशत सही मिले। फिर, राजेन्द्र से उन्होंने सवाल करना शुरू किया, उससे भी जवाब सौ प्रतिशत सही मिले। छडी कोने में रखी थी, रखी रह गई, हक साहब ऐंठ कर रह गए।

दो पहर में हम सभी रोज की भांति टिफिन करने गए, टिफिन के बाद वाली क्लास उमाशंकर बाबू की थी। थोडी देर के बाद स्कूल के चपरासी रामदेव भाई ने सूचना दी कि मुझे और राजेन्द्र को हेडमास्टर गुप्ता जी बुला रहे थे। हम लोग ऑफिस की ओर जा रहे थे तो हक साहब ऑफिस से निकल कर किसी क्लास में जा रहे थे। ऑफिस में हम पहुंचे तो गुप्ता जी नहीं थे, वे बगल वाली क्लास में थे। हम जब वापस अपनी क्लास में लौट रहे थे तो हक साहब हमारी क्लास से निकल रहे थे। क्लास में हमें बताया गया कि कल हक साहब कि जो क्लास शाम को अंत में थी, उसे वे सुबह साढे नौ बजे ही लेंगे , छुट्टी चार बजे के वजाय तीन बजे ही हो जाएगी। क्लास की रंगत कुछ रहस्यपूर्ण लगी, पर हमें कुछ और पता न चला। स्कूल का नियमित समय साढे दस बजे से शाम चार बजे तक का था ।

मैं और राजेन्द्र आधी दूरी तक साथ ही जाते – आते थे , भेलवा टोला के नहर – पुल से ह्म दोनों के रास्ते अलग होते थे, इस तरह हम स्कूल से साथ ही निकलते और स्कूल पहुंचते भी एक ही साथ। अगले दिन हम दोनों अपनी तरफ से एहतियात बरतते हुए निर्धारित समय से आधा घण्टा पहले नौ बजे ही स्कूल पहुंच गए । सब कुछ शांत व सुनसान जैसा लगा। गुप्ता जी बरामदे से नीचे फूलों की क्यारियों में खडे धूप सेंक रहे थे, हम भी वहीं चले गए, सदा की भांति उनके पांव छुए और उनकी बगल में खडे हो गए । हम हाई स्कूल तक भोजपुरी में ही बात करते थे। गुप्ता जी ने मुस्कुराते हुए कहा – “ इहां का खडा होतार लोगन, तोहनी के यमराजवा त क्लास ले रहल बा, क्लास में जा, आज दुनू आदमी के छुदरा छोडा दी ”। गुप्ता जी की बात सुन कर हम दंग रह गए, क्लास तो साढे नौ बजे से थी, नौ बजे कैसे लग गई? गुप्ता जी ने बताया कि साढे नौ से नहीं, साढे आठ से क्लास रखी गई थी , तुम दोनों को कल जानबूझ कर एक घंटा पीछे बताने के लिए छात्रों को हक साहब ने हिदायत दी थी। अब रहस्य समझ में आया कि कल हम दोनों को क्लास से ऑफिस में भिजवाने के बहाने हक साहब हमारी क्लास में क्यों आए थे !

हम दोनों अनुमति ले कर क्लास के अन्दर गए और अपनी सीट पर बैठ गए। हमेशा की तरह हमारी सीट पर कोई दूसरा नहीं बैठा था। कोने में देखा तो मोटी करची की नई छडी रखी हुई थी, मामला हम समझ गए। देर से आने के कारण गुस्साए हक साहब ने पहले मुझे मारना शुरू किया , जी भर मार लेने के बाद उन्होंने राजेन्द्र की तरफ रूख किया और अन्धाधुन मारने लगे, हाथ पर, बदन पर , चारों तरफ चकते निकल आए, कई जगह से खून उभर आया । वह मेरी तरह किसान का बेटा तो था नहीं कि मवेशियों को खिलाने या किसानी की रसद पहुंचाने में थोडा बहुत रफटफ हो गया हो, वह तो पंडिताई करने वाले परिवार का नाजुक और सुकुमार लडका था, चोट से रोने लगा ।

मुझे याद आया, जब मैं दूसरी क्लास में था तो चुर्की – चुर्की के खेल में दारोगा मुखिया और तिलकधारी मुखिया ने घपला कर मुझे हरा दिया था। उन दोनों ने मुझे जोर – जोर से मारा था , बाद में मेरे बदले ध्रुव भाई ने मार झेली थी। मैं भी अपने मित्र को मार खाते और रोते देख कर आगे बढा, हक सहब की छडी को अपने पर लेने लगा और मन ही मन कहने लगा – “ जितना चाहें, मार लें, मैं उफ तक नहीं करूंगा ”। मेरे बदन पर छडी पर छडी बरसती रही , मेरी आंखें लाल हो गईं , पर मैंने आंसू का एक कतरा भी नहीं निकलने दिया, मेरे बाजू फडकने लगे और मेरे मन में आया कि छडी को हाथ में थाम लूं और हक साहब को छडी बरसाने से रोक दूं, मगर अनुशासन-हीन नहीं कहलाना चाहता था , इसलिए जब तक हक साहब ने खुद ही छडी नहीं फेंक दी, तब तक मैं अपने मित्र के लिए चुपचाप मार खाता रहा। छडी टूट गई थी, हक साहब हांफ रहे थे, राजेन्द्र रो रहा था और मैं निर्विकार खडा था। आखिरकार, हक साहब ने छडी फेंक दी, वे क्लास से निकल चले गए , उस दिन उन्होंने अन्य किसी भी क्लास को नहीं पढाया। उसी के बाद मैं हक साहब का सर्वाधिक प्रिय छात्र हो गया, ग्यारहवीं में पढते रहने के दौरान हक साहब ने ही मुझे 9वीं और 10वीं क्लास तक को भी पढाने का अवसर दिया था और कॉलेज में जाने के बाद छुट्टियों में गांव आने पर स्कूल में पढाने के लिए वे ही मुझे बुला लिया करते थे। उनके द्वारा दिए गए उन्हीं अवसरों ने आगे चल कर एक्स्ट्रोवर्ट और एक अच्छा वक्ता बनने का मेरा मार्ग प्रशस्त किया।

तब तक स्कूल के मेरे साथी रोमानी उपन्यास पढ कर उसकी प्रेम कथाओं की चर्चा करने लगे थे और फिल्में देख कर नायक – नायिकाओं, राज कपूर – नर्गिस, दिलीप कुमार – मधुबाला, देवानन्द – सुरैया आदि के रोमांस की रोचक व मनमोहक कहानियां सुनाने लगे थे । उन्हीं दिनों राजेन्द्र और मैं घर से पराठे और आलू – परवल की भुजिया ले कर बेतिया गए, आना – जाना मिला कर लगभग 90 किलोमीटर की दूरी में से 30 किलोमीटर की दूरी पैदल और शेष दूरी ट्रेन से हमने तय की। बेतिया में एक दिन में हमने दो फिल्में, सुनील दत्त – नूतन की ‘मिलन’ एवं दिलीप कुमार – वहीदा रहमान व मुमताज की ‘राम और श्याम’ देखी , रात प्लेटफॉर्म पर गुजारी , दूसरे दिन घर आए।

जब मेरा मैट्रिक (बिहार सेकंडरी बोर्ड की ग्यारहवीं) का रिजल्ट आया तो मैं सेकण्ड डिविजन में बहुत अच्छे अंक ले कर पास हुआ था, और, राजेन्द्र फर्स्ट डिविजन में बहुत अच्छे अंकों के साथ, उसे कुल 900 अंकों में से लगभग 700 तो मुझे लगभग 500 अंक मिले थे। मोतीहारी एमएस कॉलेज में मैं प्री यूनिवर्सिटी कला संकाय में और राजेन्द्र विज्ञान संकाय में पढने लगा। एक वर्ष का प्री यूनिवर्सिटी कोर्स पूरा होने को आया, किंतु इतने दिनों में राजेन्द्र से दो – चार बार ही भेंट हो पाई। वह जब भी मिलता, फिल्म और उपन्यासों की बात करता, पढाई के बारे में न बात करता और न ही बात करने का कोई मौका देता। प्री की फाइनल परीक्षा हुई , मैं द्वितीय श्रेणी में उच्च अंक ले कर पास हुआ, मैट्रिक में अपने परफर्मेंस से बेहतर कर सका, परंतु मैट्रिक प्रथम श्रेणी में भी उच्च अंकों से पास होने वाले मेरे प्रिय मित्र राजेन्द्र का प्री यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन सम्मानजनक नहीं रहा और अगले साल बीएस-सी पार्ट वन में तो वह मुश्किल से पास हो सका, जबकि मेरे परफरमेंस में उत्तरोत्तर सुधार होता गया।

बीएस-सी पार्ट वन के बाद राजेन्द्र पढाई छोड कर कोई वोकेशनल कोर्स करने के लिए दिल्ली चला गया। वहां से लौट कर उसने टीचर्स ट्रेनिंग कर ली और मिड्ल स्कूल में टीचर हो गया। मैंने पढाई जारी रखी और बीए ऑनर्स कर उसी हाई स्कूल में शिक्षक हो गया, जिसमें हम पढे थे। मैं स्कूल छोड कर जेपी आन्दोलन में शामिल हुआ, इमर्जेंसी बीती तो बैंक में आ गया, एमए भी कर लिया, राजभाषा अधिकारी के रूप में मेरा चयन हो गया और पदोन्नत होता रहा , उस बीच देश में भारत सरकार और केन्द्रीय संस्थानों में कार्यरत हजारों राजभाषा अधिकारियों में मैं नम्बर एक माना जाने लगा , मेरे परफर्मेंस के लिए मुझे विभिन्न राज्यों के राज्यपालों, रिज़र्व बैंक के गवर्नरों, केन्द्रीय मंत्रियों और भारत के राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत भी किया गया, कुछ साल पहले मैं चीफ मैनेजर पद से रिटायर हो गया, राजेन्द्र भी मिड्ल स्कूल के प्रिंसिपल पद से रिटायर हुआ।

राजेन्द्र मेरा घनिष्ठतम मित्र रहा है, मैं आज भी उसे उसी रूप में देखता हूं, क्योंकि मेरे अब तक के जीवन में अंतरंग मित्रों की संख्या दो अंकों में भी नहीं पहुंची है, मित्रों की गिनती राजेन्द्र से ही शुरू होती है। कुछ साल पहले वह मिला था तो उसके हर शब्द में व्यंग्य था, मुझे लगा था कि वह शायद अवसाद या हीनताबोध के घेरे में रहा हो, वरना उसके बोल दोस्ती के मक़तब में पढाए जाने वाले हर सिलेबस से बाहर के नहीं होते ।

जीवन की आपाधापी में दूरियां बढती चली गईं थीं। वह खुद में खोया वहीं खडा रहा, आगे देखने की जहमत भी नहीं उठाई उसने; मैं आगे बढता रहा, फिर भी मुड – मुड कर पीछे देखता रहा, वह गांव में रह कर भी शहरीपन में घिरा रहा और मैं नगरों – महानगरों में रह कर भी अपने गंवारपन का दामन नहीं छोड सका। इस लम्बे अन्तराल में उसकी कोई सदा न आई और न पहुंची मेरी आवाज़ उस तक। कुछ महीने पहले मैं अपनी आत्मकथा की पुस्तक उसे खुद दे आया था, शायद….. ?

अब जा कर फेसबुक ने हम दोनों को एक – दूसरे के सामने ला खडा कर दिया है, दूरियां कम होते हुई लग रही हैं, शुक्रिया फेसबुक !

गणतंत्रता दिवस की अग्रिम शुभकामनाएं !

यह आलेख मेरे ब्लॉग   shreelal.in   पर भी पढा जा सकता है ।

वह अक्खड लडका जो आज एक नामी फिल्मकार है

वह अक्खड लडका जो आज एक नामी फिल्मकार है

(मेरी आत्मकथा ‘आवाज़ बन आवाज़ दो’ से)

                                                                    

     अनायास एक महत्त्वपूर्ण, किंतु खतरनाक किस्म की सुखद साहित्यिक दुर्घटना हो गई !

दरभंगा में मैं नया – नया था। न्यू बैंक ऑफ इंडिया का 04 सितम्बर 1993 को पंजाब नैशनल बैंक में विलय हो जाने के बाद नवम्बर 1993 में मेरा स्थानांतरण पटना से दरभंगा हो गया ।  दरभंगा साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केन्द्र था। वहां बिहार का सबसे पुराना रेडियो स्टेशन था , वहां से मेरे प्रोग्राम प्रसारित होने लगे। दरभंगा में दो सरकारी और एक गैर- सरकारी, तीन विश्वविद्यालय थे। सरकारी विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमिनारों के संचालन के लिए तो कभी अन्य प्रतिष्ठानों द्वारा आयोजित सेमिनारों में अतिथि वक्ता के रूप में और कभी साहित्यिक संस्थाओं द्वारा आयोजित कविसम्मेलनों के संयोजन व संचालन के लिए मुझे आमंत्रित किया जाने लगा, परंतु उन सबके पहले एक महत्त्वपूर्ण, किंतु खतरनाक किस्म की सुखद साहित्यिक दुर्घटना हो गई ।

समस्तीपुर रेलवे मंडल की ओर से हिंदी दिवस के अवसर पर दरभंगा रेलवे क्लब हाउस में विराट कविसम्मेलन का आयोजन था। एक हिंदी अधिकारी होने के नाते मैं भी श्रोता के रूप में आमंत्रित था । उस कविसम्मेलन का संचालन कर रहे थे अविनाश दास, जो उस वक्त मिथिला विश्वविद्यालय (सीएम कॉलेज) में हिन्दी के छात्र थे, अच्छी कविताएं लिखते थे और अच्छा मंच संचालन करते थे ।  कुछ कवियों द्वारा काव्यपाठ के बाद अविनाश जी ने स्वयं काव्यपाठ किया और अचानक घोषणा कर दी कि आवश्यक कार्यवश उन्हें जाना होगा,  इसीलिए मंच संचालन किसी और से करा लिया जाए।

मौजूद कवियों में कवि तो अच्छे थे, किंतु उनमें से किसी की भी संचालन – क्षमता पर आयोजक रेलवे के वरिष्ठ हिंदी अधिकारी रामविलास महतो को भरोसा नहीं था और कविसम्मेलन फ्लॉप होने पर रेलवे के उच्चाधिकारियों की नजरों में महतो जी की भद्द पिटती, इसीलिए वे बार-बार अविनाश जी से रूकने का आग्रह कर रहे थे। अविनाश जी में ओवर कंफिडेंस था और शायद वह कहीं न कहीं अहंकार की सीमा तक पहुंच गया था, उन्होंने महतो जी का आग्रह ठुकरा दिया और अनायास, बिना किसी अनुमान या सूचना के,  संचालन के लिए मेरे नाम का ऐलान कर दिया, शायद उन्हें लगा होगा कि यह हिंदी अधिकारी भी कविता और कविसम्मेलन के मामले में फिसड्डी साबित होगा तथा ना – नुकुर करेगा, तब उन्हें यह कहने का मौका मिल जाएगा कि सभी हिंदी अधिकारी ऐसे ही बकलोल होते हैं और उन्हें एकछत्र संचालक होने का तमगा मिल जाएगा, किंतु उनकी सोच के विपरीत श्रोता – दर्शक दीर्घा से मंच पर आ कर  मैंने माइक सम्भाल लिया, हकबकाए-से अविनाश कवियों के बीच बैठ गए।

कविसम्मेलन तीन घंटों तक चला, अविनाश जी कहीं नहीं गए , पूरे तीन घंटे बैठे रहे और कविसम्मेलन का आनन्द लेते रहे । दीपक कुमार गुप्ता , जो उन दिनों मिथिला विश्वविद्यालय में एमए (हिंदी) अंतिम वर्ष के छात्र थे और आजकल नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली में सम्पादक हैं, सहित अनेक श्रोता-दर्शक, कविगण, रेलवे के उच्चाधिकारी आदि मुझे घेर कर मेरी प्रशंसा करने लगे। अविनाश जी भी सकुचाए हुए आए और सॉरी बोलते हुए बडी ईमानदारी से उन्होंने स्वीकार किया कि उन्हें लगा था कि दूसरा कोई भी संचालन के लिए होगा ही नहीं। उसके बाद अविनाश मेरे प्रशंसक हो गए और कभी – कभी अपनी कविताएं सुनाने मेरे पास आने लगे। उस कविसम्मेलन के बाद क्षेत्र के साहित्य – जगत में मेरी लोकप्रियता ऐसी हो गई कि दरभंगा एवं आसपास के शहरों में कविसम्मेलनों और मुशायरों आदि की तिथियां मेरी डेट्स लेने के बाद ही निर्धारित की जाने लगीं । अविनाश जी के विरोधाभासी व्यक्तित्व ने मेरे मन में उनके प्रति उत्सुकता जगा दी । मैंने महसूस किया कि वह लडका अक्खड तो था, किंतु अपनी कमी स्वीकारने का साहस भी था उसमें और साथ ही, गुणग्राहकता व कुछ कर गुजरने की उद्याम लालसा भी भरपूर थी, परंतु “नाम बडे और दर्शन छोटे” वाले लोगों को बर्दास्त करने का संयम नहीं था। उस तरह का एक और उदाहरण उस घटना के दो – तीन साल बाद फिर से देखने – समझने  को मिला।

बिहार सरकार की राष्ट्रभाषा परिषद ने पटना के गांधी मैदान में विराट कविसम्मेलन का आयोजन कराया। उसके निदेशक थे प्रसिद्ध कथाकार और सीएम कॉलेज दरभंगा के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ. रामधारी सिंह ‘दिवाकर’। उस कविसम्मेलन में काव्यपाठ के लिए दरभंगा से भी कुछ कवि आमंत्रित थे, जिनमें अविनाश दास और मैं भी था। कविसम्मेलन का संचालन मुझे दिया गया। कवियों की संख्या दो दर्जन से भी अधिक थी,  श्रोताओं का विशाल समूह था । सभी कवियों को विशिष्ट दर्शक दीर्घा में सामने पहली पंक्ति में लगीं विशेष कुर्सियों पर बैठाया गया था ।  मंच पर मंत्री, निदेशक के अलावा मुझे और सरकार के विभागीय सचिव आदि आईएएस अफसरों को बैठाया गया था।

कवि सम्मेलन शानदार तरीके से चल रहा था, कवि मंच पर आते, काव्यपाठ करते और फिर अपनी जगह पर जा कर बैठ जाते। जब मैंने अविनाश जी को अवाज़ दी तो वे मंच पर आए और  माइक थामते ही तैश में आ गए – “ राजनेता और नौकरशाह मंच पर बैठें,  कवि जमीन पर ! यह तो कवियों का अपमान है !! मैं इस व्यवस्था के विरोध में  कविसम्मेलन का बहिष्कार करता हूं उतना कह कर बिना काव्यपाठ किए ही वे मंच से उतर गए और पंडाल से बाहर जाने लगे। सभी हक्के – बक्के रह गए, कविसम्मेलन के आयोजक राष्ट्रभाषा परिषद के निदेशक और अविनाश जी के गुरू डॉ. रामधारी सिंह ‘दिवाकर’ बहुत दुखी हो गए।

चूंकि मैं संचालक था, इसलिए मंच को सम्भालना मेरी ही जिम्मेदारी बनती थी । अविनाश जी का विरोध जितना स्वीकार्य था, उनका तरीका उतना ही अस्वीकार्य था। अब उपलब्ध व्यवस्था में ही राष्ट्रभाषा परिषद और अविनाश जी सहित अन्य सभी कवियों का मान–सम्मान बढाने व विशाल श्रोता – समूह में शांति बनाये रखने का दायित्व स्वाभाविक रूप से मेरे ही कंधों पर था। मैंने कहा – “ सामने जमीन से जुडे कविगण हैं, इधर चौकी (काठ की चारपाई) रख कर बना मंच है। जिनके पास जमीन होती है , उन्हें जमीन्दार कहते हैं तो जिनके पास चौकी है, उन्हें क्या कहेंगे ”? श्रोताओं ने जोरदार तरीके से प्रतिक्रिया दी – “चौकीदार। मैं ने कहना जारी रखा–“ तो, राष्ट्रभाषा परिषद ने कवियों को जमीन्दार बनाया, परंतु मेरे भाई अविनाश जी, पता नहीं क्यों , जमीन्दार से चौकीदार बनना चाहते हैं”? जमीन्दर और चौकीदार की जुगलबन्दी पर बहुत देर तक तालियां बजतीं रहीं,  ‘दिवाकर’ जी खुशी से उछल पडे, अविनाश जी सभागार के मुहाने तक पहुंच गए थे, वे लौट पडे और अपनी जगह पर बैठ गए।

कुछ दिनों बाद एक बडे कार्यक्रम का संचालन करते हुए मैंने कहा कि अविनाश का स्वाभिमान और आत्मसम्मान का भाव सराहनीय है, परंतु यदि वे उसे अहंकार बनने से बचा सकें और अपनी क्षमता, रचनात्मकता, निर्भीकता व ऐंग्री यंग मैन की छवि को चैनलाइज कर सकें तो वे एक दिन हिंदी पत्रकारिता के राजकिशोर बनेंगे (राजकिशोर जी 80 के दशक में कोलकाता से प्रकाशित लोकप्रिय हिन्दी साप्ताहिक “रविवार” से जुडे एक ईमानदार व स्वाभिमानी पत्रकार थे , जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर निर्भीक पत्रकार होने की प्रतिष्ठा व प्रसिद्धि प्राप्त हुई )।

उस घटना के कई साल बाद मैं पीएनबी के अंचल कार्यालय पटना में पदस्थापित था, अविनाश जी एक युवती के साथ आए, बोले – “ सर, ये आपकी भावे (बडे भाई की पत्नी को हमारे यहां भाभी या भौजी कहा जाता है तो छोटे भाई की पत्नी को भावे कहा जाता) हैं, छपरा की क्षत्राणी हैं” अर्थात अविनाश जी ने अंतरजातीय विवाह कर लिया था। मैंने दोनों को बधाइयां व शुभकामनाएं दीं और स्वस्थ – प्रसन्न  सुखी एवं दीर्घ दाम्पत्य जीवन के लिए आशीर्वाद दिए, साथ ही, उपहार-स्वरूप उच्च क्वालिटी की कलम भी दी।

वर्षों बाद मेरा कहा बिल्कुल सही साबित हुआ, अविनाश जी एक प्रसिद्ध पत्रकार हुए और पटना में हिंदी दैनिक ‘प्रभात खबर’ के स्थानीय संपादक हो गए। उन दिनों मैं बैंक का पीआरओ भी था, सो उनसे हमेशा मिलना – जुलना होता रहा।  ‘प्रभात खबर’ में उनकी नहीं बनी, फिर वे घूमते – घामते एनडीटीवी में आउटपुटएडिटर के महत्त्वपूर्ण पद तक पहुंचे, किंतु वहां भी फिर उनका अहम – पगा आत्मसम्मान आडे आ गया, सब कुछ छोड – छाड कर “मोहल्ला डॉट कॉम” नाम से ब्लॉगर बन गए।

 अविनाश जी की सोच में नवोन्मेष चिंतन था, कुछ नया करने की अकुलाहट थी, वे बहुत कुछ करना चाहते, लेकिन जी हुजूरीसंस्कृति में खप नहीं पाते थे, इसीलिए उनकी क्षमता व गुणवत्ता से प्रभावित हो कर बडी बडी जगह बडे बडे लोग बडा – बडा काम उन्हें दे तो देते थे, परंतु उनके अक्खडपन से तुरंत ही अप्रसन्न हो जाते थे, फलस्वरूप अविनाश अपना दूसरा रास्ता नाप लेते थे। जब मैं पीएनबी हेड ऑफिस नई दिल्ली में राजभाषा विभाग का प्रभारी मुख्य प्रबंधक बना तो अविनाश जी से फोन पर बातें होती थीं, तब वे एनडीटीवी में आउटपुट एडिटर थे । उसके बाद वे ब्लॉगर बने , तब भी बातें होती रहतीं थी, लेकिन अचानक वे दिल्ली से गायब हो गए, उनका फोन नम्बर भी बदल गया, उनकी कोई खोज-खबर नहीं लगी, उन्होंने भी मेरी कोई खोज-खबर नहीं ली, वे गुमनामी में खो गए , मगर इस बार वे शायद किसी अन्य महत्ती उद्देश्य के लिए गुमनाम हुए थे।

वर्षों बाद पता चला कि अविनाश मुम्बई में फिल्म निर्माण के क्षेत्र में हैं, उनकी कहानी पर उन्हीं के निर्देशन में बनी हिन्दी फिचर फिल्म अनारकली ऑफ आरा रिलीज हो चुकी है। मैंने उनकी फिल्म देखी है । किसी अनाम किंतु मशहूर लोकनर्त्तकी की बायोपिक-सी लगती है वह फिल्म, जो दर्शकों को हर एक पल से बांध कर रखती है। फिल्म देखते हुए क्षण-भंग का एहसास इंटर्वल और दि एंड के अलावा कभी भी नहीं होता । फिल्म अपने दर्शकों के एक –एक पल और टिकट के एक – एक पैसे का हिसाब चुकता कर देती है। बहुत ही उम्दा फिल्म है वह, जो कला और कॉमर्शियल सिनेमा की खूबियों को समेटे बायोपिक और लोकप्रिय कथा-फिल्म होने की भी अनुभूति कराती है तथा दर्शकों के मानस को मनोरंजन व सामाजिक सरोकार के बीच मरोड कर रख देती है।

उस फिल्म के कथानक और छायांकन में नौटंकी और विदेसिया शैली की लचक, कसक व ठसक महसूस की जा सकती है । हालांकि फिल्म में द्विअर्थी लगने वाले दो – तीन छोटे – छोटे संवाद हैं, जिन्हें सुन कर खुद को संभ्रांत और प्रबुद्ध कहने वाले लोग ओठ बिचका सकते हैं, परंतु मेरा मानना है कि वे संवाद ही फिल्म के असल कथ्य हैं। अविनाश ने इस फिल्म के माध्यम से गोबरपट्टी में जीवंत मनोरंजन का पर्याय माने जाने वाले स्थानीय कलाकारों के संघर्ष को स्वर दे कर लेखन व निर्देशन, दोनों ही क्षेत्रों में, अपनी दमदार धमक दर्ज कराई है।

मैं ने दो दशक पहले अविनाश जी के बारे में जैसी आश्वस्ति अभिव्यक्त की थी, वैसी आश्वस्ति आज एक बार फिर व्यक्त करना चाहता हूं – “अविनाश दास में महेश भट्ट, मृणाल सेन और प्रकाश झा की तरह जहीन व बेहतरीन फिल्म लेखक – निर्देशक होने की समझ व संभावनाएं हैं, शर्त्त बस, वही पुरानी, कि….” !

अपनी तो औक़ात ही नहीं जी !

अपनी तो औक़ात ही नहीं जी !

  1. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मरहूम जस्टिस लोया के सुपुत्र ने अपने वकील के माध्यम से कहा है कि उनके पिता की मृत्यु संदिग्ध नहीं थी, इसलिए बेकार में उस मामले को तूल न दिया जाए यानी कि उनकी मौत स्वाभाविक थी। गोया इस देश में कानून की कोई किताब नहीं, जिसमें साक्ष्य या संकेत अथवा संदेह के आधार पर कोई जांच शुरू किए जाने की बात लिखी हो , केवल मृतक के परिजनों का बयान ही निर्णायक हो ! उनका यह भी कहना है कि जब उनके पिता की मौत हुई थी , तब वे 17 साल के नाबालिग थे, बहुत कुछ जान-समझ नहीं सके थे । शायद अब वे समझदार हो गए हैं और दुनियाबी बातों को समझने लगे हैं ! शंकालू लोग जस्टिस लोया की मौत के पीछे देश के किसी खासमखास ताकतवर व्यक्ति की ओर कुछ संकेत कर रहे हैं। फिटे मुंह लोग कुछ भी सोच लेते हैं।

कमाल की बात है कि यह पता नहीं चल पा रहा है कि वैसी समझदारी के पीछे क्या है ? मगर अपनी तो औकात ही नहीं है ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !

  1. सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को खत लिखते हुए उन्हीं के चार सहकर्मियों द्वारा प्रेस कॉंफ्रेंस किए जाने को लोग न्यायापालिका के अन्दर की बात बाहर लाने का दोष मढते हुए बहुत कुछ सुना रहे हैं।

कमाल की बात है कि यह समझ में नहीं आ रहा कि न्यायालय की पवित्रता चुप रहने में है या सच्चाई की खोज खबर लेने में? मगर अपनी तो औकात ही नहीं है ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !

  1. सेना के एक जवान ने भी पिछले साल मेस में भोजन की गुणवत्ता को ले कर कुछ वैसा ही किया था , बीएसएफ के जवान ने भी वैसा ही किया था, अनुशासन तोडने के नाम पर शायद उनकी नौकरी चली गई थी। अन्य नौकरियों में भी कुछ सिरफिरे ईमानदारी के भूत को सिर पर चढाए घूमते हुए पाये जाते हैं, उन्हें भी किसी न किसी तरह वैसा ही कुछ झेलना पडता है।  

कमाल की बात है कि वैसे मामलों की जांच क्यों नहीं कराई जाती और कराई भी जाती है तो नतीजे हमेशा एक जैसे ही क्यों आते हैं? मगर अपनी तो औकात ही नहीं ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !

  1. चापलुसी और चमचागीरी एक संस्कृति है । वैसे लोगों की चांदी तो

        अंग्रेजों के जमाने में भी थी और आज भी है, आगे भी रहेगी। वे भूल जाते

        हैं कि आदमी के शब्द उसके संस्कार के संवाहक होते हैं और आचरण उसके  

        पूर्वजों के साथ – साथ वंशजों के चरित्र की ओर भी साफ – साफ संकेत कर

        देता है। कल फेसबुक पर ही वैसा ही एक आदमी किसी के इस जन्म की

        जाति के आधार पर उसके अगले कई जन्मों की जाति की चर्चा भी कर

        गया ।

        कमाल की बात है कि वैसा आदमी भी खुद को समझदार और ईज्जतदार

        लोगों में गिने जाने की जिद्द करता है। मगर अपनी तो औकात ही नहीं है

        ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !

  1. फिल्म लाइन में कास्टिंग काउच तथा समाज में मासूम बच्चे – बच्चियों और औरतों के साथ यौन हरक़त करने वालों के विरुद्ध आवाज़ उठाने वालों को भी कुछ ज्यादा समझदार लोग नासमझ, घर की ईज्जत को सरेआम बाजार में उछालने का दोषी करार दे कर लताडते रहते हैं तथा उन्हें चुप रहने की नसीहत भी देते हैं ।

कमाल की बात है कि वैसे चुप कराने वाले लोग भी खुद को ईज्जतदार और समझदार लोगों में गिने जाने की जिद्द करते हैं, वे यह भूल जाते हैं कि उनका वह आचरण खुद उनके बारे में ही यह आम धारणा बना सकता है कि उन्होंने भी खुद और उनके घर के बच्चे-बच्चियों के साथ हुए वैसे कृत्यों को चुपचाप सह लिया होगा और आज भी सह रहे होंगे, चाहे घर – परिवार में हो या दफ्त्यर में ! मगर अपनी तो औकात ही नहीं है ऐसे विषयों में कोई टिप्पणी करने की !

  1. केन्द्र सरकार ने राजनीतिक चन्दों को पारदर्शी बनाने के नाम पर चुनावी बॉंड जारी कराने की बात कही है, हालांकि उस बॉंड पर न खरीदने वाले का नाम होगा, न देने वाले का और न ही लेने वाले का ; वह बॉंड भी एक विशेष बैंक ही द्वारा जारी किया जाएगा, जिसके पास बॉंड खरीदने वाले के बारे में ज्ञान होगा। सांविधिक दायित्वों के तहत वह बैंक भारतीय रिज़र्व बैंक के साथ तो उस ज्ञान को शेयर करेगा ही जो ज्ञान वित्त मंत्रालय यानी केन्द्र सरकार के पास पहुंच जाएगा जबकि बाकी लोग ज्ञान-पिपासु बने रहेंगे।  

कमाल की बात है कि बॉंड जारी कराने वाले यह समझ नहीं रहे हैं कि नोटबंदी का गुपचुप फायदा कुछ खास लोगों को दिला देने का आरोप लगाने वाले यहां भी यह आरोप लगा सकते हैं कि प्राप्त ज्ञान का वैसा ही कुछ उपयोग हो सकता है। पहले राजनीतिक चन्दा देने – लेने के पीछे कई तरह की सांविधिक पाबंदियां थीं, जिन्हें ठीक से लागू करा कर और कुछ प्रावधानों को ही ज्यादा पारदर्शी बना कर पूरी पारदर्शिता लाई जा सकती थी, परंतु उन्हें ठीक से लागू कराते तो बना नहीं, ऊपर से 2000 रूपयों तक के चन्दे नकद लेते – देते रहने की नीति जारी रखते हुए नये बेनामी बॉंड जारी होंगे । अब पता नहीं, ऐसे बॉंड से से कौन-सी और कैसी पारदर्शिता लाई जाई जा सकेगी ? मगर अपनी तो औकात ही नहीं ऐसे विषयों पर कोई टिप्पणी करने की !      

कौन ग़लत, कौन सही

कौन ग़लत, कौन सही

लोहिया जी ने कहा था – “ जिन्दा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं”,

परंतु उन्होंने यह नहीं बताया कि जब लोग भक्तिभाव में डूब कर आंखें मूंद कर  झाल – करताल ले कर शमशान से ले कर कब्रिस्तान तक और मंदिर से ले कर मस्जिद तक अहर्निश भजन – कीर्तन करने लगें तो नाज़ी के सामने क़ाज़ी को  आना चाहिए या नहीं ?

चूडा का गवाह दही , रही – सही बात चीनी ने कही

तिलकूट तिल-तिल जल पूछ रहा, कौन ग़लत है,कौन सही

 

पोंगल, बिहू, लोहडी और मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!

          महाभारत और गुजरात चुनाव के दाग़ कब धुलेंगे

महाभारत और गुजरात चुनाव के दाग़ कब धुलेंगे

 पांच हजार साल से ज्यादा का समय बीत गया, मगर मिट न सका शीर्ष सत्ता के माथे से अनैतिकता का वह कलंक ।

विद्वान बताते हैं कि विश्व में ऐसा कुछ भी नहीं है जो महाभारत में नहीं , क्योंकि एक तरफ अनीति, कुनीति, दुर्नीति, कूटनीति, राजनीति,धर्मनीति, दुर्भिसंधि, अनाचार, अत्याचार, कदाचार , व्यभिचार और छल – कपट की चरम सीमा का आईना है महाभारत तो दूसरी तरफ मानवीय मूल्यों, संबंधों, मर्यादाओं, उच्च आदर्शों का प्रतिमान भी है। महाभारत में ज्ञान का अथाह समुद्र, विज्ञान का असीमित आकाश व अध्यात्म का आह्लादमय अनहदनाद है तो भौतिक सुखों के लिए अनैतिक आचरण का उन्माद भी है। महाभारत इस बात का भी प्रमाण है कि धर्मयुद्ध के नाम पर युद्धधर्म और राजधर्म के मानदण्ड रक्तसनी मिट्टी से बनी किंचड में विलीन हो गए और लोग समझाते रहे कि कीचड में ही तो कमल खिलता है, सच, बहुत उपजाऊ है वह कीचड !

गुजरात विधान सभा चुनाव (2017) में भी बहुत-सी राजनीतिक मर्यादाएं ध्वस्त हुईं, नैतिक मूल्यों का ह्रास हुआ और संवेदनाओं का बहुत ही सस्ता बाजारीकरण हुआ। स्वतंत्र भारत के 70 साल के इतिहास में चुनावी महासमर के दौरान अपकथन,मिथ्या वचन, अनर्गल विवेचन, सत्ता – लोलुप राजनीतिक चरित्र का अपकर्ष तथा पद और कद का ऐसा अवमूल्यन पहले कभी भी, कहीं भी नहीं देखा गया।

लोकतंत्र के सजग प्रहरी क्या इन दाग़ों को धो पाएंगे? क्या भारतीय संस्कृति के संरक्षण की सुपारी लेने वाले इस तरफ विशेष ध्यान देंगे, अपने गिरेबान में झाकेंगे, आत्मालोचन करेंगे ? क्या लोकतंत्र के नाम पर एक तंत्र के अनियंत्रित नृत्यपर अशास्त्रीय संगत करने वाले साजिंदे तबले पर थाप देना बन्द करेंगे ? क्या विश्वविजय के असंयमित अभियान में अश्वमेध के अमर्यादित अश्वों की लगाम कोई थामेगा ? भारतीय लोकतंत्र के रथ-चक्र को कीचड से बाहर निकाल पाने में कोई सफल हो सकेगा ?

   वोट की राजनीतिक विसात –  नेहरू, पटेल और प्रसाद

वोट की राजनीतिक विसात

नेहरू, पटेल और प्रसाद

 

देश के प्रथम प्रधान मंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू, प्रथम उप प्रधान मंत्री एवं गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल तथा प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पद और कद का जैसा अवमूल्यन गुजरात चुनाव के दौरान हुआ, वह राष्ट्रीय भाव – धारा के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। वह चुनाव केवल जीत की राजनीति करने वालों की प्रवृत्तियों का वीभत्स नमूना बन गया अर्थात जीत जैसी भी हो और जिस तरह से भी मिले, कोई गुरेज नहीं, भले ही भारतीयता, राष्ट्रीयता और लोकतांत्रिक मान्यताओं के प्रतीक महापुरूषों की अवमानना ही क्यों न करनी पडे ! चुनाव बीत जाने और चुनाव परिणाम आ जाने के बाद उन बीती बातों को ‘बीता हुआ कल’ मान कर मरघटी चुप्पी में जी लेना राजनीतिक मरण से भी बदतर है।

चूंकि चुनाव गुजरात में था, इसलिए भाषणों में सोमनाथ मंदिर का आना जरूरी माना गया । चूंकि सोमनाथ चर्चा का विषय बना, इसलिए ग़जनी का आक्रमण, सोमनाथ मंदिर का भंजन, गृह मंत्री पटेल द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार, डॉ. प्रसाद द्वारा मंदिर के नये कलेवर का उद्घाटन और राष्ट्रपति के उस कार्यक्रम के प्रति प्रधान मंत्री पं. नेहरू की असहमति आदि का भी चर्चा में आना जरूरी समझा गया । परंतु , उस कवायद में जिस प्रकार भारत के प्रथम नागरिक और संविधान के सर्वोच्च संरक्षक राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के प्रति सहानुभूति एवं गृह मंत्री लौह पुरूष सरदार पटेल के प्रति क्षेत्रीय अपनत्व प्रदर्शित करने के बहाने प्रधान मंत्री पं. नेहरू के प्रति संशय और अवमानना का भाव लाया गया , वह ने केवल नेहरू का , बल्कि उन तीनों महान विभूतियों के पद और कद का स्पष्ट रूप से अवमूल्यन था। वह प्रकरण भारतीय जनमानस के लिए  चिंतन का विषय होना चाहिए। उस पूरे विषय को मत बटोरने का माध्यम बनाने वाले राजनेता चुनाव बीत जाने और उसका परिणाम आ जाने के बाद भले ही भुला दें ,  भारत के संवेदनशील नागरिकों को  कदापि नहीं भुलाना चाहिए।

भारत का जो संवैधानिक स्वरूप है, उसके अनुसार राष्ट्रपति द्वारा मंदिर के उद्घाटन कार्यक्रम के प्रति प्रधान मंत्री की असहमति सर्वथा उचित भी थी और निहायत जरूरी भी । एक व्यक्ति के रूप में पं. नेहरू और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की धर्म के प्रति आस्था भिन्न हो सकती है, परंतु एक प्रधान मंत्री और रष्ट्रपति के रूप में उनकी निष्ठा निर्धारित थी। इस कथन का तात्पर्य यह नहीं कि किसी एक ने उस निष्ठा का पालन किया और किसी दूसरे ने नहीं, ऐसी  सोच तो सम्यक राष्ट्रीय दृष्टिकोण वाले किसी भी व्यक्ति की हो ही नहीं सकती। वह तो व्यक्ति एवं पद के बीच संवैधानिक चिंतन की पराकाष्ठा थी , जिसे आज लोग अपने राजनीतिक फायदे का जरिया बना रहे हैं।

मेरी इस सोच का प्रमाण डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की ही दो पुस्तकें – ‘आत्मकथा’ और ‘इंडिया डिवाइडेड’ हैं। ये दोनों पुस्तकें डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के विचारों के आईना हैं। इनमें उनकी सोच, चिंतन – परम्परा और तथ्यात्मक गवेषणा पूरे कलेवर में दिखती है। वे अपनी ‘आत्मकथा’ में पारिवारिक – सामाजिक धार्मिक मान्यताओं की चर्चा करते हुए कलकत्ता प्रवास के दौरान विदेश जाने या न जाने के प्रति एक ज्योतिषी की भविष्यवाणी प्रकारांतर से सच होती हुई दिखाते हैं तो ‘इंडिया डिवाइडेड’ के प्रथम पृष्ठ में ही मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष के रूप में मोहम्मद अली जिन्ना के उस भाषण का उल्लेख करते हैं जिसमें जिन्ना ने दो राष्ट्रों के सिद्धांत को जरूरी बताया था। डॉ. प्रसाद उसी पुस्तक में आगे जा कर बाबर के वसीयतनामे का उल्लेख करते हुए भारत में मंदिरों के विध्वंस की भी चर्चा करते हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत ऐतिहासिक तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में गुजरात चुनाव के दौरान प्रथम प्रधान मंत्री, प्रथम गृह मंत्री और प्रथम राष्ट्रपति के प्रति सोमनाथ मंदिर प्रकरण में की गई बयानबाजी निहायत गैरजरूरी तो लगती ही है, नीयत में किसी प्रछन्न एजेण्डा होने की ओर भी इंगित करती है। अयोध्या राममंदिर – बाबरी मस्जिद विवाद पर बहस करने वालों को ‘इंडिया डिवाइडेड’ और बाबर के वसीयतनामे का अध्ययन अवश्य करना चाहिए ताकि यह पता चल सके कि शासन की सुदृढता एवं लोकप्रियता के लिए जनमानस की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान व्यक्त करना कितना जरूरी होता है और स्वयं को ऊंचा दिखाने तथा दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति कितनी भयावह होती है।

मैं ऐसा कह सकता हूं, क्योंकि गुजरात चुनाव के दौरान बडे लोगों के भाषणों का अध्ययन, श्रवण और मनन करने के बाद तथ्यों से साक्षात्कार के लिए 1100 पृष्ठों की वे दोनों पुस्तकें मेरे सामने हैं । यद्यपि इन दोनों पुस्तकों का प्रथम संस्करण 1946 में ही प्रकाशित हो गया था, तथापि धर्म, समाज, राजनीति और इतिहास पर उनके विचार आईने की तरह साफ और जल की तरह निर्मल होने के अकाट्य प्रमाण हैं। इसीलिए किसी विषय पर वैचारिक मतभेद को वैयक्तिक शत्रुता के रूप में बता कर राजनीतिक लाभ उठाने की प्रवृत्ति सर्वथा अनुचित और जनमत को गुमराह करने की नीयत प्रतीत होती  है।

अगली कडी में महाभारत की कथा …. प्रतीक्षा करें ….

नववर्ष मंगलमय हो

नववर्ष मंगलमय हो

नववर्ष – 2018 का स्वागत व अभिनन्दन करते हुए

“सर्वे भवंतु सुखिन सर्वे संतु निरामया” की कामना

के साथ मैं वादा करता हूं कि ये

सातों वचन निभाऊंगा  :

  1. सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने का साहस व सुनने का धैर्य बनाए रखूंगा तथा सही व ग़लत की परिभाषा विषय-परक के वजाय वस्तु-परक होने की नीति जारी रखूंगा।
  2. निरर्थक तर्क-वितर्क में विजयी हो कर अपनों का अपनापन खो देने के बदले उन्हीं को विजयीभाव महसूस करने दे कर उनका स्नेह प्राप्त करते रहने की नीति पर चलता रहूंगा, फिर भी, अपनों के लिहाज के कारण सही को सही और ग़लत को ग़लत कहने की नीति नहीं छोडूंगा।
  3. आस्था और अन्धविशवास के बीच की सीमा-रेखा जानने का प्रयास करता रहूंगा।
  4. धर्म, राजनीति और नैतिकता में पाखण्ड को उजागर करने की नीति जारी रखूंगा।
  5. पद और कद के अवमूल्यन के खिलाफ आवाज़ उठाता रहूंगा।
  6. धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, देवी-देवता, तीर्थ , ईश्वर आदि सब कुछ से ऊपर अपने देश की मिट्टी को मानने की नीति जारी रखूंगा।
  7. एक चेतन – चिंतनशील – मननशील – संवेदनशील सामाजिक प्राणि के रूप में आदमी होने का प्रयास जारी रखूंगा।

नववर्ष की हार्दिक बधाइयां और शुभकामनाएं !!

 

 

 

हार्दिक बधाइयां शुभकामनाएं शुभाशीष !!          

हार्दिक बधाइयां शुभकामनाएं शुभाशीष !!

 

मेरी सबसे छोटी बेटी शिप्रा आर्यन ने आज शुक्रवार दिनांक 21.12.2017 को प्रात: 6.21 बजे मदरहुड बंगलोर में पुत्री को जन्म दिया । मेरी दौहित्री (नतीनी) का हार्दिक स्वागत ! अभिनन्दन !!

बेटी शिप्रा आर्यन और दामाद अभिषेक आर्यन को लक्ष्मी, सरस्वती एवं शक्ति का समन्वित स्वरूप –  पुत्री प्राप्त होने पर हार्दिक बधाइयां , शुभकामनाएं व शुभाशीष तथा आदरणीय समधी जी एवं समधन जी को भी दादा – दादी बनने का सौभाग्य प्राप्त होने पर हार्दिक बधाइयां और शुभकामनाएं।

मेरी नतीनी सदा सर्वदा स्वस्थ–प्रसन्न रहे, दीर्घजीवी हो, सौभाग्य, यश और ऐश्वर्य उसकी सहचरी हो –

नाना-नानी, मामा-मामी एवं समस्त पूर्वजों, स्वजनों-परिजनों एवं शुभैषियों के आशीर्वाद उसके साथ हैं! ईश्वर की अनुकम्पा उस पर सदा बनी रहे और आप सबके आशीष उसे प्राप्त होते रहें!

हार्दिक बधाइयां, शुभकामनाएं और अशेष शुभाशीष !!          

ओपीनियन लांड्रिंग (एकांकी नाटक)

ओपीनियन लांड्रिंग (एकांकी नाटक)

डिस्क्लेमर ( ‘ओपीनियन लांड्रिंग’) नामक इस एकांकी नाटक का किसी भी चुनावी राजनीति से प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई सरोकार नहीं है, कथानक और पात्र बिल्कुल काल्पनिक हैं। धरती , आकाश या पाताल लोक में किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति से यदि कहीं कोई साम्य दिख जाए तो वह महज संयोग होगा, उसके लिए लेखक उत्तरदायी नहीं होगा)

अंक एक : दृश्य एक

(परदा उठता है, सूत्रधार का प्रवेश)

 

सूत्रधार : मेहरबान ! कद्रदान !! शाहबान !!! सावधान,  दुनिया भर के शब्दकोशों में आज

एक नया शब्द जुडने वाला है , जुड रहा है, जुड गया है। स्वागत कीजिए, लेकिन

पहले स्वागत – अभिनन्दन नन्दी जी का।

 

(नन्दी का प्रवेश)

 

नन्दी : वह कौन-सा शब्द है सूत्रधार ?

 

सूत्रधार:ओपीनियन लांड्रिंग’’

 

नन्दी : ओपीनियन और लांड्रिंग , ये दोनों शब्द तो पहले से ही अंग्रेजी

शब्दकोशों में हैं!

 

सूत्रधार: होंगे , लेकिन इतिहास में पहली बार मेरे नाटककार ने दोनों को एक

साथ मिला कर एक नया शब्द बनाया है – ओपीनियन लांड्रिंग। मेरा

नाटककार जो भी करता है, वह इतिहास में पहली बार ही होता है।

 

नन्दी : ‘मनी लांड्रिंग’ शब्द तो सुना था परंतु ‘ओपीनियन लांड्रिंग’ तो पहली बार

सुन रहा हूं। लांड्रिंग का मतलब धुलाई, सफाई , कपडे की धुलाई, मनी लांड्रिंग का

मतलब काले धन की धुलाई यानी सफाई अर्थात काले धन को सफेद

करना, मतलब दो नम्बर को एक नम्बर बनाना होता है, कभी-कभी

भाई लोग सामने वाले की भी बात – बेबात लांड्रिंग कर

देते हैं, मगर तुम्हारे ‘ओपीनियन लांड्रिंग’ का मतलब क्या है ?

 

सूत्रधार: सही दिशा में जा रहे हैं नन्दी महाराज आप ! ठीक समझ रहे हैं !!

       ‘ओपीनियन लांड्रिंग’ का मायने है ‘मन की सफाई’, विचारों की सफाई,

        सलाहों की सफाई, रायशुमारी की सफाई, सफाई की सफाई, क्योंकि

        जो दिखता है, वह है नहीं, जो नहीं दिखता, वह था नहीं और जो वे

        कहते हैं, वह होता नहीं, फिर भी, कुछ न कुछ तो होता है, उसी ‘कुछ न

        कुछ’ को अपनी ओपीनियन बता देना और पहले बताई गई

        ओपीनियन को लोगों का मन बदलने के लिए ‘मन की बात’ बना देना

        ही ‘ओपीनियन लांड्रिंग’ है।

 

नन्दी : समझ गया , समझ गया, भलीभांति समझ गया यानी अपना उल्लू

सीधा करना। गंदा है, पर धंधा है, इसीलिए चलता है, यह भी चलेगा।

भगवान भोलेनाथ भला करें ! जय बाबा सोमनाथ !! द्वारिकाधीश

तुम्हारे नाटक के लिए सफलता के द्वार खोलें !!! जय हो !

(परदा गिरता है)      

 

 

                          दृश्य दो

(कलाकारों की दो टोलियां मेला में ‘तमाशा दिखाओ’ प्रतियोगिता में भाग ले कर थके-हारे

लौटी हैं। विजयी टीम के दो अहम कलाकार घर पहुंच कर वार्तालाप करते हैं)

 

गप्पू : अरे ओ शप्पू ! वो कितने सितारे थे ?

शप्पू : एक सितारा और मिट्टी के तीन दीपक  – कुल चार, उस्ताद !

गप्पू : वो चार थे और हम चवालीस, फिर भी हमारे घर जुगनू जैसी ही रोशनी

और उसके घर सफेदी की चमकार ! क्या समझ रखा है, उस्ताद खुश

होगा ? शाबाशी देगा ??

शप्पू : हमारे पास चवालीस नहीं, बयालीस सितारे ही थे उस्ताद !

दो तो हम खुद ही थे, आप सूरज और मैं चंदा !

गप्पू : कोई दीपक नहीं था क्या हमारे पास ?

शप्पू : नहीं उस्ताद। आप ही का हुक्म था कि चांद, सूरज और सितारों के होते

हुए मिट्टी के दीपकों की क्या औकात ! उनका भाव न बढाया जाए !

(कुछ सोचते हुए)

गप्पू : अरे ओ शप्पू !

शप्पू : जी, उस्ताद !

गप्पू : आज की आमदनी कितनी हुई है ?

शप्पू : एक कम सौ उस्ताद !

गप्पू : अब तक की कुल कमाई कितनी थैलियों में है?

शप्पू : एक कम बीस में उस्ताद !

गप्पू : और वो इसलिए कि एक कम तीस कोस दूर जब कोई पप्पू बाजीगर बनने की

कोशिश करता है तो तमाशबीन समझाते हैं, “चुप हो जा पप्पू, नहीं तो गप्पू आ

जाएगा”, और एक तुम हो कि इतने सितारों के होते हुए भी अपने घर में अंधियारा

फैला रखे हो। तुमने हमारा नाम मिट्टी में मिलाय दियो। पप्पू के मिट्टी के दीयों में

तेल और बाती भी नहीं, तमाशायियों ने उसे उतने पैसे भी नहीं दिए, फिर भी उसके

घर दिवाली जैसी रौनक है और हमारे घर सितारों के बावजूद अंधियारा ! हमारी जीत

में भी लोग हार बता रहे हैं और उसकी हार में भी जीत का मज़ा !

शप्पू : वह इसलिए उस्ताद कि मुकाबला हमारे इलाके में था, दर्शक हमारे अपने थे। फिर भी

हम हारते–हारते जीते । दर्शकों ने शायद घर की मुर्गी को दाल बराबर समझ लिया।

और सच पूछिए उस्ताद तो वास्तव में हम घर के जोगडा ही हैं, बाहर वालों ने हमें

जोगी बना रखा है, यह सब भक्तों का कमाल है।

 

गप्पू : जो भी हो, केवल नाम के सितारे कलाकारों का जमावडा कर रखा है तुमने ? इसकी

सजा मिलेगी, बरोबर मिलेगी ।

शप्पू : मैंने आपका नमक खाया है उस्ताद  !

गप्पू : तो अब बोली खा ।

शप्पू : दुहाई उस्ताद ! वह बोली आप ही को लगेगी, क्योंकि आप मुझमें और

मैं तो आप में ही हूं ! दूसरे सितारे तो केवल नाम के थे ।

गप्पू : ठीक है, ठीक है, बडी हाडतोड मेहनत हुई है, इतनी मेहनत तो बाहरी इलाके में

तमाशा करने में भी नहीं हुई थी। हम थक गए हैं, चलो आराम करें,कोई भजन सुना।

शप्पू : (गाल बजाते हुए) ‘आराम है हराम’ प्रभु जी ….  !

गप्पू : अरे चुप्प ! इसे तो पप्पू की टोली वाले गाते हैं । तुम नकल काहे

मारता है जी ? अरे बुडबक, नकल मारना है तो मार, लेकिन उसे

असल बता और इस तरह बता कि पब्लिक को लगे कि इतिहास में

पहली बार हम ही यह भजन सुना रहे हैं।

शप्पू : इतिहास की शुरुआत कहां से मानें उस्ताद ?

गप्पू : अरे चांद के चचेरे चाचा ! इतना भी नहीं समझ पाए ? हम जहां

खडे होते हैं, इतिहास वहीं से शुरू होता है।

शप्पू : तो फिर कौन-सा भजन सुनाएं उस्ताद ?

गप्पू : जैसे-  उसका वाला भजन है ‘आराम है हराम’ तो तुम अपना भजन

गाओ –   ‘हराम है आराम’ ।

शप्पू : जी उस्ताद –  ‘हराम है आराम’ । मगर इससे क्या होगा उस्ताद !

गप्पू : अरे ओ शप्पू , मेरी डंवाडोल नाव के चप्पू ! इसे ही कहते हैं

‘ओपीनियन लांण्डरिंग’ यानी मन की सफाई अर्थात भक्तजनों को भ्रमित

कर पब्लिक पर वशीकरण मंत्र मारना । हमारा तमाशा देखने पब्लिक

यूं ही नहीं आती । मगर एक बात तो बता , हम हुनरबाजों की बेहतरीन बाजीगरी

को जादूगरी मानने के बजाय लोग मदारी का तमाशा कह रहे हैं और अनाडी

बेहुनर पप्पू को लोग खिलाडी कह रहे हैं, ऐसा क्यों ?

शप्पू :  वह इसलिए उस्ताद कि हम वास्तव में खेल तो मदारी वाला ही दिखाते

हैं परंतु उसे जादूगरी और बाजीगरी बताने के लिए भक्तजनों की टोली

तैयार कर लेते हैं । बस, पब्लिक ‘मैजिक. मैजिक’ कहते हुए पागल

हो जाती है ।

गप्पू : रस्सी पर चलने वाला खेल है बडा खतरनाक ! आज तो मैं धडाम से

नीचे गिर गया होता और हड्डी पसली बराबर हो गई होती !

शप्पू : आप सचमुच नीचे गिर गए थे उस्ताद , वह तो पप्पू की टोली का खेल देख

कर आ रहे एक दर्शक ने रस्सी थाम ली, वरना …. !

गप्पू : वरना क्या ?

शप्पू : अब जाने भी दीजिए उस्ताद ! घर की बात घर में ही रहे तो ठीक ।

 

दृश्य तीन

(दोनों करवटें बदलते हुए )

 

शप्पू : नींद नहीं आ रही उस्ताद  ।

गप्पू : तुम किधर से बोल रहे हो शप्पू ? केवल तुम्हारी आवाज सुनाई पड रही है , तुम्हारा

हमेशा चम-चम चमकने वाला चांद-सा चमकीला चेहरा मुझे क्यों नज़र नहीं आ रहा ?

शप्पू : मुझे भी केवल आपकी आवाज ही सुनाई पड रही है उस्ताद , दम-दम दमकने वाला

दमदार मुखमंडल आप का मुझे भी नहीं  दिख रहा !

 

(अंधेरे में टटोलते हुए दोनों एक दूसरे के गले मिल कर रोते हैं। दोनों के चेहरे आंसू से

      तर ब तर हो जाते हैं। आंसू से धुल जाने पर एक दूसरे का चेहरा नज़र आने लगता

      है। आंसू पोंछने पर हाथ में कुछ लग जाता है)

 

 गप्पू : (हाथ को निहारते हुए ) कहीं पप्पू गुलाल के बदले हमारे चेहरे पर कुछ और तो नहीं

लगा गया?

शप्पू : जी उस्ताद , ऐसा ही कुछ हुआ-सा लगता है।

 

 

 

 

गप्पू : तुम तो बहुत बडे चाणक्य बनते थे ! इतना भी न सूझा कि अंधेरी रात में न चांद

काम आता है , न सूरज ; और सितारों से तो वैसे भी अंधेरा नहीं भागता, सितारे

दिशा-बोध करा सकते हैं, रास्ता नहीं बताते। कुछ दीयों का इंतजाम क्यों नहीं किया?

शप्पू : इंतजाम करने की कोशिश की थी उस्ताद, किंतु कहीं से एक दीया भी न मिला ।

गप्पू : तो भगवान सोमनाथ, द्वारिकाधीश या जगन्नाथ जी से ही मांग लेते !

शप्पू : उनके दरबार में पप्पू भी गया था उस्ताद और लगता है कि वहां जा कर कुछ ज्यादा

ही रोया–धोया, शायद इसीलिए भगवान उस पर पसीज गए।

गप्पू : तो फिर अम्बा मैया से गुहार लगाते या राम जी से मांग लेते !

शप्पू : मांगा था उस्ताद ! लेकिन पप्पू वहां भी चला गया  ।

गप्पू : तो श्मशान और कब्रिस्तान भेजने की धमकी दे देते ।

शप्पू : दी थी उस्ताद ! परंतु डरने के बजाय पप्पू श्मशान में जा कर भगवान भूतनाथ को

ही डायलग मार आया ।

गप्पू : हमसे बडा डायलगबाज कौन हो गया रे ? पप्पू ने कौन-सा डायलग मारा ?

शप्पू : वही वाला उस्ताद -“ तेरे दर पर आया हूं, कुछ कर के जाऊंगा;

                       झोली भर के जाऊंगा या मर के जाऊंगा”।  

( मरघटी चुप्पी छा जाती है , परदा गिरता है, फिर परदा उठता है )

 

 

 

दृश्य चार

(दातून करते हुए मनुहार से )

 

गप्पू : शप्पू भाई, दीये मांगने से नहीं मिले तो तुमने बना क्यों नहीं लिये ?

शप्पू : कोशिश की थी उस्ताद ! किंतु दीये बने ही नहीं क्योंकि मिट्टी सूख गई थी, उसे

गीला करने के लिए चुल्लू भर पानी भी नहीं मिला।

गप्पू : अरे चुप्प ! अंट शंट बोलते रहते हो । चुल्लू भर पानी मिल भी जाता तो क्या कर

लेते ? उसमें खुद डूबते और मुझे भी डुबाते ?

 

     (दोनों चिंतामग्न बैठे हैं। गप्पू अचानक चीखता है )

गप्पू :  तो फिर तुमने दीये खरीद क्यों नहीं लिये ?  

शप्पू : चिल्लाइए मत उस्ताद ! आप ही का हुक्म था कि मिट्टी के दीयों का भाव न बढाया

जाए।इसलिए मैंने ज्यादा जोर नहीं लगाया वरना मेरे मन में तो वह बात आई ही थी।

गप्पू : तो तुमने क्यों नहीं बताई अपने मन की बात ?

शप्पू : अपने मन की बात कब बताता ? सारा समय तो आप के मन की बात सुनने में लग

गया !

गप्पू : ठीक है , ठीक है । ध्यान रहे कि रो – धो कर और गिडगिडा कर पब्लिक की

सहानुभूति ज्यादा दिनों तक नहीं बटोरी जा सकती, भक्तजनों की टोली को भी

टिकाए रखने के लिए कोई दूसरी जुगत  लगानी पडेगी।

शप्पू :  तो खेल में सुधार लाना ही होगा उस्ताद !

गप्पू : तुम भी नहीं सुधरोगे । खेल सुधारने से क्या होगा ? पप्पू की टोली में हमसे बेहतर

खेल दिखाने वाले हैं और पप्पू अब हमारी टेकनिक भी समझ गया है । सबसे आसान

तरीका है दर्शकों में भक्तिभाव जगाना। भक्तजनों की संख्या बढा दो, खिलाडियों का

नहीं, तालियों का प्रबंध करो ।

शप्पू : जी उस्ताद !

गप्पू : इस बात का खास ध्यान रहे कि हमारी बातें पब्लिक में न पहुंचे, वरना उनके मन से

हमारा आकर्षण समाप्त हो जाएगा । यह भी ध्यान रहे कि हमारी टोली में भी ये

बातें न पहुंचे , नहीं तो टोली के सदस्य  विद्रोह पर उतर आएंगे और हमारी उस्तादी

मानने से भी इंकार कर देंगे। अभी और भी कई मेलों में तमाशे दिखाने हैं।

शप्पू : जी उस्ताद, समझ गया ।

गप्पू : यह लो, पाकिस्तानी घास से बना चाइनीज टीस्सु पेपर, इसमें अमेरीकी परफ्यूम वाला

जापानी केमिकल लगा है, इससे चेहरा चमकेगा भी और गम गम गमकेगा भी , मल

लो अपने चेहरे पर और खूब ढोल बजवाओ । चलो, बाहर भक्तजन भजन गाने में

मगन हो रहे हैं, जयकारे लगा रहे हैं।

 

(दोनों चेहरा साफ कर लेते हैं, हाथ में हाथ डाले कदमताल कर हंसते – गाते निकलते हैं)

युग्म गीत : इमली का बूटा, बेरी का बेर; इस जंगल में हम दो शेर!!

समूह गान : शेर के घर में सवा सेर ; शोर मचाने लग गए शेर !!

(भक्तजन जोर – जोर से भजन गाने लगते हैं, जयकारे शोर में बदलते जा रहे हैं, धीरे –

धीरे शोर की ध्वनि धीमी पडती जा रही है , परदा गिर जाता है) ।

58 visitors online now
20 guests, 38 bots, 0 members